' एक बात मेरी समझ में नहीं आई.' मैंने चलते चलते सालेह से पूछा.
''वो क्या?''
'वह यह कि पहले से आखिर तक मुसलमानों की संख्या करोड़ों बल्कि अरबों में थी. तो लैला का नंबर बिल्कुल शुरू में कैसे आ गया?'
'' तुम क्या समझते हो कि अल्लाह पहचान पत्र देखकर तय करते हैं कि कौन मुसलमान है और कौन नहीं?''
'मैं समझा नहीं कि तुम्हारी इस बात क्या मतलब है?'
'' मतलब यह है कि मुसलमानों की ज्यादा बड़ी तादाद ने अपने लिए मुसलमान होने की पहचान पसंद ही नहीं की. ज़्यादातर लोगों के लिए उनका अपना समुदाय अपने आलिम और अपना फिरका ही असल पहचान बना रहा. इसलिए आज के दिन जब मुसलमानों का हिसाब किताब शुरू हुआ तो पहले पहल सिर्फ उन लोगों को बुलाया गया जो सच्चे दिल के साथ एक खुदा के मानने वाले और हर तरह की फिरका विरियत (सांप्रदायिकता) से ऊपर उठकर सिर्फ रसूल अल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम से अपना रिश्ता जोड़ने वाले, हर तरह की बिदतों (धर्म में नई बात) और गुमराहियों से अपने दीन (धर्म) की हिफाज़त करने वाले लोग थे. यह वो लोग थे जिन्होंने कभी सच के मामले में अपनी मान्नेताओं और अपने रिश्तों को अहमियत (महत्व) नहीं दी. जब कभी सच सामने आया उन्होंने खुले दिल से उसे क़ुबूल (स्वीकार) किया. ऐसे लोगों में अर्श के साये तले खड़े नेक लोग भी शामिल थे और वे भी जिनके अच्छे कामों के साथ बुरे रवय्ये (व्यवहार) भी मिले हुए थे और इसी आधार पर वह हष्र के मैदान में खड़े थे. लेकिन अल्लाह की ज़ात करीम ने उनके बुरे आमल को नज़र अंदाज़ कर दिया और नेक कामों के आधार पर कामयाबी का परवाना उनके हाथ में थमा दिया. ऐसे लोगों की संख्या बहुत कम थी. इसलिए तुम्हारी बेटी लैला का नंबर जल्दी आगया. वो कम से कम इस मामले में बिल्कुल पक्की निकली थी. जो उसकी कमज़ोरियां थी वह हष्र की सख्ती झेलने की बिना पर और सजा देने के काबिल न समझी गई. बल्कि करीम रब ने कमाल इनायत से उसे भी तुम्हारे साथ कर दिया, हालांकिन उसके अमल (कर्म) तुम्हारे जैसे नहीं थे.''
'मगर मेरा हिसाब किताब और फैसला तो अभी हुआ नहीं.'
'' तुम इस समय जहां हो इसका मतलब यह है कि फैसला हो चुका है. लेकिन ऐलान अभी नहीं हुआ. और बेफिक्र रहो, हष्र के दिन के आखिर पर सबसे आखिर में होगा.''
' ऐसा क्यों?' मैंने पूछा तो सालेह ने स्पष्ट किया:
''मैंने पहले तुम्हें बताया था कि चार तरह के लोग हैं जिनकी कामयाबी का फैसला मौत के समय ही हो जाता है यानी नबी, उनका साथ देने वाले, शहीद और खास नेक लोग.''
मैंने हाँ में गर्दन हिलाई. सालेह ने अपनी बात जारी रखी:
'' इनमें से नबी और खास नेक लोग वह लोग हैं जिनका असल कारनामा आम लोगों पर सच्चे दीन की गवाही देना और एक खुदा व आखिरत (परलोक) की ओर लोगों को बुलाना है. आज क़यामत के दिन इन दोनों समूहों के लोग अपनी गवाही की दास्तान अल्लाह के सामने पेश करेंगे जो उन्होंने दुनिया में लोगों पर दी थी. इस तरह लोगों के पास यह कारण नहीं रह जाएगा कि हक़ और सच्चाई उन्हें पता नहीं चली. क्योंकि यह नबी और यह लोग सच्चाई को खोल खोल कर बयान करते रहे थे.
