हम चलते चलते उस दरवाजे के पास आ गए जहाँ से हष्र का रास्ता था. मैंने सालेह से पूछा:
' क्या अब हमें वापस हष्र के मैदान में जाना होगा?'
'' क्यों वहां जाने का शौक खत्म हो गया?'' उसने आश्चर्य के साथ पूछा.
' नहीं ऐसी बात नहीं. मैं सोच रहा था कि यहाँ आ गया हूँ तो अपने घर वालों से मिल लूँ. जब हम शुरू में यहां आए थे तो तुम मुझे सीधे ऊपर ले गए थे. अब तो मेरे घर वाले उम्मत-ए-मुहम्मद्या के कैम्प में पहुंच चुके होंगे?'
'' तुम इंसान अपनी भावनाओं को तहजीब के लिफाफे में डाल कर दूसरों तक पहुँचाने के आदी होते हो. खुलकर क्यों नहीं कहते कि अपनी घरवाली के पास जाना चाहते हो. यह बार बार घर वालों के शब्द क्यों बोल रहे हो?''
सालेह ने मेरी बात पर हँसते हुए टिप्पणी की तो मैं झेंप गया. फिर वह मुस्कुरा कर बोला:
'' शर्माओ नहीं यार. हम वहीं चलते हैं. यह सेवक तुम्हारी हर इच्छा पूरी करने पर लगाया गया है.''
हम जिस दुनिया में थे वहां रास्ते, समय स्थान सबके मतलब (अर्थ) बिल्कुल बदल चुके थे. इसलिए सालेह की बात खत्म होने के साथ ही हम उसी पहाड़ के पास पहुंच गए जिसके आसपास सभी नबियों और उनकी उम्मतों के कैम्प लगे हुए थे.
'' शायद मैंने तुम्हें पहली बार यहां आते समय यह बताया था कि इस पहाड़ का नाम 'आराफ़' है. इसी की ऊंचाई पर तुम गए थे. और यह देखो उम्मत-ए-मुहम्मद्या का कैम्प करीब आ गया है.''
हम पहाड़ के जिस हिस्से में थे वहां उसका दामन बहुत बड़ा था. इस लिए वहां जगह की बहुत गुंजाइश थी, लेकिन वह पूरी जगह इस समय अनगिनत लोगों से भरी हुई थी. पहाड़ के आसपास इतना रश शायद किसी और जगह नहीं था.
मैंने सालेह से कहा:
' लगता है सारे मुसलमान यहाँ आ गए हैं.'
'' नहीं बहुत कम हैं. उम्मत-ए-मुहम्मद्या की तादाद बहुत ज्यादा थी. इस लिए नेक लोगों की संख्या भी बहुत ज्यादा है. वरना अधिकतर मुसलमान तो अभी हष्र के मैदान ही में परेशान घूम रहे हैं.''
' तो मेरे जमाने के मुसलमान भी यहां होंगे.?'
'' बदकिस्मती (दुर्भाग्य) से तुम्हारे ज़माने में से बहुत कम लोग यहां हैं. रसूल अल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की उम्मत के शुरुआती हिस्से के लोगों की बहुत बड़ी संख्या यहां मौजूद है. आखरी समय के कम लोग ही यहां आ सके हैं. तुम्हारे ज़माने में तो अधिकांश मुसलमान दुनिया परस्त थे या फिरका परस्त (सांप्रदायिक). दोनों तरह के लोग इस समय मैदान-ए-हष्र में घूम रहे हैं. इसलिए तुम्हारे जानने वाले यहां कम होंगे. जो होंगे उनसे तुम जन्नत में जाने के बाद दरबार में मिल लेना. यहां तो हम सिर्फ तुम्हारे 'परिवार' से मिलकर तुम्हारी आँखें ठंडी करेंगे और तुरंत वापस लोटेंगे. खबर नहीं कब हिसाब किताब शुरू हो जाए.''
' यह दरबार क्या है?'
सालेह की बातचीत में जो बात समझ में नहीं आई थी मैंने उसके बारे में पूछा.
'' हिसाब किताब के बाद जब सभी जन्नती, जन्नत में चले जाएँगे तो उनकी अल्लाह के साथ एक बैठक होगी. उसका नाम दरबार है. इस बैठक में सभी जन्नतयों को उनके दर्जे और ओहदे औपचारिक रूप से बांटे जाएंगे. यह लोगों की उनके रब के साथ बैठक भी होगी और ख़ास लोगों के सम्मान का मौका भी होगा.''
