मंगलवार, 10 जुलाई 2012

भाग १.० क़यामत का दिन


ज़मीन के सीने पर एक सिलवट भी बाकि न रही थी- दरया और पहाड़, खाई और टीले, समंदर और जंगल कुछ भी नहीं, धरती का हर नक्शा मिट चुका था हर ऊंचाई बराबर हो चुकी थी- दूर तक बस एक चटयल मैदान था और ऊपर आग उगलता आसमान- मगर आज इस आसमान का रंग नीला न था , ये लाल हो गया था, ये लाली सूरज की  दहकती आग के बजाए जहन्नम के उन भड़कते शोलों का एक असर थी जो किसी अजदहे की तराह मुंह खोले बार बार आसमान की तरफ लपकते और सूरज को अपनी गिरिफ्त में लेने की कोशिश करते, जहन्नमी शोलों की लपक का ये खोफनाक मंज़र और भड़कती आग के दहकने की आवाज़ दिलों को लरज़ा रही थी !
लरजते हुए ये दिल मुजरिमों के दिल थे ये बेपर्वाहों, घमण्डियों, जालिमों, कातिलों, और फसाद करने वालों के दिल थे-
ये ज़मीन के फिरोनों और कुव्वत वालों के दिल थे, ये अपने दौर और अपने ज़माने में खुद ही को खुदा समझने वालों के दिल थे-
ये दिल उन लोगों के थे जो गुज़री हुई दुन्याँ में ऐसे जिए जैसे मरना न था, मगर जब मरे तो ऐसे हो गए जैसे कभी धरती पर बसे ही न थे, ये खुदा की बादशाही में खुदा को नज़र अंदाज़ करके जीने वालों के दिल थे, ये खुदा की मखलूक (जिस को पैदा किया) पर अपनी खुदाई कायम करने वालों के दिल थे, ये इंसानों के दर्द और खुदा की याद से खली दिल थे,
तो आज वो दिन शुरू हो गया जब इन बेपरवाह दिलों को जहन्नम के भड़कते शोलों और ख़त्म न होने वाले अज़ाबों का निवाला बनजाना था,
वो अज़ाब जो अपनी भूक मिटाने के लिए पत्थरों और इन पत्थर दिलों के इन्तिज़ार में थे, आज इन अज़ाबों के लिए तो ईद का दिन था के उनकी जनम से भड़की भूक मिटने वाली थी, उन अज़ाबों के डर से खुदा के ये मुजरिम किसी पनाह की तलाश में भागते फिर रहे थे, मगर इस मैदान (मैदान-ए-हष्र) में कैसी पनाह और कौन सी राहत ?
हर जगह आफत मुसीबत और सख्ती थी, और उन पत्थर दिल मुजरिमों की खत्म न होने वाली नहूसत थी,
पता नहीं इस हाल में कितने बरस कितनी सदयाँ गुज़र चुकी हैं,
ये हष्र का मैदान और क़यामत का का दिन है,
नई ज़िन्दगी शुरू हो चुकी है, कभी खत्म न होने के लिए, मैं भी हष्र के इस मैदान में गुम सुम खड़ा खाली आखों से ये सब कुछ देख रहा हूँ, मेरे सामने अनगिनत लोग भागते, दौड़ते, गिरते पड़ते चल रहे हैं, फिज़ा में शोलों के भड़कने की आवाज़ के साथ लोगों के चीखने, चिल्लाने, रोने, पीटने की आवाजें गूंज रहीं हैं, लोग एक दूसरे को बुरा भला कह रहे हैं, गालियाँ दे रहे हैं, लड़ झगड़ रहे हैं, एक दूसरे पर इलज़ाम लगा रहे हैं, आपस में गुत्तम गुत्ता हैं,
कोई सर पकड़े बैठा है, कोई मुहँ पर मिट्टी मल रहा है, कोई चहरा छुपा रहा है, कोई शर्मिंदगी उठा रहा है, 
कोई पत्थरों से सर टकरा रहा है, कोई सीना पीट रहा है, कोई आपने माँ बाप, बीवी बच्चों,
 दोस्तों और लीडरों को अपनी इस हालत का जुम्मेदार ठहरा कर उन पर बरस रहा है,
उन सब का मसला एक ही है क़यामत का दिन आ गया है और उनके पास इस दिन की कोई तैय्यारी नहीं, अब ये किसी दूसरे को इलज़ाम दें या या खुद को बुरा भला कहें, रोएँ छिल्लाएँ या सब्र करके बैठ जाएँ अब कुछ नहीं बदल सकता, अब तो सिर्फ इन्तेज़ार है काएनात के मालिक के ज़ाहिर होने का, जिस के बाद हिसाब किताब शुरू होगा और इन्साफ के साथ हर इंसान की क़िस्मत का फैंसला हो जाएगा !