इसलिए इस गवाही के आधार पर लोगों से सवाल पूछा जाएगा और आखिर कार उनके भविष्य का फैसला कर दिया जाएगा. यह फैसले होते रहेंगे जब तक कि सारे इन्सान निपट नहीं जाएंगे और आखिर में तुम्हारे जैसे सारे गवाह लोगों को बुलाकर उनकी कामयाबी का ऐलान किया जाएगा. उसके बाद फिर कहीं जाकर लोगों को जन्नत और जहन्नम की ओर रवाना किया जाएगा.''
' तो इसका मतलब यह है कि लोग फ़ौरन जन्नत या जहन्नम में नहीं जाएंगे.'
'' नहीं फ़ौरन नहीं जाएंगे. बल्कि एक एक आदमी का हिसाब किताब होता जाएगा. अगर वह पास है तो दाएँ हाथ की तरफ इज़्ज़त व आराम में और फैल है तो बाएँ हाथ की ओर अपमान और अज़ाब में खड़ा कर दिया जाएगा. जब सब लोगों का हिसाब किताब हो जाएगा तो फिर लोग समूह समूह करके जन्नत और जहन्नम की ओर ले जाए जाएंगे.''
' और सबसे पहले?'
'' सबसे पहले रसूल अल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम जन्नत का दरवाज़ा खुलवाएँगे और जन्नत वाले जबर्दस्त स्वागत और सलाम के साथ जन्नत में दाखिल (प्रवेश) होंगे.
' इस समय रसूल अल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम कहाँ हैं?'
'' इस समय पैगम्बर होज़े कौसर के पास हैं. उनकी उम्मत में से जिस किसी का हिसाब किताब हो जाता है और वह सफल होता है तो उसे पहले पैगम्बर के पास लाया जाता है जहां कौसर के जाम से उसकी आ तवाजे होती है. जिसके बाद वह न सिर्फ ये के हष्र की सख्ती और प्यास भूल जाता है बल्कि फिर कभी प्यासा नहीं होता. वैसे तुम्हें जाम-ए-कौसर याद होगा?''
' क्यों नहीं?' मैंने जवाब दिया.
सालेह की बातें सुनकर मेरे दिल में रसूल अल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम से मुलाकात की चाह पैदा हो गई. मैंने सालेह से कहा:
' क्यों न हम पहले बारगाह रिसालत में हाज़िर (उपस्थित) हों.'
अभी मेरी जुबान से यह वाक्य निकला ही था कि एक ऐलान होने की आवाज़ आई:
''उम्मत-ए-मुहम्माद्या के कामयाब लोगों का हिसाब पूरा हो गया है. अब उम्मत-ए- ईसवी का हिसाब शुरू हो रहा है. मरयम के बेटे ईसा, मसीह अलैहिस्सलाम, अल्लाह के रसूल और बनी इसराइल (यहूदियों) में से आखरी पैगम्बर (दूत) परवरदिगार आलम की बारगाह में हाज़िर हों.''
मैंने सवालिया नज़रों से सालेह को देखा तो उसने कहा:
'' अब हज़रत ईसा अपनी क़ौम पर गवाही देंगे. वह अल्लाह के सवाल के जवाब में अपनी तालीमात (शिक्षाओं) का खुलासा (सार) पेश करेंगे है. यह अपनी क़ौम के मुजरिमों के खिलाफ उनकी गवाही होगी और सही अकीदे (आस्था) और अमल वालों के पक्ष में एक तरह की शिफारिश बन जाएगी. इसके बाद उनकी उम्मत (मौजूदा इसाई) से जिन लोगों के अकीदे (आस्था) बिल्कुल हज़रात ईसा की शिक्षा के अनुसार हुए, उनकी गलतियां अल्लाह अनदेखी कर देंगे और सरसरी हिसाब किताब के बाद सब कामयाब करार पाएंगे.''
