हमारा पूरा परिवार होज़े कौसर के वीआईपी लाउंज में जमा था. मेरी तीनों बेटियां लैला, आरफा और आलया और दोनों बेटे अनवर और जमशैद अपनी माँ नाएमा के साथ मौजूद थे. जमशैद के आने से हमारा परिवार पूरा हो गया था. इसलिए इस बार खुशी और आनंद का जो आलम था वह बयान से बाहर था. यूँ अपने परिवार को इकट्ठा देखकर मैंने अपने पहलू में बैठे सालेह से कहा:
' अपनों में से एक भी आदमी रह जाए तो जन्नत का क्या मजा!'
मेरी बात का जवाब जमशैद ने दिया जिसकी पत्नी बच्चे और ससुराल वालों के बारे में जहन्नम का फैसला हो चुका था:
'' हां अब्बू! मुझसे ज्यादा यह कौन जान सकता है. आप बहुत खुश नसीब हैं.''
'' ये खुश नसीब इसलिए हैं कि अपने घर वालों की तरबियत (संस्कार) को उन्होंने अपना मकसद बना लिया. वह तो तुम ही नालायक थे वरना दूसरों को देखो. सबके साथ अच्छा मामला हुआ.'' इस बार नाएमा ने कहा था.
'' अम्मी आप ठीक कह रही हैं, लेकिन मुझे दुनिया में यह ख्याल रहा कि मेरे आब्बू की शिफारिश मुझे बख्शवा देगी. दरअसल मेरे ससुर के पीर साहब थे जिन पर उन्हें बहुत विश्वास था. वह हमेशा मेरे ससुर से कहते थे कि मेरा दामन पकड़े रखो. मैं क़यामत के दिन तुम्हें बख्शवा दूंगा. बस वहीं से मुझे यह अहसास हुआ कि मेरे अब्बू जैसा तो कोई हो नहीं सकता. उनकी शिफारिश मेरे काम आएगी.''
उसकी बात सुनकर मैंने कहा:
'' बेटा तुम बिल्कुल गलत समझे थे. देखो तुम्हारे ससुर को उनके पीर साहब नहीं बचा सके. हकीकत यह है कि सिफारिश के ज़रये निजात समझने की दावत न हमारे नबी ने दी और न कुरआन में यह कहीं बयान हुआ है कि उसे निजात का रास्ता समझो. कुरान तो नाज़िल ही इसलिए हुआ था कि यह बताए कि आखिरत (परलोक) के दिन निजात (मुक्ति) कैसे होगी. उसने बार बार यह स्पष्ट किया था कि क़यामत के निजात का रास्ता एक ही है यानी ईमान और नेक आमाल (अच्छे कर्म). कुरान के उतरने के समय सारे ईसाई इस गुमराही का शिकार थे कि हज़रत ईसा की सिफारिश उन्हें बख्शवा देगी जबकि मुशरिकीन (खुदा का साझी करार देने वाले) यह समझते थे कि उनके बुत ईश्वर के सामने उनकी शिफारिश करेंगे. इसलिए कुरान मजीद ने बार बार यह स्पष्ट किया कि सिफारिश कोई रास्ता नहीं है निजात का. हर इंसान को वही मिलेगा जो उसने किया होगा.'
'' लेकिन सिफारिश का उल्लेख कुरान में आया तो है और हदीसों (नबी की बातें) में भी इसका जिक्र है.'' जमशैद ने सवाल किया.
मैंने उसके सामने एक सवाल रखते हुए कहा:
' यह बताओ कि पूरे कुरान या हदीस में कहीं यह कहा गया है कि सिफारिश को एक रास्ता समझ कर उस पर भरोसा करो या उसके लिए दुआ करो.'
'' नहीं ऐसा तो कहीं नहीं कहा गया.''
जमशैद की जगह अनवर ने पूरे आत्मविश्वास से कहा तो जमशैद ने उससे मतभेद किया और कहा:
'' नहीं भाई हम तो हर अज़ान के बाद सिफारिश की दुआ करते थे.''
मैंने जमशैद की बात का जवाब दिया:
'यह तो लोगों ने पैगम्बर की बात में खुद बढ़ाया था. पैगम्बर ने सिर्फ इतना कहा था कि मेरे लिए महमूद रुतबे की दुआ करो तो तुम्हारी सिफारिश करना मुझ पर वाजिब हो जाएगा. यह नहीं कहा था कि सिफारिश के लिए दुआ किया करो या उस पर भरोसा करके नेक काम करना छोड़ दो और मजे से गुनाह करते रहो.'
