मंगलवार, 10 जुलाई 2012

भाग १.१ क़यामत का दिन


सालेह से मेरी दोस्ती उस वक़्त हुई थी जब मैंने मौत के बाद या यूँ कहूँ तो ज्यादा सही होगा के ख़त्म होने वाली दुन्याँ के धोके से निकल कर हकीक़त की दुन्याँ में कदम रखा था, लोग मौत से बहुत डरते हैं, मगर मेरे लिए मौत एक बहुत ही ख़ुशी का और अच्छा तजुर्बा था, मौत के फ़रिश्ते ''इज़राइल'' का नाम दुन्याँ में डर की एक निशानी समझा जाता है, मगर मेरे सामने वो एक बहुत ख़ूबसूरत शक्ल में आए थे, उन्होंने बहुत ही मुहब्बत और शफकत से मेरी शख्सियत यानि मेरी रूह (आत्मा) को मेरे जिस्म से अलग किया, मेरा जिस्मानी वुजूद पिछली दुन्याँ में रह गया और मेरी असल शख्सियत को उन्होंने इस नई दुन्याँ में जिसका नाम आलम-ए-बजर्ख था भेज दिया, बजर्ख का मतलब पर्दा होता है, मौत के फरिश्ते के ज़ाहिर होते ही मेरे और पिछली दुन्याँ  के बीच एक पर्दा सा आ गया, जिसकी वजह से उस दुन्याँ से मेरा मिलना जुलना बंद हो गया था, मैं नहीं जनता था के मेरी जुदाई के गम में मेरे घर वालों पर क्या गुज़र रही थी, पर मुझे मेरी तरबियत (सिखाई हुई अच्छी बातें) की बुन्याद पर यकीन था के वे खुदा की मर्ज़ी पर सब्र और शुक्र करेंगे, मैं अपनी असल शख्सियत समेत अब एक नई दुन्याँ में था, ये बजर्ख की दुन्याँ थी, इस नई दुन्याँ में मौत के फ़रिश्ते इजराईल ने मुझे जिस के हवाले किया वो यही सालेह था, उस के साथ बहुत से खूबसूरत शक्ल वाले खूबसूरत कपड़े पहने हुए फरिश्ते थे, उन सब के हाथों में गुलदस्ते थे और जुबान पर मुबारकबाद और सलामती की दुवाएं थी, मुबारक और सलामती के इस माहोल में वह सब मिल कर मुझे यकीन दिला रहे थे के आज़माइश (परीक्षा) के दिन अब ख़त्म और जन्नत की अज़ीम कामयाबी के दिन शुरू हो गए हैं, उस वक़्त सालेह ने मुझे ये खुशखबरी दी के बजर्ख की ज़िन्दगी के शुरू होने पर मेरे लिए पहले इनाम के तौर पर ज़मीन व आसमानों के मालिक के  सामने पेश होना है, उसने मुझे बताया के ये इनाम हर इंसान को नहीं मिलता! मेरे लिए ये खुशखबरी जन्नत की खुशखबरी से भी ज्यादा कीमती थी !