' क्या यही सब कुछ मुसलमानों के मामले भी में हुआ था?'
'' हां सबसे पहले नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम को बुलाया गया था और उन्होंने गवाही दी थी. यह गवाही उनका इंकार करने और आपकी नाफ़रमानी करने वालों के खिलाफ एक गवाही बन गई. काश तुम वह मंज़र (दृश्य) देखलेते जब उनमे से हर एक आदमी की ख्वाहिश (इच्छा) यह हो गई थी कि धरती फटे और वो उसमें समाजाए. लेकिन यह गवाही लैला जैसे लोगों के हक़ (पक्ष) में सिफारिश बन गई. हालांकि कामयाबी की असल वजह तो यह थी कि उनका ईमान और अमल कुल मिलाकर पैगम्बर की गवाही के अनुसार था.''
' इसका मतलब है कि अभी मुसलमानों में से सिर्फ उन लोगों को निजात (छुटकारा) मिली है जो ईमान (विश्वास) और अमल (कर्म) में पैगम्बर की शिक्षाओं के अनुसार थे?'
'' हां उनकी गलतियां अनदेखी कर दी गई. और यही अन्य नबियों की उम्मतों के साथ होगा. नबियों की उम्मतों के उन लोगों को निजात मिल जाएगी जो ईमान और अमल में कुल मिलाकर अपने नबी की शिक्षाओं के अनुसार थे. उसके बाद मैदान में सिर्फ मुजरिम और नाफरमान ही फैसले के इन्तिज़ार में रह जाएंगे.''
' फिर क्या होगा?'
'' इसके बाद आम हिसाब किताब शुरू होगा.''
' आम हिसाब किताब?' मैंने सवाल के अंदाज में पूछा तो सालेह ने कहा:
'' सभी उम्मतों के हिसाब किताब का पहला चरण वह है जिसमें नेक लोगों की कामयाबी का ऐलान हो रहा है और लैला जैसे लोगों को औपचारिक हिसाब किताब के बाद छोड़ा जा रहा है. इसके बाद सामान्य हिसाब किताब शुरू होगा जिसमें आमाल (कर्मों) की पूरी जाँच पड़ताल के बाद फैसला होगा. जाहिर है इसके नतीजे में सारे मुजरिम चपेट में आ जाएंगे. लेकिन ईमान वालों में से बहुत से लोग अपने गुनाहों के बावजूद अल्लाह की रहमत से छोड़ दिए जाएँगे और उनकी तराजू का दाँया पलड़ा भारी हो जाएगा. उनका हष्र के मैदान में परेशान होना उनकी माफी का बहाना बन जाएगा. इसी को मैं आम हिसाब किताब कह रहा हूँ.
लेकिन कुछ लोग होंगे जिनको आखिर समय तक के लिए रोक दिया जाएगा और हिसाब किताब के लिए नहीं बुलाया जाएगा. यह वो ईमान वाले होंगे जिन पर गुनाहों का बोझ बहुत ज्यादा होगा. उन लोगों के लिए इन्तिज़ार (प्रतीक्षा) का यह बहुत लम्बा समय हजारों बल्कि शायद लाखों साल तक चलता चला जाएगा जिसमें उन्हें बहुत सख्तियाँ, मुसीबत और परेशानी झेलना होंगी. फिर कहीं जाकर उनकी माफ़ी की संभावना पैदा होगी.''
'वह संभावना क्या होगी?'
''वह संभावना अल्लाह की रहमत का ज़हूर है कि वह अपने इन्साफ के अनुसार लोगों को पूरी सज़ा देने के बजाय हष्र की सजा को उनके गुनाहों का बदला बना देगा और इसके बाद उनकी माफी की वजह अपने नबियों और खासकर रसूल अल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की दरख्वास्त (अनुरोध) को बना देगा कि उनका हिसाब किताब भी शुरू कर ही दिया जाए.'