सालेह ने मुझे संबोधित करते हुए कहा:
'' अब्दुल्लाह तुम रुको मैं इन्हें सिफारिश का तसव्वुर विस्तार से समझाता हूँ. देखो असल में निजात (मुक्ति) तो ईमान और नेक आमाल के बिना मुमकिन नहीं. आज अगर किसी को माफी मिल रही है तो असल में वह किसी की सिफारिश से नहीं मिल रही बल्कि खुदा के इल्म (ज्ञान), कुदरत और रहमत की वजह से मिल रही है. कुरआन में यह इस तरह बयान किया गया है कि अल्लाह बस शिर्क ही माफ नहीं करेंगे. इसके अलावा जिस गुनाह को चाहें और जिस व्यक्ति के लिए चाहें माफ़ कर सकते हैं. छोटे मोटे गुनाहों को अल्लाह तआला दुनिया की सख़्तियों और नेकियों के बिना पर माफ कर दिया करते थे, लेकिन जिन लोगों ने गुनाह का रास्ता लगातार पकडे रखा और तौबा नहीं की उन्हें तो बहरहाल इस राह पर चलने का अंजाम आज भुगतना पड़ रहा है. लेकिन इसके बाद अगर कोई बन्दा अपने गुनाहों की काफी सजा भुगत लेता है..'' सालेह ने यहीं तक बात पूरी की थी कि जमशैद ने बीच में कहा:
'' जैसे मैंने भुगती या फिर लैला ने हष्र के मैदान के शुरू के समय तकलीफ उठाई थी.''
'' बिल्कुल''
सालेह ने समर्थन करते हुए अपनी बात जारी रखी:
''मैं यह बता रहा था कि जब ईश्वर पर यकीन रखने वाला बन्दा हष्र की सख्तियाँ झेलने के नतीजे में खुदा के अपने इन्साफ के तहत निजात (उद्धार) के काबिल हो जाता है तो खुदा कुछ नेक लोगों की गवाही को जो दरअसल उसके अच्छे कामों ही की गवाही होती है, उसकी रिहाई का बहाना बना देते हैं. जैसे तुम्हारे लिए तुम्हारे माँ बाप की गवाही रिहाई का ज़रिया बन गई. या लैला रसूल अल्लाह की उस गवाही के कारण निजात पा गई जो आपने शुरू में दी थी. लेकिन देख लो इस में भी खुद का ईमान और खुद के नेक अमल की मौजूदगी जरूरी है और सज़ा तो बहरहाल इंसान को भुगतनी पड़ती है. तो यह बताओ कि सजा भुगत कर माफी का रास्ता अच्छा है या शुरू में तौबा और अच्छे काम करने का रास्ता लेना और बिना सख्ती के निजात पा जाना अच्छा है?''
'' जाहिर है कि पहला रास्ता बेहतर है, लेकिन यह बताइए कि फिर पैगम्बर की सिफारिश का सच क्या है?'' इस बार आरफा ने जवाब दिया और साथ में सालेह से एक सवाल भी कर लिया.
'' पैगम्बर की सिफारिश का मतलब अगर यह होता कि लोगों के पास कोई नेक अमल न हो तब भी पैगम्बर लोगों को बख्शवा देंगे तो कुरान नेक काम करने की कोई बात ही नहीं करता बल्कि कुरान में अल्लाह पैगम्बर की जुबां से यह कहलवा देते कि लोगों बस मुझ पर ईमान ले आओ, मैं आखिरकार तुम्हे बख्शवा दूंगा है.''
'' यह तो ईसाइयों का ईमान (विश्वास) था और इसका अंजाम उन्होंने आज भुगत लिया.'' नाएमा ने व्यंग भरे अंदाज में कहा. सालेह ने उस के समर्थन में कहा:
''हम जानते हैं कि कुरान में ऐसी कोई बात बयान नहीं हुई है. इसके विपरीत सारा ध्यान इस ओर दिलाया गया है कि ईमान लाओ और नेक आमाल करो और सीधा जन्नत में जाओ. बाकी रही हदीस (नबी की बातें) तो हदीसों में जो कुछ सिफारिश के बारे में आया है उसे अगर कुरान की रौशनी में देखा जाता जो आखिरत (परलोक) की हकीकत बताने वाली असल किताब है तो बात स्पष्ट थी.''
''वो क्या बात है?'' जमशैद ने पूछा:
''वो यही कि आज के दिन मुजरिमों ने अपने जुर्मों की पूरी पूरी सज़ा भुगती है. इसके बाद पैगम्बर की दुआ वो वजह बन गई जिसकी वजह से लोगों की निजात (मुक्ति) की उम्मीद पैदा हुई. यह पहली बार तब हुआ था जब पैगम्बर ने अल्लाह से यह दुआ की थी कि लोगों का हिसाब किताब शुरू हो. इसके नतीजे में लोगों को इंतजार की मुश्किल से छुटकारा मिला. दूसरी बार पैगम्बर और दुसरे सभी नबियों ने अपनी अपनी उम्मत को दी गई अपनी शिक्षा की गवाही दी . यह गवाही उन सब लोगों के लिए निजात (मुक्ति) का कारण बन गई जिनके आमाल (कर्म) कुल मिला कर ज़्यादातर उनकी शिक्षा के अनुसार थे.
