बुधवार, 25 जुलाई 2012

आखरी भाग


                                                   अबू याह्या की कलम से 


प्रिय पाठकों 
यह कहानी अगर आप ने पूरी कर ली है तो उम्मीद है कि ज्यादा तर पाठकों की तरह आपके लिए भी एक नई दुनिया का परिचय साबित हुई होगी. लेकिन मेरी तमन्ना है कि यह नॉविल आप के लिए सारे आलम के रब की आखरी किताब का भी एक नया परिचय बन जाए.
मैंने जो कुछ लिखा है वह कुरआन और हदीसों के बयानों और संकेत वजाहतों (विवरण) में लिखा है. अल्लाह बदले के दिन का मालिक है. जन्नत (सुवर्ग) असल कामयाबी है. जहन्नम (नरक) का अज़ाब असल विफलता है. दुनिया का जीवन थोड़ा और धोखा है. इन्सानयत की आखरी कामयाबी सिर्फ ईमान (ईश्वर पर यकीन) और नेक आमाल (कर्म) की कुरानी दावत (पुकार) की पैरवी (पालन) में है. यही सब नबियों की दावत और कुरआन का सार है. मुझे विश्वास है कि इस उपन्यास को पढ़ने के बाद जब आप कुरआन को समझ कर अनुवाद के साथ पढ़ेंगे तो कुरान मजीद के बयान के मायने बड़ी हद तक आप पर स्पष्ट होने लगेंगे. कुरान आपके लिए अनदेखी दुनिया का नहीं बल्कि एक जानी पहचानी दुनिया का परिचय बन जाएगा. यदि आपने कुरआन को इस तरह पा लिया तो यह मेरी सबसे बड़ी सफलता होगी.
उम्मीद है कि इस नॉविल के पढ़ने के बाद आप कम से कम एक बार पूरे कुरआन को अनुवाद के साथ पढ़ने की कोशिश जरूर करेंगे.
अच्छी उम्मीद के साथ खुदा हाफिज़ 
अबू याह्या
abu.yahya786 @ gmail.com
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                                                            मेरी कलम से 


प्रिय पाठकों 
मुझे अपने भाषा का ज्ञान कम होने का पूरा हसास है, मैं इस अनुवाद में होने वाली गलतियों की पूरी जुम्मेदारी लेता हूँ, अगर भाषा की वजह से कोई बात गलत समझ ली गई है तो उसका भी जुम्मेदार सिर्फ मैं हूँ. इस अनुवाद में कुछ कमी हो सकती है इस लिए जो लोग उर्दू पढ़ सकते हैं वे इस किताब को उर्दू ही मैं पढ़ें.
अगर आप को ये जरा भी पसंद आई है तो अपने सभी दोस्तों को इस ब्लॉग का लिंक ज़रूर दें और मेरी तरफ से उनसे इसको पढ़ने का अनुरोध करें, के अच्छी बात फैलाना भी सदका (दान) है.
(नोट: इख्तिलाफ के दरवाज़े खुले हैं झिजक महसूस ना करें)
हदीस= ''मेरी उम्मत का इख्तिलाफ मेरी उम्मत के लिए रहमत है ''
दुआओं में याद रखें, खुदा हाफ़िज़ वस्सलाम.
मुशर्रफ अहमद 
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भाग १५.१ जब ज़िन्दगी शुरू होगी

दरबार शुरू होने वाला था. जन्नत के आम लोग, खास लोग, सारे नबी, शहीद, सहाबा, शोहदा दरबारी सब अपनी अपनी जगह पर आकर बैठ रहे थे. दरबार से पहले खुदा की तरफ से एक खास दावत का आयोजन था. यह दावत अभी तक होने वाली सबसे बड़ी दावत थी जिसमें हज़रत आदम से लेकर क़यामत तक के सभी जन्नती एक साथ जमा थे. पांच बड़े नबियों को अल्लाह की ओर से दावत की मेजबानी की जिम्मेदारी दी गई थी. नूह, इब्राहीम, मूसा, ईसा और मोहम्मद अलैहिम सलाम इस दावत के मेजबान (host) थे.
यह दावत एक बहुत ऊँचे पहाड़ के दामन में आयोजित हुई थी. यह बहुत विशाल मैदान था जो एक बाग के रूप में फैला हुआ था. यहाँ से दूर दूर तक फैला हुआ हरा भरा क्षेत्र आँखों को ठंडक दे रहा था. इस मैदान के बीच में नदियाँ बह रही थीं. इस दावत का पूरा इन्तिज़ाम अरब की परंपरा और शान व शौकत के अनुसार किया गया. इसी लिए सीटें शाही सिंहासन के रूप में थीं जिन पर हीरे और मोती जुड़े हुए थे. ज़मीन पर दूर दूर तक नर्म कालीन और गालीचे बिछे हुए थे. गुलामान (सेवकों) की एक बड़ी संख्या हाथों में तरह तरह के शरबत के जग लिए फिर रहे थे. जन्नती को जिस प्रकार का शर्बत चाहिए होता वह नज़र उठाते और गुलामान पल भर में हाज़िर होकर उनकी इच्छा के अनुसार जाम भर देते. यह शरबत क्या था एक पारदर्शी ड्रिंक था जिसमें बहुत स्वाद था. इसके अलावा बहुत से लज़ीज़ खाने, सोने और चांदी के बर्तनों में लगातार पेश किए जा रहे थे. पेड़ों की डालयाँ फलों से लदी थी और जब फल का जी चाहता वह डाली झुक जाती और लोग फल को तोड़ लेते.
अच्छे अच्छे कपड़े पहने खुबसूरत लड़के और लड़कियां हर तरफ नजर आए. उनके चेहरे रोशन, आंखें चमकदार और होंठो पर मुस्कुराहटें थीं. यह मंज़र देखकर मुझे दुनिया की महफ़िलें याद आ गईं जहां औरतें मेकअप का ताम झाम किये, खुदा की बनाई हुई हदों को तोड़ती अपने जिस्म की नुमाइश करती महफ़िलों में शामिल हुआ करती थीं. मर्द अपनी निगाहों को झुकाने के बजाय इस नुमाइश से मज़ा लिया करते थे. अपने जिस्म का प्रदर्शन ना करने वाली औरतों और अपनी निगाहों को नीचा रखने वाले मर्दों को कितनी मुश्किलों का सामना करना पड़ता था.
लेकिन अब सारी मुश्किलें ख़त्म; मैंने दिल में सोचा. यह महफ़िल खुबसूरत औरतों से भरी हुई थी जिनके कपड़े भी और गहने अपनी खूबसूरती में बे मिसाल और हर नज़र को अपनी और खींच लेने के लिए काफी थे. लेकिन अल्लाह ने इंसानों के मन इस तरह पाक (पवित्र) कर दिए थे कि निगाहों में बेशर्मी और दिलों में बेईमानी की कल्पना भी कोई नहीं कर रहा था. हर मर्द और हर औरत खुबसूरत पर पाकी (पवित्रता) के अहसास में जिन्दा था. अब न अपनी खूबसूरती को छुपाने का कोई हुक्म था न निगाहों को नीचा रखने की ज़रूरत थी. कितनी थोड़ी थी वह महनत और कितना ज्यादा है यह बदला.
मेरे साथ मेरे घर वाले और दुन्याँ में रहे मेरे दोस्त और करीबी रिश्तेदार बैठे थे. मेरे बच्चे मेरी फिर शादी करवाकर बहुत खुश थे. उसी मौके (अवसर) पर जमशैद व अमूराह की रजामंदी से उनकी भी शादी कर दी गई और वह भी हमारे परिवार का हिस्सा बन चुकी थी. ज़िन्दगी ख़ुशियों की राह पर तेज़ी से दौड़ रही थी. मेरे दिल में बस एक  बेनाम सा एहसास था. वह यह कि मेरे सारे प्यार करने वाले लोग मेरे साथ आ चुके थे, सिवाय मेरे उस्ताद (गुरु) फरहान अहमद साहब के. एक मामूली सी उम्मीद थी कि शायद मैं दरबार में उनसे मिल सकूं.
दावत खाने के बाद लोग दरबार में अपनी निर्धारित सीटों पर आकर बैठना शुरू हो गए. अर्श इलाही के बिल्कुल करीब ख़ास लोग बैठे हुए थे. जिस में अम्बिया हज़रात, नबियों के सहाबा और शहीद और सालेहीन की एक बड़ी संख्या शामिल थी. जबकि बाक़ी जन्नत वाले उन के पीछे बैठे हुए थे. इस बैठक की सबसे खास बात यह थी कि आज पहली बार लोगों को खुदा के दीदार (दर्शन) की नेमत से फैज़याब (लाभान्वित) होना था जो जन्नत वालों का सबसे बड़ा सम्मान था. नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने खबर दी थी कि जिस तरह दुनिया में चौध्वी के चांद का दीदार किया जाता है, उसी तरह जन्नत में दीदार इलाही होगा. इसलिए लोगों में बहुत उत्साह था. इसके अलावा आज ही के दिन लोगों का सम्मान और उनके पद औपचारिक रूप उन्हें दिए जाने थे. इसलिए हर आदमी दरबार के शुरु होने की राह देख रहा था.
लोग अपनी अपनी सीटों पर  बिराजमान हो चुके थे. हर जुबान व दिल पर अपने रब की तारीफ़ बड़ाई की तसबीह थी. लोग बार बार यह कह रहे थे कि यह सब अल्लाह का एहसान है कि उसने हमें सीधी सच्ची राह दिखाई वरना हम कभी जन्नत में नहीं पहुंच सकते थे.
दरबार की शुरुआत पर फरिश्तों ने अल्लाह की तसबीह और तमजीद की. इसके बाद दाऊद अलैहिस्सलाम तशरीफ़ लाये और अपनी मीठी आवाज़ में एक खुदा की तारीफ का गीत इस तरह गाया कि समां बंध गया. इसके बाद अर्श को उठाने वाले फरिश्तों ने ऐलान किया कि आलम के परवरदिगार अपने बन्दों से बातचीत करेंगे. कुछ ही देर में अल्लाह ने बहुत प्यार और नरमी के साथ बन्दों से बातचीत फ़रमाना शुरू की.
इस बातचीत में अल्लाह ने अपने बंदों की तारीफ़ फ़रमाई जो अपनी मेहनत, संघर्ष और धैर्य से इस जगह तक पहुंचे थे. बन्दों से पूछा गया कि क्या वह इस सिले से राज़ी हैं जो उनकी मेहनत के बदले उन्हें मिला है. सब ने एक जुबान होकर जवाब दिया कि हमने अपनी उम्मीदों से बढ़कर बदला पाया है और वो सब कुछ पाया है जो किसी प्राणी को नहीं मिला. हम क्यों तुझ से राजी न हों. पर इरशाद हुआ अब मैं तुम्हें वह दे रहा हूँ जो हर चीज़ से बढ़कर है. मैं तुम्हें अपनी रज़ामंदी से नवाजता हूँ. इसके साथ ही फिज़ा में अल्लाह की बड़ाई के नारे गूंजने लगे.
 फिर रुतबे और सम्मान का सिलसिला शुरू हुआ. यह एक लंबी प्रक्रिया है. लेकिन यहां अनगिनत नेअमतें लगातार मिल रही थीं जिनकी वजह से लोग इत्मीनान के साथ बैठे हुए थे. दुसरे लोगों की तरह मेरे घर वाले भी मेरे साथ ही अगली सीटों पर बैठे थे. मैं यह सब कुछ देख रहा था और मन में सोच रहा था कि दुनिया की कितनी कम परेशानी उठाकर आज कितना बड़ा इनाम इंसानों को मिल रहा है. लेकिन फिर मुझे ख्याल आया कि इंसानों की ज्यादा बड़ी संख्या तो परीक्षा में असफल ही गई . फिर मुझे अपने उस्ताद फरहान साहब का ख्याल आया. वह आज भी मुझे नहीं मिल सके थे हालांकि मेरा ख्याल था कि आज के दिन तो कहीं न कहीं मिल ही जाएंगे. मैंने सोचा कि सालेह से पूछूँ. पर वह यहाँ मेरे साथ नहीं था. लेकिन उसी समय वह मेरे पास आ खड़ा हुआ.
उसे देख कर मैंने कहा:
' मुझे लगता था कि मैं दरबार में अपने उस्ताद (गुरु) को देख सकता हूँ. लेकिन वह मुझे नहीं मिल सके. तुम्हे मेरे उस्ताद का कुछ पता चला?'
'' नहीं जन्नत की इस बस्ती में अभी तक वे मुझे कहीं नहीं मिल सके. मुझे लगता है कि अब तुम भी उनके बारे में सोचना छोड़ दो. लगता है उनके बारे में ख़ुदा अपना फैसला कर चुका है. दुनिया की कोई ताकत अब इस फैसले को नहीं बदल सकती. खुदा का इन्साफ बहरहाल लागू होकर रहता है.''
' और उसकी रहमत?'
'' तुम अच्छी तरह जानते हो कि खुदा का रहम और इन्साफ हर चीज़ उसूल (सिद्धांत) पर आधारित है. किसी की इच्छा से यहाँ कुछ भी नहीं बदल सकता.''
'मगर जन्नत की यह दुनिया तो मुमकिन की दुनिया है. यहाँ सब कुछ मुमकिन है.'
सालेह झल्ला कर बोला
'' यार तुम क्यों बहस कर रहे हो. फैसला हो गया है. वैसे तुम खुद ईश्वर से बात क्यों नहीं करते. तुम्हारी बात तो बहुत सुनी जाती है. मैं तो तुम्हें अर्श तक ले जाने आया हूँ. चलो और समय का पहिया उल्टा घुमाने की दुआ करो.''
खबर नहीं कि सालेह ने गुस्से में आकर मुझ से यह कहा था या सचमुच मुझे सुझाव दिया था. लेकिन इस बात पर अमल करने की मूर्खता करने के लिए मैं तैयार नहीं था. लेकिन उसकी यह बात ठीक थी कि मुझे बुलाया जा रहा है. कुछ ही देर में मेरा नाम पुकारा गया. मैं जो अभी तक इत्मीनान से बैठा था लरज़ते दिल के साथ खड़ा हो गया. मैं धीरे धीरे क़दमों से चलता हुआ उस हस्ती के सामने पेश हो गया जिसके अहसानों के बोझ तले मेरा रोआं रोआं दबा हुआ था. करीब पहुँच कर मैं सजदे में गिर गया.
कुछ देर बाद आवाज़ आई:
'' उठो!''
मैं धीरे धीरे उठा और झुकी नज़र के साथ हाथ बांधकर खड़ा हो गया.
अल्लाह ने बहुत नरमी के साथ पूछा:
'' अब्दुल्लाह! आज के दिन मेरे लिए क्या लाए हो?''
मैं तो यहां लेने आया था, कुछ देने के लिए नहीं. इसलिए यह सवाल मेरी उम्मीद के बिलकुल उलट था. लेकिन जो मेरे पास था वह मैंने कह दिया:
' मालिक जो अच्छा काम मैंने किया वह हकीकत में तेरी ही तौफीक (करने,मदद) से था. उसे तो मैं पेश नहीं कर सकता. रहा मेरा वुजूद तो मेरे पास तेरी आला (उच्च) हस्ती के सामने पेश करने के लिए .... बहुत सारी नदामत (लज्जा) और इल्तिज़ा के सिवा कुछ नहीं.'
जवाब मिला:
'' अच्छा किया कि नदामत और इल्तिज़ा ले आए. यह चीजें मेरे पास नहीं होती. उन्हें मैं तुम्हारे नाम से अपने पास रख लूँगा. अब बोलो क्या मांगते हो?''
मैंने अर्ज़ किया:
' आपकी दी हुई हर चीज़ और आप की रज़ा मन्दी दोनों मिल गए हैं. मेरा ज़र्फ़ इतना छोटा है कि उसके बाद मांगने के लिए कुछ नहीं बचता. लेकिन जो भी भलाई और भीख आप अता (प्रदान) करेंगे मैं उसका का मोहताज (ज़रुरत मन्द) हूँ.'
करीब मोजूद अर्श के उठाने वाले फरिश्ते को इशारा हुआ. उसने मेरे इनाम और रुतबे बयान करना शुरू कर दिए. यह तो मुझे पता था कि मैं इस नई दुनिया का हुक्मरान (राजा) और हाई क्लास का हिस्सा हूँ, मगर जो दिया गया वह मेरी हैसियत, अपेक्षाओं और मेरी औक़ात से बहुत ज्यादा था. फरिश्ता बोले जा रहा था और मैं शर्म से सिर झुकाकर यह सोच रहा था कि आलमों के परवरदिगार की करीम हस्ती मुझ जैसे गुनाह गार (पापी) के साथ ऐसी है तो नेक लोगों के साथ कैसी होगी?
फरिश्ता चुप हुआ तो मुझे संबोधित करके कहा:
'' अब्दुल्लाह! गुनाह गार तो सब हैं. पर वापस लौट आने वालों और तौबा करने वालों को मैं गुनाह गार नहीं लिखता. और तुमने तो मुझसे और मेरी मुलाक़ात से बंदों को परिचित कराने के लिए अपनी ज़िन्दगी लगा दी थी. तुम्हें तो मैंने वफादार लिखा है.''
पल भर की ख़ामोशी के बाद कहा गया:
'' मुझे पता है जो कुछ अभी तुम सालेह से कह रहे थे. मैं वह भी जानता हूँ जो तुम हष्र में अपने आमाल नामे के पेश होने के वक़्त सोच रहे थे. तुम यही सोच रहे थे ना कि काश एक मौका और मिल जाए. काश किसी तरह गुज़रा हुआ समय फिर लौट आए. ताकि मैं एक एक इंसान को झिंझोड़ कर इस दिन के बारे में चेता सकूं.
अब्दुल्लाह! मैं तुम्हारी तड़प को अच्छी तरह जानता हूँ और मुझ से जुड़ी तुम्हारी उम्मीदों को भी. यह तुमने ठीक समझा कि बेशक मुझे किसी की ज़रुरत नहीं और यह भी कि मैं जमाल व कमाल और जलाल (महिमा) वाला हूं. मैं यह भी जानता हूँ कि तुम्हारी कुल सम्पत्ति यही है कि तुम्हारी पहुँच मेरे क़दमों तक है. मेरे लिए तुम्हारी भी अहमियत (महत्व) है और तुम्हारी इस बात की भी, लेकिन...''
फिर एक ख़ामोशी छाई और मैं लरज़ते दिल के साथ सोच रहा था कि मेरे रब (प्रभु) से न ज़ुबान से निकलने वाले शब्द छुपे रहते हैं और न दिल में आने वाले ख्याल ही उसके इल्म (ज्ञान) से बाहर रह सकते हैं. बे इख़्तियार मेरी ज़ुबान से निकला:
'मेरे रब आप पाक (पवित्र) हैं.'
'' मुझे मालूम था कि तुम अपनी दिली तमन्ना दर्शाने के लिए बयान का यही तरीका अपनाओगे. देखो! लोगों को फिर दुनिया में भेजना मेरी योजना का हिस्सा नहीं. उस दुनिया में न तुम जा सकते हो और न दूसरे इंसान. मगर समय मेरा गुलाम है. मैं चाहूं तो उसका पहिया उल्टा घुमा सकता हूँ.''
फिर एक फरिश्ते को इशारा हुआ. वह हाथों में चांदी के पन्नों का पुलिंदा लेकर मेरे पास आया. मैंने देखा तो पहले पेज पर सोने के तारों से लिखा था:
'' जब ज़िन्दगी शुरू होगी''
आवाज़ आई:
'' अब्दुल्ला! यह तुम्हारी दास्तान है. इस नई दुनिया में जो तुम्हारे साथ हुआ, उसका कुछ हिस्सा इसमें महफूज़ (सुरक्षित) कर दिया गया है. तुम्हारी खातिर अब तुम्हारी इस कहानी को समय की खिड़की से दोबारा पिछली दुनिया में भेजा जा रहा है. इस बात का इन्तिज़ाम किया जाए कि यह दास्तान इंसानों तक पहुंचा दी जाए. मैं अपने बन्दों और बंदियों के दिलों में डाल दूंगा. कि वह तुम्हारी इस कहानी को अपने हर चाहने वाले तक पहुँचा दें ..... हर इंसान तक जिसे वह आखिरत (परलोक) की रुसवाई से बचाकर जन्नत की मंजिल तक पहुंचाना चाहते होंगे. अजब नहीं कि कोई खुश किस्मत इस पैगाम (संदेश) को पढ़ कर अपने अमल (कर्म) सुधार ले. अजब नहीं कि किसी की ज़िन्दगी बदल जाए. अजब नहीं कि किसी का भविष्य बदल जाए. मैं लोगों को तुम्हारी दुआ (अनुरोध) पर एक मौका और देना चाहता हूँ. आखरी घाटे से पहले, आखरी बर्बादी से पहले, आखरी तबाही से पहले इस क़यामत से पहले.''
मैं बे इख़्तियार 'अल्लाहुअकबर कहता हुआ सजदे में गिर गया.
...............
अल्लाहुअकबर अल्लाहुअकबर. मौअज़्ज़न (अज़ान पढने वाला) ने अभी यह शब्द पढ़े ही थे कि अब्दुल्लाह एक झटके के साथ 'अल्लाहुअकबर कहता हुआ जाग गया. वह खाली खाली नज़रों से आसपास देख रहा था. कुछ देर तक वह नहीं समझ सका कि वह कहाँ है. वह तो अल्लाह के सामने खड़ा था. उसने गोर किया. वह अभी भी अल्लाह के सामने मौजूद था. ठीक बैतुल्लाहहराम में काबे के सामने. फज्र (सुबह) का समय था और मस्जिदुलहराम में लोगों की चहल पहल जारी थी.
' तो क्या मैंने सपना देखा था?' अब्दुल्ला ने खुद से सवाल किया.
'मगर वह तो बिल्कुल सच था. वह हष्र का दिन, वह जन्नत की महफ़िल और खुदा के सामने मेरी पेशी... अगर वह सच था तो फिर यह क्या है? और अगर यह सच है तो फिर वह हकीकत से ज्यादा यकीनी चीज़ क्या थी. वह सपना था या सपना है.'
वह लगातार बड़बड़ाए जा रहा था:
'' ऐसा न हो कि अचानक एक दिन आंख खुले और मुझे मालूम हो कि जो कुछ दुनिया में देखा था सपना तो दरअसल वह था और सच आखिरत की ज़िन्दगी था.
आसमान से नूर उतर रहा था. सफेद जगमगाती हुई रोशनियों से हरम (क़ाबा) की फिज़ा दूध्या हो रही थी. आसमान अभी काला ही था, लेकिन इस जगह दिन की रौशनी से ज्यादा चहल पहल थी. यह हरम मक्का था. ईमान वालों का काबा. दिल वालों का केंद्र और मुहब्बत वालों का क़िबला. ख़ुदा के बन्दे और बंदिआं ... हर जाति, हर समुदाय के लोग यहां जमा थे. ईश्वर की स्तुति, बड़ाई और तारीफ करते हुए.
आज हरम पाक में अब्दुल्लाह की आखरी रात थी. लेकिन यह आखरी रात अब्दुल्लाह के जीवन की सबसे कीमती रात बन चुकी थी. अब्दुल्लाह कुछ देर पहले हैरानी की जिस स्थिति में था, अब उससे बाहर आ चुका था. उसने हरम को देखा और फिर आसपास नज़र डाली. हरम से बाहर हर तरफ ऊँची ऊँची इमारतों का मंज़र था. यह देख कर उस पर एक दूसरी कैफियत छा गई. उसकी आंखों से आंसू बहने लगे. उसका दिल मालिक ज़ुलजलाल के लिए खुद एक विनती बन गया:
' मालिक! क़यामत का समय सर पर आ खड़ा हुआ है. नंगे पैर बकरियां चराने वाले (अरब वाले) ऊँची ऊँची इमारतें बना रहे हैं. तेरे महबूब रसूल की भविष्यवाणी पूरी हो चुकी है. अब मुझे तेरे बन्दों तक तेरा पैगाम (संदेश) पहुंचाना है. क़यामत से पहले उन्हें क़यामत के हादसे से खबरदार करना है. मुझे लोगों को झिंझोड़ना है. आज दुनिया की मुहब्बत आखिरत की फ़िक्र पर ग़ालिब आ चुकी है. तेरी मुलाकात से बेपरवाही आम है. शासक क्रूर और जनता जाहिल. अमीर माल में मस्त हैं और ग़रीब अपने हाल में मस्त. व्यापारी मुनाफा खोर और झूठे हैं. नेता बेईमान हैं. कर्मचारी कामचोर हैं. मर्दों का जीने का मकसद सिर्फ रुपया कमाना बन चुका है और औरतों का मकसद सिर्फ फैशन मेकप और जिस्म दिखाना.'
अब्दुल्लाह की आंखों से आंसू जारी थे. उसके दिल से लगातार दुआएं और मिन्नतें निकल रही थी. वह दुआ जिसका क़ुबूल होना शायद मुक़द्दर बन चुका था.
'' मौला! आज लोग तुझ से ग़ाफ़िल और बे परवाह होकर अत्याचार और दुनिया परस्ती में ज़िन्दगी गुजार रहे हैं. धर्म के नाम पर खड़े लोग सांप्रदायिकता के अधीन या राजनीति में उलझे हुए हैं. कोई नहीं जो तेरी मुलाकात से सावधान कर रहा हो. तू मुझे इस सेवा के लिए क़ुबूल फरमाले. तू मुझे अपने पास से ऐसी सलाहियत (क्षमता) अता कर कि मैं तेरी मुलाक़ात और आने वाली दुनिया का नक्शा तेरे बन्दों के सामने खींच कर रख दूं. जो कुछ तू ने कुरान में बयान किया तेरे महबूब नबी ने जिस घटना की खबर दी है, उस दिन की एक जीवित तस्वीर तेरे बन्दों तक पहुँचा दूँ. इंसानियत को पता नहीं कि उसके पास मोहलत ख़त्म हो चुकी है. मुझे क़ुबूल कर कि मैं इस बात से तेरे बन्दों को खबरदार कर सकूं. मेरे रब! सारी इंसानियत को सीधी राह की हिदायत दे. और अगर तूने सब कुछ खत्म करने का फैसला कर लिया है तो फिर मेरे लिए आसानी कर दे कि जितने लोग हो सकें, मैं उन्हें जन्नत की राह दिखा सकूँ. उन्हें तुझ तक पहुँचा सकूँ.... इससे पहले कि सूर फूंक दिया जाए .... इससे पहले कि अमल की मोहलत खतम होजाए..''
........................................................................................................जारी है....