मैं इस से ज्यादा कुछ और पता करना चाहता था, लेकिन बातचीत में हम कैम्प के काफी नजदीक पहुंच चुके थे. यहाँ खेमों की एक लम्बी कतार लगी थी. इस बस्ती में लोगों को कैम्प अलग अलग ज़माने के हिसाब से बांटे गए थे. कुछ खेमों के बाहर खड़े उनके मालिक आपस में बातचीत कर रहे थे. यहीं मुझे अपने बहुत से साथी और करीबी दोस्त दिखाई दिए जिन्होंने ने दीन की दावत में मेरा भरपूर साथ दिया था. उन्हें देख कर मुझे इतनी खुशी हुई कि बयान से बाहर है. ये वो लोग थे जिन्होंने अपनी जवानियाँ, अपने करियर, अपने परिवार और अपनी इच्छाओं को कभी सिर पर सवार नहीं होने दिया था. इन सब को एक हद तक रखकर अपना बाकी समय, सलाहियतें (क्षमता), पैसा और जज्बा परमेश्वर के दीन (धर्म,रस्ते) के लिए समर्पित कर दिया था. उसी का फल था कि आज वे इस कभी ना ख़त्म होने वाली सफलता को सबसे पहले पाने में कामयाब हो गए जिसका वादा दुनिया में किया गया था.
यहीं हमें उम्मत-ए-मुहम्मद्या के इतिहास की कई मशहूर हस्तियां नजर आईं. हम जहां से गुजरते लोगों को सलाम करते जाते. हर व्यक्ति ने हमें अपने खेमे में आकर बैठने और कुछ खाने पीने की दावत दी, जिसे सालेह शुक्रिया के साथ मना करता चला गया . लेकिन मैं हर व्यक्ति से बाद में मिलने का वादा करता रहा.
रास्ते में सालेह कहने लगा:
'' उनमें से हर आदमी इस काबिल है कि उसके साथ बैठा जाए. तुम अच्छा कर रहे हो कि उनसे अब मुलाकात तय कर रहे हो. इनमें से बहुत से लोगों से बाद में समय लेना भी आसान नहीं होगा.''
यह कहकर वह एक पल के लिए रुका और प्यार भरी नज़रों से मेरी ओर देखकर बोला:
'' समय लेना तो तुम से भी आसान नहीं होगा अब्दुल्ला! तुम्हें अभी पूरी तरह अंदाजा नहीं. इस नई दुनिया में तुम खुद एक बड़ी हैसियत के मालिक होगे. बल्कि हकीकत तो यह है कि खुदा की नज़रों में तुम हमेशा एक बड़ी हैसियत के आदमी थे.''
यह कहते हुए सालेह रुका और मुझे गले लगा लिया. फिर हल्के से मेरे कान में बोला:
'' अब्दुल्ला! तुम्हारे साथ रहना मेरे लिए बड़े सम्मान की बात है.''
मैंने अपनी निगाहें आसमान की ओर उठाई और धीरे से जवाब दिया:
' सम्मान की बात तो खुदा की इबादत (उपासना) करना है. उसके बन्दों को खुदा की बात मानने को कहना है. यह मेरा सम्मान है कि खुदा ने रेत के एक बे कीमत ज़र्रे को सेवा का मौका दिया.'
यह कहते हुए एहसान मंदी की भावनाओं से मेरी आंखों से आंसू बहने लगे.
'' हाँ यही बात ठीक है. खुदा ही है जो ज़र्रे को सूरज की सी ऊंचाई देता है. तुम सूरज की तरह अगर चमके तो यह खुदा की रहमत (कृपा) थी. लेकिन यह रहमत इश्वर को मानने वालों पर होती है, शर्कशों, फसाद फैलाने वालों और बेपर्वाहों पर नहीं.''
हम एक बार फिर चलने लगे और चलते चलते हम एक खुबसूरत और कीमती खेमे के पास पहुंच गए. मेरे दिल की धड़कन कुछ तेज हो गई. सालेह मेरी ओर देखते हुए बोला:
'' नाएमा नाम है ना तुम्हारी पत्नी का?''
मैंने हाँ में गर्दन हिलादी. सालेह ने उंगली से इशारा करके कहा:
'' यह वाला कैम्प है.''
