जमशैद को अभी हिसाब के लिए पेश नहीं किया गया था. दो फरिश्ते उसे अर्श के पास लेकर खड़े हुए थे और वह अपनी बारी का इंतजार कर रहा था. उसका चेहरा उतरा हुआ था जिस पर दुनिया के पचास साठ सालों की दौलत मंदी का तो कोई असर नजर नहीं आता था, लेकिन हष्र के हजारों साल की मुसीबतों की पूरी कहानी लिखी हुई थी. उसके पास जाने से पहले मैंने अपने दिल को मजबूत बनाने की कोशिश की. पास पहुंचा तो उसके पास खड़े फरिश्तों ने मुझे आगे बढ़ने से रोक दिया. मगर सालेह के हस्तक्षेप पर उन्होंने हमें इजाज़त दे दी. जमशैद ने मुझे देख लिया था. वह खुद मेरे पास आया और मेरे सीने से लिपट गया. फिर वह मेरी ओर देखकर बोला:
'' अब्बू में इतना रोया हूँ कि अब आँसू भी नहीं निकल रहे.''
मैं उसकी कमर थपथपाने के सिवा कुछ न कह सका. फिर उसने धीरज से कहा:
'' अब्बू शायद मैं इतना बुरा नहीं था.''
'मगर तुम बुरों के साथ जरूर थे बेटा! बुरों का साथ कभी अच्छे परिणाम तक नहीं पहुंचाता. तुमने शादी की तो ऐसी लड़की से जिसमे एक ही गुण था उसकी खूबसूरती और उसकी दौलत. खुदा की नजर में यह कोई गुण नहीं होते. तुम हमसे अलग हो गए और अपने ससुर के ऐसे कारोबार में शामिल हो गए जिसके बारे में तुम्हें पता था कि इसमें हराम की मिलावट है. लेकिन पत्नी, बच्चों और दौलत के लिए तुम हराम में सहयोग देते रहे. यही चीजें तुम्हें इस जगह तक ले आई.'
'' आप ठीक कहते हैं अब्बू, मगर मैंने नेकियाँ भी की थी. तो क्या कोई उम्मीद है?''
मैं चुप रहा. मेरी चुप्पी ने उसे मेरा जवाब समझा दिया. वह मायूस होकर बोला:
'' मुझे अंदाज़ा हो गया है अब्बू. अपने बीवी बच्चों और सास ससुर को जहन्नम में जाता देखने के बाद मुझे अंदाज़ा हो चुका है कि आज किसी के हाथ में कुछ नहीं है. सारा अधिकार उस ईश्वर के पास है जिसके हुक्मों (आदेशों) को मैं भूला रहा. आज जिस का अमल (कर्म) उसे नहीं बचा सका उसे दुनिया की कोई ताकत नहीं बचा सकेगी. मैं हजारों साल से इस मैदान में परेशान फिर रहा हूँ. मैं अनगिनत लोगों को जहन्नम में जाता देख चुका हूँ. मुझे अपनी निजात (मुक्ति) की कोई उम्मीद नहीं है . मैंने खुदा से बहुत माफी मांगी है. मगर मैं जानता हूँ कि आज माफी मांगने का कोई फायदा नहीं. अब्बू! खुदा शायद मुझे माफ न करें. लेकिन आप मुझे ज़रूर माफ़ कर दीजिए. आप तो मेरे पिता हैं ना.''
यह कहकर वह फूट फूट कर रोने लगा. मैंने बहुत कोशिश की कि मेरी आंखों से आंसू न बहें, लेकिन न चाहते हुए भी मेरी आंखें बरसने लगीं. इसी बीच में जमशैद का नाम पुकारा गया. फरिश्तों ने तुरंत उसे मुझसे अलग किया और बारगाह इलाही में दे दिया.
वह हाथ बांध कर और सर झुकाकर सारे जहानों के परवरदिगार के सामने पेश हो गया. एक चुप्पी छाई हुई थी. जमशैद खड़ा था मगर उससे कोई सवाल नहीं किया जा रहा था. मुझे समझ में नहीं आया कि चुप्पी की वजह क्या है. थोड़ी देर में वजह भी ज़ाहिर हो गई. कुछ फरिश्तों के साथ नाएमा वहां आ गई. इसके साथ ही सालेह ने मुझे इशारा किया तो मैं नाएमा के साथ जाकर खड़ा हो गया. नाएमा के चेहरे की हवाइयाँ उड़ रही थीं. वह मुझसे कुछ पूछना चाह रही थी, मगर बारगाह इलाही का रोब इतना ज्यादा था कि उसकी आवाज़ नहीं निकल रही थी.
कुछ देर में जमशैद से सवाल हुआ:
'' मुझे जानते हो मैं कौन हूँ?''
इस आवाज़ में इतना ठहराव था कि मैं अंदाज़ा नहीं कर सका कि यह ठहराव किसी तूफान के आने का संकेत था या फिर मालिक दो जहां का सब्र था.
'' आप मेरे रब हैं. सबके प्रभु हैं. यही मेरे पिता ने मुझे बताया था.''
शान बेनियाज़ के साथ पूछा गया:
'' कौन है तुम्हारा पिता?''
जमशैद ने मेरी ओर देख कर कहा:
'' यह खड़े हुए हैं.''
उसके इस वाक्य के साथ मेरा दिल धक से रह गया. मुझे इस बात का अंदाज़ा हो चुका था कि अब जमशैद मारा गया. क्योंकि मैंने तौहीद (सिर्फ एक ईश्वर) के अलावा और भी बहुत सी चीजों की नसीहत की थी जिनमें उसका रिकॉर्ड अच्छा नहीं था. अब मुझसे यही पूछा जाना था कि उसे किन बातों की नसीहत की थी और मेरी यही गवाही उसकी पकड़ का कारण बन जाती. मगर मेरी आशा के बिल्कुल उलट अल्लाह ने मुझे गवाही के लिए नहीं बुलाया. उन्होंने जमशैद से एक अलग सवाल किया:
'' अभी तुम अपने पिता से क्या कह रहे थे ... कि खुदा शायद मुझे माफ न करें. लेकिन आप मुझे ज़रूर माफ़ कर दीजिए. आप तो मेरे पिता हैं ना.''
पल भर पहले जो मेरी उम्मीद बंधी थी, वह इस सवाल के साथ ही दम तोड़ गई. जमशैद को अंदाज़ा हो गया कि उसकी पकड़ शुरू हो चुकी है. डर के मारे उसका चेहरा काला पड़ गया. उसके हाथ पैर कांपने लगे. उसके वहम और गुमान में भी यह बात नहीं थी कि अल्लाह जो दूसरों के हिसाब किताब में व्यस्त थे साथ साथ हमारी बात भी सुन रहे थे. न सिर्फ सुन रहे थे बल्कि उसके शब्द अल्लाह को नाराज़ करने का कारण बन गए थे. वह बड़ी बेबसी से बोला:
'' जी मैंने यह बात कही थी लेकिन मेरा मतलब वह बिल्कुल नहीं था जो आप समझे हैं.''
'' तुम्हें क्या पता मैं क्या समझा हूँ?''
पूछा गया, मगर आवाज़ में अभी तक वही ठहराव था.
'' न...ना....नहीं मुझे बिल्कुल नहीं पता ... आप क्या समझे.'' जमशैद ने लड़खड़ाती आवाज़ से जवाब दिया.
इससे ज्यादा कोई बात कहने के बजाय नाएमा से पूछा गया:
''मेरी बंदी यह तेरा बेटा है. इसने तेरे साथ कैसा सुलूक किया?.''
नाएमा बोली:
'' परवरदिगार! इसने मेरे साथ बहुत अच्छा व्यवहार किया. यह बुढ़ापे तक मेरी सेवा करता रहा. इसने माल से, हाथों से और मुहब्बत से मेरी बहुत सेवा की. इसकी पत्नी इसे टोकती थी लेकिन यह मेरी सेवा से बाज नहीं आया. इसने अपना माल और अपनी जान सब कुछ मेरे लिए समर्पित कर रखा था.''
नाएमा का बस नहीं चल रहा था कि वो जमशैद के लिए और बहुत कुछ कहे, मगर उसे पता था कि जो पूछा गया है उससे एक शब्द ज्यादा कहने पर उसकी अपनी पकड़ हो जाएगी. इसलिए वह मजबूरन इतना कह कर चुप हो गई.
परवरदिगार ने फरिश्ते से पूछा:
'' क्या यह औरत ठीक कह रही है?''
फरिश्ते ने आमाल नामा देखकर कहा:
'' इसने बिल्कुल ठीक कहा है.''
इसके बाद जो कुछ हुआ उस ने मेरे दिल की धड़कन तेज कर दी. हुक्म हुआ इसके आमाल (कर्म) तराजू में रखो. पहले गुनाह (पाप) रखे गए. जिनसे बाएँ हाथ का पलड़ा भारी होता चला गया. इसके बाद नेकियाँ रखी गईं. हम सब के चेहरे उड़ रहे थे. एक एक करके नेकियाँ रखी गई. मगर वह गुनाहों की तुलना में इतनी कम और हल्की थीं कि तराजू में उल्टे हाथ का पलड़ा भारी ही रहा. आखिर में सिर्फ दो नेकियाँ रह गईं. लगता था कि फैसला हो चुका है. नाएमा ने मायूसी और बेकसी के मिले जुले भाव के साथ आँखें बंद कर लीं. जमशैद अपना सर पकड़ कर बेबसी से ज़मीन पर गिर गया.
मैं जिस समय से हष्र के मैदान में आया था मैंने एक बार भी अर्श की तरफ़ देखने की हिम्मत नहीं की थी. मगर न जाने क्यूँ इस समय पहली बार आपसे आप ही मेरी निगाहें मालिक ज़ुल्ज़लाल की तरफ उठ गई..... एक पल से भी कम समय के लिए ... इस लम्हे मेरे दिल से वही आवाज़ निकली जो ज़िन्दगी की हर बेबसी और मुश्किल पर मेरे दिल से निकला करती थी. ला इलाहा इल्लल्लाह (अल्लाह के सिवा कोई ईश्वर नहीं). फिर मेरी नज़र और सर दोनों फ़ौरन झुक गए.
फरिश्ते ने उसकी पहली नेकी उठाई. यह नाएमा के साथ किया हुआ उसका अच्छा सुलूक था. आश्चर्यजनक तौर पर सीधे हाथ का पलड़ा उठना शुरू हुआ. मैंने अपने बराबर खड़ी नाएमा को झिंझोड़ कर कहा:
'' नाएमा! आँखें खोलो.''
मेरी आवाज़ जमशैद तक भी चली गई. उसने सर उठाकर देखा और धीरे धीरे खड़ा हो गया. उठते पलड़े के साथ उसकी आस भी बन गई. लेकिन एक जगह पहुंच कर दाएं हाथ का पलड़ा ठहर गया. बाएँ हाथ का पलड़ा अब भी भारी ही था. हमारे दिलों में जलने वाली आशा की शमा फिर बुझने लगी. फरिश्ते ने आखरी नेकी उठाई और ऊँची आवाज़ से कहा. यह सिर्फ एक खुदा के होने का यकीन है. उसके रखते ही पलड़े का रुख बदल गया. मेरी जुबां से निकला. 'अल्लाहुअकबर व लिल्लाहिल हम्द.' (अल्लाह सबसे बड़ा है और सारी तारीफें उसी को लायक हैं).
इसके साथ ही मद्धम स्वर में आवाज आई:
'' जमशैद तुम्हारे पिता ने तुम्हें मेरे बारे में यह भी बताया था कि मैं माँ बाप से सत्तर हजार गुना ज्यादा अपने बन्दों से प्यार करता हूँ. यह तुम थे जिसने मेरी कद्र नहीं की. इसीलिए हष्र के मैदान मैं तुम्हें इतनी सख्ती उठानी पड़ी. मेरा इन्साफ बिना भेद भाव के होता है. मगर मेरी रहमत हर चीज़ पर ग़ालिब है.''
फरिश्ते ने निजात (मुक्ति) का फैसला लिख करके आमाल नामा उसके दाहिने हाथ में दे दिया. जमशैद के मुंह से जज़्बात के बहाव में एक चीख निकली. उसे जन्नत का परवाना मिल गया था. हजारों साल जितने इस लम्बे और कड़े दिन के दर्द से उसे निजात मिल गई बल्कि हर तकलीफ से उसे छुटकारा मिल चुका था. वह भागता हुआ आया और हम दोनों से लिपट गया. नाएमा खुभी से अभी तक सुन्न खड़ी थी. जमशैद की आंखों से आंसू बहने लगे थे और मैं अपने वुजूद (अस्तित्व) के हर रेशे के साथ करीम रब की बड़ाई और शुक्र कर रहा था जिस की बढ़ी हुई रहमत ने जमशैद को माफ कर दिया था.
.............................................................................................जारी है....
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