'मगर हष्र की इतनी तकलीफ उठाना और फिर छुटकारा पाना तो कोई अच्छा तरीका नहीं हुआ.' मैंने शिकायत भरे लहजे में पूछा तो सालेह ने जवाब दिया:
'' अच्छा तरीका बताने ही तो सरे नबी आए थे कि ईमान लाओ, नेक अमल करो कोई गलती हो तो माफी मांग लो. मिजात (मुक्ति) का सबसे सरल और आसान तरीका यही था, लेकिन नबियों की बात किसी ने सुनी ही नहीं और उसका नतीजा आज भुगत लिया.''
मैंने उसका समर्थन करते हुए कहा:
' तुम ठीक कह रहे हो. यह तो बड़ी खराबी और बर्बादी के बाद माफी हुई. मैं तो लैला की परेशानी नहीं देख सका था जो शुरू ही में छुटकारा पा गई तो उन लोगों का क्या होगा जो आखिर तक इंतजार करते रहेंगे और हष्र के सख्तियाँ और मुसीबतें बर्दास्त करते रहेंगे.'
''मेरे भाई तुमने लैला को जिन हालात में देखा था वह बहुत अच्छे थे. लेकिन अब मैदान की दुर्दशा का माहौल बहुत भयानक हो चुका है. इस की वजह यह है कि जहन्नम का दरवाज़ा पूरी तरह खोल दिया गया है. जिसके बाद सिर्फ हष्र की गर्मी ही नहीं बल्कि जहन्नम का नज़ारा और उसमें जाने की संभावना भी लोगों को मारे डाल रही है. अल्लाह का गजब मुजरिमों पर भड़क रहा है. लोग अपने सामने तबाही और अपमान के दरवाजे खुले देख रहे हैं. यह सब इतना होलनाक है कि इंसान की बर्दाश्त से बाहर है. सबसे बड़ी बात यह है कि किसी को नहीं पता कि उसके साथ क्या होगा. इसलिए इस वक़्त तुम हष्र वालों के डर और उनके मानसिक और शारीरिक तकलीफ और मनोवैज्ञानिक दर्द का अंदाज़ा नहीं कर सकते.''
मैं दिल में सोचने लगा कि क्या यही वह तरीका था जिसके ज़रये लोग निजात (मुक्ति) की आस लगाए बैठे थे? काश लोग दुनिया में समझ लेते कि निजात (मुक्ति) का होना सिर्फ ईमान और नेक कामों पर होगा. पैगम्बर ने सारी उम्र उसी की दावत दी थी. लेकिन लोगों की खुश फहमयों का क्या कीजये. नबियों की असल दावत को उन्होंने पीछे फेंक दिया और अपनी सोच की झूठी दुनिया आबाद कर ली. उनका मानना था कि कुछ न भी करें शिफारिश उन्हें बख्शवा देगी. लेकिन आज यह साबित हो चुका है कि बख्शिश ईमान और नेक कामों पर मिलेगी. हर वह बड़ा गुनाह जिसकी तौबा नहीं की, उसकी सजा आज हष्र की सख्ती और जहन्नम के भयानक साए तले भुगतनी पड़ेगी. ए काश कि लोगों को यह बात आज समझ आने के बजाय दुनिया में समझ आ जाती तो उनकी सारी जिंदगी तौबा करते बीतती.'
मैं अपनी सोचों में गुम था कि सालेह ने मुझे देखकर कहा:
'' मेरा ख्याल है कि होज़े कौसर पर जाने से पहले हज़रत ईसा की गवाही का मंजर देख लेते हैं. फिर रसूल अल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के पास चलेंगे.
...............