'' जैसे के मैं.'' लैला बोली.
'' हां जैसे के तुम. और अब तीसरी बार हुज़ूर उस समय दुआ करेंगे जब कुछ लोगों का मामला टाल दिया जाएगा. उनका हिसाब किताब आखिर समय तक नहीं किया जाएगा और वह अपने गुनाहों की सज़ा में हष्र के मैदान में परेशान होते रहेंगे. पैगम्बर उन के लिए बार बार दुआ करेंगे. इसके बाद जब खुदा की हिक़मत (नीति) और इल्म (ज्ञान) के तहत उनका फैसला करना उचित होगा तब पैगम्बर को इजाज़त दी जाएगी कि वह उनके पक्ष में कोई बात करें. फिर पैगम्बर की दरख्वास्त (आवेदन) के नतीजे में उनका हिसाब किताब होगा जिसके बाद जाकर उनकी निजात (मुक्ति) की उम्मीद पैदा होगी. और यह होगा भी सबसे आखिर में जब ऐसे लोग अपने सभी गुनाहों की काफी सज़ा भुगत चुके होंगे और एक खुदा को मानने और अपने अच्छे कामों की बिना पर निजात के लायक हो जाएंगे.''
'' मेरा एक सवाल है.'' अनवर ने सालेह को संबोधित करके कहा.
''वह यह कि अगर सब लोग सज़ा भुगत कर ही माफी के हक़दार बन रहे हैं तो इसमें अल्लाह की रहमत कहाँ से आ गई. यह तो बस इन्साफ हो रहा है ना.''
'' बहुत अच्छा सवाल है.'' सालेह ने अनवर को दाद देते हुए जवाब दिया.
'' देखो! वो अगर इन्साफ करते तो ऐसे लोगों की असल सजा जहन्नम का अज़ाब था जो हष्र के मैदान की सख़्तियों से हजारों लाखों गुना कड़ी सजा है. इन्साफ के तहत ऐसे सभी लोगों को जहन्नम की सजा भुगतनी चाहिए थी. लेकिन खुदा की रहमत (दया) यह है कि वह हष्र की सख्ती को जहन्नम के अज़ाबों का बदल बना रहे हैं. यूँ खुदा की रहमत और इन्साफ दोनों का एक साथ ज़हूर हो रहा है.''
सालेह ने बात ख़त्म की तो जमशैद ने कहा:
'' तो यह है असल बात. मैं तो इस गलत फहमी में रहा कि शिफाअत (शिफारिश) का मतलब यह होता है कि हम जितने मर्जी गुनाह करें पैगम्बर और अन्य नेक लोग हमें बख्शवा देंगे.''
'' यह सोचना खुदा के इन्साफ के खिलाफ है. यह बस एक गलतफहमी थी जो क़ुरआन को समझ कर न पढ़ने के वजह से लोगों को लगी. निजात तो ईमान और नेक अमल से ही होती है. बाकी रही माफी तो वो अल्लाह की रहमत से मिलती है. अल्लाह बस यह करते हैं कि इस माफी की वजह किसी नेक बन्दे की गवाही या सिफारिश को बना देते हैं. इससे अल्लाह का मक़सद अपने महबूब और बुजुर्ग बन्दों को सम्मान देना है. निजात तो अपने उसूल (सिद्धांत) पर होती है. और तुम से ज्यादा यह कौन जानता है कि इंसान जहन्नम में न भी जाए तब भी गुनाहों की कितनी सख़्त सज़ा हष्र के मैदान की सख्ती के रूप में बहरहाल भुगतनी पड़ती है.''
'' क्या जहन्नम में जाने के बाद भी निजत (मुक्ति) की संभावना है?'' आलया ने सवाल किया तो एक ख़ामोशी छा गई. कुछ देर बाद चुप्पी को सालेह ने तोड़ते हुए कहा:
'' कुरान कहता है ना कि अल्लाह बस शिर्क ही माफ नहीं करेंगे. इसके अलावा जिस गुनाह को चाहें और जिस आदमी के लिए चाहेंगे माग कर सकते हैं.''
'' मतलब?'' अनवर ने पूछा.
