हज़रत नूह (मनु) अर्श इलाही के दाईं ओर हाथ बांधे खड़े थे. हम सभी लोग हज़रत अबू बकर के नेतृत्व में उनके पीछे जाकर खड़े हो गए. सामने की ओर इंसानों का नज़र की हद तक फैला हुआ एक समुद्र सा था. इनमें से हर व्यक्ति बदहाल और परेशान नजर आता था. यह लोग सिर झुकाए खड़े थे. उनके चेहरे डर के मारे काले पड़ गए थे. फिज़ा में हल्की सी फुसफुसाहट के सिवा कोई और आवाज न थी. यही हज़रत नूह की वह उम्मत थी जो दरअसल उनकी औलाद में जन्मे लोग थे.
कुछ देर में एक आवाज़ उठी:
'' नूह के गवाह बारगाह इलाही में पेश हों.''
मेरा ख्याल था कि अब अबू बक्र आगे बढ़ कर कुछ कहेंगे. लेकिन उस समय मैंने देखा कि पीछे से नबी करीम तशरीफ़ लाये और अर्श इलाही के सामने खड़े हो गए.
कहा गया:
'' कहो ऐ मोहम्मद! क्या कहना चाहते हो?''
रसूल अल्लाह ने बारगाह इलाही में अर्ज़ किया:
'' परवर दिगार तूने मुझे नबुव्वत दी और अपना कलाम (कुरान) मुझ पर नाज़िल किया. इस किताब में तू ने मुझे बताया कि नूह भी वही दीन (धर्म) तौहीद (एकेश्वरवाद) लेकर आए थे जो तू मुझे दे रहा है. इसी दीन की गवाही मैंने अपनी उम्मत पर दी और अब ये लोग तेरे सामने हैं ताकि यह गवाही दें कि इसी दीन को उन्होंने नूह की औलाद तक बिना कम और ज्यादा किये पहुंचा दिया था.''
इरशाद हुआ:
'' तुमने सच कहा. अपने उम्मत्यों को पेश करो.''
इस पर हज़रत अबू बक्र ने आगे कदम बढ़ाने शुरू किए और हज़रत नूह के बराबर में जाकर खड़े हो गए. हम सब भी साथ साथ उनके पीछे जाकर ठहर गए.
आवाज़ आई:
'' तुम कौन हो?''
हज़रत अबू बक्र ने अपना परिचय दिया और फिर हम में से हर व्यक्ति का नाम और ज़माना बता कर उसका परिचय कराया. फिर अर्ज़ किया कि हम उम्मते मुहम्मद्या में से हैं, हम पर आप के आखरी नबी मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने सच की गवाही दी और यह बताया कि नूह भी इसी धर्म को लेकर आए थे. नूह और मुहम्मद का यही धर्म हम ने दुन्याँ की सारी कौमों को पहुँचाया. इन लोगों को भी हमने सच पहुंचा दिया था जो आपके सामने नूह की उम्मत के रूप में मौजूद हैं.''
इस गवाही के बाद नूह की उम्मत के लिए फरार के रास्ते बंद हो गए. यह बात साफ हो गई कि नूह का धर्म वही था जो मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम का था और उम्मते मुहम्मद्या ने इस धर्म को दुनिया तक पहुंचा दिया था. अब नूह की उम्मत का हिसाब इसी गवाही की रोशनी में होना था. हमारा काम खत्म हो चुका था. इसलिए हम वापसी के लिए रवाना हो गए.
...............
हमारा काफिला वापसी के सफ़र पर था. इस बार क़ाफ़िले के सरदार खुद नबी थे. हमारा काफिला फरिश्तों की देखरेख में हष्र के मैदान से गुज़रता हुआ होज़े कौसर की ओर जा रहा था. मैं अपमान के अंदेशे से थोड़ा पीछे ही चल रहा था . अचानक किसी ने मेरे कंधे पर हाथ रख कर कहा:
'' भाई तुम कहाँ भागने की कोशिश कर रहे थे.''
मैंने पीछे मुड़कर देखा तो सालेह मुस्कुरा रहा था. मैं लज्जित होकर चुप रहा. वह हँसते हुए बोला:
'' खुदा का शुक्र करो कि तुम्हारे क़ाफ़िले के सरदार अबू बक्र थे. उनकी जगह हज़रात उमर होते तो तुम्हें दो चार दुर्रे तो जरूर मारते.''
उसकी बात सुन कर मैं भी हंसने लगा. कुछ देर के बाद मैंने कहा:
' असल बात अबू बक्र या उमर की नहीं. उमर भी वही करते जो अबू बक्र ने किया. क्योंकि उन्हें भेजने वाली एक ही हस्ती थी, उस रब करीम की जो सारी ज़िंदगी मेरी बुराइयों को छुपाता रहा है.'
