सोमवार, 16 जुलाई 2012

भाग ९.० नूह की कौम और दीन (धर्म) बदलने वाले


उस्ताद फरहान अहमद और जमशैद की याद ने मेरे अंदर एक गहरी ख़ामोशी पैदा कर दी थी. सालेह को इसका अच्छी तरह अंदाज़ा था. उसने मेरा ध्यान एक दूसरी ओर बटाने के लिए कहा:
'' तुम भूल गए हो कि हम असल में रसूल अल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम से मिलने निकले थे. तुम बीच में बैठ गए. अब वह खुद तुम्हें याद कर रहे हैं.''
'' क्या अब्बू अभी तक रसूल अल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम से नहीं मिले.'' अनवर ने आश्चर्य से कहा.
सालेह वजाहत (वर्णन) करते हुए कहने लगा:
'' हर इन्सान जो हष्र के मैदान से सफल होकर आता है वह सीधा रसूल अल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के पास जाता है. वहां हुज़ूर अपने हाथों से उसे कौसर का जाम अता (प्रदान) करते हैं. उसके घर वालों को भी इस मौके (अवसर) पर वहीं बुलवालिया जाता है. इसके बाद वे शोर मचाते और मज़ा करते हुए कहना तुम्हारे पिता का के इस 'झील के किनारे किसी जगह आ बैठते हैं. मगर तुम्हारे पिता को हष्र के मैदान में घूमने का शौक था इसलिए पैगम्बर से मुलाकात से पहले ही इन्हें इनकी दुआ से फिर मैदान में भेज दिया गया. लेकिन अब पैगम्बर ने इन्हें खुद ही याद किया है.''
'' खैरियत तो है! इस याद करने की कोई खास वजह?'' नाएमा ने पूछा तो सालेह ने जवाब में कहा:
'' बात यह है कि उम्मतों का हिसाब होते होते अब हज़रत नूह (मनु) की कौम का हिसाब किताब शुरू हुआ है. लेकिन उनकी उम्मत ने इस बात से इनकार कर दिया है कि नूह ने उन तक ईश्वर का संदेश पहुँचाया था.''
'' यह क्या बात हुई? वह यह कैसे कह सकते हैं कि उन तक खुदा का पैगाम (संदेश) नहीं पहुँचा? उनको तो दुनिया ही में इस गुनाह की वजह से डुबा दिया गया था कि उन्होंने हज़रत नूह के पैगाम को झुटलाया था. अल्लाह के इस फैसले के बाद अल्लाह के सामने खड़े होकर यह कैसे कह सकते हैं कि हज़रत नूह ने उन तक खुदा का पैगाम नहीं पहुँचाया?'' आरफा ने हैरानी से पूछा.
लैला ने उसकी बात को और बढ़ाते हुए कहा:
'' और अगर वह झूठ बोलने के लिए जिद पर उतर ही आये हैं तो कुरआन में बयान हुआ था कि ऐसे लोगों के मुंह बन्द करके उनके हाथ पांव से गवाही ली जाएगी. तो वह यह कैसे कह रहे हैं?''
सालेह ने उन्हें समझाते हुए बात को साफ़ किया:
'' यह बात कहने वाले लोग हज़रत नूह की वह कौम नहीं जिन पर अज़ाब आया था. यह उनकी औलाद के वे लोग हैं जो उन पर ईमान ले आए थे और फिर उन मानने वालों की औलादों ने दुनिया को आबाद किया था. मगर उन में एक बड़ी संख्या उन लोगों की थी जिनमें हज़रत नूह के बाद सीधे कोई पैगम्बर नहीं आया. ये लोग एक ईश्वर व आखिरत (परलोक) की उसी रहनुमाई (मार्गदर्शन) पर गुज़ारा करते रहे जो दरअसल हज़रत नूह की थी ... चाहे एक लंबे समय बीतने के आधार पर वह उसको ऐसे न जानते हों जैसे वो थी और चाहे उन्होंने उसकी शक्ल कितनी ही बिगाड़ दी हो ... इसीलिए वह हज़रत नूह की रहनुमाई (मार्गदर्शन) को मना करने वाले हो गए हैं.''