'' मतलब यह कि कुछ गुनाह जहन्नम तक पहुँचा सकते हैं, लेकिन उन गुनाहों के बावजूद जिन लोगों में ईमान की झलक बाकी थी, उन्हें आखिरकार माफी मिल सकती है. लेकिन यह माफी किसको मिलेगी, कब मिलेगी, यह बातें खुदा के सिवा कोई जानता है और न कोई तय ही करेगा. और मेरे भाई जहन्नम (नरक) तो एक पल भी रहने की जगह नहीं है. जो लोग वहां से निकलेंगे, वे न जाने कितना समय बिताने के बाद अपनी सजा भुगत कर निकलेंगे. यह अवधि इतनी ज्यादा होगी कि अरबों खरबों साल भी इस हिसाब में कुछ पलों के बराबर हैं. इस बारे में तो ना सोचना ही बेहतर है.''
''मेरे खुदाया'' अनवर लरज़ कर बोला.
'' जहन्नम तो दूर की बात है, हष्र के मैदान में एक पल खड़े रहना भी बर्दास्त से बाहर है.'' जमशैद ने अपने अनुभव की रोशनी में कहा.
लैला ने भी कुछ बढ़ाया:
'' यह गुनाह कितनी बड़ी मुसीबत होती हैं. काश यह बात हम दुनिया में समझ लेते.''
सालेह ने बहस समाप्त करते हुए कहा:
'' इंसानों की दो सबसे बड़ी बदनसीबियां रही हैं. एक यह कि हष्र का दिन इन्साफ और हिसाब किताब का था, लेकिन लोगों ने उसे सिफारिशों का दिन समझा. दूसरा यह कि इंसान के लिए सबसे ज्यादा रहम और मुहब्बत करने वाला खुदा था, जबकि लोगों ने खुदा से हट कर औरों को ज्यादा रहम करने वाला समझा.''
मैंने सालेह का समर्थन करते हुए कहा:
' कितनी सच्ची बात कही है तुमने सालेह! काश लोग यह दुनिया में जान लेते.'
फिर मैंने अपने बच्चों को कहा:
'मेरे बच्चों! अब दुनिया की ज़िन्दगी एक अतीत हो चुकी है. अब तुम्हारी मंजिल खत्म न होने वाली जन्नत की बादशाही है. शांति, सुकून, आसानी, प्यार, रहम (दया), आनंद और सुरूर ... तुम्हें यह सब मुबारक हो. देखा तुमने हमारा रब कितना करीम और रहीम है. आओ हम सब मिलकर अपने रब (प्रभु) करीम की बड़ाई (स्तुति) करें और मिलकर कहें 'अल हम्दु लिल्लाहि रब्बिल आ लमीन' (सारी तारीफ अल्लाह को लायक हैं जो सारे जहानों का रब है).
सबने मिलकर इस को एक नारे के रूप में ऊँची आवाज़ से कहा.
...............
'' अब्दुल्लाह! हष्र के दिन के मामले अपने अंत की ओर बढ़ रहे हैं. तुम्हें अगर हष्र के मामलों में कोई दिलचस्पी रह गई है तो फिर वहाँ चले चलो.'' कुछ देर बाद सालेह ने मुझसे संबोधित होकर कहा.
'' इस समय हिसाब किताब कहां तक पहुंचा है?'' नाएमा ने पूछा.
ज़्यादातर लोग दुन्याँ के आखिर समय में पैदा हुए थे. उन सब का हिसाब किताब अब हो चुका है. मुसलमानों और ईसाइयों और उनके साथ रहने वालों का सामान्य हिसाब किताब हो चुका है. इस समय यहूद्यों का हिसाब चल रहा है. यूँ समझ लो कि ज़्यादातर इंसानियत की तकदीर का फैसला हो चुका है. दूसरी उम्मतों के लोगों की संख्या बहुत कम थी इसलिए अब ज्यादा समय नहीं लगेगा.''
'मेरे उस्ताद (गुरु), फरहान अहमद का क्या हुआ. तुम्हें कुछ पता है?'
'' नहीं मेरा उनसे कोई सीधा संबंध नहीं. इसलिए मैं उनके बारे में कुछ नहीं जान सकता. यह तो मैं जानता हूँ कि वह यहाँ होज़ पर नहीं हैं. बाकी अल्लाह बेहतर जानता है कि उनका क्या होगा. वैसे बेहतर है कि अब तुम उठ जाओ.''
' ठीक है. हम लोग चलते हैं.' मैंने सीट से उठते हुए कहा.
नाएमा और बच्चे भी अपनी सीटों से उठ गए. नाएमा ने उठते हुए कहा:
''मैं इन बच्चों के साथ उनके परिवारों के पास जा रही हूं. यहां वीआईपी लाउंज में तो आपके बच्चे ही आ सकते हैं. इनके बच्चे तो नीचे इंतजार कर रहे हैं. उनके पास जा रही हूँ. और हाँ मुझे अपने जमशैद के लिए कोई नई दुल्हन भी ढूँढनी है.''