उनसब की देख रेख में मेरा सफ़र शुरू हुआ, 
ये नई दुन्याँ थी, जहाँ दूरी, फांसले, जगह, टाइम, ज़माने और अंतरिक्ष के मतलब इस तरह बदल गए थे के वो शब्दों में किसी तरह बयान नहीं किये जा सकते, मैं ख़ुशी और हैरत के आलम में ये सफ़र तए कर रहा था के एक जगह हम रोक दिए गए, ऐलान हुआ ज़मीन के फरिश्तों की हद आगई, सब यहाँ रुक जाएँ-'' सिर्फ सालेह को मेरे साथ आगे बढ़ने की इजाज़त मिली, आसमानों की दुन्याँ का सफ़र शुरू हुआ, कुछ ही देर में हम एक और जगह पहुँच कर रुक गए, यहाँ जिब्राइल अमीन (फरिश्तों के सरदार) खास तौर पर मेरे स्वागत के लिए आए थे, मुझे देख कर वो कहने लगे:
''अब्दुल्लाह! तुम मुझ से पहली बार मिल रहे हो, मगर मैं तुम से पहले भी कई बार मिल चूका हूँ,''
फिर धीरे से मेरा कन्धा थपथपाते हुए बोले:
''आक़ा के हुक्म पर कई बार मैंने तुम्हारी मदद की थी, मगर ज़ाहिर है तुम उस वक़्त ये नहीं जानते थे,''
आक़ा के शब्द से मेरे चहरे पर एक रौशनी सी फूटी, जिसे नूर से बने जिब्राइल ने जुबान पर आने से पहले ही पढ़ लिया और कहा:
''आओ चलो! मैं तुम्हें तुम्हारे अन्न दाता से मिलाता हूँ, नबियों के अलावा ये इज्ज़त बहुत कम लोगों को मिलती है के वो इस तरह खुदा के हुज़ूर पेश किये जाएँ, तुम वाकई बहुत खुश नसीब हो-''
हम आगे बढ़े तो मेरे मन में एक सवाल पैदा हुआ जिस का पूछ लेना ही मैंने बहतर समझते हुए जिब्राइल अमीन से अर्ज़ किया:
'क्या हम सिद्रातुल मुन्तहा की तरफ जा रहे हैं ''
 ''नहीं ---'' जिब्राइल अमीन ने जवाब दिया, फिर आगे बोले कि:
''लगता है कि तुम्हारे मन में मैराज वाली बात है, वो नबियों का रास्ता है, नबियों के खुदा के हुज़ूर पेश होने कि जगह बहुत आला (उच्च) होती है, और फिर उन्हें कई निशानियाँ दिखाई जाती हैं, तुम्हारा रास्ता बिल्कुल अलग है, तुम्हे सिर्फ खुदा के हुज़ूर सजदा करने की इजाज़त है जो एक बड़ा इनाम है, और मेरे ख्याल से सालेह को भी तुम्हारी वजह से यहाँ तक आने की इजाज़त मिली है-''
उस लम्हे मैंने सालेह को देखा जिस का चेहरा ख़ुशी से दमक रहा था, जिब्राइल अमीन ने बात को जारी रखते हुए कहा:
''खुदा की हस्ती ला महदूद (यानि जो किसी जगह या स्पेस में नहीं समां सकती) है, उसके मकामात भी ला महदूद हैं, तुम्हारी दुन्याँ में उन माकामत का कोई अंदाज़ा नहीं किया जा सकता, जो कुछ तुम दुन्याँ में जानते थे वो बहुत थोड़ा और कम था, आज मरने के बाद तुम्हारी आखें खुली हैं, अब तुमने वो दुन्याँ देखना शुरू किया है जिसके कमालात (नामुमकिन को मुमकिन होते देखना) की कोई हद नहीं-''
मैं जो कुछ देख रहा था वो वाकई जिब्राइल अमीन की बातों की सच्चाई का सुबूत था, मैंने दिल में सोचा के खुदा का शुक्र है के मैं कुफ्र (इनकार) और नाफ़रमानी की हालत में नहीं मरा, वरना आँख तो उस वक़्त भी खुलती, मगर जो कुछ देखने को मिलता वो बहुत ज्यादा बुरा और भयानक होता-,
जिब्राइल अमीन की देख रेख में हम कई मंज़िलें तै करते हुए अर्श के फरिश्तो के पास पहुंचे, यहाँ नूर, रंग और रौशनी का एक ख़ूबसूरत और हैरत अन्गेज मिश्रण छाया हुआ था जो अल्फाज़ में बयां नहीं किया जासकता, अर्श को उठाने वाले फ़रिश्ते सर झुकाए हुए थे, चहरे पर डर का असर था और साथ ही इतमिनान (संतुष्टि) का नूर फैला हुआ था, जिब्राइल अमीन ने बताया:
''खुदा की बारगाह का हर हुक्म इन्ही फरिश्तों के ज़रये से नीचे जाता और नीचे वालों का हर काम इन्ही के ज़रये से आलम के परवरदिगार के हुज़ूर पेश किया जाता है-''
मैं खुदा के करीब रहने वाले उन फरिश्तों और उन के इस मकाम को हसरत की निगाहों से देख रहा था, उन्होंने भी नज़र उठा कर मुझे देखा और लम्हा भर के लिए उन के चहरे पर मुस्कराहट आई, मेरा होंसला बढ़ा, मैंने कदम अर्श की तरफ बढ़ाऐ, मेरे रोएँ रोएँ से उस हस्ती की हमद व सना (तारीफ और बड़ाई) होने लगी जिससे मिलने की ख्वाहिश में मैंने सारी ज़िन्दगी गुज़ारी थी,
फिर चलते चलते मुझ पर न जाने क्यूँ खौफ सा तारी होने लगा.खुदा से मिलने की बहुत ज्यादा ख्वाहिश पर उसकी अज़मत (महानता) का एहसास हावी हो गया. इस पल मुझ पर इतना रोब तारी हुआ कि मैं घबरा कर वापस पीछे हटने लगा. हालांकि अर्श अभी बहुत दूर था, लेकिन अर्श के मालिक की  अज़मत (महानता) के एहसास से मेरी हिम्मत टूट गई. मुझे लगा कि उस पल मेरा वुजूद (अस्तित्व) पारा पारा होकर फिज़ा में बिखर जाएगा. शायद यही होता, लेकिन ऐसे में मेरे कानों में जिब्राइल अमीन की आवाज़ आई:
''यहीं सजदे में गिर जाओ. इस जगह से आगे सिर्फ अम्बिया हज़रात जाते हैं.''
मैं और सालेह दोनों सजदे में चले गए. जिसे बिन देखे सजदा किया था, आज पहली बार उसे देखकर सजदा किया. देखा तो खैर क्या था. बस आसार देख लिए थे.यह सजदा कितना लम्बा और कितना सुकून देने वाला था, मुझे नहीं याद . जिसने सूरज को रौशनी और चाँद को नूर बख्शा, फूलों को महक और तितलियों को रंग का लिबास पहनाया, तारों को चमक का लहजा और कलयों को चटक की आवाज़ दी, आसमान को ऊँचाइयों का ताज और समन्दरों को घहराइयों का तख़्त दिया, ज़मीन को पैदा करने की शक्ति और नदियों को बहाव का हुस्न दिया, जिसने इंसान को बयान (अपनी बात कहने) का गुण और कुरान का सौभाग्य दिया, उसके क़दमों में गुज़ारा हुआ एक पल किसी खुश हाल राजा के राज्य से बढ़कर था. लेकिन उस पल को भी ख़त्म होना ही था. अर्श के फरिश्तों की आकर्षक आवाज़ गूंजी:
'' वो अल्लाह है जिस के अलावा कोई ईश्वर नहीं.''
यह इस का ऐलान था कि खुदा बात कर रहा है: 
आवाज़ आई:''मैं अल्लाह हूँ. मेरे सिवा कोई ईश्वर नहीं.''
हर सुर से ज्यादा अच्छी इस आवाज़ का वह जादू था कि मेरा वुजूद (अस्तित्व) सरापा गोश हो गया. मेरा पूरा शरीर और उसकी हर शक्ति कानों और आवाज़ को सुनने में सिमट आई. मैं कुछ और सुनने के इंतज़ार में था. मगर बातचीत में अंतराल आ गया था. मुझे अहसास हुआ कि शायद अब मुझे कुछ कहना चाहिए. जो पहली बात मेरी ज़ुबान पर आई वह यह थी:
' मालिक! जीवन में बस यही एक सच्चाई तो जानी है.' (के आप के सिवा कोई ईश्वर नहीं)
मेरी यह बात मेरे अपने कान मुश्किल से सुन सके. पर हाज़िर और गायब के जानने वाले और दिलों के भेद जानने वाले तक पहुंच गई थी. जवाब मिला:
''मगर यह बात जानने वाला हर इंसान यहाँ तक नहीं आता... जानते हो अब्दुल्ला! तुम यहां तक ​​कैसे आ गए?''
