मेरी आँख खुली तो मैंने खुद को एक बहुत अच्छे और नरम और नाजुक बिस्तर पर पाया. नाएमा बिस्तर पर मेरे पास बैठी परेशान निगाहों से मुझे देख रही थी. मेरी आंखें खुलते देख कर एकदम से उसके चेहरे पर रौनक आ गई. उसने फ़ौरन पूछा:
'' आप ठीक हैं?''
'मैं कहाँ हूँ?' मैंने जवाब देने के बजाय खुद एक सवाल कर दिया.
'' आप मेरे पास मेरे कैम्प में हैं. सालेह आपको इस हाल में यहां लाए थे कि आप बेहोश थे.''
'वह खुद कहां है?'
''वह बाहर हैं. आप ठहरें, मैं उन्हें अंदर बुलाती हूँ.''
उसकी बात पूरी होने से पहले ही सालेह सलाम करता हुआ अंदर आ गया. उसके चेहरे पर इत्मिनान (संतोष) की मुस्कान थी. मैं उसे देखकर उठ बैठा और पूछा:
' क्या हुआ था?'
'' तुम बेहोश हो गए थे.''
' ब खुदा मैंने अपने रब का यह रूप पहली बार देखा था. खुदा के बारे में मेरे सभी अंदाज़े गलत थे. वह उससे कहीं ज्यादा अज़ीम (महान) है जितनी मैं कल्पना कर सकता था. मुझे अपनी ज़िन्दगी के हर उस लम्हे पर अफ़सोस है जो मैंने खुदा की अजमत के अहसास में बसर नहीं किये.'
मेरी बात सुनकर सालेह ने कहा:
'' यह ग़ैब और हाज़िर का फर्क (अंतर) है. दुनिया में ख़ुदा गायब में हुआ करता था. आज पहली बार था कि खुदा ने गायब का पर्दा उठाकर इंसान को संबोधित किया था. तुम नसीब वाले हो कि तुमने ग़ैब में रह कर खुदा की अजमत को खोज लिया था और खुद को उसके सामने बेऔकत कर दिया था. इसीलिए आज तुम पर अल्लाह का ख़ास करम है.''
''मगर यह बेहोश क्यों हुए थे?'' नामह ने बातचीत में हस्तक्षेप करते हुए पूछा.
'' दरअसल हुआ यह था कि हम अर्श के बाईं ओर मुजरिमों के हिस्से में खड़े थे. तभी फरिश्तों का आना शुरू हो गया और हिसाब किताब शुरू हो गया. अल्लाह ने चूंकि गुस्से के अंदाज़ में बातचीत की थी और नाराज़ी का असल रुख बाएं हाथ वालों तरफ ही था, इसलिए सबसे ज्यादा उसका असर उसी बाईं ओर हो रहा था. अल्लाह अपनी सिफात (गुणों) से कभी खाली नहीं होते, इसलिए गुस्से में होने के बावजूद भी उन्हें एहसास था कि इस समय उनका एक महबूब बन्दा बाएँ हाथ की ओर मौजूद है. इसलिए उन्होंने अब्दुल्ला को बेहोश कर दिया. वह ऐसा न करते तो अब्दुल्ला को उस कहर व गज़ब का सामना करना पड़ जाता जो बाईं ओर वालों पर उस समय हो रहा था.''
सालेह की बात सुनकर ना चाहते हुए भी मेरी आंखों से अपने करीम रब के लिए एहसान मंदी के आंसू जारी हो गए. मैं बिस्तर से उतरा और सजदे में गिर गया. मेरे मुँह से अपने आप यह शब्द निकलने लगे:
' ऐ मेरे माबूद (जिसकी पूजा की जाए) तूने मुझे कब कब याद नहीं रखा. माँ के पेट से आज के दिन तक तेरी किसी मसरूफियत (व्यस्तता) ने तुझे मुझसे ग़ाफ़िल नहीं किया और मैं? मैंने कभी तेरी करीम हस्ती की कद्र नहीं की. मैंने कभी तेरे किसी एहसान का शुक्र अदा नहीं. मैंने कभी तेरी बंदगी (उपासना) का हक़ अदा न किया. तू पाक (पवित्र) है. तो बुलंद है. हर तारीफ़ तेरे ही लिए है और हर शुक्र तेरा ही है. मुझे माफ कर दे और अपनी रहमतों के साये में ले ले. अगर तुने मुझे माफ नहीं किया तो मैं तबाह हो जाऊंगा, मैं बर्बाद हो जाऊंगा.'
मैं देर तक यही दुआ मांगता रहा. नाएमा ने मेरी पीठ पर हाथ फेर कर कहा:
'' अब आप उठये. आपने तो उम्र भर खुदा की मर्ज़ी और पसंद का जीवन बिताया है. मैं आपको जानती हूँ.''
नाएमा की बात सुनकर मैं चुपचाप उठ खड़ा हुआ और उसे देखते हुए बोला:
' तुम अभी खुदा के अहसानों और उसकी अजमत (महानता) को नहीं जानतीं ... वरना कभी ये शब्द नहीं कहतीं.'
'' अब्दुल्लाह ठीक कह रहा है नाएमा.'' सालेह ने मेरा समर्थन करते हुए कहा.
'' इन्सान का बड़े से बड़ा काम भी खुदा की छोटी से छोटी इनायत (दी हुई चीज़) की तुलना में कुछ नहीं. खुदा अब्दुल्लाह से जुबान छीन लेता तो यह एक शब्द नहीं बोल सकता था. हाथ छीन लेता तो यह लिख नहीं सकता था. हर नेमत और हर तौफीक उसी की थी. इंसान कुछ भी नहीं. सब कुछ ईश्वर है''.
'' आप ठीक कहते हैं. मैंने इस पहलू से गौर (विचार) नहीं किया था.'' नाएमा ने बात को मानते हुए सिर हिलाते हुए कहा.
' अब हमें कहाँ जाना है?' मैंने सालेह से पूछा.
'' हिसाब किताब शुरू हो चुका है. तुम्हें वहां पहुंचना होगा. लेकिन पहले अच्छी खबर सुनो.''
'वह क्या है?'
'' जब हिसाब किताब शुरू हुआ तो अल्लाह ने सबसे पहले मुसलमानों के हिसाब का फैसला किया है. और जानते हो इसमें तुम्हारी बेटी लैला को रिहाई मिल गई.''
' क्या?' मैं आश्चर्य और खुशी के मारे चिल्ला उठा.
'' हाँ! सालेह ठीक कहते हैं.'' नाएमा बोली.
''मैं उससे मिल चुकी हूँ. वह अपने बाकी भाई बहनों के साथ दूसरे कैम्प में है. वहां सब आपका इंतज़ार कर रहे हैं.''
' और जमशैद?' मैंने सालेह से अपने बड़े बेटे के बारे में पूछा.
जवाब में सोग वार ख़ामोशी छा गई. मुझे अपने सवाल का जवाब मिल चुका था. मैंने कहा:
' फिर मैं वापस हष्र के मैदान में जाना पसंद करूंगा. शायद कोई रास्ता निकल आए.'
'' ठीक है.'' सालेह बोला और फिर मेरा हाथ थाम कर खेमे से बाहर आ गया.
...............
खेमे से बाहर आकर मेरा पहला सवाल यह था:
'मैं जमशैद के लिए क्या कर सकता हूँ?'
'' तुम लैला के लिए कुछ नहीं कर सके तो जमशैद के लिए क्या कर सकते हो. क्या तुम अल्लाह को बताओ कि उसे क्या करना चाहिए?''
' मैं अल्लाह की पनाह मांगता हूँ. मेरा मतलब यह कतई नहीं था.' मैंने फ़ौरन जवाब दिया, मगर सालेह की बात पर जमशैद को बचाने का मेरा जोश ठंडा हो चुका था. कुछ देर ख़ामोशी के बाद मैंने पूछा:
' अच्छा यह बताओ कि मेरे बेहोश होने के बाद हष्र के मैदान में क्या हुआ?'
'' तुम जब होश में थे तुम्हें तब भी पूरी तरह मालूम नहीं था कि वहां क्या हो रहा है. उसे पूछना है तो किसी मुजरिम से पूछो. उधर गिरोह दर गिरोह फरिश्ते नाज़िल हो रहे थे और इधर मुजरिमों की जान पर बन रही थी. फिर जब सजदे में जाने का हुक्म हुआ तो सारे लोग सजदे में थे और ज्यादा बड़े गुनाहगार उस समय भी खुदा के सामने सीना ताने खड़े थे.''
' यह उनकी कमर तख्ता जैसी होने का नतीजा था?'
'' हां यह उनकी सजा थी. इसके बाद जब खुदा ने पूछा कि मैं राजा हूँ. मेरे सिवा और राजा कहां है? उस समय भी यही अपराधी सीना ताने उसके सामने खड़े थे. काश! तुम देख सकते कि उस समय इन मुजरिमों के साथ क्या हो रहा था. उनके दिल कटे जा रहे थे. कलेजे मुँह को आ रहे थे. आँखें डर और आतंक से फटी हुई थी. दोषी बेबसी से उंगलियां चबा रहे थे, लेकिन मजबूर थे कि उस वक़्त भी सारी कायनात के बादशाह के सामने सीना ताने खड़े रहें.''
' फिर क्या हुआ?'
'' जाहिर है हिसाब किताब तो एक एक करके होना था, लेकिन इस मौके पर अपराधियों के सामने उनका अंजाम बिल्कुल साफ़ कर दिया गया. वो इस तरह की जहन्नम का दरवाज़ा पूरी तरह खोल दिया गया. जिसके बाद हष्र के मैदान के बाएँ हिस्से का माहौल भयानक हो गया. जहन्नम जैसे जोश के मारे उबली जा रही थी. ऐसा लग रहा था जैसे वह मुजरिमों को देखकर जुस्से से फटी जा रही हो. इसके दहाड़ की आवाज़ें दूर तक सुनी जा रही थीं और शोले बेकाबू होकर बाहर निकले जा रहे थे. यह शोले इतने बड़े थे कि उनसे उठने वाली चिंगारियां बड़े बड़े महल जितनी बड़ी और ऊँची थीं. उनके ऊपर उठने से आसमान पर जैसे लाल चिंगारियों का झुण्ड बन गया था. न पूछो कि ये सब कुछ देख कर लोगों की हालत क्या हो गई. उन्हें लग रहा था कि इससे पहले हष्र की जो सख्तियाँ थी वह कुछ भी नहीं थीं.''
' हिसाब किताब कैसे शुरू हुआ?'
'' सबसे पहले हज़रत आदम को पुकारा गया जो पूरी मानवता के पिता और पहले नबी थे.
उन्होंने कहा:
' मैं हाज़िर हूँ और तेरे हुक्म का पाबन्द हूँ और सब भलाईयाँ तेरे दोनों हाथों में हैं.'
हुक्म हुआ. ''अपनी औलाद में से जहन्नम में जाने वालों को अलग कर लो.''
' कितनों को अलग करूँ?' उन्होंने पूछा, कहा गया.
'' हर हजार में से नौ सौ निन्यानवे.''
'' तुम अनुमान नहीं कर सकते अब्दुल्ला! यह सुनकर हष्र के मैदान में कोहराम मच गया.''
' लेकिन इतनी बड़ी संख्या में लोगों की जहन्नम का फैसला क्यों?' मैंने पूछा.
'' यह फैसला नहीं यह बात बताना था कि मैदान में जो लोग हैं, उनमें हजार में से एक ही इस काबिल है कि जन्नत में जा सके. दरअसल पूरी मानवता ईमान और अख़लाक़ (नैतिकता) की परीक्षा में बुरी तरह फैल हुई है . इसलिए खुदा के इन्साफ के तहत उसूली तौर से इतने ही लोग जहन्नम के हकदार हो चुके हैं. लेकिन जैसा कि रसूल अल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने दुनिया ही में बता दिया था कि अल्लाह की रहमत (कृपा) के सौ हिस्से किए जाएं तो उसकी रहमत (कृपा) का एक हिस्सा दुनिया में ज़ाहिर (प्रकट) हुआ था और बाकी निन्यानवे हिस्से उसने आज के दिन के लिए रोक रखे थे. इसलिए उसकी रहमत का ज़हूर हुआ और उसने नाकाम लोगों की जहन्नम का फैसला सुनाने के बजाय पहले चरण पर उन लोगों को बुलाने का फैसला किया जिनके कामयाब होने और निजात (छुटकारा) पाने की संभावना सबसे ज्यादा थी.''
' यानी कुल मिलाकर अच्छे लोग?'
'' हां. हर उम्मत के उन लोगों को जिन की कामयाबी बस एक औपचारिक सा हिसाब किताब करने की मांग करती है. इस अमल (प्रक्रिया) की शुरूआत मुस्लिम उम्मत से शुरू हो चुका है फिर दूसरी उम्मतों का नंबर भी जल्दी ही आ जाएगा क्योंकि कुल इंसानी आबादी में ऐसे लोग सिर्फ एक प्रतिशत के लगभग ही है. बाकी लोगों का मामला वह बाद में देखेंगे. इसका फायदा यह होगा कि हष्र की सख्ती किसी के गुनाहों का बदल बन सकती है तो बन जाए.''
यह कहने के बाद सालेह पल भर को रुका और फिर बोला:
'' वैसे मैं दूसरे लोगों के लिए ज्यादा संभावना नहीं देखता.''
' क्यों?' मैंने पूछा.
'' इसकी वजह शिर्क (एक ईश्वर के साथ औरों को भी भगवान मानना) है. खुदा शिर्क के मामले में बहुत गैरत मंद हैं. तुम जानते हो कि हर दौर में इंसानियत की सबसे बड़ी समस्या शिर्क ही रहा है. इसी शिर्क की वजह से आज सबसे ज्यादा लोग मारे जाएंगे . क्योंकि शिर्क की माफी की संभावना न के बराबर है. हाँ किसी के हालात और माहौल की कोई बड़ी मजबूरी हो तो खैर है वरना शिर्क करने वाले किसी इन्सान के लिए आज कामयाबी की मामूली सी भी कोई उम्मीद नहीं है.''
' चाहे वह मुसलमान हों?' मैंने पूछा.
'' हां.'' सालेह ने जवाब दिया.
'' शिर्क जहन्नम की आग का शोला था. आज यह जरूर हर उस इन्सान को जलाएगा जिसने खुदा के साथ किसी और को उसकी ज़ात, सिफात (गुण) या हकूक व इख़्तियार (अधिकार व ताकत) में साझी ठहराया था. ईश्वर के अलावा किसी और की भी इबादत (पूजा) की थी. उससे दुआ मांगी थी. उसे सजदा (प्रणाम) किया था. या उसे परमेश्वर का हिस्सा समझा था.''
' खुदा सबसे बड़ा है, उसके सिवा कोई ईश्वर नहीं.' मेरे मुँह से निकला.
............................................................................................................जारी है...
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