शुक्रवार, 13 जुलाई 2012

भाग ५.१ दो सहेलियां


हष्र के मैदान में गजब की गर्मी थी. मैं सोच रहा था कि न जाने लोग प्यास से ज्यादा परेशान होंगे या फिर अंदेशों (संभावनाओं) से कि कहीं उन्हें जहन्नम की भड़कती हुई आग में न फेंक दिया जाए. इसी सोच में था कि सालेह की आवाज़ कानों से टकराई:
'' अब्दुल्ला! तैयार हो जाओ. मैं तुम्हें तुम्हारी बेटी से मिलवाने ले जा रहा हूं.''
घबराहट में मैंने अपना निचला होंठ अपने दाँतों में दबा लिया. हम कुछ कदम आगे चले तो खुरदुरी पथरीली सतह पर दो लड़कियां बैठी दिखाई दी. मैं दूर से इन दोनों को पहचान गया. उनमें से एक लैला थी. मेरी सबसे छोटी और चहेती बेटी. दूसरी आसमा थी. मेरी बेटी की सबसे करीबी सहेली.
इस माहौल में कड़ी गर्मी थी. लोगों के शरीर से पसीना पानी की तरह बह रहा था. भूख तो परेशानी की हालत में उड़ चुकी थी, मगर प्यास की शिद्दत (प्रकोप) ने सभी को परेशान कर रखा था. ये दोनों भी प्यास से निढाल बैठी थीं. आसमा की हालत बहुत खराब थी और प्यास की शिद्दत के मारे अपने हाथ से बहता हुआ अपना पसीना चाट रही थी. जाहिर है इससे प्यास क्या बुझती. उसने तो और भड़काना था. जबकि लैला अपना सिर घुटनों में दिए बैठी थी.
आसमा एक बड़े अमीर परिवार की इकलौती चश्म व चिराग थी. ख़ुदा से हुस्न, माल, इज्ज़त सब कुछ मिला था. मां बाप ने अपनी चहेती बेटी को अच्छे कॉलेज में शिक्षा दिलाई. बचपन से उर्दू की हवा तक नहीं लगने दी गई. अरबी और क़ुरआन को समझ कर पढ़ने का तो कोई सवाल ही नहीं था. अंग्रेज़ी मीडियम स्कूलों का इतना प्रभाव था कि बच्ची अंग्रेजी अंग्रेजों से अच्छी बोलती थी. मगर ऐसे स्कूलों में भाषा भाषा के रूप में नहीं बल्कि एक बड़ी संस्कृति (culture) की गुलामी के अहसास के साथ सीखी जाती थी. इस भाषा के साथ पश्चिमी सभ्यता अपने ज़्यादातर सामान सहित हमारे घर आजाती थी. सलाम की जगह हाय, कपड़ों में जींस शर्ट, अंग्रेजी संगीत और फिल्में वगैरह ज़िन्दगी का ज़रूरी हिस्सा थे. लेकिन आसमा खानदानी राईस थी, इसलिए कम से कम एक दिखावे की हद तक तहजीब, शराफत, बड़ों का अदब व लिहाज़ और रखरखाव पाया जाता था. इसलिए मैंने इस दोस्ती को गवारा कर लिया था कि शायद लैला के साथ से आसमा बेहतर हो जाए.
लैला से उसकी दोस्ती कॉलेज के ज़माने में हुई. पता नहीं कि दोनों के स्वभाव और कैमसट्री में क्या एक जैसा था कि पारिवारिक पृष्ठभूमि के इतना अलग होने के बावजूद कॉलेज का साथ उम्र भर की दोस्ती में बदल गया. मगर बदकिस्मती से दोस्ती में आसमा ने लैला का असर कम लिया और लैला ने उसका असर ज्यादा लेलिया.
लैला मेरी बेटी ज़रूर थी, लेकिन बदकिस्मती से वह मेरे जैसी न बन सकी. मुझसे ज़्यादा अपने सबसे बड़े भाई, जमशैद की लाडली थी. वही भाई जो मेरा बड़ा बेटा था और इसी की तरह मैदान हष्र में कहीं भटक रहा था. एक ओर बड़े भाई का लाड प्यार और दूसरी ओर आसमा की दोस्ती. यह आसमा इकलौती होने के नाते खुद पिता की लाडली और नाजों में पली बढ़ी थी. नतीजा यह निकला कि आज हष्र में उसे इन मुसीबतों का सामना करना पड़ा. मेरे ज़माने की ज्यादातर औलादों को उनके माता पिता के लाड प्यार ने बर्बाद करके रख दिया था.
औलाद हर दौर में माता पिता को प्यारी रही है. मेरे समय में यह अजीब चीज़ शुरू हुई थी कि मां बाप अपने बच्चों की मुहब्बत में इस तरह गिरफ्तार हुए कि खुद उनके खिलौने बन गए. शायद यह कम बच्चों का असर था. पहले हर घर में आठ दस बच्चे होते थे. इसलिए माता पिता एक हद से ज्यादा बच्चों पर ध्यान नहीं देते थे. मगर मेरे ज़माने में माता पिता के दो तीन ही बच्चे होते थे और उनकी ज़िन्दगी का एक ही मकसद बन गया था कि बच्चों के लिए सारे जहाँ की खुशियां समेट कर लादें. वह उनके नाज़ नखरे उठाते. उनकी तरबियत (संस्कार) के लिए उन पर सख्ती करने को बुरा समझते. उनकी हर इच्छा पूरी करने को अपना मकसद बना लेते. उन्हें अच्छी शिक्षा दिलाने के लिए अपना सब कुछ लुटा देते. यहां तक के उनके बेहतर भविष्य के लिए उन्हें दुसरे देशों में पढ़ाई के लिए भेज देते और आख़िरकार यह बच्चे बूढ़े पिता को छोड़कर विकसित देशों में सेट हो जाते. यह न भी हो तब भी ज़िन्दगी में में मां बाप की कीमत कम थी. लेकिन माँ बाप इस सबके बावजूद बहुत खुश थे.
माँ बाप के पास दीन (धर्म) की बुनयादी जरूरतों को समझाने से ज्यादा जरूरी था कि बच्चों को अंग्रेजों की सी अंग्रेजी बोलना सिखादें. ईमान और अखलाक (नैतिक शिक्षा) देने से ज़्यादा ज़रूरी था कि बहुत महंगे स्कूलों में महंगी शिक्षा दलवादें. ईश्वर की सच्ची मुहब्बत, उसके बन्दों से प्यार, मानव सेवा और इंसानियत का भला चाहने के बजाय बच्चे अपने माँ बाप से सिर्फ लाभ कमाने की सीख लेते थे. बच्चों को परिवार के बुजुर्गों के बजाय टीवी के हवाले किया जाता जहां तहजीब, शराफत, शर्म और अच्छे अख़लाक़ (नैतिकता) के बजाय बेशर्मी, अपने फाएदे के लिए कुछ भी कर गुज़ारना और उग्रवाद का एक नया सबक हर दिन पढ़ाया जाता. आखिरत (परलोक) की कामयाबी  के बजाय दुनिया और उसकी कामयाबी को ही मकसद बनाकर पेश किया जाता था. ईश्वर, धर्म और परलोक यह बस रस्मी सी बातें थीं . दीनदारी (भक्ति) की आखरी हद यह थी कि मौलवी साहब से बच्चे को कुरआन देख कर पढ़वा दिया जाता. रहा उसका तर्जुमा (अनुवाद) तो न वह मौलवी साहब को मालूम था न माँ बाप को और न कभी बच्चों ही को पाता चलता. यह लोग कभी समझ कर पढ़ लेते तो उन्हें पता होता कि कुरान दुन्याँ की कामयाबी की बातों से उतना ही खाली है जितना उनकी जिन्दगियां आखिरत (परलोक) की बातों से. इसकी वजह पिछली दुनिया में किसी की समझ में आई हो या ना आई हो, पर आज साफ़ थी. जो दुनिया में गुज़री वह तो ज़िन्दगी थी ही नहीं. वह तो सिर्फ इम्तिहान का एक पर्चा था या राह चलते मुसाफिर का किसी सराय में गुज़ारा हुआ एक पहर. ज़िन्दगी तो यह थी जो ख़त्म न होने वाली एक बर्दाश्त से बहार हकीकत बनकर आज सामने आखड़ी हुई थी .
...............
हम ज़रा पास पहुंचे तो आसमा की नज़र मुझ पर पड़ी. उसने लैला को टहोका दिया. लैला ने घुटनों से सिर उठाया. उसकी नज़र मेरी नज़र से चार हुई. उनकी आंखों में ऐसी बेबसी, वहशत और दुख था कि मेरा दिल कट कर रह गया. वह उठी ... भाग कर मुझसे लिपट गई और पूरी ताकत से रोने लगी. उस जुबान से अब्बू ....अब्बू के सिवा कुछ नहीं निकल रहा था. मैं बड़ी मुश्किल से खुद पर काबू कर रहा था. मुझे लगा कि अगर वह रोती रही तो कहीं मेरे हौंसले का बाँध भी मेरा साथ न छोड़ दे. मैंने उसके सिर पर हाथ फेर कर कहा:
' बेटा चुप हो जा. मैंने तुझे बहुत समझाया था ना. इस दिन के लिए जीना सीखो. दुनिया सिवाय एक भ्रम के और कुछ नहीं.'
''हां आप ठीक कहते थे. मगर मेरी आँखों पर पट्टी बंधी हुई थी.'' यह कहते हुए उसकी सिसकियों की आवाज़ और तेज़ हो गई.
वो मेरे सीने से लगी हुई थी और मेरी नज़रों के सामने से उसके जन्म, बचपन, लड़कपन, जवानी और ज़िन्दगी भर की सारी तस्वीरें गुजर रही थीं. कभी बिस्तर पर पड़ी हुई वह गुड़िया जिसके रोने से मैं बेचैन हो जाता था. कभी फ्रोक पहनी हुई वह परी जिस की एक अदा पर मैं जान निसार करता था. कभी स्कूल की ड्रैस में बैग लटकाए वह मासूम सी कली, कभी कॉलेज की ड्रैस में फूलों जैसी वह बच्ची और कभी शादी के जोड़े में सजी मेरे दिल वह टुकड़ा जो इस समय हसरत व मुसीबत की सूरत बने मेरे सीने से लगी तड़प रही थी.
मुझे लगा जैसे मेरा दिल फट जाएगा. मैंने उसे बाजुओं से पकड़ कर खुद से दूर कर दिया और अपना सर पकड़ कर खड़ा हो गया. लैला सिसकती हुई आवाज में बोली:
'' मुझे अपने घर वालों में से यहाँ कोई नहीं मिला, न पति न बच्चे, न आप लोगों में से कोई मिला, सिवाय भैया के. उनकी हालत बहुत खराब है अब्बू! वह बहुत बेकरारी से आप को खोज रहे हैं. उन्हें बस आप ही से उम्मीद है.''
मैंने लैला की तरफ देखकर कहा:
' उस बेवक़ूफ़ ने दुनिया में गलत उम्मीदें बाँधी थीं और अब भी गलत उम्मीद बांध रहा है. दुनिया में उसे अपने कारोबार, पत्नी और बच्चों से सारी उम्मीदें थीं. उसका अंजाम वह अब भुगत रहा है. और अब वह मुझसे उम्मीद लगा रहा है. हालांकि मैं कुछ भी नहीं कर सकता.'
इतने में आसमा भी हमारे पास आकर खड़ी हो चुकी थी. मेरी आखरी बात सुनकर वह बोली:
'' अंकल मुझे तो सारी उम्मीद आपसे थी. लेकिन अब आप भी निराश कर रहे हैं.''
' तुम्हें याद है आसमा! जब तुम लैला के साथ पहली बार मेरे घर आई थी तो मैंने तुमसे क्या कहा था.'
'' मुझे याद है अब्बू आपने इससे क्या कहा था.'' आसमा के बजाय लैला ने जवाब दिया.
'' आपने कहा था कि बेटा तुम मेरी बेटी की सहेली हो. देखो ऐसी सहेली बनना जो जन्नत में उसके साथ रहे. ऐसा न हो कि तुम दोनों खुदा को नाराज़ कर दो और किसी बुरी जगह तुम दोनों को साथ रहना पड़े. ऐसा न हो कि क़यामत के दिन तुम दोनों एक दूसरे को दोष दो कि तुम्हारी दोस्ती ने मुझे बर्बाद कर दिया.''
आखरी शब्द कहते हुए लैला फिर रोने लगी. उसके साथ आसमा भी सिसकियाँ भरने लगी. मैंने गर्दन घुमाकर सालेह को देखा जो इस अरसे में चुप खड़ा हुआ था. मुझे ख्याल था कि शायद वह कोई उम्मीद जगाने की बात कह सके. मुझे अपनी ओर आकर्षित देखकर वह कहने लगा:
'' अब्दुल्लाह! वैसे तो हर इन्सान का मामला सिर्फ खुदा के हाथ में है. इंसान का अमल (कर्म) अगर राई के दाने के बराबर था तब भी उसके आमाल नामे (वह फाइल जिस में कर्म लिखे जाते हैं) में होगा. हर अमल को आज परखा जाएगा. नीयत, वजह, हालात,स्थिति, प्रक्रिया और अमल के नतीजे (परिणाम) एक एक चीज़ की जांच होगी. फरिश्ते, दर व दीवार, शरीर के अंग और जर्रे हर चीज़ गवाह बन जाएगी. यहाँ तक के यह बिल्कुल तय हो जाएगा कि हर अच्छा या बुरा अमल किस इनाम या सज़ा का हकदार है. नेकी का बदला दस से सात सौ गुना तक सब्र और दीन (धर्म) के लिए किए गए कामों का बदला बे हद व हिसाब दिया जाएगा. जबकि बुराई का बदला उतना ही होगा जितनी बुराई की होगी. लेकिन शिर्क (ईश्वर के साथ किसी को मिलाना), हत्या, बलात्कार जैसे जुर्म अगर आमाल नामे में आ गए तो इंसान को तबाह कर देंगे. जबकि बे सहारों का माल खाना, विरासत का माल हड़प करना, झूँठा इलज़ाम लगाना आदि गुनाह इतने खतरनाक हैं कि सारी नेकियों को खाकर इन्सान को जहन्नम में पहुँचासकते हैं. 
यह सज़ा जज़ा के सामान्य नियम हैं. इन के आधार पर अल्लाह इन्साफ के साथ फैंसला करते हैं. और विश्वास रखो कि किसी पर राई के दाने के बराबर ज़ुल्म नहीं होगा. तुम्हारे बच्चों के बारे में एक मात्र उम्मीद वाली बात जो मैं तुम्हें पहले ही बता चूका हूँ वह यह है कि तुम्हारे जैसे और सच्चे ईमान वालों की निज़ात (मुक्ति) का मामला जल्दी या देर से हो ही जाएगा. लेकिन तुम अपने बच्चों को मुझसे बेहतर जानते हो कि उनकी निजात (मुक्ति) की उम्मीद कितनी है.''
' मुझे ज़्यादा खतरा अपने बेटे का है.' मैंने जवाब दिया.
इस जवाब में मेरे सारे अंदाज़े, उम्मीदें और अंदेशे सब जमा थे. मैंने आगे कहा:
' उसे पैसे कमाने, गाड़ी, बंगले अमीर बनने का बहुत शौक था. यह शौक जिसे लग जाए, उसे किसी भी बुरे हाल में पहुँचा सकता है. उसके बाद लोग हलाल हराम और अच्छे बुरे की तमीज़ खो बैठते हैं. अगर हराम से बच भी जाएं तो घमंड, दिखावा और औरों को नीचा समझना जैसी बुराईयां इंसान को मुजरिम बना कर खुदा की अदालत में ला खड़ा करते हैं जहां से निजात (मुक्ति) बहुत मुश्किल हो जाती है.'
मेरी इस बात का जवाब आसमा ने दिया:
'' यह सारी बातें लैला मुझे बताती थी. उसने आप की कुछ किताबें भी मुझे पढ़ने के लिए दी थीं. मगर मुझे उर्दू पढ़नी नहीं आती थी. मेरी बदकिस्मती कि मेरी सारी ज़िन्दगी बेपरवाही, दुनिया परस्ती, फैशन, दिखावे और नुमाइश और घमंड में गुज़र गई. मुझ पर खुबसूरत दिखने का भूत सवार था. मैंने लाखों रुपये जेवर, कपड़े और मेकप में बर्बाद कर दिए. लेकिन गरीबों पर कभी कुछ नहीं खर्च कर सकी. कभी किया भी तो बहुत बड़ा एहसान समझा. हालांकि अल्लाह ने हमें बहुत अमीर किया था.
यही नहीं मुझे जब गुस्सा आता था तो मैं उसे कमज़ोर लोगों पर उतारती थी. शरीर को छुपाने वाले कपड़े पहनना मुझे गरीबी की निशानी लगता था. चुगली करना, बुराई करना, लोगों में ऐब ढूँढना मेरे लिए मामूली बातें थीं. यह मामूली बातें आज इतना बड़ा रोग बन जाएंगी मुझे नहीं मालूम था. मुझे नहीं मालूम था.''
यह कह कर एक बार फिर वह फूट फूट कर रोने लगी. लैला अफ़सोस के लहजे में बोली:
'' इसके अम्मी अब्बू बहुत बुरे हाल में हम से मिले हैं. उनके साथ पता नहीं क्या होगा.''
फिर वह मुझे देख कर बोली:
'' अब्बू मेरे साथ क्या होगा?'' यह कहते हुए उसकी आंखों से आंसू जारी थे.
'' बेटा इंतज़ार करो. उम्मीद है कि ज्यादा देर न गुज़रगी  कि हिसाब किताब शुरू हो जाएगा. इस समय मुझे अल्लाह की रहमत से उम्मीद है कि इतनी सख्ती उठाने के बाद वह तुम्हारे वह गुनाह माफ़ कर देगा जो तुमने दुनिया में मामूली समझ कर किया थे.'
'' काश अब्बू! काश अब्बू मैं आपका रास्ता अपनाती. आपने मुझे बहुत समझाया था कि 'ईमान' ज़ुबान से कलमा पढ़ लेने का नाम नहीं, खुदा की हस्ती को अपनी ज़िन्दगी बना लेने का नाम है. रस्मी सी इबादत (औपचारिक पूजा) खुदा को नही चाहिए. उसे दिल की इमानदारी चाहिए. उसे कुछ बे रूह सजदों की जरूरत नहीं, एक सच्चा बंदा (भक्त) दास चाहिए. ईमान मेरी ज़िन्दगी में तो था, लेकिन वह मेरे किरदार (व्यक्ति) में शामिल नहीं हो सका. मैंने आपके कहने से नमाज़े तो पढ़ी, लेकिन खुदा की याद मेरी ज़िन्दगी नहीं बन सकी. मैंने रोज़े  तो रखे, लेकिन मुझ में सच्ची परहेज़ गारी पैदा नहीं हो सकी. ज्यादा से ज्यादा मुझे पचास साल वह सब करना पड़ता. यहां तो सदियाँ गुज़र गई  हैं गर्मी और सख्ती में परेशान घूमते घूमते.''