इस बार मेरे बादशाह कि आवाज़ में अपनाईत का रंग झलक रहा था.
''इसलिए कि तुम्हारी ज़िन्दगी का मकसद लोगों को मेरे बारे में बताना था. मेरी मुलाकात से खबरदार करना था. तुमने मेरी याद को ... मेरे काम को अपनी ज़िन्दगी बना लिया. यह उसका बदला है.''
आसमान और जमीन के मालिक की बातचीत और आवाज सुनते रहना मेरी सब से बड़ी ख्वाहिश बन चुकी थी, मगर एक बार फिर जहानों के मालिक अपनी बात कहने के बाद ठहर गए. मुझे लगा कि मेरा रब मुझे बोलने का मौका दे रहा है. मैंने अर्ज़ किया:
' क्या आपके पास यहां रुक सकता हूं?'
''मुझसे कोई दूर नहीं होता. न किसी से मैं दूर होता हूँ. मेरा हर बंदा (भक्त) और मेरी हर बंदी जो मेरी याद में जिये, वो मेरे पास रहता है ... और कुछ...''
अंतिम बात से मुझे अंदाज़ा हुआ कि मुलाकात का समय खत्म हो रहा है. मैंने पूछा:
'मेरे लिए क्या हुक्म है?'
''हुक्म का समय चला गया है. अब तो तुम्हें हुक्म देने वाला बनाने का समय आ रहा है. फिलहाल तुम वापस जाओ. अभी ज़िन्दगी शुरू नहीं हुई.''
मैंने चलते चलते पूछा:
'आप क़यामत के दिन मुझे भूलेंगे तो नहीं. मैंने उस दिन की वहशत और आपके नाराज़ होने का बहुत चर्चा सुन रखा है.'
फिज़ा में जैसे मुस्कराहट का हुस्न बिखर गया.खनकते हुए अंदाज़ में आवाज़ आई:
''भूलने कि आदत तुम इंसानों में होती है. राजाओं का राजा ... तुम्हारा मालिक, तुम्हारा रब कुछ नहीं भूलता. रहा मेरा गुस्सा, तो वह मेरे रहम पर कभी काबू नहीं पाता. तुमने तो जीवन भर मुझे उम्मीद (आशा) और डर (भय) के साथ याद रखा है. मैं भी तुम्हें दरगुज़र (गलतियों को छोड़ देना) और रहमत के साथ याद रखूंगा... लेकिन...''
एक पल ठहर ने के बाद इरशाद हुआ:
'' तुम्हारी तसल्ली के लिए में सालेह  को तुम्हारे साथ भेज रहा हूं. यह हर जरूरत के समय पर तुम्हारा ध्यान रखेगा.''
यह थी मेरी और सालेह की पहली मुलाक़ात की दास्तान और मेरे साथ रहने कि असल वजह. आलमे बजर्ख में मेरे जिंदगी शरीर के बिना थी. इसमें मेरे अहसास, जज़्बात और मुशाहेदात (खुद देखना) वैसी ही थे जैसी सपने में होती है ( यानी गैर भौतिक). मगर सोच समझ (चेतना) से भरपूर इस जीवन में मुझे इन नेमतों का पूरा अहसास रहता जो स्वर्ग में मुझे मिलने वाली थीं. सालेह मेरी इच्छा पर समय समय पर मुझसे मिलने आता रहा. हर बार वह मुझे नित नई चीजों के बारे में बताता रहता और मेरे सवाल का जवाब देता. धीरे धीरे हमारी दोस्ती बढ़ती गई. फिर आखरी मुलाकात में उसने मुझे बताया था कि ''ज़िन्दगी शुरू होने जा रही है.''