मंगलवार, 24 जुलाई 2012

भाग १५.० जब ज़िन्दगी शुरू होगी


जन्नत में धीरे धीरे मेरे जानने वाले लोग भी आते जा रहे थे. अलग अलग मजलिसों में उनसे मुलाकात हो रही थीं. उन में दुन्याँ में मेरे समझाने पर ऊँची इमानी और अख्लाकी (नैतिक) ज़िन्दगी गुज़ारने वाले लोग भी थे और ख़ुदा के दीन (धर्म) में मेरा साथ देने वाले मेरे साथी भी. इनमें से हर आदमी से मिलकर यूँ लगता था कि ज़िन्दगी में खुशी और मुहब्बत का एक दरवाज़ा और खुल गया है. लेकिन वो अभी तक नहीं आई थी जिसका मुझे इंतजार था. हालांकि इस इंतजार में कोई परेशानी नहीं थी बल्कि मजा ही था. फिर एक दिन, हालांकि इस नई दुनिया में रात और दिन नहीं रहे थे, सालेह मेरे पास आकर कहने लगा:
'' सरदार अब्दुल्लाह तुम्हारे लिए एक बुरी खबरी है.''
मुझे हैरत हुई कि जन्नत में मुझे यह क्या बुरी खबर सुनाऐगा. लेकिन इसका लहजा ऐसा था कि मैं पूछने पर मजबूर हो गया:
' क्यों भाई! यहाँ क्या खबर बुरी खबर हो सकती है?'
'' सरदार अब्दुल्लाह बुरी खबर यह है कि तुम्हारे ऐश के दिन ख़त्म हो गए. तुमने नाएमा के पीछे आज़ादी के बहुत दिन देख लिए. अब तुम्हारी निगरानी के लिए नाएमा खुद आ रही है.''
' क्या सच?' मैंने जल्दी से ख़ुशी के मारे सालेह को गले लगाते हुए कहा.
'' और क्या मैं झूठ बोलूंगा?''
फिर मेरे सर को सहलाते हुए बोला:
'' मुझे छोड़ दो. मैंने नाएमा के आने की खुश खबरी दी है. मगर मैं खुद नाएमा नहीं हूँ.''
' तुम हो भी नहीं सकते.' मैंने उसे छोड़ते हुए कहा.
' लेकिन यह बताओ कि इतनी अच्छी खबर तुम मुझे धमकी के अंदाज में क्यों सुना रहे हो. वैसे तुम्हें नाएमा से अगर यही उम्मीदें हैं तो मुझे विश्वास है कि तुम्हें बहुत निराशा होगी. खैर छोड़ो इन बातों को. मैं नाएमा के आने पर उसे एक बहतरीन तोहफा देना चाहता हूं.'
'' क्या तोहफा देना चाहते हो?''
' एक बहतरीन घर.'
'' भाई तुम्हारे पास तुम्हारा घर है और उसके पास उसका घर है. अब इस नई दुनिया में खानदानी निज़ाम (व्यवस्था) तो है नहीं कि घर देना तुम्हारी जिम्मेदारी हो, न उसे तुम्हारे बच्चों को घर बैठकर पालना है. फिर नया घर क्यों बनाते हो?''
' मुझे पता है कि हर जन्नती का अपना घर और अपनी सल्तनत होगी, लेकिन मेरी इच्छा है कि अपनी पसंद से नाएमा के लिए घर बनाऊँ जो मेरी सल्तनत में हो. और फिर उस घर को नाएमा को गिफ्ट करूँ.'
'' जानते नहीं खुदा ने ज्यादा बढ़ने वालों को शैतान का भाई कहा है?'' वो इस समय मुझे तंग करने के मूड में था.
' जन्नत में शैतान नहीं आ सकता, लेकिन उसके कुछ चेले जरूर हैं जो मियाँ बीवी में प्यार पैदा करने के बजाय दूरी पैदा करते हैं.' मैंने बनावटी गुस्से के साथ उसे घूरते हुए कहा.
'' ठीक है ठीक है.'' वह हाथ जोड़ते हुए बोला
'' मुझे बताओ क्या करना चाहते हो?'''
उसके बाद मैंने उसे सारी स्कीम समझाई. मेरी बात ख़त्म हुई तो वह बोला:
'' चलो महल देखने चलो.''
मैंने हैरान होकर पूछा:
' क्या मतलब?, क्या महल बन गया?'
'' तुम क्या समझते हो तुम दुनिया में खड़े हो कि पहले जमीन ख़रीदोगे, फिर नक्शा पास कराओगे, फिर कोई ठेकेदार ढूँडोगे और फिर कई महीनों में महल तैयार होगा. सरदार अब्दुल्लाह! यह तुम्हारी सल्तनत है. खुदा की शक्ति तुम्हारे साथ है. तुमने कहा और सब हो गया. यही यहाँ का कानून है.
...............
हम दूर तक फ़ले हुए सागर के ऊपर सफ़र कर रहे थे. सालेह और मैं समुद्री जहाज जैसी किसी चीज में सवार थे. सवारी का यह तरीका सालेह के कहने पर ही अपनाया गया था. उसका कहना था जन्नत में जितना सुखद मंजिल पर पहुँचना है इतना ही मज़ेदार वहां तक ​​पहुंचने का रास्ता है. उसकी बात ठीक थी. मुझे दुनिया की ज़िन्दगी में समुद्री सफ़र कभी पसंद नहीं आया था. लेकिन इस सफ़र की बात ही कुछ और थी. यह जहाज़ एक तैरता हुआ महल जैसा था जिसके ऊपर हम दोनों खड़े थे. धीमी हवा और खुशगवार (सुखद) मौसम में आगे बढ़ते हुए हम अपनी मंजिल के करीब पहुंच रहे थे.
हमारी मंज़िल वह पहाड़ी द्वीप था जिसे एक महल के रूप में नाएमा के लिए तैयार किया गया था. यह महल बिल्कुल वैसा ही था जैसा मैं सालेह को बता रहा था. बीच समुद्र में एक बहुत बड़ा द्वीप, जहां हरे हरे पहाड़, दरया, नदियां, समुद्र के साथ चलने वाले पहाड़ी रास्ते, घास के बड़े बड़े मैदान और इन सबके बीच एक घर. जिसका फर्श पारदर्शी हीरे का बना हुआ. ऐसा फर्श जो हीरे की तरह चमकदार और शीशे की तरह पारदर्शी हो, इतना पारदर्शी कि उसके नीचे बने होज़ों में बहता पानी और उनमें तैरती रंग बिरंगी मछलियों साफ़ नज़र आएं. जिसकी दीवारें पारदर्शी चांदी की बनी हों जो बाहर का हर मंज़र दिखाई दे और जिसकी ऊँची और बड़ी छत सोने की हो और छत पर मोती, जवाहरात और कीमती पत्थर जड़े हों. यह महल कई मंजिल ऊँचा हो. इतना ऊँचा कि आसपास के पहाड़ों से भी ऊँचा हो जाए. जिसकी हर मंजिल से कुदरत और उसकी खूबसूरती का एक नया मंज़र दिखाई दे.
यहाँ आकर जो कुछ मैंने अपने सामने देखा मेरे बताने और अंदाज़े से कहीं ज्यादा खुबसूरत था. इसकी वजह शायद यह थी कि मेरे शब्द उन नेमतों का बयान (वर्णन) करने के लिए बहुत कम थे जो मुझे हासिल थीं. मैंने तो एक सामान्य नक्शा या ख्याल बताया था, लेकिन उस नक़्शे में डिज़ाइन, रंग और रूप रौशनी और दूसरी आराम की चीज़ें मेरे बयान और कल्पनाओं दोनों से ही कहीं ज्यादा थी. सालेह ने मेरी बात को उसूल में समझा और उसके बाद महल बनवा दिया जो खुबसूरत बिल्डिंग का एक शाहकार था जो उम्मीद से भी ज्यादा दिल को मोह लेने वाला था. यह महल इतना बड़ा था कि उसे पूरा देखने के लिए बहुत समय चाहिए था. मैंने सालेह से कहा:
'' मेरा इत्मिनान (संतोष) हो गया. ऐसा है कि अभी तो चलते हैं. नाएमा आएगी तो उसके साथ.....'
मेरा वाक्य यहीं तक पहुंचा था कि खनक सी एक आवाज़ आई:
''मगर मैं तो यहाँ आ चुकी हूँ.''
मैंने पीछे मुड़कर देखा तो बस देखता ही रह गया. यह नाएमा थी और नाएमा नहीं भी थी. हष्र के दिन मैंने नाएमा को जवान और सुंदर देखा था. मगर यहाँ मेरे सामने जो लड़की खड़ी थी उसकी खूबसूरती बताने के लिए हुस्न, सौंदर्य, युवा, शबाब, रूप, आकर्षण,सुन्दरता जैसे शब्द कोई हैसियत नहीं रखते थे. मैं अभी इसी हालत में था कि सालेह की आवाज़ आई:
'' आप से मिलिये. आप सरदार अब्दुल्लाह! हैं. यह नाएमा हैं. और मुझे पता है कि आप को एक दूसरे से मिलकर बहुत खुशी हुई है.''
' तुमने मुझे बताया क्यों नहीं कि नाएमा पहले से यहां होगी.' मैंने कुछ नाराज़ होकर सालेह की तरफ देखते हुए कहा.
नाएमा सालेह की सफाई पेश करते हुए बोली:
'' उन्हें मैंने मना किया था. आपको सरप्राइज़ देना चाहती थी.''
'' यह भी आपको सरप्राइज़ देना चाहते थे. देखा आपने, आपके लिए कितना ख़ास घर बनवाया है उन्होंने.''
'' हाँ मैंने देख लिया. मुझे तो अपनी आंखों पर यकीन ही नहीं आता.''
'और मुझे अपनी आँखों पर यकीन नहीं आ रहा.' मैं नाएमा को देखते हुए कहा. फिर सालेह को संबोधित करते हुए कहा:
' आपकी पत्नी तो है नहीं. आप विदा होने का क्या लेंगे?'
उसने हंसते हुए जवाब दिया:
''मैं दुनिया में हमेशा तुम्हारे साथ रहा था. अभी भी चाहता हूं कि हमेशा तुम्हारे साथ रहूँ.''
'मगर भाई, तब आप नज़र नहीं आया करते थे.'
वह शरारती अंदाज में बोला:
'' यह अब भी मुमकिन है कि मैं गायब रहकर यहां मौजूद रहूं.''
यह कहते ही वह हमारी नज़रों से गायब हो गया और फिर उसकी आवाज़ आई:
'' ऐसे ठीक है?''
'' नहीं भई नहीं. ऐसे नहीं चलेगा.'' नाएमा एकदम बोली.
सालेह फिर सामने आ गया. नाएमा ने उसे देख कर राहत (संतोष) की सांस ली और बोली:
'' आप वादा करें कि जब भी आएंगे इंसानों की तरह सामने आएंगे और जाएंगे तो इंसानों की तरह ही जाएंगे.''
'' अच्छा भई अच्छा! '' उसने सर हिलाकर जवाब दिया, लेकिन उसकी आंखों में अभी भी शरारत चमक रही थी. वह बड़ी मासूमियत से बोला:
'' मुश्किल यह है कि इंसान तो मैं हूं नहीं. फिर इंसानों वाले नियम मुझ पर कैसे लागू हो सकते हैं?''
' सोच लो! मेरी पहुँच तुम्हारे सरदार तक है. मेरी एक शिकायत पर वह तुम्हें वाकई इंसान बना सकते हैं.' मैंने मुस्कुरा कर कहा तो वह लहजे में उदासी लाते हुए बोला:
'' यार धमकी क्यों देते हो. मैं वादा करता हूँ कि मैं आऊँगा और जाऊँगा तो इजाज़त (अनुमति) ले लिया करूंगा. और अगर तुम कहो तो मैं अभी चला जाता हूँ.''
यह कहकर वह पीठ फेर कर मुड़ा, दो चार कदम चला, फिर घूमकर नाएमा से बोला:
'' हालांकि मेरे जाने से कोई फर्क नहीं पड़ता. क्योंकि तुम दोनों के बच्चे यहां आ चुके हैं और उनका फैसला है कि हम अपनी माँ की शादी खुद करेंगे. उसके बाद ही तुम अब्दुल्लाह के घर आ सकती हो.''
'' सालेह ने सही कहा.'' लैला अंदर आते हुए जोर से बोली. और तीर की तरह भाग कर मेरे पास आ गई. उसके पीछे ही अनवर, जमशैद, आलया  और आरफा भी थे. उन को देखकर मेरी खुशी कई गुना बढ़ गई. मैंने सबको अपने गले लगाकर प्यार किया. मिलना मिलाना ख़त्म हुआ तो नाएमा ने कुछ गुस्से के साथ कहा:
'' यह क्या बचपने वाली बात तुम लोग कर रहे हो कि हमारी दुबारा शादी होगी?''
आलया ने कहा:
'' अम्मी पिछली दुनिया में हम में से कोई भी आप की शादी में मौजूद नहीं था. इसलिए हम सब भाई बहनों की एक ही राय है कि हम आप लोगों की शादी बड़ी धूमधाम से करेंगे. हम आप को खुद दुल्हन बनाकर विदा करेंगे और तब तक आपका अब्बू से पर्दा रहेगा.''
अनवर ने हस्तक्षेप करते हुए कहा:
'' पर्दे वाली बात तो बड़ी सख्त है. बस इतनी शर्त लगादो कि अकेले में नहीं मिलेंगे.''
' इस महरबानी का बहुत बहुत शुक्रिया. यह बताओ कि शादी कब होगी.' मैंने बेबसी से पूछा.
'' जब तैयारियां हो जाएंगी.'' आरफा ने बड़ी गंभीरता से कहा.
' और क्या तैयारियां होंगी.' मैंने पूछा.
''मैं बताती हूँ.'' लैला बोली.
'' जगह तो यही ठीक है. बस कपड़े, गहने आदि का इन्तिज़ाम करना है.''
'और मुझे भी ज़रा अपने अच्छे कपड़े बनवाने हैं ... अब्बू जैसे. मुझे तो अब्बू के कपड़े देखने के बाद अपने कपड़े अच्छे नहीं लग रहे.'' जमशैद ने भी मांगों में अपना हिस्सा डाला.
' अच्छा यह सब तैयारियां हो गईं तो शादी हो जाएगी?' मैंने पूछा.
'' क्यों नहीं.'' सब ने मिल कर कहा.
' चलो फिर अभी चलो. मैं तुम्हें जन्नत के सबसे बड़े शॉपिंग के इलाक़े में ले चलता हूँ. वैसे तो तुम लोग वहां घुस भी नहीं सकते, लेकिन मेरी तरफ से जो दिल चाहे आज शॉपिंग करलो.'
इस पर सारे बच्चों ने खुशी का नारा लगाया. फिर हम शॉपिंग के लिए रवाना हो गए.
.................
यह एक और अलिफ़ लैला की सी जगह थी. मैं इससे पहले सालेह के साथ यहां कई बार आ चुका था. लेकिन हर बार यहां हमेशा नई चीजें मौजूद हुआ करती थीं. इस जगह के लिए शॉपिंग सेंटर या बाजार जैसी शब्दावली बिल्कुल ठीक नहीं थीं. यह सैकड़ों मील फैला हुआ एक इलाका था जो रंग और नूर के सैलाब से रौशन था. यहां रात का समय ही रहा करता था. खाने पीने, पहनने और बरतने की यहां इतनी चीज़ें थीं कि उनकी संख्या गिनना तो दूर की बात है, उनकी विभिन्न प्रकार और वेराईटी ही करोड़ों में थी. हर जगह यहाँ फरिश्ते तैनात थे. लोग डिसप्ले से कुछ पसंद कर लेते और फिर फरिश्तों को नोट करा देते. जिसके बाद यह चीजें लोगों के घरों में पहुंचा दी जातीं. फरिश्ते हर आदमी का रिकॉर्ड चेक करके उसके बारे में सब कुछ जान लेते. इस बाजार के दो हिस्से थे एक हिस्से में आम जन्नती खरीदारी कर सकते थे. दूसरा हिस्सा ख़ास लोगों के लिए विशेष था. आम लोग यहां जा तो सकते थे, मगर यहाँ खरीदारी की इजाज़त सिर्फ ऊँचे दर्जे के जन्नतियों को थी.
यह सब पहली बार यहां आए थे. पहले मैं उन्हें आम लोगों के हिस्से में ले गया. ये लोग उसे देख कर खुशी से पागल हो गए. उसके बाद उन्होंने जो दिल चाहा खरीदना शुरू कर दिया. लेकिन नाएमा सारा समय मेरे साथ ही रही. उनकी खरीदारी ख़त्म हो गई तो मैंने कहा कि मैं तुम्हें खाना खिलाने ले जाता हूँ. खाने के लिए मैं उन्हें ऊपर ले गया. यहां छत से दूर दूर तक सुंदर रोशनियाँ दिखाई दे रही थीं. जबकि ऊपर तारों भरा आसमान था. दुन्याँ से उलट जहां शहर की रोशनियाँ तारों की चमक को फीका कर देती थीं यहाँ ज़मीन और आसमान पर एक जैसी जगमगाहट थी.
तारों की दूधया रोशनी और ठंडी हवा में खाने की सुगंध ने वातावरण को बेहद प्रभावी बना रखा था. बाजार की तरह यहां भी धीमी सी आवाज़ में नगमे चल रहे थे. खाने की इतनी वेराईटी थी कि किसी को समझ में नहीं आता था कि क्या खाएं. जो चीज़ लेते वह इतनी लज़ीज़ (स्वादिष्ट) होती कि छोड़ने का दिल ही नहीं चाहता था. मगर शुक्र खुदा का कि यहां पेट भरने का कोई मसला ही नहीं था जिस की वजह से जब तक दिल चाहता रहा हम लोग बैठकर खाते रहे.
वापसी पर मैं जानबूझ कर इन लोगों को बाजार के उस इलाके से ले गया जहाँ सिर्फ ऊँचे दर्जे के जन्नती खरीदारी कर सकते थे. उसे देख कर उन लोगों की आंखें फट गईं. जमशैद ने कहा:
'' यह भी शॉपिंग सेंटर का हिस्सा है?''
'हां यह भी शॉपिंग का इलाका है.' मैंने जवाब दिया.
मेरी बात पूरी तरह सुने बिना ही सब लोग शॉपिंग के लिए बिखर गए. मेरे साथ केवल नाएमा ही रह गई.
' क्यों, तुम कुछ नहीं ख़रीदोगी? पहले भी तुमने कुछ नहीं लिया और अब भी यहीं खड़ी हो.'
मेरी बात सुनकर नाएमा धीरे से मुस्कराकर बोली:
''मेरे लिए सबसे कीमती चीज़ आपका साथ है. यह अनमोल चीज आपके साथ के सिवा कहीं नहीं मिलेगी.'' यह कहते हुए नाएमा का रौशन चेहरा और रौशन हो गया.
हम दोनों एक जगह ठहर कर ख्वाब और ख्याल से ज्यादा हसीन इस जगह और इस के माहोल को एन्जोए करने लगे. दूर तक फैला हुआ यह बाजार अपने भीतर हर तरह की दुकानें लिए हुए था. कपडे, फैशन, जूते, आराम के सामान, उपहार और न जाने कितनी ही दूसरी चीजों की दुकानें यहां थीं. हर दुकान इतनी बड़ी थी कि कई घंटों में भी नहीं देखी जा सकती थी. दुनिया का बड़े से बड़ा शॉपिंग सेंटर भी इसकी एक दुकान के सामने कुछ नहीं था. लेकिन यहां की असल कशिश (आकर्षण) यह दुकानें नहीं बल्कि मदहोश करदेने वाला माहौल था जो हर तरफ छाया हुआ था. मन को अपनी ओर खींचती चीजों से भरी दुकानें, उनमें जगमग जगमग करती रोशनियाँ, खुशबूदार फिज़ा (वातावरण), सुंदर फ़वारे और खुबसूरत लोगों की चहल पहल, सब मिलकर एक बहुत प्रभावशाली माहौल बना रहे थे. यहां का माहौल आने वालों की देखने, सुनने, सूंघने और दूसरी हर तरह की शक्ति पर जिससे उसका दिमाग किसी चीज़ को महसूस करता है इस तरह हमला कर रहा था कि उसे मदहोश कर देता था. दूसरों के लिए जगह चीज़े खरीदने की जगह थी जबकि मेरे लिए यह जगह खूबसूरती के कमाल देखने की थी. मगर फिलहाल नाएमा के साथ ने यहां के हर रंग को मेरी नज़र में फीका कर दिया था. लेकिन हमारी तन्हाई में मिलने के पल बहुत कम रहे क्योंकि थोड़ी ही देर में लैला लौट आई और कहने लगी:
'' अब्बू वह जो हीरों का ताज है मुझ पर कैसा लगेगा?''
' बहुत प्यारा लगेगा.'
''मगर अब्बू यह लोग कह रहे हैं कि आप इसे खरीद नहीं सकते.''
' अच्छा!' मैंने इतना ही कहा था कि बाकी लोग भी मुंह लटकाए लौट आए. अनवर ने कहा:
'' अब्बू चलें यहाँ ज्यादा अच्छी चीजें नहीं हैं.''
'' दूसरे शब्दों में अंगूर खट्टे हैं.'' नाएमा हंसते हुए बोली.
' नहीं यह अंगूर इतने खट्टे भी नहीं हैं. चलो मेरे साथ चलो.'
मैं इन सबको लेकर उस जगह गया जहाँ फरिश्ता मौजूद था. मैंने उससे कहा:
' मेरा नाम अब्दुल्लाह है. यह मेरे बीवी बच्चे हैं. इन्हें जो चाहिए आप दे दें.'
फरिश्ते ने मुस्कुराते हुए कहा:
'' सरदार अब्दुल्लाह! मैं माफ़ी चाहता हूँ आपको खुद आने की तकलीफ उठानी पड़ी. उन्हें जो चाहिए वे ले सकते हैं.''
इन सब का चेहरा खुशी से दमक उठा और यह लोग एक बार फिर खरीदारी मिशन पर निकल खड़े हुए.
...........................................................................................................जारी है....