फिर एक डर मेरे मन में पैदा हुआ, मैंने सालेह से पूछा:
' तुम्हें मेरे बारे में कैसे पता चला. क्या सब लोगों को यह बात मालूम हो गई?'
'' नहीं नहीं ... अबू बक्र बड़े सब्र वाले व्यक्ति हैं. उन्होंने किसी को नहीं बताया. रहा मैं तो अल्लाह तआला ने मेरे ही ज़रये हज़रत अबू बक्र को तुम्हारे बारे में पैगाम भेजा था. इसलिए मुझे मालूम हो गया. वैसे तुमने सच कहा. जानते हो अल्लाह ने क्या कह कर मुझे अबू बक्र के पास भेजा था?''
मेरे जवाब का इंतज़ार किए बिना वह बोला:
''मेरे बंदे को संभालो. वह इन्कसारी (विनम्रता) में अपनी जिम्मेदारी को भोले जा रहा है.''
शर्मिंदगी और एहसान मंदी के मिले जुले अहसासों के साथ मैंने अपना सर झुका लिया. कुछ देर बाद मैंने सालेह से पूछा:
' यहां हष्र के मामले कैसे चल रहे हैं?'
'' अलग अलग नबी की अपनी उम्मतों के बारे में गवाही देने का काम (प्रक्रिया) जारी है. हर नबी और रसूल अपनी उम्मत के बारे में यह गवाही दे रहा है कि उसने अपनी उम्मत तक रब (प्रभु) का पैगाम (संदेश) पहुंचा दिया था. जिसके बाद हर वह आदमी जिस का अमल (कर्म) उस शिक्षा के अनुसार होता है, उसकी खताएं दरगुज़र करके उसकी जीत का ऐलान कर दिया जाता है.'' सालेह ने जवाब दिया.
मुझे याद आ गया. सालेह ने बताया था कि हिसाब किताब के इस दौर के बाद सामान्य हिसाब किताब शुरू होगा. मुझे आस बंध गई कि शायद इस मरहले (चरण) में मेरे बेटे जमशैद की निजात (मुक्ति) का फैसला हो जाए, लेकिन जाहिर है मेरे हाथ में कुछ नहीं था . मैंने सालेह से पूछा:
' यहां क्या हालात (स्थिति) है?'
'' हालात का न पूछो. किसी का कोई अच्छा हाल नहीं है. उस पर यह के किसी को नहीं पता कि उसके साथ क्या होगा.''
हम दोनों बातचीत करते हुए काफिले (दल) के पीछे पीछे चल रहे थे कि अचानक एक जोरदार शोर हुआ. इस शोर की वजह यह थी कि मुसलमानों का एक जनसमूह नबी करीम के नाम की दुहाई देता उनकी ओर बढ़ना चाह रहा था. लोग चीख रहे थे, रो रहे थे और गुहार कर रहे थे कि या रसूल अल्लाह हमारी मदद करें. हम आपके उम्मती हैं. जबकि फरिश्ते उन्हें मार मार कर दूर कर रहे थे. ये लोग हष्र की सख़्तियों से इतने तंग आ चुके थे कि मार खाकर भी रसूल अल्लाह की ओर बढ़ने की कोशिश किए जा रहे थे. उन्हें रसूल अल्लाह के रूप में मुश्किल से आशा की एक किरण नजर आई थी.
रहमत लिल आलमीन मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने इस घटना को देखा तो फरिश्तों के सरदार को अपने पास बुलाकर पूछा कि ये लोग तो मेरे उम्मती, मेरे नाम लेवा, मेरे जैसा कलमा पढने वाले हैं. उनके साथ यह व्यवहार क्यों हो रहा है? फरिश्ते ने बड़े अदब से जवाब दिया:
'' या रसूल अल्लाह! बेशक ये लोग आपके नाम लेवा हैं, लेकिन आप नहीं जानते कि उन लोगों ने आपके बाद आपके दीन (धर्म) में क्या क्या में नई चीजें पैदा कर दी थी.''
इस पर रसूल अल्लाह के चहरे पर कड़ी नाराजगी के आसार पैदा हुए और आपने कहा:
'' ऐसे लोगों के लिए मुझ से दूरी हो जिन्होंने मेरे बाद मेरे लाए हुए दीन को बदल डाला.''
पैगम्बर यह कहकर वापस होज़े कौसर की दिशा में मुड़ गए और काफिले (दल) के लोग भी आपके पीछे पीछे चले गए. मैं भी आगे बढ़ना चाह रहा था कि सालेह ने कहा:
'' रुको और देखो यहाँ क्या होता है.''