एकदम से ही  एक आदमी मेरे पास चला आया :
''हाए इस से तो मौत अच्छी थी, इस से तो कब्र अच्छी थी!''
मैं आस पास की दुन्याँ से कट चूका था के ये चींख जैसी आवाज़ मुझे सोच की वादियों से हकीकत के इस मैदान में ले आई जहाँ मैं बहुत देर से गुम सुम खड़ा था,
पल भर में मेरे दिमाग में शुरू से आखिर तक सब कुछ ताज़ा हो गया, अपनी कहानी, दुन्याँ  की कहानी, ज़िन्दगी की कहानी --- सब फिल्म की रील की तरह मेरे दिमाग में घूमने लगी !
इस भयानक दिन के शुरू में मैं अपने घर में था, पर ये घर मेरा दुनयावी घर नहीं था बल्के ज़ाहिर नज़र से देखने वालों के लिए ये क़ब्र का अँधेरा घड़ा था, मगर दरअसल ये आखिरत की असल दुन्याँ का पहला दरवाज़ा और बज़र्ख (दुन्याँ और आखिरत के बीच) की दुन्याँ थी, वो दुन्याँ जिसमे मेरे लिए ख़तम न होने वाली राहत थी, उस दिन मुझ से मेरा हमदम मेरा प्यारा दोस्त ''सालेह'' मिलने आया हुआ था - सालेह वो फ़रिश्ता था जो दुन्याँ की ज़िन्दगी में मेरे दाएं हाथ पर रहा- उस का साथ मौत के बाद की ज़िन्दगी में मेरे लिए हमेशा सुकून की चीज़ रही थी और आज भी हमेशा की तरहा हमारी मजेदार बातें चल रही थीं, बात चीत के दौरान मैंने उससे पुछा ;
'यार ये बताओ की तुम्हारी ड्यूटी मेरे साथ क्यूँ लगाई गई है ?'