इस आखरी बात पर हम सब हंस पड़े सिवाय जमशैद के. उसकी समझ में नहीं आया कि वह नई दुल्हन की बात पर हँसे या पिछली पत्नी की तबाही पर अफसोस करे.
.........................................................................................................जारी है....
' अपनों में से एक भी आदमी रह जाए तो जन्नत का क्या मजा!'
मेरी बात का जवाब जमशैद ने दिया जिसकी पत्नी बच्चे और ससुराल वालों के बारे में जहन्नम का फैसला हो चुका था:
'' हां अब्बू! मुझसे ज्यादा यह कौन जान सकता है. आप बहुत खुश नसीब हैं.''
'' ये खुश नसीब इसलिए हैं कि अपने घर वालों की तरबियत (संस्कार) को उन्होंने अपना मकसद बना लिया. वह तो तुम ही नालायक थे वरना दूसरों को देखो. सबके साथ अच्छा मामला हुआ.'' इस बार नाएमा ने कहा था.
'' अम्मी आप ठीक कह रही हैं, लेकिन मुझे दुनिया में यह ख्याल रहा कि मेरे आब्बू की शिफारिश मुझे बख्शवा देगी. दरअसल मेरे ससुर के पीर साहब थे जिन पर उन्हें बहुत विश्वास था. वह हमेशा मेरे ससुर से कहते थे कि मेरा दामन पकड़े रखो. मैं क़यामत के दिन तुम्हें बख्शवा दूंगा. बस वहीं से मुझे यह अहसास हुआ कि मेरे अब्बू जैसा तो कोई हो नहीं सकता. उनकी शिफारिश मेरे काम आएगी.''
उसकी बात सुनकर मैंने कहा:
'' बेटा तुम बिल्कुल गलत समझे थे. देखो तुम्हारे ससुर को उनके पीर साहब नहीं बचा सके. हकीकत यह है कि सिफारिश के ज़रये निजात समझने की दावत न हमारे नबी ने दी और न कुरआन में यह कहीं बयान हुआ है कि उसे निजात का रास्ता समझो. कुरान तो नाज़िल ही इसलिए हुआ था कि यह बताए कि आखिरत (परलोक) के दिन निजात (मुक्ति) कैसे होगी. उसने बार बार यह स्पष्ट किया था कि क़यामत के निजात का रास्ता एक ही है यानी ईमान और नेक आमाल (अच्छे कर्म). कुरान के उतरने के समय सारे ईसाई इस गुमराही का शिकार थे कि हज़रत ईसा की सिफारिश उन्हें बख्शवा देगी जबकि मुशरिकीन (खुदा का साझी करार देने वाले) यह समझते थे कि उनके बुत ईश्वर के सामने उनकी शिफारिश करेंगे. इसलिए कुरान मजीद ने बार बार यह स्पष्ट किया कि सिफारिश कोई रास्ता नहीं है निजात का. हर इंसान को वही मिलेगा जो उसने किया होगा.'
'' लेकिन सिफारिश का उल्लेख कुरान में आया तो है और हदीसों (नबी की बातें) में भी इसका जिक्र है.'' जमशैद ने सवाल किया.
मैंने उसके सामने एक सवाल रखते हुए कहा:
' यह बताओ कि पूरे कुरान या हदीस में कहीं यह कहा गया है कि सिफारिश को एक रास्ता समझ कर उस पर भरोसा करो या उसके लिए दुआ करो.'
'' नहीं ऐसा तो कहीं नहीं कहा गया.''
जमशैद की जगह अनवर ने पूरे आत्मविश्वास से कहा तो जमशैद ने उससे मतभेद किया और कहा:
'' नहीं भाई हम तो हर अज़ान के बाद सिफारिश की दुआ करते थे.''
मैंने जमशैद की बात का जवाब दिया:
'यह तो लोगों ने पैगम्बर की बात में खुद बढ़ाया था. पैगम्बर ने सिर्फ इतना कहा था कि मेरे लिए महमूद रुतबे की दुआ करो तो तुम्हारी सिफारिश करना मुझ पर वाजिब हो जाएगा. यह नहीं कहा था कि सिफारिश के लिए दुआ किया करो या उस पर भरोसा करके नेक काम करना छोड़ दो और मजे से गुनाह करते रहो.'