और अब मैं उसके साथ मैदाने हष्र (आखरी अदालत का मैदान) को तेजी के साथ अर्श की ओर बढ़ रहा था.
चलते चलते मैंने आसपास देखा तो नज़र कि हद तक चटयल मैदान नज़र आया. माहौल कुछ ऐसा हो रहा था जैसे फज्र की नमाज़ के बाद सूरज निकलने से पहले होता है. यानी हल्का हल्का उजाला हर ओर फैला हुआ था. उस समय इस क्षेत्र में कम ही लोग नज़र आ रहे थे. मगर जो थे उन सब की मंजिल एक ही थी. मेरे दिल में सवाल पैदा हुआ कि उनमें से कोई नबी या रसूल है? मैंने सालेह को देखा. उसे पता था कि मैं क्या पूछ रहा हूँ. कहने लगा:
''वह सब पहले ही उठ चुके हैं. हम उन्हीं के पास जा रहे हैं.'' 
'क्या उनसे मुलाकात का मौका मिलेगा?' मैंने बच्चों की तरह बड़े शौक से पूछा.
वह चलते चलते रुका और धीरे से बोला:
''अब उन्हीं के साथ ज़िन्दगी गुज़रेगी. अब्दुल्ला! तुम अभी तक नहीं समझ पाए कि क्या हो रहा है.आज़माइश (परीक्षा) खत्म हो चुकी है. धोके खत्म हो चुके हैं. अब असल ज़िन्दगी शुरू हो रही है जिसमें अच्छे लोग अच्छे लोगों के साथ रहेंगे और बुरे लोग हमेशा बुरे लोगों के साथ रहेंगे.''
असल में बात यह थी कि अभी तक शाक (Shock) से नहीं निकल सका था. दरअसल अभी तक नई दुनिया कि सारी जान पहचान आलमे बज़र्ख में हुई थी. वो एक तरह की रोहानी (आध्यात्मिक) दुनिया थी. मगर यहाँ हष्र में तो सब कुछ माद्दी (भौतिक) दुनिया जैसा था. मेरे हाथ पाँव, अहसास, ज़मीन आसमान सब कुछ वही था, जिसका मैं पिछली दुनिया में आदी था. वहाँ मेरा घर था, घर वाले थे, मेरा महल्ला, मेरा क्षेत्र, मेरी कौम ....
यह सब सोचते सोचते मेरे मन में एक धमाका हुआ. मैंने रुक कर सालेह को दोनों हाथों से पकड़ लिया:
'मेरे घर वाले कहाँ हैं? मेरे रिश्तेदार, मेरे दोस्त सब कहाँ हैं? उनके साथ क्या होगा? वह क्यों नज़र नहीं आ रहे?'
सालेह ने मुझसे नज़रें चुराकर कहा:
''जिन सवालों का जवाब मुझे नहीं पता वह मुझसे मत पूछो. आज हर  इंसान अकेला है. कोई किसी के काम नहीं आ सकता. अगर उनके आमाल (कर्म) अच्छे हैं, तो विश्वास रखो वह तुमसे आ मिलेंगे. उनके साथ कोई नाइंसाफी  नहीं होगी. और अगर ऐसा न हुआ तो''
सालेह बात अधूरी छोड़कर चुप हो गया. उसकी बात सुन कर मेरा चेहरा भी बुझ गया. उसने मेरे कंधे पर हाथ रखकर मेरा हौसला बढ़ाया और कहा:
''अल्लाह पर भरोसा रखो. तुम अल्लाह कि फ़ौज में लड़ने वाले सिपाही थे. इसलिए पहले उठ गए हो. बाकी लोग अभी उठ रहे हैं. इंशाल्लाह वे भी खैर के साथ तुम से मिल जाएंगे. अभी तो तुम आगे चलो.''
इस तसल्ली से मुझे कुछ साहस हुआ और मैं उसके साथ चलने लगा.
......................................................................................................... जारी है........ 

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