''बात ये है अब्दुल्लाह की मैं और मेरा साथी दुन्याँ में तुम्हारे साथ ड्यूटी किया करते थे- वो तुम्हारी बुराइयाँ और मैं नेकियाँ लिखता था- तुम मुझे दो मिनट चैन से ना बैठने देते थे- कभी अल्लाह का ज़िक्र, कभी उसकी याद में आँसू, कभी इंसानों के लिए दुआ, कभी नमाज़, कभी अल्लाह की राह में खर्च, कभी लोगों की सेवा--- कुछ और नहीं तो तुम्हारे चहरे पर हर समय दूसरों के लिए मुस्कराहट रहती थी- इसलिए में हर समय कुछ ना कुछ लिखता ही रहता था- तुमने मुझे थका कर मार ही डाला था, लेकिन हम फ़रिश्ते तुम इन्सानों की तरह तो होते नहीं के बुराई का बदला बुराई से दें- इसलिए तुम्हारी इस बुराई के जवाब में भी देखलो के मैं तुम्हारे साथ हूँ और तुम्हारा ख्याल रखता हूँ-'' सालेह ने बड़ी गम्भीरता से मेरी बात का जवाब दिया,
मैंने उसकी बात के जवाब में उसी गंभीरता से कहा: 'तुम से ज्यादा बुराई मैंने बाएँ हाथ वाले के साथ की थी- वो मेरा गुनाह लिखता, मगर मैं उसके बाद फ़ौरन तौबा कर लेता, फिर वो बेचारा अपने सरे लिखे लिखाए को बैठ कर मिटाता और मुझे बुरा भला कहता के तुम ने मिटवाना ही था तो लिखवाया क्यूँ था, आखिर कार उसने तंग आकर अल्लाह से दुआ की के इस आदमी से मेरी जान छुड़ाएं, इस लिए मौत के बाद से अब तुम ही मेरे साथ रहते हो'
ये सुन कर सालेह खूब हँसा , फिर कहने लगा:
''फ़िक्र न करो हिसाब किताब के समय वो फिर आजाए गा, कानून के मुताबिक हम दोनों मिलकर ही तुम्हें अल्लाह के सामने पेश करेंगे''
ये कहते कहते उसके चहरे पर गंभीरता दिखाई देने लगी , वो बोलते बोलते चुप हुआ और सर झुका कर एक घहरी ख़ामोशी में डूब गया, मैंने उसका ये रूप आज तक नहीं देखा था, कुछ देर बाद उसने सर उठाया तो उसके चहरे पर हमेशा रहने वाली शोखी और मुस्कराहट कहीं दूर चली गई थी और उसकी जगह दह्शत और खौफ के सायों ने ले ली थी, मुझे देखकर वो मुस्कुराने की नाकाम कोशिश करते हुए बोला: 
''अब्दुल्लाह! इस्राफील (क़यामत का फ़रिश्ता) को हुक्म मिल चुका है, अल्लाह का वादा पूरा होने का समय आ गया है, ज़मीन पर बसने वोलों को दी हुई मोहलत खत्म हो गई है, तुम कुछ देर और बज्रख (दुन्याँ और आखिरत के बीच की दुन्याँ) के इस परदे में अल्लाह की रहमतों के साए में रहोगे, मगर अब मैं जा रहा हूँ, अब मैं तुम से उस वक़्त मिलूँगा जब ज़िन्दगी शुरू होगी, तुम्हारी आँख खुलेगी तो क़यामत का दिन शुरू हो चूका होगा, मैं उस दिन तुमसे दौबारा मिलूँगा''
ज़िन्दगी के हंगामे जारी थे, बाजारों में वही चहल पहल और गहमा गहमी थी,न्यूयार्क, लॉस अन्जिलिस, लन्दन, पैरिस, शंघाई, दिल्ली, मोस्को, कराची हर जगह रौनक मेले लगे हुए थे, रात को दिन कर देने वाली रोशनियों में 20,20 क्रिकेट मैच और फुटबॉल वर्ल्ड कप के मुकाबले, उनको देखते और तालियाँ बजाते दर्शक, नाईट कलब और बार में शराब पीते और नशे में नाचते लोग, होलीवुड और बोलीवुड की एक्शन और थिलर फिल्मों में एक्ट्रेस के जलवे और उन जलवों के शोकीन दर्शक फिल्मों, ड्रामों, इस्टेज़, टीवी, और फैशन शोज़ में थिरकती मटकती अपने जिस्म की नुमाइश करती मोडल्स और एक्ट्रेस और उन नुमाइश