सालेह ने मुझे संबोधित करते हुए कहा:
'' अब्दुल्लाह तुम रुको मैं इन्हें सिफारिश का तसव्वुर विस्तार से समझाता हूँ. देखो असल में निजात (मुक्ति) तो ईमान और नेक आमाल के बिना मुमकिन नहीं. आज अगर किसी को माफी मिल रही है तो असल में वह किसी की सिफारिश से नहीं मिल रही बल्कि खुदा के इल्म (ज्ञान), कुदरत और रहमत की वजह से मिल रही है. कुरआन में यह इस तरह बयान किया गया है कि अल्लाह बस शिर्क ही माफ नहीं करेंगे. इसके अलावा जिस गुनाह को चाहें और जिस व्यक्ति के लिए चाहें माफ़ कर सकते हैं. छोटे मोटे गुनाहों को अल्लाह तआला दुनिया की सख़्तियों और नेकियों के बिना पर माफ कर दिया करते थे, लेकिन जिन लोगों ने गुनाह का रास्ता लगातार पकडे रखा और तौबा नहीं की उन्हें तो बहरहाल इस राह पर चलने का अंजाम आज भुगतना पड़ रहा है. लेकिन इसके बाद अगर कोई बन्दा अपने गुनाहों की काफी सजा भुगत लेता है..'' सालेह ने यहीं तक बात पूरी की थी कि जमशैद ने बीच में कहा:
'' जैसे मैंने भुगती या फिर लैला ने हष्र के मैदान के शुरू के समय तकलीफ उठाई थी.''
'' बिल्कुल''
सालेह ने समर्थन करते हुए अपनी बात जारी रखी:
''मैं यह बता रहा था कि जब ईश्वर पर यकीन रखने वाला बन्दा हष्र की सख्तियाँ झेलने के नतीजे में खुदा के अपने इन्साफ के तहत निजात (उद्धार) के काबिल हो जाता है तो खुदा कुछ नेक लोगों की गवाही को जो दरअसल उसके अच्छे कामों ही की गवाही होती है, उसकी रिहाई का बहाना बना देते हैं. जैसे तुम्हारे लिए तुम्हारे माँ बाप की गवाही रिहाई का ज़रिया बन गई. या लैला रसूल अल्लाह की उस गवाही के कारण निजात पा गई जो आपने शुरू में दी थी. लेकिन देख लो इस में भी खुद का ईमान और खुद के नेक अमल की मौजूदगी जरूरी है और सज़ा तो बहरहाल इंसान को भुगतनी पड़ती है. तो यह बताओ कि सजा भुगत कर माफी का रास्ता अच्छा है या शुरू में तौबा और अच्छे काम करने का रास्ता लेना और बिना सख्ती के निजात पा जाना अच्छा है?''
'' जाहिर है कि पहला रास्ता बेहतर है, लेकिन यह बताइए कि फिर पैगम्बर की सिफारिश का सच क्या है?'' इस बार आरफा ने जवाब दिया और साथ में सालेह से एक सवाल भी कर लिया.
'' पैगम्बर की सिफारिश का मतलब अगर यह होता कि लोगों के पास कोई नेक अमल न हो तब भी पैगम्बर लोगों को बख्शवा देंगे तो कुरान नेक काम करने की कोई बात ही नहीं करता बल्कि कुरान में अल्लाह पैगम्बर की जुबां से यह कहलवा देते कि लोगों बस मुझ पर ईमान ले आओ, मैं आखिरकार तुम्हे बख्शवा दूंगा है.''
'' यह तो ईसाइयों का ईमान (विश्वास) था और इसका अंजाम उन्होंने आज भुगत लिया.'' नाएमा ने व्यंग भरे अंदाज में कहा. सालेह ने उस के समर्थन में कहा:
''हम जानते हैं कि कुरान में ऐसी कोई बात बयान नहीं हुई है. इसके विपरीत सारा ध्यान इस ओर दिलाया गया है कि ईमान लाओ और नेक आमाल करो और सीधा जन्नत में जाओ. बाकी रही हदीस (नबी की बातें) तो हदीसों में जो कुछ सिफारिश के बारे में आया है उसे अगर कुरान की रौशनी में देखा जाता जो आखिरत (परलोक) की हकीकत बताने वाली असल किताब है तो बात स्पष्ट थी.''
''वो क्या बात है?'' जमशैद ने पूछा:
''वो यही कि आज के दिन मुजरिमों ने अपने जुर्मों की पूरी पूरी सज़ा भुगती है. इसके बाद पैगम्बर की दुआ वो वजह बन गई जिसकी वजह से लोगों की निजात (मुक्ति) की उम्मीद पैदा हुई. यह पहली बार तब हुआ था जब पैगम्बर ने अल्लाह से यह दुआ की थी कि लोगों का हिसाब किताब शुरू हो. इसके नतीजे में लोगों को इंतजार की मुश्किल से छुटकारा मिला. दूसरी बार पैगम्बर और दुसरे सभी नबियों ने अपनी अपनी उम्मत को दी गई अपनी शिक्षा की गवाही दी . यह गवाही उन सब लोगों के लिए निजात (मुक्ति) का कारण बन गई जिनके आमाल (कर्म) कुल मिला कर ज़्यादातर उनकी शिक्षा के अनुसार थे.