सोमवार, 23 जुलाई 2012

भाग १४.१ जन्नत की बादशाही में दाखिला

अंधेरे में मेरा सफ़र जारी था. बाहर दूर तक गहरा अँधेरा छाया हुआ था. मगर इस अंधेरे में कोई भय ... कोई डर नहीं था. अंधेरे की इस परत पर एक सन्नाटे की परत जमी हुई थी. मगर इस सन्नाटे में भी कोई वहशत कोई खौफ नहीं था. अंधेरे की तरह सन्नाटा भी अपने भीतर एक अजीब तरह का सुकून और सुरूर लिए हुए था. ऐसा लगता था कि खामोसी में बिना आवाज़ के ही नगमे बिखरे हुए हैं जो कानों के बजाय दिल के दरवाजों से वुजूद पर हौले हौले दस्तक दे रहे हैं. बगैर साज़ के कुछ सुर हैं फिजा में बिखरे हुए जो सीधे मेरे दिल की दुनिया में दाखिल होकर झूम रहे हैं.
रहा अँधेरा तो मुझे इसका मकसद एक नज़र आता था. वह यह कि यह अँधेरा उस रौशनी को खूब साफ़ करके दिखलादे जो बहुत दूर फिजा में उंचाई पर एक दिए की तरह रौशन थी. यह रौशनी आसमान के किसी तारे की न थी कि उस समय धरती की तरह आसमान भी अंधेरे की चादर ओढ़े हुए था. यह रौशनी एक ऊँचे पहाड़ की चोटी से उठ रही थी. अंधेरे में रौशनी काफी खुबसूरत और आकर्षक लग रही थी इतनी कि उससे नजर हटाने का दिल ही नहीं चाहता था. फिर मैंने सोचा इस अंधेरे में देखने को और रखा ही क्या है. मेरे दिल में इच्छा जागी कि क्या ही अच्छा होता कि मैं देख सकता कि इस रौशनी में नीचे का मंज़र कैसा दिख रहा है. मैंने 'सुब्हानअल्लाह' कहा जिसके साथ ही अँधेरा छट गया और नीचे का मंज़र साफ दिखने लगा.
नीचे नज़र की हद तक एक बहुत बड़ा हरा भरा मैदान फैला हुआ था जिसके ठीक बीच में संग मरमर का सफेद पहाड़ दिख रहा था. यह किसी पहाड़ी श्रंखला का हिस्सा नहीं बल्कि अकेला एक ही संग मरमर का ऊँचा टीला था जो इस ज़मीन के सीने में अकेले किसी स्तम्भ की तरह गड़ा था. इस पहाड़ की चोटी ऊँची होते होते एक बारीक नोक की तरह बारीक होकर खत्म हो रही थी. लेकिन यह पहाड़ का अंत नहीं थी बल्कि यह नोक उस विशाल और आलीशान महल की बुन्याद  का काम कर रही थी जो ठीक उसके सिरे पर बना हुआ था. मुझे यह मंज़र हकीकत से ज्यादा किसी चित्रकार के कल्पना का शाहकार लग रहा था. क्योंकि ऐसे मैदान फिर उसमे ऐसे पहाड़, पहाड़ की इतनी बारीक चोटी और चोटी के सहारे खड़े ऐसे महल हकीकत में नहीं हुआ करते.
लेकिन वह पिछली दुनिया की बातें थीं. अब तो परीक्षण और भौतिक नियमों की वह पहली दुनिया खत्म हो चुकी थी. एक नई दुनिया वुजूद में आ चुकी थी जिसमे मेरी बादशाही थी और मैं था. मैंने सोचा कि मानव इतिहास हजारों लाखों साल का सफर तय करके एक ईश्वर के दौर में दाखिल (प्रवेश) हो चूका है ... जब ज़मीन का इन्तिज़ाम (व्यवस्था) खुदा के फरिश्तों ने संभाल कर हर नामुमकिन को मुमकिन कर दिया है. और एक ऐसी दुनिया बना दी है जिसका अँधेरा हर डर और ख़ामोशी हर अंदेशे से पाक (मुक्त) है. जिसका अंधेरा रौशनियों का हिस्सा और ख़ामोशी सुकून का सामान हुआ करती है.
मेरी चाहने पर एक बार फिर अँधेरा छा चूका था. अंधेरे से मुझे ख्याल आया कि कुछ जहन्नम वालों का हाल भी देखूँ. मैंने 'सुब्हान अल्लाह' कहा और उसके साथ ही मेरे बाईं ओर नीचे की ओर एक स्क्रीन सी दिखाई गई. उस पर जो सीन चला वह बहुत ही दहशत नाक था. यह जहन्नम के बीच के हिस्से का मंज़र (दृश्य) था. भयानक और बड़े बड़े फरिश्ते भड़कती हुई आग से कुछ बहुत बुरी शकल वाले इंसानों को घसीट घसीट कर बाहर निकाल रहे थे. उनके गलों में तौक़ थे और हाथ पैरों में भारी और नुकीली जंजीरें बंधी हुई थीं. उनके चेहरे का मांस आग में झुलस गया था. उनके शरीर पर तारकोल का बना हुआ कपड़ा था, जिससे सुलगती आग उनके मांस को जला रही थी. वह तकलीफ के मारे चीख रहे थे . रो रो कर अल्लाह से फरियाद कर रहे थे कि उन्हें एक बार दुनिया की ज़िन्दगी में जाने का मौका दिया जाए फिर कभी वे अत्याचार, कुफ़्र और नाइंसाफी के पास भी नहीं फटकेंगे. मगर वहां चीख़ना, रोना और दांत पीसना सब बेकार था.
फिर जहन्नम वालों ने चिल्ला चिल्ला कर पानी मांगना शुरू किया तो फरिश्ते उनको घसीटते हुए पानी के कुछ चश्मों तक ले गए. यहां उबलते पानी से भाप उठ रही थी. लेकिन यह जहन्नमी इतने प्यासे थे कि उसी पानी को पीने पर मजबूर थे. वह खोलते हुए पानी को पीते और चीख़ते जा रहे थे. वह पानी से मुंह हटाते लेकिन कुछ ही देर में इतनी ज्यादा प्यास लगती कि फिर जानवरों की तरह उसी पानी को पीने पर खुद को मजबूर पाते. इस के नतीजे में उनके चेहरे की खाल उतर गई और उनके होंठ नीचे तक लटक गए थे.
यह मंज़र देख कर मैंने खुदा की पनाह (शरण) मांगी और उसका शुक्र अदा किया कि उसने मुझे इस भयानक अंजाम से बचा लिया. फिर मैं इस मंज़र से नज़र हटा कर उस रौशनी को देखने लगा जो पहाड़ की चोटी पर बने मेरे महल से उठ रही थी. मेरी सवारी धीरे धीरे इस महल की ओर बढ़ रही थी. मेरे दिल में इच्छा जागी कि महल पहुंचने से पहले ही यहां बैठे बैठे उसे देख लूँ. मैंने फिर सुब्हान अल्लाह कहा. अचानक मेरा कमरा सिनेमा घर में बदल गया. लेकिन इस सिनेमा की स्क्रीन सामने ही न थी बल्कि दाहिने बाएँ नीचे और ऊपर की ओर भी थी, महल का मंज़र किसी थ्री डी फिल्म की तरह चलने लगा. मुझे लगा कि मैं खुद महल के भीतर मौजूद हूँ और सब कुछ देख और सुन सकता हूँ.
आज यहां जश्न का माहोल था. ऊँचे पहाड़ की चोटी पर मेरा यह शानदार महल नूर का घर बना हुआ था. बिना बल्ब के फूटती हुई रोशनियाँ और बिना किसी शमा के चमकते हुए झूमर इस शानदार महल को अंधेरे के सागर में रौशनी का एक जज़ीरा (द्वीप) बनाए हुए थे. यह रौशनी हर दिशा और हर रुख से फूट रही थी. यह रौशनी से ज्यादा रंग और नूर की वह बरसात लगती थी जो आँखों के रस्ते अहसासात (भावनाओं) की दुनिया को हर पल एक नई लज्ज़त हा अहसास करा रही थी. रौशनी कभी आँखों को इतनी अच्छी भी लग सकती है यह कभी किसी ने नहीं देखा होगा. समय समय पर यहां नगमों का तरन्नुम छिड़ता और दिलों के तारों को छेड़ता हुआ वातावरण में बिखर जाता. संगीत इतना मदहोश करने वाला भी हो सकता है, किसी ने कभी इसका गुमान न किया होगा. वातावरण में धीमी धीमी खुशबू भी महक कर फिजा को और मदहोश बनाए हुए थी. खुशबू इतनी राहत देने वाली भी हो सकती है, किसी इंसान ने कभी इसकी कल्पना नहीं की होगी.
इस बड़े महल की सीड़यों पर गुलामान (नौकरों) की चहल पहल बिखरे मोतियों का सा मंजर लग रही थी. उनके चेहरों पर रौशनी, खुबसूरत कपड़े और अंदाज़ में मुस्तैदी थी. इन की मंजिल महल के एक कोने पर बना विशाल बाग था. यह बाग क्या था हरयाली, फूलों और पेड़ों का एक गुलदस्ता था जिसने अपनी खूबसूरती से बागीचे बनाने वालों की हर कारीगरी को मात दे दी थी. हज़ारहा रंग इस बाग में बिखरे हुए थे. एक हरे रंग ने ही इतने अलग अलग रूप लिए थे कि उन्हें गिना नहीं जा सकता था. बड़े बड़े घने पेड़ और उन पर लगे अनगिनत तरह (प्रकार) के फल, हर पेड़ पर अलग रंग के पत्ते, हजारों तरह के पौधे जिन पर लगे रंग बिरंगे फूल और कलयां. फिर यह सब कुछ ऐसे ही नहीं था बल्कि असल खूबसूरती डिजाइन की थी जिस डिजाइन के साथ पेड़ों, पौधों और फूलों को लगाया गया था. यह बाग किसी शायर की दिल को छू लेने वाली ग़ज़ल की तरह था जिसमें अलग अलग शब्दों को एक ख़ास लड़ी में पिरो कर खुबसूरत ग़ज़ल बनाई जाती है. इस हसीन और खुबसूरत बाग में बने खुबसूरत रास्ते और क़यामत ढा रहे थे जो याकूत और नीलम जैसे कीमती पत्थरों से बनाए गए थे. इस पर चार चाँद वह झरने, नदियां और नहरें लगा रही थीं जो बाग के बीच में बहरही थीं. देखने में खुबसूरत लगने के साथ साथ उन की आवाज़ भी कुछ कम खुबसूरत नहीं थी. इन नहरों में से किसी में सफेद दूध, किसी में झाग उड़ाता पानी, किसी में लाल शरबत किसी में बहते शहद की मोजें और ना जाने कितनी तरह की पीने की चीज़ों थीं. हर नहर से एक अलग तरह की खुशबू उठ रही थी जो करीब जाने वाले को अपने जादू में जकड़ लेती. नहरों के साथ और पेड़ों के नीचे जगह जगह बैठने वालों के लिए हीरे जवाहरात से जड़े हुए तख्त, शाही सीटें, कालीन और आरामदेह तकिये रखे हुए थे.
यह खुबसूरत बाग चारों ओर से खुला हुआ था. जब कभी हवा का कोई झोंक उठता एक नई खुशबू को अपने साथ लाता था. बाग से दूर तक का नज़ारा बिल्कुल साफ दिख रहा था. बाहर जो अंधेरा था यहां उसका कोई असर महसूस नहीं होता था. दूर तक विशाल शहर की सी ऊँची इमारतें और उनमें जगमगाती रोशनियाँ थीं जो रात में चमकते हुए कंडील लग रहे थे. आसमान पर छोटे छोटे तारे जगमगा रहे थे जिनकी दूधया रौशनी ने आसमान को और हसीन बना दिया था. एक दिशा में एक जगमगाती हुई रौशनी थी जो धीरे धीरे महल की ओर बढ़ रही थी. मुझे मालूम हो गया कि यह दरअसल मेरी ही सवारी थी जिसे खुदा की कुदरत से अंदर बैठा हुआ होने के बावजूद मैं बाहर से महल की ओर बढ़ता हुआ देख रहा था.
बाग के एक हिस्से में मैंने सालेह को बैठे हुए देखा और मन में कहा कि तुम मुझसे पहले ही यहां पहुंच चुके हो. वह जिस जगह बैठा हुआ था वह शायद बाग का सबसे सुंदर हिस्सा था. उसके आसपास का फर्श पारदर्शी शीशे की तरह था. फर्श इतना पारदर्शी था कि दूर तक नीचे का मंज़र साफ दिख रहा था. फर्श के नीचे एक ढलती हुई हसीन शाम का मंज़र था जिसमें हरी भरी घास और रंगीन फूलों से ढके मैदान और उनके बीच में बहते दरया बहुत खुबसूरत लग रहे थे.
यहाँ से नज़र नीचे दौड़ा पर हसीन शाम नज़र आती तो आसपास एक महकती और चमकती हुई रात थी. नीचे अगर दरया बह रहे थे तो ऊपर पेड़ों की फलों से लदी डालयाँ थीं जो इशारा पाकर नीचे आने और मनपसंद मेवों की भेंट पेश करने के लिए बेकरार थी. कुछ सेवक एक कोने पर तरह तरह के पकवान पका रहे थे. उससे उठने वाली महक खाने के स्वादिष्ट होने का ऐलान कर रही थी. साथ ही शीशे से अधिक पारदर्शी पर चांदी के बने हुए बर्तन खूबसूरती से रखे हुए थे ... इस इंतजार में कि कब महफिल गर्म हो और हम अपने मालिक को खुश करें.
यह मंज़र देखने से मुझे एहसास हो रहा था कि यह सब कुछ मेरे लिए अजनबी नहीं है. मुझे याद आया कि में ब्रज़ख की ज़िन्दगी में मैं इसको देख चुका था. इसी बीच में मुझे महसूस हुआ कि सवारी की गति धीमी हो रही है. मैंने इशारा किया और स्क्रीन गायब हो गई. मेरी सवारी मंजिल पर पहुंच रही थी. ऊंचाई से जगमगाता हुआ महल इतना खुबसूरत लग रहा था कि मेरा दिल चाहा कि मैं यहाँ ठहर कर यह मंज़र देखता रहूं. इस मंज़र को देखने के लिए मैंने महल के आसपास तीन चक्कर लगाए. फिर मुझे खयाल आया कि सालेह नीचे मेरा इंतज़ार कर रहा है. इसलिए मैंने उतरने का फैसला किया. मेरी सवारी या शीश महल उसी जगह धीरे से उतर गया जहां सालेह मौजूद था.
मैं बाहर निकला तो सालेह ने हंस कर मेरा स्वागत किया और बोला:
''मैं यह समझ रहा था कि तुम उसे अर्श समझ कर उसका तवाफ़ कर रहे हो. अच्छा हुआ तुम ने सात चक्कर नहीं लगाए.''
उसके दिलचस्प टिप्पणी करने पर मैं भी उसकी हँसी में शामिल होकर उसके गले लग गया. फिर वह मुझसे अलग होते हुए बोला:
'' तुम पहले अपने महल का निरीक्षण करोगे या खाने पीने का इरादा है?''
'मैं तो इस घर की खूबसूरती से हैरान होकर रह गया. मैं सोच भी नहीं सकता कि किसी चीज़ को इतनी खूबसूरती में भी बनाया जा सकता है.'
'' अब्दुल्लाह! यह तो सिर्फ शुरुआत है. अब से लेकर दरबार वाले दिन तक जो कुछ भी तुम देखोगे कुरआन उस सब को शुरूआती महमान नवाजी का सामान कहता है. जो इसके बाद मिलेगा वह तो न किसी कान सुना है न किसी आँख ने देखा है और न किसी दिमाग पर कभी उसका ख्याल ही गुज़रा है.''
' तुम ठीक कहते हो. ये बातें कुरान और हदीस में बयान हुई थीं, लेकिन जन्नत उस से अलग है जो नक्शा कुरआन में बयान हुआ है. मेरा मतलब है कि उस बयान से कहीं ज्यादा खूबसूरत जगह है.'
'' इसकी वजह यह है कि जन्नत का कुरान में ज़िक्र कुरान नाजिल (उतरने) होने के समय के अरब वासियों के दिमाग के हिसाब से हुआ है. यानी जिन चीजों को उस वक़्त अरब वाले ज्यादा से ज्यादा बड़ी नेमत और ऐश की चीज़ें समझ सकते थे, उसी का बयान (वर्णन) किया गया. वह आदमी मूर्ख होगा जो जन्नत को सिर्फ उन्ही चीज़ों तक समझेगा.''
' तुम सही कहते हो, कुरान नाजिल होने के ज़माने के अरब वासी तो शायद बहुत सी चीज़ों का अंदाज़ा भी नहीं कर सकते थे जो मेरे जमाने यानी सूचना युग में आविष्कार हो चुकी थी. कुरआन ने अरबों की सोच के हिसाब से ही जन्नत के ऐश का नक्शा खींचा था. लेकिन भाई जिस सवारी पर मैं सवार होकर आया हूं, उसने तो मेरी कल्पना को भी हिला दिया.'
'' इस तरह की बहुत सी चीजें तुम अब और देखोगे. खैर अभी क्या इरादा है?''
मैं उसकी बात सुनी अनसुनी करते हुए आसपास फैले हुए हसीन माहौल में खोगया. मैं एक एक चीज़ और एक मंज़र को अपनी आंखों में समेट लेना चाहता था. सालेह ने मेरे मूड को देखा तो शरारत भरी मुस्कान के साथ कहने लगा:
'' तुम शायद हूरों को ढूंढ रहे हो. वह तुम्हारा स्वागत करने बाहर आईं थी, अब सब अपने महलों में लौट गई हैं. लेकिन तुम चाहो तो''
मैंने उसे वाक्य पूरा करने का मौका दिए बिना पूरी संजीदगी से जवाब दिया:
'मेरे समय में इंसानयत के दो बड़े पेशवा हुआ करते थे. एक कार्ल मार्क्स जो पेट को ही ज़िन्दगी की असल बताते थे और दूसरे फ़्रायड जो.... ''
मैंने वाक्य अधूरा छोड़ कर पल भर के लिए रुका जिस पर सालेह ने जोरदार ठहाका लगाया. मैंने खाने की खुशबू को सूंघते हुए कहा:
'मैं फिलहाल कार्ल मार्क्स की बात मानने का इरादा रखता हूं.'
.................
दुनिया में तमाम इंसानों की ज़िन्दगी समय की गुलामी में बीता करती थी. समय का पहिया पल, दिनों और महीनों और साल का सफ़र तय करता हुआ आगे बढ़ा करता था. पहरों और मोसमों के बदलने से समय के गुजरने का एहसास हुआ करता था. मगर मैं अब जिस दुनिया में था, वहां समय गुलाम था और इंसान आक़ा. पल, दिन और सप्ताह, महीने और साल,और सदियाँ इनके दिन खत्म हो चुके थे. समय बीतने का ज़माना पिछली दुन्याँ की तरह गुज़र चुका था. समय और काल के अवशेषों से अब जो कुछ बाकी था वह सिर्फ मौसम थे. और वह भी सारे हमारे काबू में थे. जन्नत के इंसानी राज्य में कहीं हमेशा सुबह की रौशनी छाई रहती, कहीं दोपहर के सन्नाटे, कहीं शाम की फैलती डूबती लाली, कहीं आधी रात की स्याह ख़ामोशी और कहीं पूरे बड़े चाँद की चांदनी, कहीं तारों भरी रातें, कहीं बहारों की घनी छाओं. हांलाकि जन्नत का मौसम बहुत अच्छा रहता था, लेकिन लोगों की मर्ज़ी के हिसाब से सर्दियां थीं तो कहीं गर्मी और कहीं बरखा की रुत थी, यानि जो भी दिल चाहे हर तरह का मौसम इंसान के लिए मौजूद था.
मैं एक बहुत बड़ी सल्तनत का अकेला राजा बन चुका था. मेरा प्यारा दोस्त सालेह इस नए संसार में मेरा साथी था. उसी ने मुझे बताया कि यह इतनी बड़ी सल्तनत बहुत बड़ी और फैली हुई काएनात का एक हिस्सा थी. इस नई व्यवस्था में बटवारा कुछ इस तरह था कि सभी जन्नत वालों की रहने की जगह इसी धरती पर थी जहां हजारों लाखों साल तक इंसान की आज़माइश होती रही. जन्नत वालों में दो कक्षाएं थीं. एक आम लोग दुसरे ख़ास लोग. आम लोग या कम दर्जे (स्तर) के आमाल वाले वो लोग थे जिन्हें इनाम में एक या एक से ज्यादा सितारे दे दिए गए थे. यह बताने की शायद जरूरत नहीं कि यह सितारे अब वेसे नहीं रहे थे जिनको हम दुनिया में जानते थे बल्कि बदलकर खुबसूरत जन्नतों और वादियों में बदल चुके थे.
ख़ास लोगों में पहले शोहदा और नबियों के साथी थे. उनको अरबों खरबों सितारों की आकाशगंगा (गैलेक्सी) की बादशाही दी गई थी. मैं ऐसी ही एक आकाशगंगा का राजा था. उनके ऊपर नबियों की क्लास थी जो अनगिनत आकाशगंगाओं के शासक थे.
फिलहाल यह एक राज़ था कि किसे कौन सी जगह की बादशाही मिलनी है, वहाँ क्या करना होगा. सालेह ने मुझे बताया कि यह सब कुछ अल्लाह दरबार के दिन बयान करेंगे. इसी दिन हर इंसान को उसके साम्राज्य औपचारिक रूप से दे दिए जाएंगे. फिलहाल तो लोग केवल पृथ्वी पर रहते थे और कहना सालेह का के उनको जो नेअमतें यहां मिल रही थीं वे शुरुआती महमान नवाज़ी की चीजें थीं. असल नेअमतें जो किसी आँख ने देखी, न किसी कान ने सुनी न किसी दिमाग में उनका ख्याल गुज़रा वह दरबार वाले दिन के बाद ही मिलना शुरू होंगी. लेकिन तब तक लोगों को प्रोटोकॉल उन की हैसियत के अनुसार ही दिया जा रहा था.
इस प्रोटोकॉल का इज़हार उन समारोहों, मजलिसों और दावतों में होता जो जन्नत वाले आपस में एक दूसरे को दे रहे थे. हालांकि अभी तक सारे जन्नती जन्नत में नहीं आए थे, मगर यहाँ भरपूर जीवन शुरू हो चुका था. पीछे हष्र में सिर्फ इतना हो रहा था कि एक के बाद एक करके नेक लोग जन्नत में दाखिल हो रहे थे, मगर यहाँ समय चूंकि रुका हुआ था इसलिए सिर्फ दो लोगों के दाखिल (प्रवेश) होने के बीच भी अनगिनत साल गुज़र जाते थे. मेरा तो अंदाज़ा यही था और जिसका सालेह ने भी समर्थन किया था कि दरबार उसी समय लगेगा जब सारे जन्नती जन्नत  में आ जाएँगे. यही जन्नत की शरुआती ज़िन्दगी थी. इसी दौरान में मजलिसे और समारोह हो रहे थे. ज्यादा तर नबी हज़रात ही थे जो अपनी और दुसरे नबियों की उम्मतों के शुरू में आने वाले नेक लोगों के सम्मान में दावतें कर रहे थे.
इन्हीं मजलिसों में मेरी कई लोगों से मुलाकात हुई. मैं हालांकि दुनिया में बहुत कम कम लोगों से मिला करता था, लेकिन जन्नत में आने के बाद मैंने महसूस किया कि मैं आदत के खिलाफ बहुत सोशल किसम का हो चुका हूं. इसलिए मेरे नए नए दोस्त बनने लगे. लोगों के हालात और उनकी पिछली ज़िन्दगी के तजुर्बे मिलने लगे. मेरे लिए ये बात अजीब तो नहीं थी मगर फिर भी मुझे थोडा आश्चर्य हुआ कि शुरूआती सफल लोगों में अधिकतर गरीब और परेशान हाल लोग थे. यह वो लोग थे जिन्होंने दुनिया में बहुत परेशानी और दुख झेले, लेकिन हमेशा सब्र (धैर्य) और शुक्र से काम लिया. मैंने यह बात खास तौर पर नोट की कि ऊँचे दर्जे के इन शुरूआती जन्नतयों की एक बात समान थी. यह सब सब्र करने वाले थे जिन्होंने बुरे से बुरे हालात में भी अल्लाह पर भरोसा किया और इत्मिनान और खुदा पर भरोसे का दामन कभी नहीं छोड़ा.
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रविवार, 22 जुलाई 2012