' क्या उसे पता है कि मैं यहां आ रहा हूं?, मैंने धड़कते दिल के साथ पूछा.'
'' नहीं.'', सालेह ने जवाब दिया. फिर हाथ से इशारा करके कहा:
'' यह है तुम्हारी मंज़िल.''
मैं हौले हौले चलता हुआ खेमे के पास पहुंचा और सलाम करके अंदर दाखिल होने की इजाज़त चाही. अंदर से एक आवाज़ आई जिसे सुनते ही मेरे दिल की धड़कन तेज हो गई.
'' आप कौन हैं?''
'' अब्दुल्लाह.......''
मेरी जुबान से अब्दुल्लाह का नाम निकलते ही पर्दा उठा और सारी दुनिया में जैसे अंधेरा छा गया. अगर रोशनी थी तो सिर्फ एक चेहरे में जो मेरे सामने था. समय, ज़माने, सदियाँ और पल सब अपनी जगह ठहर गए. मैं चुप चाप खड़ा टकटकी बांधे उसे देखता रहा. नाएमा का मतलब रौशनी होता है. लेकिन रौशनी का मतलब यह होता है यह मुझे आज पहली बार पता चला था.
हम जब आखरी बार मिले थे तो जीवन भर का साथ बुढ़ापे की साझेदारी में ढल चुका था. जब प्यार खूबसूरती और जवानी का मोहताज नहीं रहता. पर नाएमा ने अपनी जवानी के सभी अरमानों और सपनों को मेरी भेंट कर दिया था. उसने जवानी के दिनों में उस समय मेरा साथ दिया था जब मैंने आसान जीवन छोड़ कर अपने लिए काँटों भरे रास्ते चुन लिए थे. उसके बाद भी जीवन के हर सर्द व गर्म और अच्छे बुरे हाल में उसने पूरी ताकत से मेरा साथ दिया था. यहां तक की मौत हम दोनों के बीच आड़े आ गई. मगर आज मौत का अस्थायी पर्दा उठा तो मेरे सामने चाँद का नूर, तारों की चमक, सूरज की रोशनी, फूलों की महक, कलयों की नाजुक, शबनम की ताजगी, सुबह का उजाला और शाम की ख़ामोशी सब एक साथ एक ही चेहरे में शामिल हो गए थे. वर्षों की साझेदारी को कुछ पल में समेट कर देखने की कोशिश कर रहा था. नाएमा की आँखों में नमी आ गई थी जो उसके गालों पर बहने लगी. मैंने हाथ बढ़ाकर उसके गालों से नमी पोंछ्ली और उसके हाथों को अपने हाथों में लेकर कहा:
'मैंने कहा था ना. थोड़ा सा इंतजार थोड़ा सा सब्र. यह लड़ाई हम ही जीतेंगे.'
''और मैंने कब आप का विश्वास नहीं किया था. और अब तो मेरा विश्वास हकीकत में बदल चुका है. मुझे तो बस ऐसा लग रहा है कि आप कुछ देर के लिए घर से बाहर गए थे और फिर आ गए. हमने थोड़ा सा सब्र किया और बहुत बड़ी लड़ाई जीत ली.''
' हमें जीतना ही था नाएमा. अल्लाह नहीं हारता. अल्लाह वाले भी नहीं हारते. वह दुनिया में पीछे रह सकते हैं, मगर आखिरत (परलोक) में हमेशा सबसे आगे हैं.'
'' और अब ?'' नाएमा ने सवाल करते हुए आंखें बंद कर ली. शायद वह कल्पना की आँख से जन्नत की दुनिया की कल्पना कर रही थी जो अब शुरू होने वाली थी.
' हमने खुदा के पैगाम (संदेश) को आम करने के लिए अपनी छोटी सी ज़िन्दगी लगाई और बदले में खुदा जन्नत की हमेशा रहने वाली ज़िन्दगी और कामयाबी हमें देगा.'