मैंने बातचीत के बीच में आते हुए सालेह की बात को और स्पष्ट किया:
' देखो बात यह है कि ज्यादातर इन्सान हज़रत नूह ही औलाद में से है. उनमे से कई गिरोह ख़ासकर सामी पीढ़ी के लोग जो दुनिया के बीच में यानी मिडल ईस्ट और उसके आसपास आबाद रहे, वो हैं जिनमें पैगम्बरों के आने का सिलसिला लगातार जारी रहा. लेकिन बहुत से गिरोह में हज़रत नूह (मनु) के बाद कोई पैगम्बर नहीं आया. खासकर हज़रत इब्राहीम के बाद तो हालत यह हो गई थी कि हज़रात इब्राहीम की पीढ़ी से बाहर कोई पैगम्बर आया ही नहीं. इसी लिए यही वह लोग हैं जो नूह की औलाद या नूह की कौम में से हैं. उन्ही उम्मतों के हिसाब किताब के मौके (अवसर) पर इन लोगों को भी हज़रत नूह की उम्मत के साथ पेश किया गया है. मगर ये लोग सीधे हज़रत नूह की शिक्षाओं को उनके नाम से इस तरह नहीं जानते जिस तरह आसमानी किताब वाले गिरोह (यहूदी, इसाई) या मुसलमान जानते थे. इसलिए उन लोगों ने हज़रत नूह के पैगाम (संदेश) पहुंचाने का इंकार कर दिया और उनकी यह बात एक तरह से गलत नहीं है.'
सालेह ने मेरी बात को आगे बढ़ाते हुए कहा:
'' अब्दुल्लाह ने ठीक कहा. हकीकत यह है कि नूह (मनु) की इस कौम तक खुदा का पैगाम असल में उम्मते मुहम्मद्या ने पहुंचाया था. इसलिए रसूल अल्लाह रसूल अल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की उम्मत से सभी पहले से आखिर गवाहों को बुलाया जा रहा है जिन्होंने पिछली दुनिया में लोगों को सही दीन (धर्म) की दावत दी थी. आज यह गवाह बताएंगे कि उन्होंने किसी न किसी तरह उन लोगों तक एक ईश्वर के होने का वो पैगाम (संदेश) पहुंचा दिया था जो हज़रत नूह की विरासत था और बाद के समय में बर्बाद हो गया था. पर आखरी रसूल के आने के बाद ताकयामत इस पैगाम को महफूज़ (सुरक्षित) कर दिया गया और मुसलमान उम्मत ने यह अमानत नूह की कौम तक पहुंचादी था.''
नाएमा ने मेरी ओर देखते हुए पूछा:
'' तो फिर उन्हें उम्मते मुहम्मद्या के साथ क्यों नहीं किया गया?''
'वह इस्लाम क़ुबूल (स्वीकार) कर लेते तो ऐसा ही होता, लेकिन उन्होंने इस्लाम क़ुबूल नहीं किया और बदली हुई किताबों के साथ अपने बाप दादा के धर्म पर जमे रहे. आज हर उम्मत क्यूंकि अपने रसूल के साथ पेश की जा रही है तो ऐसे सारे लोग नूह की कौम के रूप में पेश किए गए हैं क्योंकि उनके बाप दादा हज़रत नूह पर ईमान लाए थे.' मैंने जवाब दिया और फिर बात को पूरी करते हुए कहा:
' अपनी क़ौम के शुरुआती लोगों को खुदा का पैगाम खुद हज़रत नूह (मनु) ने पहुंचाया और आखरी लोगों को मुसलमानों ने पहुंचाया जो नूह समेत सभी रसूलों के पैगाम (संदेश) यानि एक ईश्वर के होने और आखिरत (परलोक) में हिसाब होने की अमानत को रखने वाले थे.'
'' चलो भई अब बुलाया जा रहा है.'' सालेह मुझसे संबोधित होकर बोला.
इसके साथ ही हम दोनों उठकर वहां से रवाना हो गए.
...............