मैंने देखा कि फरिश्ते उन लोगों पर बुरी तरह टूट पड़े हैं. इसी बीच में मैदान के बाईं ओर से कुछ और ज्यादा फ़रिश्ते भी आ गए. उन्होंने बहुत बेरहमी से लोगों को मारना शुरू कर दिया. फरिश्ते एक कोड़ा मारते और हजारों लोग उसकी चपेट में आकर चीख़ते चिल्लाते और दूर जा गिरते. थोड़ी ही देर में होज़ के पास का इलाक़ा साफ हो गया. मार खाते और बिलबिलाते हुए ये लोग जिन्होंने इस्लाम में नई नई चीज़ें खुद से गढ़ ली थी, अपनी रुसवाई और कर्मों का मातम करते हुए वहां से विदा हो गए.
मैं सालेह के साथ खड़ा यह खतरनाक मंज़र (दृश्य) देख रहा था. मैं सोच रहा था कि वह बदनसीब हैं जिनके लिए कुरआन की हिदायत और रसूल अल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की सुन्नत (तरीका) काफी नहीं थे. इसलिए उन्होंने इसमें बढ़ा कर और परिवर्तन करके सच्चे दीन (धर्म) का चेहरा बिगाड़ने की कोशिश की. उनके पास अपनी हर गुमराही और बदअमली के बेजा तर्क मौजूद होते थे. जब कोई समझाने वाला उन्हें समझाने की कोशिश करता यह उसकी जान के दुश्मन हो जाते थे. जब उन्हें बताया जाता कि कुरआन से बाहर कोई अकीदा (आस्था) नहीं बनाया जा सकता और रसूल के तरीके के अलावा कोई और तरीका खुदा के हां क़ुबूल नहीं होगा तो यह इन बातों को बकवास समझते और अपनी गुमराहियों में मगन रहते थे. मगर इसका नतीजा उन्होंने आज भुगत लिया था. मैं यह सब सोच ही रहा था कि सालेह ने मुझसे कहा:
'' अब्दुल्लाह! मैं इंसानों को समझ नहीं सका कि आखिर हर नबी की उम्मत ने सीधी राह और ईश्वर के निर्देश साफ़ रूप से पा लेने के बाद गलत तरीकों में इतनी दिलचस्पी क्यों ली?''
' तुमने अच्छा सवाल किया है. मैं भी ज़िन्दगी भर इस मसले पर सोचता रहा हूँ. मेरे ख्याल से इस की असल वजह हद से आगे बढ़ जाना है. इंसान बड़ी जज्बाती मखलूक (भावनात्मक प्राणी) है. वह किसी को कम किसी को ज्यादा समझने का शिकार हो जाता है. नबियों का नाम लेवाओं के साथ भी यही हुआ. कुछ लोग खुद को बड़ा समझने के अपने रुझान के आधार पर नबियों की शिक्षाओं को छोड़ बैठे तो कुछ लोगों ने नबियों और नेक लोगों की मुहब्बत में हदे पार करके उनके मरने के बाद उन्ही से दुआ माँगना और पूजा करना शुरू कर दिया और खुद नए नए तरीके बना लिए.'
सालेह ने मेरी बात पर गर्दन हिलाते हुए कहा:
'' इस मुहब्बत में ज्यादा बढ़ाने और हदे पार करने का सबसे बड़ा नमूना ईसाई थे. एक तरफ तो उनके हां हज़रत मूसा की शरीयत (क़ानून) को छोड़ दिया गया. और दूसरी ओर रहबानीयत (संन्यास लेना) का तरीका बना करके ऐसी ऐसी पूजा और रियाज़ दीन (धर्म) में शामिल कर ली कि किसी आम आदमी के लिए धार्मिक बनना और पहचान के साथ जीना मुश्किल हो गया. आमाल के साथ उन्होंने ईमान को भी आखरी हद से पार बढ़ाया. उन्होंने नबियों की उम्मत होते हुए भी परमेश्वर की पत्नी और बेटा गढ़ लिया. मगर यार सच है कि तुम मुसलमान इस काम में कौन सा पीछे रहे हो.''
यह आखिरी बात उसने बहुत जोर देकर कही. मैंने बिना देर किये जवाब दिया.
'' और आज उसका नतीजा भी भुगत लिया. ईसाइयों ने भी और मुसलमानों ने भी.''
यह कहते वक़्त मेरी नज़रों में कुछ देर पहले के मंज़र (दृश्य) घूम रहे थे.
..................................................................................................जारी है....
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