'' जैसे के मैं.'' लैला बोली.
'' हां जैसे के तुम. और अब तीसरी बार हुज़ूर उस समय दुआ करेंगे जब कुछ लोगों का मामला टाल दिया जाएगा. उनका हिसाब किताब आखिर समय तक नहीं किया जाएगा और वह अपने गुनाहों की सज़ा में हष्र के मैदान में परेशान होते रहेंगे. पैगम्बर उन के लिए बार बार दुआ करेंगे. इसके बाद जब खुदा की हिक़मत (नीति) और इल्म (ज्ञान) के तहत उनका फैसला करना उचित होगा तब पैगम्बर को इजाज़त दी जाएगी कि वह उनके पक्ष में कोई बात करें. फिर पैगम्बर की दरख्वास्त (आवेदन) के नतीजे में उनका हिसाब किताब होगा जिसके बाद जाकर उनकी निजात (मुक्ति) की उम्मीद पैदा होगी. और यह होगा भी सबसे आखिर में जब ऐसे लोग अपने सभी गुनाहों की काफी सज़ा भुगत चुके होंगे और एक खुदा को मानने और अपने अच्छे कामों की बिना पर निजात के लायक हो जाएंगे.''
'' मेरा एक सवाल है.'' अनवर ने सालेह को संबोधित करके कहा.
''वह यह कि अगर सब लोग सज़ा भुगत कर ही माफी के हक़दार बन रहे हैं तो इसमें अल्लाह की रहमत कहाँ से आ गई. यह तो बस इन्साफ हो रहा है ना.''
'' बहुत अच्छा सवाल है.'' सालेह ने अनवर को दाद देते हुए जवाब दिया.
'' देखो! वो अगर इन्साफ करते तो ऐसे लोगों की असल सजा जहन्नम का अज़ाब था जो हष्र के मैदान की सख़्तियों से हजारों लाखों गुना कड़ी सजा है. इन्साफ के तहत ऐसे सभी लोगों को जहन्नम की सजा भुगतनी चाहिए थी. लेकिन खुदा की रहमत (दया) यह है कि वह हष्र की सख्ती को जहन्नम के अज़ाबों का बदल बना रहे हैं. यूँ खुदा की रहमत और इन्साफ दोनों का एक साथ ज़हूर हो रहा है.''
सालेह ने बात ख़त्म की तो जमशैद ने कहा:
'' तो यह है असल बात. मैं तो इस गलत फहमी में रहा कि शिफाअत (शिफारिश) का मतलब यह होता है कि हम जितने मर्जी गुनाह करें पैगम्बर और अन्य नेक लोग हमें बख्शवा देंगे.''
'' यह सोचना खुदा के इन्साफ के खिलाफ है. यह बस एक गलतफहमी थी जो क़ुरआन को समझ कर न पढ़ने के वजह से लोगों को लगी. निजात तो ईमान और नेक अमल से ही होती है. बाकी रही माफी तो वो अल्लाह की रहमत से मिलती है. अल्लाह बस यह करते हैं कि इस माफी की वजह किसी नेक बन्दे की गवाही या सिफारिश को बना देते हैं. इससे अल्लाह का मक़सद अपने महबूब और बुजुर्ग बन्दों को सम्मान देना है. निजात तो अपने उसूल (सिद्धांत) पर होती है. और तुम से ज्यादा यह कौन जानता है कि इंसान जहन्नम में न भी जाए तब भी गुनाहों की कितनी सख़्त सज़ा हष्र के मैदान की सख्ती के रूप में बहरहाल भुगतनी पड़ती है.''
'' क्या जहन्नम में जाने के बाद भी निजत (मुक्ति) की संभावना है?'' आलया ने सवाल किया तो एक ख़ामोशी छा गई. कुछ देर बाद चुप्पी को सालेह ने तोड़ते हुए कहा:
'' कुरान कहता है ना कि अल्लाह बस शिर्क ही माफ नहीं करेंगे. इसके अलावा जिस गुनाह को चाहें और जिस आदमी के लिए चाहेंगे माग कर सकते हैं.''
'' मतलब?'' अनवर ने पूछा.
'' मतलब यह कि कुछ गुनाह जहन्नम तक पहुँचा सकते हैं, लेकिन उन गुनाहों के बावजूद जिन लोगों में ईमान की झलक बाकी थी, उन्हें आखिरकार माफी मिल सकती है. लेकिन यह माफी किसको मिलेगी, कब मिलेगी, यह बातें खुदा के सिवा कोई जानता है और न कोई तय ही करेगा. और मेरे भाई जहन्नम (नरक) तो एक पल भी रहने की जगह नहीं है. जो लोग वहां से निकलेंगे, वे न जाने कितना समय बिताने के बाद अपनी सजा भुगत कर निकलेंगे. यह अवधि इतनी ज्यादा होगी कि अरबों खरबों साल भी इस हिसाब में कुछ पलों के बराबर हैं. इस बारे में तो ना सोचना ही बेहतर है.''