हम एक बार फिर रसूल अल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की मजलिस में थे. वही नूर, वही जमाल, वही जलाल (महिमा). मुझे ये महसूस होता था कि सदियों से पैगम्बर को जानता हूँ. मुझे लग रहा था कि जैसे आप की मुहब्बत मेरे दिल में बढ़ती जा रही है. मैं इस समय भी पैगम्बर की मजलिस में पिछली सीट पर बैठा टकटकी बांधे पैगम्बर के नूरानी चहरे को देखे जा रहा था. हुज़ूर तब तक अपने पास बैठे साथियों से बातचीत कर रहे थे, इसी बीच उनके पास आकर एक साहब ने उनके कान में कुछ कहा.
सालेह ने जो मेरे साथ बैठा हुआ था सरगोशी के अंदाज में मुझसे कहा:
'' यह रसूल के सेवक हज़रत अनस हैं और पैगम्बर को तुम्हारे बारे में बता रहे हैं.''
इसके साथ ही पैगम्बर ने नज़र उठाकर मुझे देखा और दिलनवाज़ मुस्कुराहट के साथ मेरा स्वागत किया. इससे सालेह की बात की पुष्टि हो गई कि हज़रत अनस ने मेरे ही आने की खबर पैगम्बर को दी थी.
फिर मुस्कुराते हुए सब लोगों से कहा:
''अल्लाह के पैग़म्बर और इंसानों के बाप नूह (मनु) की उम्मत ने उनकी गवाही को यह कहकर स्वीकार करने से इनकार कर दिया है कि नूह ने उन तक सीधे कोई पैगाम (संदेश) नहीं पहुचाया. हकीकत यह है कि यह पैगाम मेरी उम्मत ने नूह की कौम तक पहुंचाया था. आप हज़रात चूंकि सभी नबियों के मानने वाले हैं और मेरे ज़रये से जो दीन (धर्म) आपको मिला वही नूह को भी मिला था. इसलिए आपकी यह जिम्मेदारी है कि हज़रत नूह की तरफ से आप लोग खुदा के हुज़ूर (सामने) पेश हों और यह गवाही दें कि ईमान और नेक कामों की जो दावत (पुकार) नूह ने दी थी और जो मैंने आप लोगों तक पहुंचाई थी, वह आप ने बिना कांट व छांट किये नूह की कौम के सामने पेश करके मेरे और नूह (मनु) के मिशन को पूरा कर दिया था.''
यह कहते हुए पैगम्बर ने अपने बराबर बैठे हुए हज़रत अबू बक्र से कहा:
''अबू बक्र खड़े हो जाओ.''
यह सुनते ही वे खड़े हो गए. फिर आपने सब मौजूद लोगों से संबोधित होकर कहा:
''यह मेरे करीबी साथी हैं. इनके अलावा मेरे ज़माने से क़ियामत तक के सभी ज़माने के मेरे उम्मती यहाँ हैं. आप लोग अबू बक्र की कयादत (कमान) में अल्लाह की बारगाह में पेश हों और इस सच की गवाही दें जो आपके पास है.''
यह कहते हुए पैगम्बर खड़े हो गए और उनके साथ ही सभी लोग भी खड़े हो गए. अबू बक्र ने रसूल अल्लाह के हाथों को चूमा और आगे बढ़ गए. उनके बाद सभी मौजूद लोगों ने एक एक करके नबी करीम के हाथों का चूमा. मेरा नंबर सबसे आखिर में था. मैंने भी यह इज्ज़त हांसिल की और इसके बाद हम सब हज़रत अबू बक्र के नेतृत्व में हष्र के मैदान की तरफ़ रवाना हो गए.
...............
मैं इन बुजुर्ग हस्तियों के बीच सबसे पीछे चल रहा था. सालेह मेरे साथ नहीं था. पैगम्बर की मजलिस से उठते समय वह मुझसे यह कह कर अलग हो गया था कि यह गवाही का काम करने तुम्हें अकेले जाना होगा. लेकिन वहां से वापसी पर मैं तुम्हें मिल जाऊँगा.