यह कहते हुए मैंने भी अपनी आंखें बंद कर ली. मेरे सामने अपनी मेहनत और संघर्ष से भरपूर ज़िन्दगी का एक एक पल आ रहा था. मैंने अपनी नौजवानी और जवानी के बेहतरीन साल ख़ुदा के दीन (धर्म) की खिदमत (सेवा) के लिए खर्च कर दिए थे. अपनी अधेड़ उम्र, हुनर और बुढ़ापे की आखरी ऊर्जा तक उसी राह में झोंक दी थी. मैं एक असाधारण प्रतिभाशाली और अक्ल मंद आदमी था जो अगर दुनिया की ज़िन्दगी को अपना मकसद बना लेता तो विकास और सफलता के ऊँची मंजिल तक आसानी से पहुंच जाता. लेकिन मैंने सोच लिया कि कैरियर, संपत्ति, रुतबा और बार और सम्मान और ख्याति अगर कहीं हासिल करनी है तो आखिरत (परलोक) में हासिल करनी है. मैंने जीवन में इच्छाओं के मैदान ही में खुद से जंग नहीं की थी बल्कि पक्षपात की भावनाओं से भी लड़ता रहा था . फिरकावारियत (सांप्रदायिकता), अपनों ही की बात को सच मन्ना और भेदभाव से मैंने कभी अपना दामन दागदार नहीं होने दिया. परमेश्वर के धर्म को हमेशा ईमानदारी और अक्ल से समझा और निष्ठा और सच्चे दिल से उस पर अमल किया. उस धर्म को दुनिया भर में फैलाया और कभी इस राह में किसी बुरा कहने वाले की बात की परवाह नहीं की. इस रास्ते में खुदा ने जो सबसे बड़ा सहारा मुझे दिया वह नाएमा का प्यार और उसका साथ था जिसने हर तरह के हालात में मुझे लड़ने का साहस दिया., और अब हम दोनों शैतान के खिलाफ (विरुद्ध) अपनी जंग जीत चुके थे. मेहनत खत्म हो चुकी थी और जश्न का समय था. हम इसी हाल में थे कि सालेह ने खनकार कर हमें अपने होने का एहसास दिलाया और बोला:
'' आप लोग विस्तार से बाद में मिलियेगा. अभी चलना होगा.''
उसके इन शब्दों से मैं वापस इस दुनिया में लौट आया. मैंने सालेह का नाएमा से परिचय कराया:
' यह सालेह हैं.' फिर हंसते हुए अपनी बात को बढ़ाया:
' यह किसी भी समय मुझे अकेला छोड़ने को तैयार नहीं होते.'
नाएमा ने सालेह को देखते हुए कहा:
''मैं उन्हें जानती हूं. मुझे यहाँ पर यही छोड़ गए थे और उसी समय आपके बारे में बताया था. वरना मैं बहुत परेशान रहती.''
मैंने सालेह की तरफ मुड़ते हुए कहा:
' तुम मुझसे अलग ही कब हुए जो नाएमा को यहाँ छोड़ने आ थे.'
'' तुम्हें शायद याद नहीं. जब तुम ऊपर बैठे खुदा से मैदान-ए-हष्र में घूमने फिरने की दुआ कर रहे थे तब मैं तुम्हारे बराबर से उठ गया था. अब्दुल्ला! यह तुम्हारी कमजोरी है और शक्ति भी कि जब तुम खुदा के साथ होते हो तो तुम्हें आसपास का होश नहीं होता.''
' होश तो मुझे थोड़ी देर पहले भी नहीं था, लेकिन इस समय तो तुम टले नहीं.'
'' हाँ मैं अगर टल जाता तो फिर तुम से अगली मुलाकात हष्र के बाद ही होती. वैसे तुम इंसान बड़े नाशुक्रे हो और भुलक्कड़ भी. भूल गए तुम्हें कहाँ जाना है?''
' ओहो, नाएमा! हमें चलना होगा. तुम यहीं रुको मैं कुछ देर में आता हूँ.'
''मगर हमारे बच्चे?''
'वह भी ठीक हैं. तुम उन्हें यहाँ तलाश करो. पास में ही कहीं मिल जाएंगे. वरना मैं थोड़ी देर में सब को लेकर खुद आजाउंगा. अभी मुझे फ़ौरन हष्र में लौटना है. मिलना मिलाना उसके बाद उम्र भर होता रहेगा.'
इस आखरी सवाल के बाद यहाँ मेरे लिए रुकने की गुंजाइश खत्म हो चुकी थी. क्योंकि मुझे जवाब में उन दो बच्चों के बारे में भी बताना पड़ता जो यहाँ नहीं थे और यह बहुत तकलीफ देह (कष्टदायक) काम था.
नाएमा ने कुछ समझते हुए और कुछ न समझने के अंदाज़ में गर्दन हिलादी.
......................................................................................................जारी है....
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