हम एक बार फिर हष्र के मैदान में आ चुके थे. मगर इस बार हम अर्श इलाही के दाहिने तरफ खड़े थे. अर्श इलाही की तजलियात से ज़मीन और आसमान नूर से भरे हुए थे. कामयाब लोगों के लिए तजलियात ख़ुशी और सुकून का पैगाम (संदेश) थीं जबकि मुजरिमों पर कहर बनकर नाज़िल हो रही थीं. अर्श इलाही के चारों ओर फरिश्ते हाथ बांधे गोल दाएरे बनाए खड़े थे. सबसे पहले अर्श को उठाने वाले फरिश्ते थे और उनके बाद दर्जा ब दर्जा दुसरे फरिश्ते. इन फरिश्तों की जुबान से खुदा की तारीफ़ और बड़ाई के कलमे अदा हो रहे थे. हज़रत ईसा खुदा की बारगाह में हाजिर हो चुके थे. जबकि पहले से आखिर तक सारे ईसाइयों को मैदान में मौजूद फरिश्तों ने धकेल कर अर्श के करीब कर दिया था. इरशाद हुआ:
''ऐ मरियम के बेटे ईसा पास आओ.''
फरिश्तों ने हज़रात ईसा के लिए रास्ता छोड़ दिया और वह चलते हुए अर्श इलाही के बिल्कुल पास आ खड़े हुए. उनके हाथ बंधे हुए और गर्दन झुकी हुई थी. इरशाद हुआ:
'' ईसा तुमने अपनी क़ौम को मेरा पैगाम (संदेश) पहुंचा दिया था? तुम्हें क्या जवाब मिला?''
' मालिक मुझे कुछ पता नहीं. गायब की जानकारी तो सिर्फ तुझे ही है.'
उनकी यह बात इस हकीक़त का बयान थी कि हज़रत ईसा को पता न था कि उनकी उम्मत ने उनके बाद दुनिया में क्या क्या किया था. हज़रत ईसा के जवाब पर हष्र के मैदान में चुप्पी छा गई. कुछ पल बाद आसमान पर एक धमाका हुआ . सभी नज़रें आसमान की ओर उठ गईं. आसमान पर एक फिल्म सी चलने लगी. इस फिल्म में इसाई हज़रत ईसा और हज़रत मरियम की मूर्तियों के सामने सर टेक रहे थे. बाज़ारों में क्रूस पकड़े लोग जुलूस निकाल रहे थे. गिरजों में मसीह और मरियम की पूजा हो ही थी. मसीह को मुश्किल दूर करने वाला समझ कर उनसे मदद मांगी जा रही थी. उनकी तारीफ़ के नगमे गाए जा रहे थे. पादरी भाषणों में उन्हें परमेश्वर का पुत्र साबित करने के लिए एड़ी चोटी का जोर लगा रहे थे.
यह सीन देखता हुआ मैं सोच रहा था कि ईसाइयों ने मानव इतिहास के सबसे बड़े शिर्क को जन्म दिया था. हालांकि खुदा ने तो अपने पैग़म्बर हज़रत ईसा को एक खुदा ही की दावत (निमंत्रण) देकर भेजा था. उनके ज़माने में यहूदियों ने हज़रत मूसा के क़ानून में तरह तरह के बदलाव करके इस प्रक्रिया को बहुत मुश्किल बना दिया था. उन लोगों ने खुदा और इन्सान के ईमान (विश्वास) और प्यार भरे रिश्तों को भी बिना आत्मा के कानूनी रिश्ते में बदल दिया था. इसलिए वह कुछ दिखाई देने वाले और छोटे कामों पर तो खूब ज़ोर देते मगर ईमान और नेक अमल से संबंधित सभी अख्लाकी अहकाम (नैतिक आदेश) के मामले में उन में बेपरवाही छाई हुई थी. ऐसे में उनकी ओर हज़रत ईसा (यीशु मसीह) को भेजा गया. उन्होंने बड़े जोर शोर से यहूद्यों की दिखावे की पूजा और अख्लाकी (नैतिक) दिवालिया पन की आलोचना की. अपने ज़माने के धार्मिक गुरुओं की आलोचना करते हुए उन्होंने कहा था:
'ऐ दिखावे बाजों, झून्ठों और बेशर्मों तुम पर अफसोस! कि तुम विधवाओं के घरों को दबा बैठते हो और दिखावे के लिए नमाज़ों को देर तक पढ़ते हो, तुम्हें ज़्यादा सज़ा होगी. ऐ कपटी कानून बाजों तुम पर अफसोस! कि पोदीना और सौंफ और जीरे पर तो देह (यानी: उत्पादन पर जकात) देते हो पर तुमने शरीयत (खुदा के कानून) की भारी बातों यानी इन्साफ और रहम (दया) और ईमान को छोड़ दिया है. तुम पर जरूरी था कि यह भी करते वह भी न छोड़ते. ऐ अंधे राह बताने वालों जो मच्छर को तो छानते हो और पूरे ऊंट को निगल जाते हो. ऐ कपटी दिखावे बाजों तुम पर अफसोस! कि प्याले और बर्तनों को ऊपर से तो साफ करते हो मगर वह अंदर लूट और बेपरवाही से भरे हैं. ए अंधे फरेसी पहले प्याले और बर्तनों को अंदर से साफ कर ताकि ऊपर से भी साफ हो. ए कपटी तुम पर अफसोस! तुम सफ़ैदी फेरी हुई कब्रों के समान हो जो ऊपर से तो सुन्दर दिखाई देती हैं लेकिन अंदर मुर्दों की हड्डियों और हर तरह की गंदगियों से भरी हैं. इसी तरह तुम भी देखने में तो लोगों को धार्मिक दिखाई देते हो लेकिन अंदर में अधर्म घमंड और दिखावे से भरे हो.
हज़रत ईसा कि इस आलोचना पर यहूदी आपके सख्त दुश्मन हो गए और यहां तक कि वो आप की हत्या पर उतारू हो गए. लेकिन अल्लाह ने आपको उनकी चाल से बचा कर अपनी ओर उठा लिया. दुर्भाग्य से हज़रत ईसा के बाद सेंट पॉल नामक आपके एक कट्टर यहूदी दुश्मन ने आप कि पैरवी (पालन) का लबादा पहन कर आप की पूरी शिक्षा को बदल करके रख दिया. एक तरफ उसने ऐलान किया कि शरियत (खुदा के क़ानून) का पालन सिर्फ यहूदियों के लिए जरूरी है, दुसरे लोगों के लिए नहीं. दूसरी ओर उसने हज़रत ईसा और उनकी माँ को खुदा के स्थान पर बैठा दिया. इसलिए धीरे धीरे ईसाई दुनिया का सबसे बड़ा शिर्क करने वाला धर्म बन गया. ईसाई हज़रत मसीह को परमेश्वर का पुत्र समझते, मुश्किल को दूर करने वाला समझ कर हर मुसीबत में उनका नाम लेते. लेकिन यह एक झूठ था जिस का झूठ होना आज बिल्कुल खुल गया है.
मैं यह सब सोच ही रहा था कि मैदान में ईसाइयों के रोने की आवाजें तेज़ होने लगी. ईसाइयों को अपने करतूत साफ नज़र आ गए थे और उनका भयानक अंजाम जहन्नम के रूप में मुंह खोले उनके सामने खड़ा था. अचानक बहुत से ईसाई चिल्लाने लगे:
'' खुदा वंद हमने मसीह की शिक्षाओं का पालन किया था. तूने अपने मसीह को हमारी ओर भेजा. उसने बताया कि वह तेरा बेटा है जिसे तू ने हमारे उद्धार के लिए भेजा है.
एक तेज डाँट वातावरण में तेज़ हुई और सब लोग ठिटक कर चुप हो गए. मसीह से पूछा गया:
'' ईसा! क्या तुमने इन लोगों से कहा था कि अल्लाह को छोड़ कर मुझे और मेरी माँ को भगवन बना लो.''