मैं रास्ते में दिल ही दिल में सोच रहा था कि मैं इस काबिल नहीं कि ऐसी बा बरकत और बुजुर्ग हस्तियों के बीच उम्मते मुहम्मद्या की नुमाएंदगी (प्रतिनिधित्व) करूँ. मुझ पर यह अहसास इतना ग़ालिब होने लगा कि मैंने सोचा कि मैं चुपचाप इन लोगों के पास से निकल जाता हूँ. किसी को क्या पता चलेगा. खुदा मेरे ज़माने के किसी और आदमी को बुलवा लेंगे. इस विचार से मैं धीरे धीरे वापस होने लगा. यहाँ तक कि मेरे और लोगों के बीच काफी दूरी हो गई. मैंने मौका गनीमत जाना और वापस कौसर की होज़ की ओर जाने के लिए मुड़ा ही था कि पीछे से अचानक आवाज आई:
'' अब्दुल्लाह! यह क्या कर रहे हो?''
मैं घबरा कर पल्टा तो पीछे हज़रात अबू बक्र खड़े थे. मैं कुछ शर्मिंदा सा हो गया. मेरी हालत ऐसी हो गई जैसे मैं चोरी करते हुए पकड़ा गया. मैंने पहले सोचा कि कोई बहाना बना दूं, लेकिन ध्यान आया कि यह दुनिया नहीं हष्र है खुदा उसी समय हकीकत खोल देंगे. इसलिए मैंने सही बात बताने ही में भलाई समझी. साथ में उनसे यह अनुरोध भी किया कि मेरी जगह किसी और को ले जाया जाए.
वे मेरी बात सुनकर हंसने लगे और बोले:
'' गवाही के लिए लोगों को खुदा ने खुद चुना है. उसी ने एक फरिश्ते के ज़रये (द्वारा) मुझे यह बताया था कि अब्दुल्लाह किस वजह से वापस जा रहा है.''
उन्होंने धीरे से मेरा हाथ थाम लिया और आगे की ओर चलने लगे. रास्ते में मुझे समझाने लगे:
'' देखो अब्दुल्लाह! इस गिरोह में हर आदमी का चयन खुदा ने खुद किया है. जानते हो कि वो किस मेयार पर लोगो को चुनता है?''
मैं चुपचाप उनकी शक्ल देखने लगा. उन्होंने अपने सवाल का खुद ही जवाब दिया:
'' पक्षपात, भावनाओं और इच्छाओं से ऊपर उठ कर जिस व्यक्ति ने सच ही को मकसद बना लिया, और एक ईश्वर व आखिरत (परलोक) को अपने जीवन का मिशन बना लिया वही अल्लाह के पास इस गवाही के काम के सबसे ज्यादा योग्य हैं. देखो तुम्हारे ज़माने के धार्मिक लोग इच्छाओं से तो शायद ऊपर उठ गए थे, लेकिन उनमें ज़्यादातर पक्षपात और भावनाओं से ऊपर नहीं हो सके. लोग अलग अलग फिरके (समुदायों) और मसलक के अधीन थे. वह सिर्फ उसी बात को मानते थे जो उनके हलके (क्षेत्र) के लोग करें. वह लोगों को अपने ही फिरके की ओर बुलाते थे. अपने ही आलिमों और धर्म गुरुओं कि बड़ाई के अहसास में जिया करते थे. जबकि तुम सिर्फ खुदा की बड़ाई के अहसास में ज़िन्दा रहे. तुमने सच्चाई को हर क़ीमत देकर क़ुबूल (स्वीकार) किया और हर भेदभाव से ऊपर उठकर अपनाया. ख़ुदा की तौहीद (एकेश्वरवाद) तुम्हारी ज़िन्दगी की सबसे बड़ी तमन्ना थी और परमेश्वर से मिलने के लिए लोगों को तैयार करना तुम्हारी ज़िंदगी का सबसे बड़ा मकसद था. फिर तुमने दावत का काम सिर्फ अपनी कौम ही में नहीं किया बल्कि गैर मुस्लिम लोगों तक क़ुरआन का पैगाम (संदेश), तौहीद (एकेश्वरवाद) और आखिरत (परलोक) पहुंचाने के लिए एक लम्बी महनत की. यही सारी बातें आज तुम्हे चुने जाने की वजह बन गई हैं.''
................................................................................................................जारी है....

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