लैला की बात सुनकर आसमा ने उसके कंधे पर हाथ रखकर सिसकते हुए कहा:
'' बहन तुम मुझ से तो अच्छी ही हो. मैंने तो ज़िन्दगी में नमाज़ रोजा कुछ भी नहीं किया. बुरी आदतें, दिखावा,नुमाइश,बदतमीजी, घमंड और लोगों के हक मारना वगैरह गुनाह इसके अलावा हैं. मेरा क्या होगा. मुझे तो सिवाय जहन्नम के कोई नतीजा (परिणाम) नज़र नहीं आता.''
यह कहकर वह चीख चीख कर रोने लगी.
...............
इन दोनों की बातों से मेरा दिल कट रहा था. मुझमें अब उनके साथ रहने की हिम्मत नहीं रही थी. सालेह को मेरी हालत का अंदाज़ा हो चुका था. उसने उन दोनों से संबोधित होकर कहा:
'' अब्दुल्ला को अब यहां से विदा होना होगा. आप दोनों यहाँ बैठ कर अल्लाह के फैसले का इंतजार करें. ज्यादा देर न गुज़रेगी कि हिसाब किताब शुरू हो जाएगा.''
यह कहकर वह मेरा हाथ पकड़ कर मुझे आगे ले गया. मैं चाहता था कि जाते जाते लैला को तसल्ली दे दूं. मैं वापस मुड़ा तो यह देखकर हैरान रह गया कि पीछे का मंज़र (दृश्य) बदल गया है. हम किसी और जगह खड़े थे.
'' मुझे जरा तेजी से तुम्हें वहां से हटाना पड़ा. वरना तुम्हें और दुख होता. क्या तुम अपने बेटे से मिलना चाहोगे?''
' नहीं. में कुछ और देखने की ताकत नहीं रखता.' मैंने दो टूक कह दिया.
मेरा दिल अफ़सोस के गहरे समुद्र में डूब चुका था. मेरा बस नहीं चल रहा था कि मैं किसी तरह वापस दुनिया में लोटूं और लैला को सुधारने को अपनी ज़िन्दगी का सबसे बड़ा मकसद बना लूं. मुझे एहसास हुआ कि यह मुमकिन नहीं. फिर एक भयानक अंदेशे के एक ज़हरीले साँप ने मेरे सामने सर उठाया. मैंने सालेह से कहा:
' सालेह! कहीं लैला की इस हालत का जुम्मेदार मैं तो नहीं?'
'' नहीं ऐसा नहीं है. देखो! औलाद तो नूह अलैहिस्सलाम जैसे पैगम्बर की भी खुदा की पकड़ की चपेट में आई है. मगर जिम्मेदारी उनकी नहीं थी. इंसान का फ़र्ज़ (कर्तव्य) सिर्फ सही बात दूसरों तक पहुंचाना है. क़ुबूल करने न करने का फैंसला हमेशा दूसरे करते हैं. तुम्हारी बेटी लैला ने अपने फैसले खुद किए थे. इसलिए तुम उसकी तकलीफ के जिम्मेदार नहीं हो.''
मुझे लगा जैसे मुझ पर से एक बोझ उतर गया है. लेकिन अगले ही पल मुझे एक और दहशतनाक अंदेशा हुआ. अगर मेरी बेटी की वजह से मेरी पकड़ की नौबत आई तो क्या होगा? यही ना कि बिना किसी हिचकिचाहट के अपनी प्यारी बेटी को जहन्नम में झोंक कर मैं अपनी जान बचाना पसंद करूंगा. क्योंकि आज के दिन का अजाब इतना सख्त है कि सारे रिश्ते और संबंध उस के आगे हीच हैं.
............................................................................................................................जारी है....

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