''मेरे खुदाया'' अनवर लरज़ कर बोला.
'' जहन्नम तो दूर की बात है, हष्र के मैदान में एक पल खड़े रहना भी बर्दास्त से बाहर है.'' जमशैद ने अपने अनुभव की रोशनी में कहा.
लैला ने भी कुछ बढ़ाया:
'' यह गुनाह कितनी बड़ी मुसीबत होती हैं. काश यह बात हम दुनिया में समझ लेते.''
सालेह ने बहस समाप्त करते हुए कहा:
'' इंसानों की दो सबसे बड़ी बदनसीबियां रही हैं. एक यह कि हष्र का दिन इन्साफ और हिसाब किताब का था, लेकिन लोगों ने उसे सिफारिशों का दिन समझा. दूसरा यह कि इंसान के लिए सबसे ज्यादा रहम और मुहब्बत करने वाला खुदा था, जबकि लोगों ने खुदा से हट कर औरों को ज्यादा रहम करने वाला समझा.''
मैंने सालेह का समर्थन करते हुए कहा:
' कितनी सच्ची बात कही है तुमने सालेह! काश लोग यह दुनिया में जान लेते.'
फिर मैंने अपने बच्चों को कहा:
'मेरे बच्चों! अब दुनिया की ज़िन्दगी एक अतीत हो चुकी है. अब तुम्हारी मंजिल खत्म न होने वाली जन्नत की बादशाही है. शांति, सुकून, आसानी, प्यार, रहम (दया), आनंद और सुरूर ... तुम्हें यह सब मुबारक हो. देखा तुमने हमारा रब कितना करीम और रहीम है. आओ हम सब मिलकर अपने रब (प्रभु) करीम की बड़ाई (स्तुति) करें और मिलकर कहें 'अल हम्दु लिल्लाहि रब्बिल आ लमीन' (सारी तारीफ अल्लाह को लायक हैं जो सारे जहानों का रब है).
सबने मिलकर इस को एक नारे के रूप में ऊँची आवाज़ से कहा.
...............
'' अब्दुल्लाह! हष्र के दिन के मामले अपने अंत की ओर बढ़ रहे हैं. तुम्हें अगर हष्र के मामलों में कोई दिलचस्पी रह गई है तो फिर वहाँ चले चलो.'' कुछ देर बाद सालेह ने मुझसे संबोधित होकर कहा.
'' इस समय हिसाब किताब कहां तक पहुंचा है?'' नाएमा ने पूछा.
ज़्यादातर लोग दुन्याँ के आखिर समय में पैदा हुए थे. उन सब का हिसाब किताब अब हो चुका है. मुसलमानों और ईसाइयों और उनके साथ रहने वालों का सामान्य हिसाब किताब हो चुका है. इस समय यहूद्यों का हिसाब चल रहा है. यूँ समझ लो कि ज़्यादातर इंसानियत की तकदीर का फैसला हो चुका है. दूसरी उम्मतों के लोगों की संख्या बहुत कम थी इसलिए अब ज्यादा समय नहीं लगेगा.''
'मेरे उस्ताद (गुरु), फरहान अहमद का क्या हुआ. तुम्हें कुछ पता है?'
'' नहीं मेरा उनसे कोई सीधा संबंध नहीं. इसलिए मैं उनके बारे में कुछ नहीं जान सकता. यह तो मैं जानता हूँ कि वह यहाँ होज़ पर नहीं हैं. बाकी अल्लाह बेहतर जानता है कि उनका क्या होगा. वैसे बेहतर है कि अब तुम उठ जाओ.''
' ठीक है. हम लोग चलते हैं.' मैंने सीट से उठते हुए कहा.
नाएमा और बच्चे भी अपनी सीटों से उठ गए. नाएमा ने उठते हुए कहा:
''मैं इन बच्चों के साथ उनके परिवारों के पास जा रही हूं. यहां वीआईपी लाउंज में तो आपके बच्चे ही आ सकते हैं. इनके बच्चे तो नीचे इंतजार कर रहे हैं. उनके पास जा रही हूँ. और हाँ मुझे अपने जमशैद के लिए कोई नई दुल्हन भी ढूँढनी है.''
इस आखरी बात पर हम सब हंस पड़े सिवाय जमशैद के. उसकी समझ में नहीं आया कि वह नई दुल्हन की बात पर हँसे या पिछली पत्नी की तबाही पर अफसोस करे.
.........................................................................................................जारी है....
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