हालांकि यह एक आसान सा सवाल था, लेकिन यह सुनते ही हज़रत ईसा पर घबराहट तारी हो गई. उनके पैरों के लिए उनका बोझ उठाना मुश्किल हो गया. यह देख कर अल्लाह तआला ने फरमाया:
'' ईसा तुम मेरे प्यारे पैगंबर (दूत) हो. मेरे पैग़म्बर मेरे समक्ष डरा नहीं करते. इत्मीनान से मेरी बात का जवाब दो.''
इस वाक्य के साथ ही दो फरिश्ते हज़रत ईसा के पास आए और उन्हें सहारा देकर एक सीट पर बिठा दिया.
यह मंज़र (दृश्य) बहुत खौफनाक था. हज़रत ईसा परमेश्वर के एक बहुत प्रिय और महबूब पैगंबर थे, लेकिन दुर्भाग्यवश वही मानव इतिहास की ऐसी हस्ती बन गए जिन्हें सबसे बड़े पैमाने पर अल्लाह की तुलना में ला खड़ा किया गया. उनसे प्रार्थना और दुआ की जाती, उनकी तारीफ़ और बड़ाई की जाती, उनकी इबादत (पूजा) की जाती. मगर आज खुदा के सवाल पर उनकी जो हालत हो गई थी वह उन्हें भगवान समझने वालों को खून के आंसू रुलाने के लिए बहुत थी. आज सब ने जान लिया था कि खुदा की तुलना में किसी की कोई हैसियत नहीं है.
मैंने मन में सोचा कि एक एक करके खुदा के ऐसे ही अन्य नेक बंदे आएंगे जिन्हें दुनिया में लोग ऐसे नाम और गुणों से पुकारते थे जो केवल खुदा के लिए ही ख़ास हैं, लेकिन आज उनमे से हर आदमी इनकार कर देगा कि हमने लोगों से इस तरह की कोई बात कही थी. हर एक का हाल यह होगा कि मसीह की तरह किसी में भी खुदा के सामने खड़े होने की ताकत नहीं होगी. काश उनके नाम पर धोखा खाने वाले लोग खुदा की यह अजमत (महानता) पहले ही खोज लेते . काश लोग इंसानों को ख़ुद कि तुलना में न लेकर आते. इस दौरान हज़रत ईसा कि हालत में कुछ सुधार हुआ तो वह कुर्सी से खड़े हुए और गुज़ारिश करने लगे:
' आक़ा तू पाक (पवित्र) है! मेरे लिए ये कैसे मुमकिन था कि मैं वह बात कहूँ जिसका मुझे कोई हक़ (अधिकार) नहीं. अगर मैंने यह बात कही होती तो तू उसे जानता होता .... मैंने तो उनसे वही बात कही जो तूने मुझे हुक्म (आदेश) दिया कि एक खुदा की इबादत (पूजा) करो जो मेरा भी रब (प्रभु) है और तुम्हारा भी रब है. और मैं उन पर गवाह रहा जब तक उन में मौजूद रहा. फिर जब तूने मुझे उठा लिया, तो तू ही उन पर निगाह रखने वाला रहा. और तू तो हर चीज़ पर गवाह है. अगर तू इनको सजा दे तो यह तेरे बंदे हैं और अगर तू उन्हें बख्श दे तो तू हर चीज़ पर ताकत रखने वाला और हर चीज़ कि हकीकत को जानने वाला है.'
यह सुन कर अल्लाह तआला ने फरमाया:
'' आज सिर्फ सच्चाई अपने अपनाने वाले सच्चे लोगों को फाएदा दे सकेगी.''
फिर हज़रत ईसा को विदा कर दिया गया और फरिश्तों को हुक्म हुआ:
'' ईसा की उम्मत में से जिस किसी का इल्म और अमल (ज्ञान और कर्म) ईसा के पैगाम (संदेश) के मुताबिक (अनुसार) हैं , उसे हमारे सामने पेश किया जाए.
.........................................................................................................जारी है....
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें