बुधवार, 18 जुलाई 2012

भाग १२.१ बनी इस्राइल (यहूदी) और मुसलमान


 इसके साथ ही मंज़र (दृश्य) ख़त्म हो गया और एक जोरदार डाँट फिजा में बुलंद हुई. खुदा का गुस्सा अपने चरम पर था. उनके नबी के साथ जो कुछ बनी इस्राइल ने किया था उसकी जो सजा बख्त नस्र के रूप में उन्होंने भुगती थी वह बहुत मामूली थी. असल सज़ा का समय अब ​​आया था. हुक्म हुआ हर उस आदमी को पेश किया जाए जो किसी रूप में भी यर्मियाह के साथ किये गए इस ज़ुल्म में शामिल था.
नेताओं और धार्मिक जुरुओं और आम लोगों का वह ग्रुप पेश हुआ जो इस सब का जिम्मेदार था. उन में सज़ा देने वाले भी थे और वे भी जो यर्मियाह को बख्त नस्र का एजेंट करार देकर उनके खिलाफ लोगों को भड़का रहे थे. इन सब के लिए जहन्नम का फैसला सुना दिया गया. फिर उसके बाद एक एक करके उस ज़माने के लोगों का घेराओ शुरू हुआ. नबी के मुजरिमों का घेराओ जिस तरह होना चाहिए था वैसे ही हुआ हरेक मुजरिम के लिए बड़ी बड़ी सजा का फैसला हो गया.
...............
मैं इस बार हष्र में देर तक खड़ा रहा और लोगों का हिसाब किताब देखता रहा. सच्ची बात यह है कि इससे पहले मैंने कुछ ही लोगों का हिसाब किताब देखा था. लेकिन अब अंदाज़ा हो रहा था कि खुदा सबसे पूरा पूरा और सही इन्साफ कर रहे हैं. हर आदमी के हालात, उसके माहौल और उसकी परवरिश के नतीजे में बनने वाली नफ्सियात (सोच) की रोशनी में आमाल (कर्मों) की समीक्षा की जा रही थी. लोगों ने राई के दाने के बराबर भी कोई अमल किया था तो उनकी आमाल की किताब में वह दर्ज था. उनकी नीयत, वजह और अमल हर चीज़ को परखा जा रहा था. फरिश्तों का रिकॉर्ड, दुसरे लोग, दर और दीवार और सबसे बढ़कर इंसान के अपने शरीर के अंग गवाही दे रहे थे. इन सब की रौशनी ही में इंसान के आखरी मुक़द्दर का फैसला सुनाया जाता. यूँ किसी इंसान पर राई के दाने के बराबर भी ज़ुल्म नहीं हो रहा था. जिसे माफ़ करने की जरा भी गुंजाइश होती उसे माफ कर दिया जाता. अल्लाह के पूरे इन्साफ और पूरी रमत का एक साथ ऐसा ज़हूर हो रहा था कि शब्दों से उसे बताया नहीं जासकता.
मैं इसी हाल में था कि सालेह ने मेरे कान में कहा:
'' नाएमा बड़ी बेचैनी से तुम्हें ढूँड रही है.''
' खैरियत?' मैंने पूछा.
'' बड़ा दिलचस्प मामला है. बेहतर है तुम खुद चले चलो.''
यह कहकर सालेह ने मेरा हाथ पकड़ा और थोड़ी ही देर में हम नाएमा के पास खड़े थे. लेकिन मुझे यह देखकर हैरत हुई कि नाएमा के साथ एक सुंदर परी जैसी लड़की खड़ी थी. मैंने अपने दिमाग पर बहुत ज़ोर डाला पर मैं उसे पहचान न सका.
नाएमा ने खुद ही उसका परिचय कराया:
'' यह अमूराह हैं. और हज़रत नूह की उम्मत से हैं. यह मुझे यहीं पर मिली हैं. यह आखरी नबी या उनके किसी ख़ास उम्मती से मिलना चाह रही थीं. नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम तक तो मैं इन्हें नहीं ले जा सकती थी. लेकिन मैंने सोचा कि आप से इन्हें मिलवा दूं. आखिर आप भी तो बड़े ख़ास लोगों में से हैं.''
यह कहकर वह अमूराह को मेरा परिचय देने लगी. इस परिचय में ज़मीन आसमान के जो कलाबे वह मिला सकती थी, उसने मिलाऐ. मैंने बीच में नाएमा को रोका और अमूराह से कहा:
' नाएमा मेरी पत्नी हैं. इसलिए मेरे बारे में बढ़ा चढ़ा कर बात कर रही हैं. लेकिन उनकी यह बात ठीक है कि मैं आप को इस उम्मत के ख़ास (प्रमुख) लोगों बल्कि अपने नबी से भी मिलवा दूंगा.'
नाएमा को मेरी बात पसंद नहीं आई. वह झल्ला कर बोली:
'' यदि मैं बढ़ा चढ़ा रही हूँ तो बताएँ यह सालेह आपके साथ क्यों रहते हैं और आप को कहाँ कहाँ ले कर जाते हैं?''
मैंने झगड़ा खत्म करने के लिए कहा:
' अच्छा चलो मैंने हार मानी लेकिन पहले अमूराह से पूरा परिचय तो हो लेने दो.'
अमूराह हंसते हुए बोली:
'' इंसान हजारों साल में भी नहीं बदले बल्कि दोबारा ज़िन्दा होकर भी वैसे ही हैं. आप दोनों वैसे ही झगड़ा कर रहे हैं जैसे मेरे अम्मी अब्बू करते थे.''
'' इनके अम्मी अब्बू से भी मेरी मुलाकात हुई है.''
नाएमा बीच में बोली, मगर यह उसका खुशी से भरपूर वाक्य था जिससे मुझे अंदाज़ा हुआ कि वह अमूराह से मिलकर इतना खुश क्यों है और क्यों उसने मुझे हष्र के मैदान से वापस बुलवाया है.
'' अमूराह के पति नहीं हैं.''
मेरे अंदाज़े की पुष्टि सालेह ने कर दी. वह मेरे कान में बोला:
'' नाएमा ने तुम्हारी होने वाली बहू से मिलवाने के लिए तुम्हें बुलाया है.''
मेरा अंदाज़ा सही था. नाएमा जमशैद के लिए दुल्हन ढूंढ रही थी और आखिरकार उसे इस कोशिश में इस हद तक सफलता मिल चुकी थी कि लड़की उसे पसंद आ गई थी. मगर लड़के लड़की ने एक दूसरे को पसंद किया या देखा भी है यह मुझे पता नहीं था. मगर नाएमा को इस से कोई ज्यादा फर्क भी नहीं पड़ता था. उसके विचार में उसका राज़ी हो जाना ही इस रिश्ते के लिए काफी था.
मैंने पूछा:
' अमूराह आपके पति कहाँ हैं?'
अमूराह ने कुछ शरमाकर कहा:
'' दुनिया में सिर्फ 15 साल की उम्र में मेरा निधन हो गया था. मैं बचपन से ही बहुत बीमार रहती थी. अल्लाह की रहमत ने उसका यह बदला दिया कि बिना किसी हिसाब किताब के शुरू ही में मेरे लिए जन्नत का फैसला हो गया.''
' और बाकी फैसले तुम्हारी होने वाली सास कर रही है.' मैंने मन ही मन में सोचा.
सालेह के चेहरे पर भी मुस्कान आ गई. फिर अमूराह बोली:
'' मुझे आप लोगों से मिलकर बहुत खुशी हुई है. जन्नत में भी हम मिलते रहा करेंगे. अच्छा अब मैं चलती हूँ. मेरे अम्मीं अब्बू मुझे ढूँड रहे होंगे.''
नाएमा भी उसके साथ जाने के लिए मुड़ी तो मैंने कहा:
' ठहरो मुझे तुमसे कुछ काम है.'
नामह ने अमूराह से कहा:
'' तुम वहीं रुको जहाँ हम मिले थे. मैं अभी आती हूँ.''
मैंने मज़ाक में नाएमा से कहा:
' अमूराह से उसका मोबाइल नंबर ले लो, इस भीड़ में कहाँ खोजती फिरोगी.'
'' यह मोबाइल क्या है?'' अमूराह ने हैरानी से पूछा.
' यह एक ऐसी बला का नाम है जिसके बाद तुम नाएमा से बच नहीं सकती.' मैंने जवाब दिया. सालेह ने बीच में दखल देते हुए कहा:
'' मेरा ख्याल ​​है कि अमूराह अपनी मंजिल तक पहुंच नहीं सकेगी, मैं उसे पहुंचा कर आता हूँ.''
...............
अमूराह और सालेह के जाने के बाद मैं नाएमा को लेकर होज़ के किनारे एक जगह बैठ गया. मैंने उससे कहा:
' तुम्हें पता है तुम क्या कर ही हो?
'' हाँ मैंने जमशैद के लिए अमूराह को पसंद किया है.''
' मुझे मालूम है. लेकिन तुम्हें पता है कि तुम्हारी पसंद से कुछ नहीं होगा.'
'' मुझे मालूम है. पिछली दुनिया में हुमा के तजुर्बे के बाद अब जमशैद मेरे सामने कुछ नहीं बोल सकता और अमूराह के माँ बाप से मैं बात कर चुकी हूँ.''