से अपने अकाउंट भरते बिजनिस मैन, नए दौर के नई दुन्याँ को जीत लेने वाले, मल्टी नेशनल कंपनियों के मालिक और उन को अपना ज्ञान और प्रतिभा बेंच कर अपने भविष्य के सपने बुनने वाले नवजवान, मिडिया की चमक धमक, पत्रकारिता के मिर्च मसाले, सियासत के बाज़ार के कम न होने वाले धोके फरेब के हंगामे, बाजारों में घूमते और खरीदारी करते मर्द और औरतें, और उनको अपनी और आकर्षित करती दुकाने और दुरानदार, अमीरों की महफ़िलों में गूँजती गाने बजने की आवाज़े, गरीबों के झोपड़ों में भूक और मजबूरी, शादियों की महफ़िलों में बजते खुशयों ने नगमे, ईश्वर के नाम पर अपने फायदों की हिफाज़त करते धर्म के ढेकेदार, गरीबों और  उनके मसलों से हमेशा की तरह बेपरवाह बड़े लोग, रिश्वत की नापक़ कमाई से अपनी जेबें भरते सरकारी लोग, 
जनता का शोषण करते नेता और दुन्याँ पर अपना कब्ज़ा रखने की साजिशें करती बड़ी ताकतें, सब अपने अपने कामो में मगन थे,
ज़मीन पर रहने वाले जो हमेशा से करते आए थे वही सब कर रहे थे, ज़ुल्म और फसाद की दस्ताने, धोका और फरेब की कहानियां, एक दूसरे से आगे बढ़ने की दौड़, एक दूसरे से बेपरवाही और धोके, अल्लाह और आखिरत को भूलजाना, सियासी हंगामे, कारोबार के लिए भाग दौड़, मज़हबी झगड़े, फिरकों की लड़ाई--- हर चीज़ हमेशा की तरह जारी थी, पैग़म्बर तो सदयों पहले आने बन्द हो गए थे, एग्रीकल्चर ऐज इंडस्ट्रीएल ऐज से बदली और इंडस्ट्रीएल ऐज इन्फोर्मेशन ऐज से, मगर इंसानी रवय्ये नहीं बदले, उन के गम भी नहीं बदले, वही कारोबार और रोज़गार की परेशनियाँ, वही इश्क और मुहब्बत की नाकामयां, वही मौत और बिमारी के मसले, उस वक़्त भी इंसानों के यहाँ हर गम था सिवाए आखिरत के गम के, हर डर था सिवाए अल्लाह के डर के, आसमान की आँख ये देख रही थी के खुदा की ज़मीन को ज़ुल्म और फसाद से भर देने वाला इन्सान अब धरती के लिए उसका बोझ बरदाश्त से बहार हो चुका है, तो इन्सान को बार बार हिलाया गया, आखरी नबी की भविषवाणी पूरी होने लगीं, नंगे पाओं बकरियां चराने वाले अरबों ने दुन्याँ की सबसे ऊँची बिल्डिंगें बनाली, मगर इंसानियत होश में नहीं आई,
नूह के तीसरे बेटे याफ़िस की औलाद यानि याजूज माजूज की नस्ल दुन्याँ के फाटकों की मालिक बन गई, अजमत की हर बुलंदी से यही याजूज माजूज दूसरी दुन्याँ पर यलगार करने लगे, ब्रिटेन, रूस, अमेरिका, और चीन--- एक के बाद एक दुन्याँ की हुकूमत की गददी पर बैठते गए, आसमानी किताबों की सारी भविष्यवाणी पूरी हो गई, मगर इन्सानयत फिर भी होश में न आई, सुनामी आए, सेलाब आए, ज़लज़ले आए, मगर इन्सानयत बेपरवाह ही रही, अल्लाह ने इन्फोर्मेशन टेक्नोलोजी पैदा कर दी, उसके गैर अरबी बन्दों ने नबी-ऐ-अरबी के पैगाम को उठाया और इंसानियत पर हुज्जत (अपनी बात को पूरी तरहे साबित कर देना) पूरी करदी, मगर इन्सान फिर भी न संभले, क़यामत से पहले क़यामत के नज़ारे दिखा कर इन्सानियत को झिंझोड़ दिया गया, मगर लोगों के रवय्यों में कोई बदलाव नहीं हुआ, सो जिसे आखिर कार आना था वो आ गई, इस्राफील ने खुदा का हुक्म सुना और सूर हाथ में उठा लिया, देखते ही देखते क़यामत आ गई !
सूरज की दिशा बदल दी गई, तारे बे नूर होंने लगे, हिमालय जैसे पहाड़ हवा में रुई की तरह उड़ने लगे, समन्दरों ने पहाड़ जितनी ऊँची लहरे उठाना शुरू करदी--- मैदान समंदर बन गए, ज़मीन ने अपने ज्वालामुखी बहार उगल दिये, वादियों में आग के दरया बहने लगे, धरती ने अपने सारे भूकम्प बहार निकाल दिये, ज़मीन उलट पुलट हो गई, शहर खंडरों में बदल गए, इमारते राख होने लगीं, आबादिय कब्रिस्तानों जैसी होने लगी,
कमज़ोर इन्सान की भला हैसियत ही क्या थी, वो जो कुछ देर पहले नए घर बनाने की योजना बना रहे थे, नई दुकान नए कारोबार के बारे में सोच रहे थे, शादी और निकाह की उम्मीदें कर रहे थे, नई कार नए कपड़ों की खरीदारी कर रहे थे, औलाद के आने वाले कल की सोच में गुम थे,--- अपने सारे इरादे सारी महत्वाकांक्षा भूल गए, माँएं अपने दूध पीते बच्चे छोड़ कर भागीं, घर्भवती औरतों के गर्भ गिर गए, ताकतवर कमजोरों को कुचलते और नवजवान बूढों को छोड़ते भागने लगे, सोना चांदी बिखरे पड़े हैं, नोट हवा में उड़ रहे हैं, कीमती सामान बिखरा पड़ा है, मगर कोई लेने वाला समेटने वाला नहीं, घर---कारोबार---रिश्तेदार---दोस्त सब बे कीमत हो चुके हैं, हर जान बस अपनी फ़िक्र में है,
आज इन्सान सब को भूल चुका है सिर्फ एक ईश्वर को पुकार रहा है,मगर कोई जवाब नहीं आता, शिर्क (एक ईश्वर के साझी बनाना) करने वाले भी और नास्तिक भी सब खुदा की दुहाई दे रहे हैं, मगर इस मुसीबत से कोई पनाह नज़र नहीं आती, बर्बादी के साए पीछा नहीं छोड़ रहे, मौत हर जगह ताण्डव कर रही है, मुसीबत ने हर तरफ से घेर लिया है, आखिर कार ज़िन्दगी मौत से हार गई, ज़िन्दगी ख़त्म हो गई---मगर इस लिए के ज़िन्दगी को अब शुरू होना था !
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हवा की तेज़ सर सराहत मेरे कानों में आने लगी थी, बारिश की कुछ बूँदें मेरे चहरे पर गिरी, मुझे होश आने लगा, मैं बहुत देर तक उठने की कोशिश करता रहा, मगर मेरा दिमाग अभी पूरी तरह होश में नहीं आया था, काफी देर मैं इसी हाल में रहा, अचानक मेरे कानों में एक जानी पहचानी आवाज़ आई:
''अब्दुल्लाह ! उठो जल्दी करो-'' ये मेरे दोस्त मेरे कब्र के साथी सालेह की आवाज़ थी, उसकी आवाज़ ने मुझ पर जादू कर दिया और मैं एक दम से उठ खड़ा हुआ,
 'मैं कहाँ हूँ ?' बेचैनी में मेरा ये पहला सवाल था,
''तुम भूल गए, मैंने तुम से क्या कहा था, क़यामत का दिन शुरू हो गया है, इस्राफील (क़यामत का फरिश्ता) दूसरा सूर फूँक रहे हैं, इस वक़्त उस की आवाज़ बहुत हल्की है, अभी उस की आवाज़ से सिर्फ वो लोग उठ रहे हैं जो पिछली ज़िन्दगी में खुदा के फरमाबरदारों में से थे-'' उसने मेरा कन्धा थपकते हुए कहा,