भाग १४.० जन्नत की बादशाही में दाखिला

हमने जहन्नम की खाई को बहुत इत्मीनान और आराम से पार किया था. उसे पार करके मैंने पीछे देखा तो दूर दूर तक रोशनियों का एक काफिला था जो ऊँची आवाज़ से यही दुआ पढ़ते हुए हमारे पीछे चला आ रहा था. जिसकी रोशनी जितनी ज्यादा तेज थी, वह उतनी ही आसानी के साथ खाई को पार कर रहा था. मैंने आगे देखा तो हम अर्श के बिल्कुल करीब पहुंच चुके थे. अर्श क्या था नूर ही नूर था. यह रौशनी और नूर का एक सैलाब था जिस की हकीकत (वास्तविकता) को शब्दों में बयान करना मुमकिन नहीं था. यहां पहुंचकर हमारी अपनी रोशनी अर्श की रोशनी के सामने बे नूर हो गई. अर्श के आसपास फरिश्तों की कतारें थीं जो अदब से हाथ बांधे, 'अलहम्दु लिल्लाहि रब्बिल आलमीन' पढ़ रहे थे. हम बिल्कुल करीब पहुंचे तो मैंने देखा कि फरिश्तों ने अपने बीच से जगह छोड़ रखी है जिससे गुजर कर लोग कतार दर कतार अर्श के नीचे दाखिल हो रहे हैं. हम करीब पहुंचे तो आवाज आई:
''मेरे बन्दों! तुम्हारा स्वागत है. तुम आज ख़त्म न होने वाली बादशाही में दाखिल (प्रवेश) हो रहे हो. अपने रब की सलामती में तुम हमेशा के लिए दाखिल हो रहे हो.''
हम फरिश्तों के पास से गुजर कर आगे बढ़े तो मैंने सालेह की तरफ सवालिया अंदाज में देखा. उसने वजाहत (वर्णन) करते हुए कहा:
'' जन्नत का रास्ता अर्श के नीचे से होकर दाहिने ओर मुड़कर आएगा.''
'मगर हम अर्श के नीचे से क्यों जा रहे हैं. सीधे दाईं ओर मुड़जाएँ?'
सालेह हंस कर बोला:
'' तुम हर बात समय से पहले समझना चाहते हो. खैर मैं बताता हूँ. अर्श के नीचे जाकर हर इंसान का आखरी तज़किया हो जाएगा.''
'मगर तज़किया तो हम दुनिया में करते थे.'
'' तज़किया यानी पाकी (पवित्रता) हांसिल करना दीन (धर्म) के हर अमल (कर्म) का मकसद था. दीन की पूरी जद्दो जहद (संघर्ष) इसलिए थी कि इंसान का नफ्स (उसका खुद) पाक हो. खुदा को मानने वाला दुनिया में अपने शरीर को साफ रखता था. वह अपनी खुराक को पाक रखता था. वह इबादत (पूजा) के ज़रये (द्वारा) अपनी रूह और शरीयत का पालन करके अपने समाज, अर्थव्यवस्था और नैतिकता को पाक रखता था. शैतानी ख्यालात, बुरी इच्छाओं, हैवानी जज़्बात, यह सब नापाकियाँ थीं जिनसे बच कर बन्दा खुद को पाक रखने की कोशिश करता था. यह दुनिया में ईमान वालों की कोशिश थी. जिसका बदला आज रब की पाकीज़ा जन्नत (पवित्र स्वर्ग) के रूप में दिया जा रहा है, लेकिन इस पाकीज़ा जन्नत में जाने से पहले अल्लाह खुद ईमान वालों को पाक करेंगे. जिसके बाद उनकी रूह, शरीर और अख़लाक़ (नैतिकता) हर नापाकी से धुल जाएगी.''
' क्या मतलब?'
'' मतलब यह कि तुम्हारा शरीर जो दुनिया में खून, गंध और दूसरी नापसंद चीजों से भरा हुआ था अब नूर से भर जाएगा. जिसके बाद तुम्हारे शरीर से गंध नहीं निकलेंगी, न बदबू आएगी और न बदबू दार पसीना बहेगा . तुम्हारी सांस के साथ खुशबू आएगी. पेशाब मल की जगह खुशबूदार पसीना आएगा. तुम्हारे कान, नाक, आंख, मुंह और शरीर से गंदगी नहीं निकलेगी.
इसी तरह तुम्हारे मन से हर नापाक सोच (नकारात्मक भावना) जैसे दूसरों से जलन, अहंकार, कीना, परायी औरत पर बुरी गिगाह, नफरत, भेदभाव वगैरह ख़त्म हो जाएंगे. तुम्हारी सोच, नज़र, शरीर और रूह सब पाक हो जाएंगे.
मैंने खुश होकर कहा:
' सुब्हान अल्लाह! फिर तो जीने का मज़ा आ जाएगा.'
'' यही नहीं बल्कि तुम्हारी सलाहियत (कौशल) और ताकतें असाधारण रूप से बढ़ जाएंगी. तुम्हें नींद की जरूरत होगी न आराम की. तुम थकोगे न निढाल होगे. बोर होगे न परेशान होगे. डिप्रेस होगे न टेंशन का शिकार होगे. तुम जितना चाहोगे खाओगे, जितना चाहोगे पियोगे, तुम्हें बदहजमी होगी न शौचालय जाने की जरूरत. तुम्हारे अन्दर शक्ति का खजाना भर जाएगा. तुम हमेशा स्वस्थ रहोगे, हमेशा जवान रहोगे और सबसे बढ़कर इतने हैंडसम और खुबसूरत हो जाओगे कि कुछ हद नहीं. यह सब तुम्हारे अन्दर होने वाले कुछ बदलाव की बात है बाहर की नेअमतें तो अभी सामने आनी हैं.''
' क्या सबके साथ यही होगा?'
'' हां सब के साथ ऐसा होगा लेकिन जिस के आमाल (कर्म) जितने ज्यादा अच्छे रहे होंगे, उसकी ताकत, खूबसूरती और कमाल इतना ही होगा.''
मेरे मुंह से निकला:
'' अलहम्दु लिल्लाहि रब्बिल आलमीन.''
हम बातचीत करते हुए अर्श के बिल्कुल करीब पहुंच चुके थे. सालेह ने यहां पहुंच कर मुझसे कहा:
'' अब्दुल्लाह! अब मैं तुमसे अलग हो रहा हूँ. तुम यहाँ दाखिल होगे तो जन्नत के दरवाज़े पर निकलोगे. मैं वहीं जन्नत के दरोगा के साथ तुम्हें मिल जाऊँगा. तुम इत्मीनान से आगे बढ़ो.''
यह कहकर वह विदा हो गया.
मैं एक लम्हे के लिए खड़ा सोचता रहा. अचानक मेरे सामने एक दरवाज़ा खुल गया. आवाज़ आई:
''ऐ नफ़्स ! अपने रब की ओर लौट आ. इस तरह की तू उससे खुश है और वह तुझ से. फिर शामिल हो जा मेरे बन्दों में और दाखिल हो जा मेरी जन्नत में.''
मैं इन शब्दों से हौसला पाकर आगे बढ़ा और दरवाजे के अंदर दाखिल हो गया. मेरी जुबां पर आप से आप यह शब्द जारी थे.
'' अल्लाहुअकबर अल्लाहुअकबर लाईलाहा इल्लल्लाहु वल्लाहुअकबर अल्लाहुअकबर व लिल्लाहिल हम्द''
भीतर दाखिल होते ही मुझे यह महसूस हुआ कि मैं एक राहदारी में आगे बढ़ रहा हूँ. यहाँ फर्श, छत और दीवारें सब बिल्कुल सफेद दूधया रंग की थी. अंदर दाखिल होते ही मुझे एक सुखद एहसास हो रहा था. मेरा अंदाजा था कि यह रास्ता गैर महसूस तरीके पर दाहिने दिशा में मुड़ रहा है. मैं कुछ ही दूर गया था कि अचानक रंग और नूर के गोलों ने मेरा घेराव कर लिया. तरह तरह के रंग मेरे आसपास में जगमगाने लगे. मैं पूरे आराम और आत्मविश्वास के साथ आगे बढ़ता गया. यकायक नूर की एक चादर मेरे आरपार हो गई. इसके साथ ही मेरे वुजूद (अस्तित्व) का रेशा रेशा लुत्फ़ (आनंद) और सुरूर के अहसास में डूब गया. मुझे लगा कि मैं हवाओं में उड़ रहा हूँ. मेरा शरीर बिल्कुल हल्का हो गया. मुझे लगा कि मेरा शरीर गायब हो गया है और मैं सिर्फ रूह (आत्मा) के रूप में शेष हूँ. मैं बेखुद होकर आगे बढ़ता रहा. कुछ ही देर बाद फिर वही दूधया राहदारी मेरे सामने थी और मैं उस में चला जा रहा था. मगर अब मेरे अहसास (भावनाओं) में ज़मीन आसमान का फर्क आ चुका था. मुझे लग रहा था कि मैं बदल कर कुछ से कुछ हो चुका हूँ. ताक़त, सुकून और संतोष और आत्मविश्वास की एक ऐसी हालत थी जिसे ज़ुबान से बताया नहीं जा सकता. मैं उसमे चला जा रहा था कि अचानक मुझे ठहरना पड़ा. मेरे सामने एक ऐसी जगह आ गई थी जहां से आठ रास्ते निकल रहे थे. हर रास्ते पर ये लिखा था कि यह रास्ता जन्नत के किस दरवाजे पर निकलेगा. मैं पढ़ने की कोशिश कर रहा था कि क्या लिखा है कि एक आवाज़ आई:
'' शोहदा के दरवाजे से अन्दर चले जाओ.''
मैंने गौर किया तो दाहिनी ओर पहला दरवाजा नबियों का था और इसके बराबर में दूसरा दरवाजा नबियों के साथियों का था और फिर शोहदा का दरवाज़ा था. मैं उसी में दाखिल (प्रवेश) हो गया. यह भी एक रास्ता था जो एक दरवाजे पर खत्म हो रहा था. मैं इस दरवाजे से बाहर आ गया. इससे पहले कि मैं बाहर निकल कर कुछ देखता, मैंने अपने सामने सालेह को मौजूद पाया. इसके साथ एक फरिश्ता खड़ा हुआ था. सालेह के बजाय उस फरिश्ते ने आगे बढ़ कर मेरा स्वागत किया और कहा:
'' अस्सलामु अलैकुम, हमेशा बाक़ी रहने वाली जन्नत की बस्ती में आपका स्वागत है. सालेह ने मुझे आपका आमाल नामा दिया जिसमें आपका नाम अब्दुल्लाह लिखा हुआ है. मगर इसके साथ सम्मान के नाम इतने लिखे हुए थे कि समझ में नहीं आता कि आप को क्या कह कर संबोधित करूं.''
सालेह ने हस्तक्षेप करते हुए कहा:
'' फिलहाल सरदार अब्दुल्लाह से काम चलाइये. क्योंकि मुझे खुदा ने इनकी मौत के बाद यह कह कर उनके स्वागत के लिए भेजा था कि मेरा बन्दा अब्दुल्लाह सरदार है. उसे लेकर मेरे पास आओ.''
'' ठीक है. सरदार अब्दुल्लाह! खत्म न होने वाली बादशाहत में आना मुबारक हो.'' यह कहते हुए उसने मुझसे मुसफाह किया.
' हमारे मेजबान (होस्ट) का नाम क्या है?' मुसफाह करते हुए मैंने सालेह से पूछा.
'' यह मेजबान नहीं दरबान हैं और इनका नाम रिज़वान है.''
रिजवान हँसते हुए बोले
'' यहां मेजबान आप हैं सरदार अब्दुल्लाह. यह आपका राज्य है. जरा देखिये तो आप कहां हैं.
उनके कहने पर मैंने नज़र दौड़ाई तो देखा कि मैं एक बिल्कुल नई दुनिया में आ चुका हूँ. यहाँ आसमान और ज़मीन बदल कर कुछ के कुछ हो चुके थे. नए आसमान और नई जमीन पर बनी यह एक ऐसी दुनिया थी जहां सब कुछ था. मगर उसकी खूबसूरती और मुकम्मल (सम्पूर्ण) होने का बयान (वर्णन) करने के लिए मेरे पास शब्द नहीं थे. मैं ज़िनदगी भर अच्छा बोलने वाला आदमी रहा. मुझे भाषा व बयान पर असाधारण महारत हासिल थी. ख़ुदा ने मुश्किल से मुश्किल तथ्यों के बयान को हमेशा मेरे लिए बेहद आसान किए रखा था. लेकिन इस पल मुझे अंदाज़ा हुआ कि दुनिया की हर भाषा इन हकाइक (तथ्यों) का बयान करने से आजिज़ (असमर्थ) है जो मेरे सामने मौजूद थीं. मैं बिल्कुल ऐसी स्थिति में था जो किसी पत्थर के ज़माने के किसी इंसान को अचानक किसी आधुनिक शहर में लाकर खड़ा करदिया जाए तो उसकी हो सकती है. जो आदमी हमेशा अपनी गुफा में लकड़ी जलाकर रौशनी करता रहा हो वह अचानक लेजर लाइट की तेज और ट्यूब लाइट की दूधया रोशनी के जलवे देख लेता तो कभी उसकी सच्चाई को बयान करने के लिए शब्द नहीं पा सकता था. यही स्थिति इस समय मेरी थी.
................
सालेह मेरी बे सुधी देखकर बोला:
'' सरदार अब्दुल्ला! बे खुदी के लिए अभी बहुत कुछ है. बेहतर है कि आप अपनी मंजिल की ओर चलिए.''
रिजवान ने एक रास्ते की ओर इशारा करते हुए कहा:
'' चलिए. आप की रिहाइश का इलाका (आवास क्षेत्र) इस दिशा में है.''
हम आगे बढ़े. एक तेज़ लाल रंग का कालीन इस रास्ते में बिछा हुआ था. हम उस पर चलने लगे. इस रास्ते में दोनों ओर फरिश्तों की कतारें थी जो हाथों में गुलदस्ते लिए, रेशमी रूमाल लहराते, फूलों और खुशबू का छिड़काव करते सलाम और मरहबा कहते मेरा स्वागत कर रहे थे. यह एक लम्बा रास्ता था जो दूर तक चलता चला जा रहा था. बचपन में परिस्तान कि कल्पना की कहानियाँ शायद सब सुनते पढ़ते हैं. यह रास्ता ऐसे ही किसी परिस्तान पर जाकर खत्म हो रहा था. दूर से परिस्तान की ऊँची और भव्वे इमारतें नजर आ रही थीं. यह आलीशान इमारतों और शानदार महलों का मंज़र (दृश्य) था जो हरयाली से लदे पहाड़ों, उसके दामन में फैले पानी के फर्श और नीलगों आसमान की छत के साथ एक कल्पना की दुनिया की तस्वीर लग रहा था.
मैंने रिजवान से पूछा:
' इस समय अनगिनत लोग जन्नत में दाखिल हो रहे हैं, आपके पास क्या इतना समय है कि सब को छोड़ कर आप मेरे साथ आ गए हैं?'
वह हंस कर बोले:
'' यहां समय रुका हुआ है. आप यूं समझें कि दो जन्नती एक के बाद एक करके अंदर आ रहे हैं, उनके अन्दर आने में काफी समय होता है. और जो जन्नती ज़रा कम दर्जे (स्तर) के हैं, तो महीनों और सालों नहीं बल्कि सदियों के अंतर से अंदर आएंगे.''
मैंने सालेह की ओर देख कर कहा:
' नाएमा?'
मेरी बात का जवाब रिजवान ने दिया:
'' सरदार अब्दुल्लाह! आप तो बहुत पहले अंदर आ गए हैं. आपकी पत्नी नाएमा और अन्य लोग कुछ समय में ही यहां आ जाएँगे. लेकिन इस समय आपके करने का यहाँ बहुत काम है. अपनी जन्नत, अपनी दुनिया, उसका राज्य, यहां के नौकर और दूसरे संबंधित लोगों कि जानकारी हासिल करनी है.''
' अच्छा! यहाँ और कौन है?'
'' देखो यह आपकी सेवा करने वालों में से कुछ ख़ास लोग खड़े हैं.''
रिजवान के ध्यान दिलाने पर मैंने देखा कि फरिश्तों के बाद कतार में दोनों ओर ऐसे लड़के खड़े थे जो अपनी टीन एज की शुरुआत में थे. मुझे अंदाज़ा हो गया कि यह गुलामान हैं और यही वह लड़के हैं जिनके लिए कुरान ने मोती की परिभाषा उपयोग की थी. यह सचमुच ऐसे ही थे. बल्कि शायद मोती से भी ज्यादा साफ, पारदर्शी और चमकते हुए. मुझे अंदाज़ा हुआ कि कुरान ने जिन हक़ाइक (तथ्यों) का बयान (वर्णन) करने की जिम्मेदारी उठाई थी, इंसानी भाषाओं में उनके बताने और समझाने के लिए कितने कम शब्द थे. आज जो तथ्य सामने थे वह बयान के नहीं सिर्फ देखने और आनन्दित होने की बात थे. यह गुलामान भी एक ऐसी ही हकीक़त थे. फरिश्तों की तरह गुलामान भी उत्साहित अंदाज में मेरा स्वागत कर रहे थे. लेकिन जैसे ही मैं उनके पास पहुंचता वह घुटनों के बल एक के बाद एक बैठ कर अपना सर झुका देते थे. जैसे यह मोतियों की एक लड़ी थी जो मेरे स्वागत में बिछी जा रही थी.
कतार जब काफी लंबी हो गई तो मैंने सालेह से कहा:
' भाई यह ख़ास लोग ही इतनी बड़ी संख्या में हैं तो सारे सेवक संख्या में कितने होंगे. और इतने सारे लोगों का मैं क्या करूंगा?'
सालेह के बजाय रिजवान ने जो जन्नत के रहस्य से ज्यादा परिचित थे, जवाब दिया:
'' आप धरती से आकाश तक फैले हुई एक बहुत बड़े राज्य के प्रमुख हैं. अनगिनत काम हैं जो आपको इस नई ज़िन्दगी में खुदा कि तरफ से बताए जाएंगे. आप उन कामों के लिए इन सेवकों का इस्तेमाल करेंगे. यह आपकी व्यक्तिगत सेवा से लेकर आपके महान साम्राज्य की देख भाल और प्रशासन तक के सारे इंतज़ाम करेंगे.''
' तो मानो जन्नत भी ठाली बैठ कर ऐश करने की जगह नहीं है. यहां भी काम करना होगा.' मैंने हंसते हुए टिप्पणी की.
'' आप बेफ्रिक रहें. यहां का काम मेहनत का नहीं शान का होगा. बाकी जिस ऐश और खाली समय को जो लोग दुनिया में ढूंढने थे, उसकी भी यहां कोई कमी नहीं है.''
'मगर यह काम होगा क्या?'
''मैं तो यह जानता हूँ कि आप को राज्य में आने वाली समस्याओं के बिना ही राज करना है. बाकी असल हकीक़त तो अल्लाह जानते हैं और दरबार के दिन ये सारी बातें आपको सीधे खुद बता देंगे.''
हम कुछ दूर और चले तो सालेह ने कहा:
'' अब हूरें आ रही हैं.''
सालेह के इस वाक्य के साथ ही मुझे हूरों के बारे में वह शायराना तारीफ याद आ गई जो उसने हष्र के मैदान में की थी. उस समय सालेह की बातों को मैंने बढ़ा चढ़ा हुआ समझा था. अब महसूस हुआ कि उसकी बातों में बढ़ा चढ़ा नहीं बल्कि कुछ कमी थी. हकीक़त उससे कहीं ज्यादा थी. हम जैसे ही उनके पास पहुंचे तो गुलामान के विपरीत उन्होंने एक अलग काम किया. वह घुटनों के बल बैठने के बजाय दो ज़ानो बैठीं और सर झुका दिया.
मैंने रुककर सालेह से पूछा:
' यह क्या कर रही हैं?'
'' यह तुम्हारा दिल बहला रही हैं.'' उसने हंसते हुए कहा.
रिजवान ने स्पष्ट करते हुए कहा:
'' असल में उन्होंने आपके क़दमों को राहत पहुंचाने के लिए अपने बाल फर्श पर बिछाए हैं. इसलिए यह इस तरह झुकी हुई हैं.''
उनके कहने पर मैंने गौर किया कि वो इस तरह सर को झटका देकर झुक रही हैं कि दोनों तरफ से उनके बाल जमीन पर बिछ कर एक रेशमी फर्श बनाते जा रहे हैं. हुस्न की यह अदा मैंने ज़िन्दगी में पहली बार देखी थी . मैं पूरे आत्मविश्वास और सम्मान के साथ मुस्कुराता हुआ आगे बढ़ रहा था. जब मेरे कदमों ने रेशमी जुल्फों से बने इस फर्श को छुआ तो सुरूर की एक लहर मेरी रूह के अंदर तक तैरती चली गई. मुझे पहली बार अहसास हुआ कि हालांकि मेरे शरीर पर बहुत सूक्ष्म, मखमली और शाही लिबास (ड्रैस) था लेकिन मैंने जूते नहीं पहन रखे थे.
इस दौरान रिजवान ने मुझे इन हूर और गुलामान के बारे में और अधिक बताते हुए कहा:
'' इन हूर और गुलामान के प्रदर्शन से इनके बारे में किसी गलतफहमी का शिकार न होईयेगा. यह लड़के और लड़कियाँ बहुत असामान्य शक्तियों और क्षमताओं के मालिक हैं. वे आपके हुक्म पर जमीन और आसमान एक कर देने की ताक़त रखते हैं . यह अलग बात है कि आप से यह इतनी मुहब्बत करते है कि आप के लिए जाम का गिलास भरने को भी अपने लिए इज्ज़त कि बात समझते हैं. अल्लाह ने जो कुछ इनको दिया है अभी आपको उसका कुछ अंदाजा भी नहीं है.''
मैं रिजवान की बात के जवाब में चुप रहा. मेरा ध्यान शुक्र के एहसास के साथ उस हस्ती के क़दमों में सजदे (प्रणाम) में चला गया था जिसने एक गरीब बन्दे को बहुत मामूली अमल (कर्म) के बदले में यह सम्मान और यह इज्ज़त दी थी. मेरी आंखों से आंसू बहने लगे और मैं भी सजदे में जा गिरा. मेरी ज़ुबान पर उसकी तारीफ और बड़ाई के शब्द थे. मैं उसी हाल में था कि अचानक बारिश की बूंदों सी आवाज़ आना शुरू हो गई. सालेह ने मेरी पीठ थपथपाकर कहा:
'' अब्दुल्लाह! उठो और अपने सजदे की मक़बूलयत (लोकप्रियता) देखो.''
मैं उठा तो एक हेरत अंगेज़ मंज़र मेरे सामने था. मैंने देखा कि हूर और गुलामान के चेहरों पर मुस्कराहट और खुशी की लहर दौड़ रही थी और उनकी झोलियाँ बहुत खुबसूरत मोतियों से भरी हुई थीं. मैं कुछ नहीं समझ पाया. सालेह ने मेरी हैरत दूर करते हुए कहा:
'' ईश्वर ने तुम्हारी ओर से उन्हें बख्शिश दी है. तुम्हारी आंखों से तो आंसू ही बहे थे, मगर खुदा ने उन्हें कुबूल कर के मोतियों की बरसात बरसादी. यह उनके लिए तुम्हारे आने पर एक उपहार है जो उनकी ज़िदगी की सबसे कीमती दौलत है.''
हम फिर चलने लगे और आखिरकार यह स्वागत करने वालों की कतार एक ऊँचे और बड़े दरवाजे पर समाप्त हुई. हमारे करीब पहुंचने से पहले ही दरवाजे के दोनों पाट खुल चुके थे. यहां से रिजवान लौट गए और मैं सालेह के साथ अपने आवास की जगह में दाखिल हो गया . आवास शब्द मैंने इसलिए कहा कि कॉटेज, हट, घर, मकान, भवन, बिल्डिंग, बांग्ला, कोठी और महल जैसे सभी शब्द मेरे इस आवास को बताने के लिए बिल्कुल पर्याप्त नहीं थे. यह नज़र कि हद तक फैला हुआ एक बहुत बड़ा क्षेत्र था जो हरे हरे पहाड़ों, उन पर बने गगनचुम्बी महल, उनके दामन में मीलों तक फैले बाग़, उनके नीचे बहती नदियों और दरयाओं का एक ऐसा जत्था था जिनके बयान करने के लिए शायद शब्द तो वही हैं जो मेरे मन में थे, लेकिन उनकी सच्चाई, उनकी खूबसूरती और उनकी शान व शौकत एक अलग चीज़ थी.
मैंने इस बड़े मंज़र पर नज़र डालते हुए सालेह से पूछा:
' इतने सारे महल में से मेरे रहने का महल कौन सा है?'
उसने हंसते हुए कहा:
'' यह इतने सारे महल तुम्हारे आवास नहीं. यह तुम्हारे करीबी सेवकों के घर हैं. तुम्हारा घर यहां से काफी दूर है. तुम चाहो तो पैदल भी जा सकते हो, लेकिन बेहतर है कि अपनी सवारी में जाओ.''
यह कहकर उसने एक तरफ बढ़ने का इशारा किया. मैंने उस तरफ देखा तो एक बहुत शानदार मगर कुछ छोटा घर बना हुआ था. छोटा इस दुनिया के हिसाब से था वरना पिछली दुन्याँ के हिसाब से यह किसी बड़े महल जितना ही व्यापक था. लेकिन अजीब बात यह थी कि सालेह अगर ध्यान न दिलाता तो मैं कभी उसकी मौजूदगी (उपस्थिति) महसूस नहीं कर सकता था क्योंकि यह पूरी तरह शीशे का बना हुआ और इतना पारदर्शी था कि उसके आर पार सब कुछ दिख रहा था. सालेह आगे बढ़ा तो मैं उस के पीछे इस ख्याल से चला कि इस घर में कोई गाड़ी वगैरह जैसी सवारी खड़ी होगी. लेकिन वह सीधा मुझे इस घर के बीच में एक कमरे में ले गया जहां हीरे जवाहरात से सजी शाही अंदाज की आलीशान कुर्सियां बिछी हुई थीं. सालेह ने मुझे इशारे से बैठने के लिए कहा. फिर वह बोला:
'' यह तुम्हारी सवारी है जो तुम्हें तुम्हारी मंजिल तक पहुंचा देगी. मैं तुम्हें अकेले छोड़ रहा हूँ ताकि तुम्हें यह मालूम हो कि यहां के असल राजा तुम हो. तुम्हें किसी सहारे किसी सेवक किसी फ़रिश्ते की मदद की ज़रुरत नहीं है. तुम जो चाहोगे वह खुद (स्वतः)  ही हो जाएगा. अब मैं तुम्हें तुम्हारे घर में मिलूँगा.''
इससे पहले कि मैं कुछ कहता वह बाहर निकल गया. सालेह की इस बात पर मैं शोक में आ गया था. बल्कि सच्ची बात तो यह है कि जन्नत में दाखिल होने के बाद से मैं लगातार शोक की हालत में था. हर पल मिलने वाले ख़ुशी के झटकों ने मुझे हिला दिया था.
मैं कुछ देर में खुद को संभाल कर सोचने लगा कि मैं कहाँ हूँ और क्यों? और यह कि सालेह ने मुझ से अभी क्या कहा था. सालेह के शब्द को मैंने मन में दुहराया और उसकी बात का मतलब समझ में आते ही मुझमें बहुत आत्मविश्वास पैदा हो गया. मुझे लगा कि मेरी बादशाहत इस पल से शुरू होती है. लेकिन सवाल यह था कि यह घर या सवारी चलेगी कैसे. मैंने दिल में सोचा कि सालेह नहीं है तो क्या हुआ वह रब तो इस लम्हे भी मेरे साथ है जो दुनिया में ज़िन्दगी भर मेरे साथ रहा था. इसके साथ ही मुझे कुरान का यह बयान याद आ गया कि जन्नत में बन्दों को हर चीज़ 'सुब्हानअल्लाह' कहने से मिल जाया करेगी. मैंने धीरे से कहा:
' सुब्हान अल्लाह.'
इसके साथ ही यह घर जो एक सवारी थी हवा में ऊँचा होने लगा. मैं खुशी से खिलखिला उठा और मैंने जोर से पुकार कर कहा:
'' बिस्मिल्लाह मुज्रीहा व मुर्सिहा''
यह पैगम्बर नूह अलैहिस्सलाम के शब्द थे जो आप ने अपनी नाव में बैठ कर कहे थे. मेरी सवारी धीरे धीरे एक दिशा में बढ़ने लगी. मैं चुपचाप सर टिकाकर नीचे फैले हुए हसीं मंज़र (दृश्य) का मज़ा लेने लगा. घर धीरे धीरे उड़ रहा था कि मुझे महसूस हुआ कि नीचे शाम का सा धुंद फैलने लगा है. कुछ ही देर में हर तरफ पूरा अँधेरा छा गया. इसके साथ ही शीशे का घर दूधया रंग की रौशनी से जगमगा उठा जिसका स्रोत कहीं नज़र नहीं आता था.
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भाग १३.१ आखरी अंजाम की तरफ रवानगी


ज्यादा देर न गुजरी थी कि एक एक करके आराफ पर खड़े सारे लोग निपट गए. अब फैसला सुनाने के लिए कुछ भी नहीं रहा था. लेकिन शायद अब भी कुछ बाकी था. सब अपनी जगह खड़े थे कि हष्र के मैदान में एक जानवर को लाया गया . यह जानवर बहुत मोटा ताज़ा था जिसके गले में रस्सी पड़ी हुई थी और फरिश्ते उसे खींचते हुए अर्श के सामने ले जा रहे थे. सालेह ने मेरे कान में कहा:
'' यह मौत है जिसके खातमे (अंत) के लिए उसे लाया गया है.''
अर्श से ऐलान हुआ कि आज मौत को मौत दी जा रही है. अब किसी जन्नती को मौत आएगी ना किसी जहन्नमी को.
इसके साथ ही फरिश्तों ने उस जानवर को लेटाया और उसे जिबह (कुर्बान, बलि) कर दिया. मौत के जिबह हो जाने पर जन्नत वालों ने जोरदार तालियां बजाकर इसका स्वागत किया. जबकि जहन्नम वालों में मातम शुरू हो गया. उनके दिल में उम्मीद की कोई शमा अगर रोशन थी तो वह भी मौत की मौत के साथ अपनी मौत आप मर गई.
अर्श से आवाज़ आई कि जहन्नम वालों को समूह दर समूह उनके अंजाम तक पहुंचाया जाए. फरिश्ते तेजी के साथ हरकत में आ गए. हष्र के बाएं किनारे पर एक जबरदस्त हलचल मच गई. चीख और पुकार और आहों के बीच फरिश्ते पकड़ पकड़ कर मुजरिमों और ना फर्मानों का एक जत्था बनाते और उन्हें जहन्नम की ओर हांक देते. हर गिरोह जहन्नम के दरवाज़े पर पहुंचता जहां जहन्नम के दारोगा 'मालिक' उन का स्वागत करते और उनके आमाल (कर्मों) के अनुसार जहन्नम के सात दरवाजों में से किसी एक दरवाज़े को खोल कर उन्हें इसमें धकेल देते.
इस दौरान समय समय पर अर्श की ओर से जहन्नम को संबोधित करके पूछा जाता:
'' तू भरगई?''
वह ग़ज़बनाक आवाज़ में अर्ज़ करती:
'' परवरदिगार! क्या और लोग भी हैं? उन्हें भी भेज दें.''
यह सुनकर हष्र में एक आह और उठती. रह जाने वाले मुजरिमों पर फरिश्ते फिर झपट पड़ते और उनकी आखरी मंजिल तक पहुँचा देते. यूं थोड़ी ही देर में सारे मुजरिम अपने अंजाम तक जा पहुँचे.
इसके बाद अर्श से सदा बुलंद हुई:
'' जन्नत वालों को उनकी मंजिल तक पहुंचा दिया जाए.''
जब आदेश हुआ तो मैंने देखा कि कुछ लोग अभी तक बाएँ दिशा में मौजूद थे. मैंने सालेह से पूछा:
' यह कौन लोग हैं. उन्हें जहन्नम में क्यों नहीं भेजा जा रहा?'
उसने जवाब दिया:
'' यह मुनाफिकीन (जो होते कुछ हैं और दिखाते कुछ हैं) हैं. यह जहन्नम के सबसे निचले दर्जे में होंगे. यह दुनिया में खुदा को धोखा देते थे. आज उन्हें न सिर्फ बड़ा से बड़ा अज़ाब मिलेगा बल्कि उनकी धोखाधड़ी के बदले में उनका अंजाम एक धोखे से शुरू होगा.''
' धोखा. क्या मतलब?'
उसने कहा:
'' ये लोग देखने से यह समझे कि उन्हें जहन्नम में नहीं फेंका गया और जन्नतियों को जन्नत में जाने का हुक्म हो गया है तो शायद उन्हें भी दिखावे के ईमान के आधार पर छोड़ा जा रहा है. लेकिन यह उनकी गलतफहमी है जो जल्द ही दूर हो जाएगी.
इसी पल मेरे कानों में अलहम्दु लिल्लाहि रब्बिल आलमीन (सारी खूबयाँ और तारीफ़ उस के लिए हैं जो सारे जहानों का रब है) के पढ़ने की बहुत आकर्षक आवाज़ आना शुरू हो गई. यह अर्श को उठाने वाले और दूसरे फरिश्ते थे जिन्होंने अपनी खूबसूरत आवाज में शुक्र का कलमा पढ़ना शुरू किया था. सालेह ने मुझे बताया:
'' यह हष्र के दिन के ख़त्म होने का ऐलान है.''
इसके साथ ही हष्र के मैदान में अंधेरा फैलना शुरू हो गया. सिवाय अर्श के और कहीं रोशनी बाकी नहीं रही. मैं कुछ भी देखने के लायक नहीं रह गया था. मैंने घबरा कर सालेह से पूछा:
' यह क्या हो रहा है?'
'' अंधेरा'' उसने संक्षिप्त में उत्तर दिया.
' भाई यह तो मुझे भी पता है. मगर ऐसा क्यों हो रहा है?'
'' यह इसलिए हो रहा है कि अंधेरे को पार करके जन्नत तक सिर्फ वही लोग पहुंचेगे जिनके पास अपने ईमान और आमाल (कर्म) की रोशनी होगी.
यह कहकर उसने मेरे हाथ में मेरा आमाल नामा थमा दिया. इसमें एक अजीब सी रोशनी थी जिसकी वजह से मेरी आँखें फिर से रोशन हो गईं और मैं अंधेरे में भी साफ़ साफ़ से देखने के काबिल होगया.
'' हर आदमी को उसका आमाल नामा दिया गया है और यही आमाल नामा अब हष्र के मैदान की काली रात में रोशनी बन चुका है. अब सिवाय मुनाफिकों के हर आदमी के पास रोशनी है.'' सालेह ने मेरी जानकारी को बढ़ाते हुए बताया.
' अब क्या होगा?' मैंने पूछा.
'' अब यहां से हम लोग नीचे जाएंगे. सभी उम्मातें अपने नबी के नेतृत्व में जन्नत की ओर रवाना होंगी.''
' जन्नत का रास्ता किस तरफ़ है?' मैंने पूछा.
'' अर्श के बिल्कुल करीब है. अर्श के पीछे दाहिने हाथ की ओर जहां आसमान पर जन्नत का नज़ारा दिख रहा था वहीं से जन्नत का रास्ता है. लेकिन यह रास्ता जहन्नम की खाई के ऊपर से जाता है जहां हर तरफ अंधेरा ही अंधेरा है. जिसके पास जितनी ज्यादा रोशनी है वह उतनी ही आसानी और तेजी से जहन्नम के ऊपर से गुजर जाएगा.''
' इसका मतलब है कि एक इम्तिहान अभी और बाकी है.'
'' नहीं यह इम्तिहान नहीं. दुनिया की ज़िन्दगी की तस्वीर है. जो दुनियां में जितना ज्यादा खुदा का वफादार और बात मानने वाला रहा और ज़िन्दगी के पुल पर सच्चाई और एक ईश्वर के लिए खुदा की ओर बढ़ता रहा वह इतनी ही आसानी और तेजी से जन्नत की ओर बढ़ेगा. लेकिन हल्के या तेज़ सारे दाहिने हाथ वाले यहां से गुजर जाएंगे. सिवाय मुनाफिकों के जो ईमान और आमाल की रोशनी के बिना खाई को पार करने की कोशिश करेंगे और जहन्नम के सबसे निचले गड्ढे में जा गिरेंगे जहां उन्हें बहुत बुरा अज़ाब दिया जाएगा.''
'मेरे घर वाले मेरे साथ होंगे?' मैंने पूछा.
'' आज यह आखरी सफ़र सबको अकेले ही तय करना है.'' सालेह ने दो टूक जवाब दिया.
' फिर वह समूह समूह होकर जन्नत में जाने वाली बात का क्या हुआ?' मैंने सवाल उठाया.
'' समूह दर समूह का मतलब यह है कि हर उम्मत अपने नबी के नेतृत्व में जन्नत के दरवाज़े तक पहुंचेगी. लेकिन जन्नत में दाखिला एक एक करके अपने निजी आमाल के आधार पर होगा.'' फिर उसने कुछ देर टहर कर पूछा:
'' क्या तुम अभी भी कोई तमाशा देखने में रुचि रखते हो?''
मेरे हां कहने से पहले ही वह मुझे लेकर तेजी से आगे बढ़ गया. यहां तक ​​कि हम एक ऐसी जगह आ गए जहाँ लोगों के पास बेहद तेज रोशनी थी. उनकी रोशनी उनके आगे आगे और दाएँ दिशा में उनके साथ चल रही थी. वह ऊँची आवाज में कह रहे थे ऐ हमारे रब! हमारी रौशनी को पूरा रख और हमें माफ कर. तू हर चीज़ पर क़ादिर (सक्षम) है. मैं सालेह से कुछ पूछे बिना ही उन लोगों को पहचान गया. यह सहाबा हज़रात (नबी के साथी) थे. सबसे आगे रसूल अल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम थे जिनका वुजूद सरापा नूर बना हुआ था. मैं उन लोगों की नक़ल में उन्ही के शब्द दोहराने लगा. यह वो कुरान की दुआ थी जो मैं ज़िन्दगी भर पढ़ता रहा था. लेकिन इस दुआ को पढ़ने का असल समय अब ​​आया था. हम इसी तरह चल रहे थे कि सालेह ने कहा:
'' अब तमाशा देखो.''
उसके साथ मैंने देखा कि कुछ लोग दौड़ते, गिरते पड़ते सहाबा हज़रात के पास आए. मगर उनके पास कोई रोशनी नहीं थी. उन्होंने आते ही दुहाई देना शुरू कर दिया कि हमें भी अपनी रोशनी से थोड़ा सा हिस्सा दे दो. सहाबा में से कुछ ने अपने पीछे हष्र के मैदान के सीधे हाथ की तरफ़ इशारा करते हुए जवाब दिया कि हम तो यह रोशनी वहाँ से लेकर आए हैं तुम भी वापस लोटो और वहां से रोशनी ले लो. यह सुनकर सारे मुनाफिक जल्दी से उस दिशा में भागे . लेकिन जैसे ही उन्होंने दाहिने ओर जाने की कोशिश की उन्हें पता चला कि यहां तो एक दीवार है. इस दीवार में कुछ जंगहों पर दरवाज़े बने हुए थे जिन पर फ़रिश्ते तैनात थे. इन लोगों ने उन दरवाजों से अंदर जाने की कोशिश की लेकिन फरिश्तों ने उन्हें मार मार कर वहां से भगा दिया. उनके पास रोशनी हांसिल करने का कोई रास्ता नहीं रहा. इसलिए वो लौटकर सहाबा हज़रात के पास वापस आ गए और उनसे कहने लगे कि देखिये हम भी मुसलमान हैं और दुनिया में आपके साथ ही थे. आपको तो पता है. हमारी रोशनी के लिए कुछ करें. जवाब मिला: बेशक तुम हमारे साथ थे लेकिन तुमने अपने आपको धोके में डाला, तुम इस दिन के बारे में शक (संदेह) में रहे और तुम्हारा असली मकसद दुनिया की ज़िन्दगी ही था. तुमने शैतान की बात मानी और उसने तुम्हें धोखे में डाले रखा. सो न आज तुम कुछ दे दिलाकर छूट सकते हो और न कोई काफ़िर.
यह सुनकर मुनाफिकों को विश्वास हो गया कि उनका अंजाम भी काफिरों (इंकार करने वालों) से अलग नहीं है. वापस जाने में उन्हें नुकसान लगा. इसलिए उन्होंने अंधेरे में रास्ता पार करने की कोशिश की. लेकिन रौशनी के बिना कोशिश का नतीजा जहन्नम की खाई थी. इस तरह एक एक करके सारे मुनाफिक चीख़ते चिल्लाते हुए जहन्नम में जा गिरे जहां नीचे अज़ाब के फरिश्ते उनका इंतजार कर रहे थे. हम सारा मंज़र (दृश्य) देखते हुए और ऊँची आवाज़ से यह दुआ पढ़ते हुए अर्श की ओर बढ़ते रहे:
'ए हमारे रब (प्रभु) हमारे नूर को बुझने न दे और मुनाफिकों के अंजाम से हमें बचाते हुए हमारी बख्शिश फ़रमा. बेशक तू हर चीज़ पर क़ादिर (ताकत रखने वाला) है.
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शुक्रवार, 20 जुलाई 2012

भाग १३.० आखरी अंजाम की तरफ रवानगी

मैं अन्य शोहदा और नबियों के साथ एक बार फिर आराफ की ऊंचाई पर खड़ा था. इस उंचाई से हष्र का मैदान बिल्कुल साफ नज़र आ रहा था. नज़र की हद तर फैले हुए मैदान में लोगों को दो समूहों में जमा कर दिया गया था. मैदान के दाहिने हाथ पर नज़र की हद तक लोगों की सफें दर सफें (लाइन पर लाइन) बनी हुई थी. यह जन्नत वाले थे. उनके चेहरे रोशन, आंखों में चमक और होंटों पर मुस्कान थी. उनके दिल खुशी से नाच रहे थे और उनकी रूहें (आत्माएं) शुक्र गुज़ारी के अहसास में डूबी हुई थी. यह दाहिने हाथ वाले थे. दाहिने हाथ वाले की खुशकिस्मती का क्या कहना!
मैदान के बाईं ओर लोग एक हुज्जूम के रूप में घुटनों के बल बैठे थे. उनके हाथ पीछे करके बांधे गए थे और जहन्नम का नज़ारा उनके सामने था. यह जहन्नमी थे जिनके लिए हमेशा के घाटे का फैसला सुनाया जा चुका था. वह अपने अंजाम की आहट को महसूस कर रहे थे. उनके चेहरे उतरे हुए, आँखें बुझी हुई सर गर्द गुबार से भरे हुए और गर्दन झुकी हुई थी. उनकी रंगत स्याह पड़ चुकी थी, शरीर पर गर्द ग़ुबार अटा हुआ था. यह बाएं हाथ वाले थे. बाएं हाथ वालों की बदनसीबी का क्या कहा.
सामने अर्श इलाही था. उसके जलाल व जमाल (महिमा) का क्या कहना! अर्श के आसपास पंक्तियों में फरिश्ते खड़े हुए थे. उनके बीच में अर्श से मिले हुए आठ बहुत ख़ास (अत्यंत असाधारण) फरिश्ते खड़े हुए थे. यह अर्श को उठाने वाले फरिश्ते थे. फरिश्तों की ज़ुबानों पर खुदा की तारीफ़ और बड़ाई (स्तुति) के शब्द जारी थे. जबकि अर्श के पीछे कुछ ऊंचाई पर जन्नत और जहन्नम दोनों का नज़ारा साफ दिख रहा था. दाहिने ओर जन्नत थी जिससे उठने वाली खुशबुओं ने हष्र के दाहिने हिस्से को महका रखा था और वहां के नगमों ने दिलों के तारों को छेड़ दिया था. जन्नत की बस्ती के खुबसूरत मंज़र, हरे हरे बाग़, बागीचे, महल, नदियाँ, नौकर साफ़ तौर से नजर आरहे थे . इस जन्नत का मंज़र (दृश्य) हर आदमी की आंखों को ललचा रहा था. जन्नती  अपनी खुश नसीबी पर रश्क करते, जन्नत की आरज़ू मन में लिए एक दूसरे के साथ खुशियाँ बाँट रहे थे.
दूसरी तरफ जहन्नम का सबसे भयानक नज़ारा अर्श के बाएँ तरफ दिखता था. आग के शोले साँप के फन की तरह बार बार लपक रहे थे. जहन्नम में दिए जाने वाले तरह तरह के आज़बों का नज़ारा दिलों को दहला रहा था. बदबू, सड़न, आग, ज़हरीले कीड़े, वहशी जानवर, कड़वे कसीले फल, काँटेदार झाड़, पीप और लहू का खाना, खोलता हुआ पानी, उबलते हुए तेल की तलछत, उन जैसे अनगिनत अज़ाब और सबसे बढ़कर बहुत खौफनाक फरिश्ते जो हाथों में कोड़े, ज़नजीरें, तौक़ और हतोड़े जैसे हथ्यार लेकर जहन्नम वालों का स्वागत करने के लिए मौजूद थे.
जहन्नम वालों की बदहाली पहले ही कुछ कम न थी कि अब जहन्नम को उन्होंने अपनी आंखों से देख लिया था. इस मंज़र (दृश्य) ने उनकी हिम्मत को आखरी दर्जे में तोड़ डाला था. वह वहशत पड़ी नज़रों से यह मंज़र देख रहे थे. उनमे से हर आदमी की सबसे बड़ी ख्वाहिश (इच्छा) थी कि किसी तरह उनकी मौत का फैसला सुना दिया जाए. मगर अफसोस कि जहन्नम में हर अज़ाब था सिवाय मौत के. क्योंकि जहन्नम वालों के लिए मौत सबसे बड़ी राहत थी लेकिन जहन्नम अज़ाब की जगह (स्थान) थी, राहत की नहीं.
जन्नत वालों और जहन्नम वालों के बीच में एक पारदर्शी पर्दा था. जिससे दोनों एक दूसरे को देख सकते और बातचीत कर सकते थे, लेकिन उस परदे के पार नहीं जा सकते थे. जन्नत वाले जहन्नम वालों से पूछते कि हमने तो अपने रब (प्रभु) के वादों को सच पाया जो उस ने हमसे किये थे. क्या तुमने भी जहन्नम के सारे वादे और विवरण सच पाए जो ईश्वर ने तुम से किए थे. जहन्नम वालों के पास जवाब में स्वीकार कर गर्दन झुका देने और हां कहने के अलावा कोई और चारा ही नहीं था .
वह भूख और प्यास से बिलख रहे थे. इसलिए सामने जन्नत वालों के सामने मेवे, और तरह तरह के पकवान खाते और पीते देखते तो कहते कि पानी और दूसरी चीज़े जो खुदा ने तुम्हें दी हैं, कुछ हमें भी खाने के लिए दे दो. जवाब मिलता कि खुदा ने जहन्नम वालों पर यह सब चीज़े हराम रखी हैं.
हम ऊपर खड़े यह सब देख और सुन रहे थे. हालांकि हमारे फैसले का ऐलान एक रस्मी सी बात थी, लेकिन न जाने क्यों मेरा दिल डर रहा था. मैं अल्लाह तआला से उसकी रहमत और माफ़ी का सवाल कर रहा था. मैं दुआ कर रहा था कि परवरदिगार हमें जहन्नम वालों का साथी न बना बल्कि जन्नत में दाखिल फ़रमा. यही दुआ दूसरे लोग भी कर रहे थे.
यह मेरी हालत थी. जबकि कुछ दूसरे साथी इस मौके पर आगे बढ़े और पुकार कर जन्नत वालों को बधाई देने लगे. वह कह रहे थे कि आप पर खुदा की रहमत (दया) और सलामती (सुरक्षा) हो. इस मौके पर नबी आगे बढ़े और अपनी क़ौम के काफ़िर सरदारों को पहचान कर कहने लगे. कहाँ है आज तुम्हारी सरदारी, तुम्हारी फौज और तुम्हारा घमंड? फिर वह जन्नत वालों की तरफ़ इशारा करके कहते कि क्या यह वही गरीब लोग हैं जिन्हें तुम नीच समझते थे और सोचा करते थे कि उन्हें खुदा की रहमत से कोई भाग ना दुन्याँ में मिला है और न कभी मिलेगा. देख लो आज वह किस ऊँचे मक़ाम (उच्च स्थान) पर हैं.
इसी बीच में ऐलान हुआ कि हमारे नबियों और शोहदा को उनका आमाल नामा उन्हें दे दिया जाए. मेरी उम्मीद से उलट इस मौके पर हिसाब किताब या पेशी नहीं हुई. सिर्फ यह हुआ कि हर आदमी को आगे सामने की ओर बुलाया जाता जहां से हर जन्नती और जहन्नमी उसे देख सकता था. वह आदमी अपने साथ मौजूद फरिश्तों के साथ चलता हुआ आगे आता. फरिश्ते बहुत इज्ज़त के साथ उसे अर्श के सामने ले जाते. जहां ज़िन्दगी में उसके कारनामों और आखिरत (परलोक) में उनकी सफलता की घोषणा की जाती.
जब कोई आदमी पेश होता, उसके ज़माने के सारे हालात, जिन लोगों को उन्होंने दीन (धर्म) पहुँचाया उनकी प्रतिक्रिया और सब कुछ विस्तार से बताया जाता. बाकि लोग यह सब सुनते और दाद देते. आखिर में जब उसकी सफलता और दर्जे का ऐलान होता तो मुबारक बाद की गूंज उठती. जन्नत वाले तालियां बजाते और कुछ सीटियाँ और चीखें मार कर अपनी खुशी का इजहार करते.
जब मेरा नाम पुकारा गया तो साथ खड़े हुए सारे लोगों ने बधाई दी. मैं सालेह और इम्साइल के साथ किनारे पर पहुँचा जहाँ से मैदान में खड़े सभी लोग मुझे देख सकते थे. इम्साइल ने मेरा आमाल नामा उठा रखा था. जबकि सालेह मेरे आगे आगे चल रहा था. वहां पहुंच कर मैं सर झुका कर खड़ा हो गया. आवाज आई:
'' अब्दुल्लाह सर झुकाने का समय बीत गया. अब सर उठाओ. लोग तुम्हें देखना चाहते हैं.''
मैंने सर उठाया इस तरह कि मेरी आंखों में शुक्र गुज़री (आभार) के आंसू और मेरे होंठों पर जीत की मुस्कान थी. सालेह और इम्साइल ने बारगाह इलाही से इशारा पाकर मेरी ज़िन्दगी का विवरण बयान करना शुरू किया. मैंने मैदान की ओर नज़र दौड़ाई तो देखा कि मेरे परिवार वाले, दोस्त, मेरा साथ देने वाले खुदा के बन्दे, मेरी दावत क़ुबूल करने वाले ईमान ला चुके लोग, एक ईश्वर और आखिरत (परलोक) की बातें सुन कर गुनाहों से तौबा करने वाले मर्द और औरतें सब मुझे देख कर हाथ हिला रहे थे. मैं भी जवाब में हाथ हिलाने लगा, मगर मेरी नज़र नाएमा को खोज रही थी. वह अपने बच्चों के बीच खड़ी थी. उसकी आंखों में आंसू थे और वे भी हंस रही थी. उसे जब लगा कि मैं उसे देख रहा हूँ तो उसने शरमाकर नज़र झुका दी. लैला उसके बराबर में खड़ी थी. वह सबसे ज्यादा जोश में थी और अपनी कुर्सी पर चढ़ी तालियां बजा रही थी. जबकि आरफा, आलया, अनवर और जमशैद अपनी सीटों पर खड़े उत्साहित अंदाज में हाथ हिला रहे थे.
मैंने कुछ देखने के लिए नज़रें मैदान की बाईं ओर फेराई. यहाँ एक दूसरा ही मंज़र (दृश्य) था. शर्मिंदगी, अपमान, पछतावे, अंदेशे, निराशा, परेशानी, यातना, मुसीबत, मलामत, लज्जा और हसरत की खत्म न होने वाली काली रात थी जो जहन्नम वालों पर छाई हुई थी. अगर ज़मीन आसमान में बोलने की शक्ति होती तो वह जहन्नम वालों के हाल पर नोहा पढ़ते. मेरा दिल चाहा कि मैं किसी तरह समय का पहिया उल्टा घुमाकर पुरानी दुनिया में लौट जाऊँ और यह मंज़र दुनिया वालों को दिखा सकूँ. मैं चीख चीख कर उन्हें बताऊँ कि मेहनत करने वालो! एक दूसरे से मुकाबला करने वालो! माल और सामान की रेस लगाने वालो! मुकाबला करना है तो उस दिन की कामयाबी के लिए करो. रेस लगानी है तो जन्नत पाने के लिए लगाओ. योजना बनानी है तो जहन्नम से बचने की योजना बना. प्लाट, दुकान, मकान, बंगले, स्टैटस, कैरियर, गाड़ी, जेवर और कपड़े के दिखावे में एक दूसरे को पीछे छोड़ने वालो! दुनिया के मिलने पर हंसने और उसकी नुक्सान पर रोने वालो! हंसना है तो जन्नत की उम्मीद पर हंसो और रोना है तो जहन्नम के अंदेशे पर रो. मरना है तो उस दिन के लिए मरो और जीना है तो उस दिन के लिए जिओ.... जब ज़िन्दगी शुरू होगी. कभी न खत्म होने के लिए .
मेरी आंखों से बहने वाली आंसुओं की लड़ी और तेज हो गई. इस बार यह आँसू खुशी के नहीं थे. इस एहसास के थे कि शायद मैं थोड़ी सी मेहनत और करता तो ज्यादा लोगों तक मेरी बात पहुंच जाती और कितने ही लोग जहन्नम में जाने से बच जाते. मेरे दिल में तड़प कर एहसास हुआ. काश एक मौका और मिल जाए. काश कोई गुज़रा हुआ समय फिर लौट आए. ताकि मैं एक एक आदमी को झिंझोड़ कर उस दिन के बारे में खबर दार कर सकूं. मेरे दिल की गहराइयों से तड़प कर एक आह निकली. मैंने बड़ी बेबसी से नज़र उठाकर अर्श की ओर देखा. वहाँ हमेशा की तरह रुख-ए-अनवर पर जलाल (महिमा) का पर्दा था. मेरी नज़र उन कदमों पर आकर ठहरगई, जहां से मैं कभी नामुराद नहीं लौटा था. इस हकीर और गरीब बन्दे की सारी पहुंच इन क़दमों तक ही थी. सरे जहां से बेनियाज़ (जिसे कुछ ज़रुरत ना हो) शहंशाह के लिए इस बात का कोई महत्व हो तब भी, और उसका कोई महत्व ना हो तब भी, यही मेरी कुल संपत्ति थी. यही मेरी कुल पहुंच थी.
दिल को कुछ करार हुआ तो मेरी नज़र फिर जहन्नम वालों की तरफ फिर गई. इनमें से बहुत से लोग ऐसे थे जिन्हें मैं जानता था. उनकी संख्या बहुत अधिक थी. यह आपस में घुस कर गुलामों कि तरह बैठे हुए थे. यह लोग नज़र नहीं मिला रहे थे बल्कि बहुत सौं ने तो पीठ फेर ली थी. इसलिए मैं अपने जानने वाले ज्यादा लोगों को वहां नहीं देख सका. लेकिन उनको देख कर उस नेमत का अहसास हुआ कि किस तरह अल्लाह ने मुझे अपने रहम और कर्म से इस बुरे अंजाम से बचा लिया. मुझे महसूस हुआ कि जन्नत की अनगिनत नेमतों में से दो सबसे बड़ी नेअमतें शायद यह है कि इंसान को जहन्नम से बचा लिया जाएगा और दूसरा उसे बड़े सम्मान के साथ जन्नत में ले जाया जाएगा.
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बुधवार, 18 जुलाई 2012

भाग १२.१ बनी इस्राइल (यहूदी) और मुसलमान


 इसके साथ ही मंज़र (दृश्य) ख़त्म हो गया और एक जोरदार डाँट फिजा में बुलंद हुई. खुदा का गुस्सा अपने चरम पर था. उनके नबी के साथ जो कुछ बनी इस्राइल ने किया था उसकी जो सजा बख्त नस्र के रूप में उन्होंने भुगती थी वह बहुत मामूली थी. असल सज़ा का समय अब ​​आया था. हुक्म हुआ हर उस आदमी को पेश किया जाए जो किसी रूप में भी यर्मियाह के साथ किये गए इस ज़ुल्म में शामिल था.
नेताओं और धार्मिक जुरुओं और आम लोगों का वह ग्रुप पेश हुआ जो इस सब का जिम्मेदार था. उन में सज़ा देने वाले भी थे और वे भी जो यर्मियाह को बख्त नस्र का एजेंट करार देकर उनके खिलाफ लोगों को भड़का रहे थे. इन सब के लिए जहन्नम का फैसला सुना दिया गया. फिर उसके बाद एक एक करके उस ज़माने के लोगों का घेराओ शुरू हुआ. नबी के मुजरिमों का घेराओ जिस तरह होना चाहिए था वैसे ही हुआ हरेक मुजरिम के लिए बड़ी बड़ी सजा का फैसला हो गया.
...............
मैं इस बार हष्र में देर तक खड़ा रहा और लोगों का हिसाब किताब देखता रहा. सच्ची बात यह है कि इससे पहले मैंने कुछ ही लोगों का हिसाब किताब देखा था. लेकिन अब अंदाज़ा हो रहा था कि खुदा सबसे पूरा पूरा और सही इन्साफ कर रहे हैं. हर आदमी के हालात, उसके माहौल और उसकी परवरिश के नतीजे में बनने वाली नफ्सियात (सोच) की रोशनी में आमाल (कर्मों) की समीक्षा की जा रही थी. लोगों ने राई के दाने के बराबर भी कोई अमल किया था तो उनकी आमाल की किताब में वह दर्ज था. उनकी नीयत, वजह और अमल हर चीज़ को परखा जा रहा था. फरिश्तों का रिकॉर्ड, दुसरे लोग, दर और दीवार और सबसे बढ़कर इंसान के अपने शरीर के अंग गवाही दे रहे थे. इन सब की रौशनी ही में इंसान के आखरी मुक़द्दर का फैसला सुनाया जाता. यूँ किसी इंसान पर राई के दाने के बराबर भी ज़ुल्म नहीं हो रहा था. जिसे माफ़ करने की जरा भी गुंजाइश होती उसे माफ कर दिया जाता. अल्लाह के पूरे इन्साफ और पूरी रमत का एक साथ ऐसा ज़हूर हो रहा था कि शब्दों से उसे बताया नहीं जासकता.
मैं इसी हाल में था कि सालेह ने मेरे कान में कहा:
'' नाएमा बड़ी बेचैनी से तुम्हें ढूँड रही है.''
' खैरियत?' मैंने पूछा.
'' बड़ा दिलचस्प मामला है. बेहतर है तुम खुद चले चलो.''
यह कहकर सालेह ने मेरा हाथ पकड़ा और थोड़ी ही देर में हम नाएमा के पास खड़े थे. लेकिन मुझे यह देखकर हैरत हुई कि नाएमा के साथ एक सुंदर परी जैसी लड़की खड़ी थी. मैंने अपने दिमाग पर बहुत ज़ोर डाला पर मैं उसे पहचान न सका.
नाएमा ने खुद ही उसका परिचय कराया:
'' यह अमूराह हैं. और हज़रत नूह की उम्मत से हैं. यह मुझे यहीं पर मिली हैं. यह आखरी नबी या उनके किसी ख़ास उम्मती से मिलना चाह रही थीं. नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम तक तो मैं इन्हें नहीं ले जा सकती थी. लेकिन मैंने सोचा कि आप से इन्हें मिलवा दूं. आखिर आप भी तो बड़े ख़ास लोगों में से हैं.''
यह कहकर वह अमूराह को मेरा परिचय देने लगी. इस परिचय में ज़मीन आसमान के जो कलाबे वह मिला सकती थी, उसने मिलाऐ. मैंने बीच में नाएमा को रोका और अमूराह से कहा:
' नाएमा मेरी पत्नी हैं. इसलिए मेरे बारे में बढ़ा चढ़ा कर बात कर रही हैं. लेकिन उनकी यह बात ठीक है कि मैं आप को इस उम्मत के ख़ास (प्रमुख) लोगों बल्कि अपने नबी से भी मिलवा दूंगा.'
नाएमा को मेरी बात पसंद नहीं आई. वह झल्ला कर बोली:
'' यदि मैं बढ़ा चढ़ा रही हूँ तो बताएँ यह सालेह आपके साथ क्यों रहते हैं और आप को कहाँ कहाँ ले कर जाते हैं?''
मैंने झगड़ा खत्म करने के लिए कहा:
' अच्छा चलो मैंने हार मानी लेकिन पहले अमूराह से पूरा परिचय तो हो लेने दो.'
अमूराह हंसते हुए बोली:
'' इंसान हजारों साल में भी नहीं बदले बल्कि दोबारा ज़िन्दा होकर भी वैसे ही हैं. आप दोनों वैसे ही झगड़ा कर रहे हैं जैसे मेरे अम्मी अब्बू करते थे.''
'' इनके अम्मी अब्बू से भी मेरी मुलाकात हुई है.''
नाएमा बीच में बोली, मगर यह उसका खुशी से भरपूर वाक्य था जिससे मुझे अंदाज़ा हुआ कि वह अमूराह से मिलकर इतना खुश क्यों है और क्यों उसने मुझे हष्र के मैदान से वापस बुलवाया है.
'' अमूराह के पति नहीं हैं.''
मेरे अंदाज़े की पुष्टि सालेह ने कर दी. वह मेरे कान में बोला:
'' नाएमा ने तुम्हारी होने वाली बहू से मिलवाने के लिए तुम्हें बुलाया है.''
मेरा अंदाज़ा सही था. नाएमा जमशैद के लिए दुल्हन ढूंढ रही थी और आखिरकार उसे इस कोशिश में इस हद तक सफलता मिल चुकी थी कि लड़की उसे पसंद आ गई थी. मगर लड़के लड़की ने एक दूसरे को पसंद किया या देखा भी है यह मुझे पता नहीं था. मगर नाएमा को इस से कोई ज्यादा फर्क भी नहीं पड़ता था. उसके विचार में उसका राज़ी हो जाना ही इस रिश्ते के लिए काफी था.
मैंने पूछा:
' अमूराह आपके पति कहाँ हैं?'
अमूराह ने कुछ शरमाकर कहा:
'' दुनिया में सिर्फ 15 साल की उम्र में मेरा निधन हो गया था. मैं बचपन से ही बहुत बीमार रहती थी. अल्लाह की रहमत ने उसका यह बदला दिया कि बिना किसी हिसाब किताब के शुरू ही में मेरे लिए जन्नत का फैसला हो गया.''
' और बाकी फैसले तुम्हारी होने वाली सास कर रही है.' मैंने मन ही मन में सोचा.
सालेह के चेहरे पर भी मुस्कान आ गई. फिर अमूराह बोली:
'' मुझे आप लोगों से मिलकर बहुत खुशी हुई है. जन्नत में भी हम मिलते रहा करेंगे. अच्छा अब मैं चलती हूँ. मेरे अम्मीं अब्बू मुझे ढूँड रहे होंगे.''
नाएमा भी उसके साथ जाने के लिए मुड़ी तो मैंने कहा:
' ठहरो मुझे तुमसे कुछ काम है.'
नामह ने अमूराह से कहा:
'' तुम वहीं रुको जहाँ हम मिले थे. मैं अभी आती हूँ.''
मैंने मज़ाक में नाएमा से कहा:
' अमूराह से उसका मोबाइल नंबर ले लो, इस भीड़ में कहाँ खोजती फिरोगी.'
'' यह मोबाइल क्या है?'' अमूराह ने हैरानी से पूछा.
' यह एक ऐसी बला का नाम है जिसके बाद तुम नाएमा से बच नहीं सकती.' मैंने जवाब दिया. सालेह ने बीच में दखल देते हुए कहा:
'' मेरा ख्याल ​​है कि अमूराह अपनी मंजिल तक पहुंच नहीं सकेगी, मैं उसे पहुंचा कर आता हूँ.''
...............
अमूराह और सालेह के जाने के बाद मैं नाएमा को लेकर होज़ के किनारे एक जगह बैठ गया. मैंने उससे कहा:
' तुम्हें पता है तुम क्या कर ही हो?
'' हाँ मैंने जमशैद के लिए अमूराह को पसंद किया है.''
' मुझे मालूम है. लेकिन तुम्हें पता है कि तुम्हारी पसंद से कुछ नहीं होगा.'
'' मुझे मालूम है. पिछली दुनिया में हुमा के तजुर्बे के बाद अब जमशैद मेरे सामने कुछ नहीं बोल सकता और अमूराह के माँ बाप से मैं बात कर चुकी हूँ.''
' यानी लड़का और लड़की दोनों की जानकारी में यह बात नहीं है. न उनकी मर्ज़ी पूछी गई और सब कुछ तुमने तय कर दिया. नाएमा यह दुनिया नहीं है. यहाँ हम माँ बाप बस औपचारिक हैसियत रखते हैं. यहां वही होगा जो उन लोगों की मर्ज़ी होगी. इसलिए अपने दिल में कोई उम्मीद बांधने से पहले उन दोनों से पूछ लो.'
'' और अगर उन्होंने मना कर दिया?''
' तो और बहुत लड़कियाँ हैं. आज किसी चीज़ की कमी नहीं. तुम इस मामले में बे फ़िक्र हो जाओ.'
नाएमा चुप हो गई लेकिन उसका मन अभी तक अपनी बहू में उलझा हुआ था. मैंने उसे देखते हुए कहा:
' नाएमा हमें पहली बार यहां अकेले में बैठने का मौका मिला है. तुम कुछ देर के लिए अपनी ममता को कोने में रख दो और देखो कि यहाँ कितना अच्छा माहौल है.'
फिर मैंने उससे कहा:
'' तुम्हें याद है नाएमा! हमने कितने मुश्किल वक़्त साथ साथ देखे थे. खुदा का पैगाम (संदेश) उसके बन्दों तक पहुंचाने के लिए मैंने अपनी ज़िन्दगी लगा दी. अपना कैरियर, अपनी जवानी, अपना हर सांस उसी काम के लिए समर्पित कर दिया. मगर देखो नाएमा मैंने जो सौदा किया था उसमे कोई घाटा नहीं हुआ. मैं तुम से दुनिया में कहा करता था ना कि जो खुदा के साथ सौदा करता है वह कभी घाटा नहीं उठाता. देखो हम घाटे से बच गए. कितनी शानदार सफलता हमें नसीब हुई है. हम जीत गए नाएमा... हम जीत गए. अब ज़िन्दगी है, मौत नहीं. जवानी है, बुढ़ापा नहीं. अब स्वास्थ्य है, बीमारी नहीं. अब अमीरी है, गरीबी नहीं. अब हमेशा रहने वाली खुशियां हैं और कोई दुख नहीं.'
'' मुझे तो कोई दुख याद नहीं आ रहा.''
' हाँ, आज किसी जन्नत में जाने वाले को न दुनिया का कोई दुख याद है और न जहन्नम में जाने वाले को दुनिया का कोई सुख याद है. दुनिया तो बस एक ख्याल था, सपना था, कहानी था. हक़ीक़त तो अब शुरू हुई है. ज़िन्दगी तो अब शुरू हुई है.'
'' ज़रा सामने देखिये समां बदल रहा है.''
मैंने उसके कहने से ध्यान किया तो एहसास हुआ कि वाकई अब शाम डखलने के बिल्कुल करीब हो चुकी है. मुझे अहसास हुआ कि यह परिवर्तन किसी ख़ास बात की निशानी है.
पीछे से एक आवाज़ आई:
''हां तुम ठीक समझे.''
यह सालेह की आवाज़ थी. मेरे पास बैठते हुए बोला:
'' इस बदलाव का मतलब है कि हिसाब किताब खत्म हो रहा है. सभी लोगों का हिसाब किताब हो चुका है.''
' पहले यह बताओ अमूराह को छोड़ कर तुम कहाँ रह गए थे. तुम न पानी पीने जा सकते हो न शौचालय जाना तुम्हारे लिए मुमकिन है. फिर तुम थे कहाँ?'
''मैं इम्साइल के साथ था.''
इसके साथ ही इम्साइल पीछे से निकल कर सलाम करता हुआ सामने आकर खड़ा हो गया. यह मेरे बाएँ हाथ का फरिश्ता था. मैंने सलाम का जवाब दिया और हंसते हुए सालेह से पूछा:
' इनकी तशरीफ़ लाने की वजह?'
'' हिसाब किताब ख़त्म हो चुका है अब तुम्हें पेश होना है. हम दोनों मिलकर तुम्हें अल्लाह के हुज़ूर पेश करेंगे.''
पेशी का सुनकर मुझे पहली बार घबराहट पैदा हुई. मैंने घबरा कर सवाल किया:
' हिसाब इतनी जल्दी कैसे खत्म हो गया?'
''मैं तुम्हें पहले बता चुका कि यहां समय बहुत तेजी से बीत रहा है और हष्र में समय बहुत धीरे. इसलिए जितना समय तुम यहाँ रहे हो इतने समय में वहां हिसाब किताब ख़त्म हो चुका.''
' वहाँ मेरे पीछे क्या हुआ था?'
'' सभी उम्मतों का जब सामान्य हिसाब किताब हो गया तो हष्र के मैदान में सिर्फ वे लोग रह गए जो ईश्वर के होने का यकीन तो रखते थे, लेकिन उनके गुनाहों (पापों) की बिना पर उन्हें रोक लिया गया था. आखिरकार हुज़ूर की दरख्वासत (अनुरोध) पर उनका भी हिसाब हो गया. अब आखिर में सारे नबी और शाहिद पेश होंगे.''
'' क्या शाहिद वे लोग हैं जो अल्लाह की राह में क़त्ल हुए?'' नामह ने सालेह से सवाल किया.
'' नहीं यह वो शाहिद नहीं. वह भी बड़े ऊँचे रुत्बों के मालिक बने हैं. लेकिन यह शाहिद हक़ की गवाही देने वाले लोग हैं. यानी उन्होंने इंसानों पर अल्लाह के दीन की गवाही के लिए अपनी ज़िन्दगी लगा दी थी. यही वह लोग हैं जिन्होंने नबियों के बाद उन की दावत को आगे पहुंचाया.
' क्या उनका भी हिसाब होगा?' मैंने पूछा क्योंकि मुझे हिसाब के ख्याल से ही घबराहट हो रही थी.
'' नहीं बस बारगाह इलाही में उनकी पेशी होगी और उनकी निजात (मुक्ति) का ऐलान होगा. लेकिन अल्लाह सारे आलमों के रब और हर चीज़ के मालिक हैं. वह जब चाहें जो चाहें हिसाब कर सकते हैं. कोई भी उन्हें रोक नहीं सकता.''
मेरे मुंह से निकला:
' रब्बिग फिर वरहम.' (ऐ मेरे रब मुझे बख्श दे और रहम कर).
''मैं खुदा के इख्तियार (अधिकार) का बयान कर रहा हूं. यह नहीं कह रहा कि खुदा यह करेंगे. दरअसल अब जन्नत और जहन्नम में दाखिले (प्रवेश) का समय आ रहा है. इसलिए अब जन्नती और जहन्नमी सब को हष्र के मैदान में जमा कर दिया जाएगा. उन सबके सामने नबियों और शहीदों की सफलता की घोषणा होगी. फिर गिरोह दर गिरोह  नेक और मुजरिम लोगों को जन्नत और जहन्नम में भेजा जाएगा. जिसके बाद खत्म न होने वाली ज़िन्दगी शुरू हो जाएगी.
.......................................................................................................जारी है....