'और बाकि लोग ?' मैंने उसकी बात काट कर कहा,
''थोड़ी ही देर में इस्राफील की आवाज़ तेज़ होती चली जाएगी और उसमे सख्ती आ जाएगी, फिर ये आवाज़ एक धमाके में बदल जाएगी, उस समय बाकि सब लोग भी उठ जाएँगे, मगर वो उठना बहुत मुसीबत और तकलीफ का उठाना होगा, हमें उससे पहले ही यहाँ से चले जाना है'' उसने तेज़ी से जवाब  दिया,
'मगर कहाँ ?' ये सवाल मेरी आँखों से झलका ही था के सालेह ने उसे पकड़ लिया,
''तुम खुशनसीब हो अब्दुल्लाह ! हम अर्श की तरफ जा रहे हैं'' वो तेज़ी से कदम उठाता हुआ बोला, फिर और ज्यादा खोल कर बात बताते हुए उसने कहा:
''इस वक़्त सिर्फ अम्बिया (नबी का बहुवचन), शहीद और नेक लोग ही अपनी कब्रों से बहार निकले हैं, ये वो लोग हैं जिनकी कामयाबी का फैंसला दुन्याँ ही में हो गया था, ये वो लोग हैं जिन्होंने खुदा को बिन देखे मान लिया था, उसे छुए बगैर पा लिया था और उस की आवाज़ उस वक़्त सुनली थी जब कान उस की नहीं सुनते थे, ये लोग उसके रसूलों पर ईमान लाए और उन की मदद की और उनकी बात मानी, उनकी वफादारी अपने धर्म के बड़े लोगों, अपने लीडरों, अपने फिरके के बड़े आलिमों और अपने बाप दादा के अकीदों (मान्नेताओं) से ना थी बल्के सिर्फ और सिर्फ एक खुदा और उस के रसूलों से थी, उन्होंने एक खुदा की इबादत के लिए हर दुःख झेला, हर ताना सुना और हर ज़ुल्म बरदाश्त किया, उन्होंने बहतरीन अख्लाक़ और बहतरीन किरदार (उच्च नैतिकता उच्च गुणवत्ता) को अपनी ज़िन्दगी बनाया, खुदा से मुहब्बत खुदा की मखलूक पर रहम के साथ ज़िन्दगी गुज़री, अब्दुल्लाह ! आज उन लोगों के अच्छे बदले का वक्त है, और ये है उनके बदले की शुरुवात-''
सालेह की बातें सुनते हुए मेरे चहरे से हेरात और उसके चहरे से ख़ुशी टपक रही थी,
'मगर मैं तो जन्नत में था और----' सालेह ने हँसते हुए मेरी बात काट कर कहा :
''शहजादे वो बज़र्ख का जमाना था, सपने की ज़िन्दगी थी, असल ज़िन्दगी तो अब शुरू हुई है, जन्नत तो अब मिलेगी-, वैसे वो भी हकीक़त ही थी, देखलो तुम्हारी और मेरी दोस्ती वहीँ शुरू हुई थी''
 मैं अपना सर झटक कर उसे देखने लगा, कुछ कुछ मेरी समझ में आ रहा था और बहुत कुछ समझना अभी बाकि था, मगर उस समय मैंने अपने आप को सालेह के हवाले करना ज्यादा बेहतर समझा,
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1 टिप्पणी:

  1. आपने हमारे ब्लॉग वेड कुरआन की पोस्ट को पढ़ा और पसंद का इज़हार किया.
    शुक्रिया.

    हम आपका ब्लॉग फोलो कर रहे हैं .
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    एक दान-पर्व है ईद-उल-फितर Eid 2012
    http://vedquran.blogspot.in/2012/08/eid-2012.html

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