' यानी लड़का और लड़की दोनों की जानकारी में यह बात नहीं है. न उनकी मर्ज़ी पूछी गई और सब कुछ तुमने तय कर दिया. नाएमा यह दुनिया नहीं है. यहाँ हम माँ बाप बस औपचारिक हैसियत रखते हैं. यहां वही होगा जो उन लोगों की मर्ज़ी होगी. इसलिए अपने दिल में कोई उम्मीद बांधने से पहले उन दोनों से पूछ लो.'
'' और अगर उन्होंने मना कर दिया?''
' तो और बहुत लड़कियाँ हैं. आज किसी चीज़ की कमी नहीं. तुम इस मामले में बे फ़िक्र हो जाओ.'
नाएमा चुप हो गई लेकिन उसका मन अभी तक अपनी बहू में उलझा हुआ था. मैंने उसे देखते हुए कहा:
' नाएमा हमें पहली बार यहां अकेले में बैठने का मौका मिला है. तुम कुछ देर के लिए अपनी ममता को कोने में रख दो और देखो कि यहाँ कितना अच्छा माहौल है.'
फिर मैंने उससे कहा:
'' तुम्हें याद है नाएमा! हमने कितने मुश्किल वक़्त साथ साथ देखे थे. खुदा का पैगाम (संदेश) उसके बन्दों तक पहुंचाने के लिए मैंने अपनी ज़िन्दगी लगा दी. अपना कैरियर, अपनी जवानी, अपना हर सांस उसी काम के लिए समर्पित कर दिया. मगर देखो नाएमा मैंने जो सौदा किया था उसमे कोई घाटा नहीं हुआ. मैं तुम से दुनिया में कहा करता था ना कि जो खुदा के साथ सौदा करता है वह कभी घाटा नहीं उठाता. देखो हम घाटे से बच गए. कितनी शानदार सफलता हमें नसीब हुई है. हम जीत गए नाएमा... हम जीत गए. अब ज़िन्दगी है, मौत नहीं. जवानी है, बुढ़ापा नहीं. अब स्वास्थ्य है, बीमारी नहीं. अब अमीरी है, गरीबी नहीं. अब हमेशा रहने वाली खुशियां हैं और कोई दुख नहीं.'
'' मुझे तो कोई दुख याद नहीं आ रहा.''
' हाँ, आज किसी जन्नत में जाने वाले को न दुनिया का कोई दुख याद है और न जहन्नम में जाने वाले को दुनिया का कोई सुख याद है. दुनिया तो बस एक ख्याल था, सपना था, कहानी था. हक़ीक़त तो अब शुरू हुई है. ज़िन्दगी तो अब शुरू हुई है.'
'' ज़रा सामने देखिये समां बदल रहा है.''
मैंने उसके कहने से ध्यान किया तो एहसास हुआ कि वाकई अब शाम डखलने के बिल्कुल करीब हो चुकी है. मुझे अहसास हुआ कि यह परिवर्तन किसी ख़ास बात की निशानी है.
पीछे से एक आवाज़ आई:
''हां तुम ठीक समझे.''
यह सालेह की आवाज़ थी. मेरे पास बैठते हुए बोला:
'' इस बदलाव का मतलब है कि हिसाब किताब खत्म हो रहा है. सभी लोगों का हिसाब किताब हो चुका है.''
' पहले यह बताओ अमूराह को छोड़ कर तुम कहाँ रह गए थे. तुम न पानी पीने जा सकते हो न शौचालय जाना तुम्हारे लिए मुमकिन है. फिर तुम थे कहाँ?'
''मैं इम्साइल के साथ था.''
इसके साथ ही इम्साइल पीछे से निकल कर सलाम करता हुआ सामने आकर खड़ा हो गया. यह मेरे बाएँ हाथ का फरिश्ता था. मैंने सलाम का जवाब दिया और हंसते हुए सालेह से पूछा:
' इनकी तशरीफ़ लाने की वजह?'
'' हिसाब किताब ख़त्म हो चुका है अब तुम्हें पेश होना है. हम दोनों मिलकर तुम्हें अल्लाह के हुज़ूर पेश करेंगे.''
पेशी का सुनकर मुझे पहली बार घबराहट पैदा हुई. मैंने घबरा कर सवाल किया:
' हिसाब इतनी जल्दी कैसे खत्म हो गया?'
''मैं तुम्हें पहले बता चुका कि यहां समय बहुत तेजी से बीत रहा है और हष्र में समय बहुत धीरे. इसलिए जितना समय तुम यहाँ रहे हो इतने समय में वहां हिसाब किताब ख़त्म हो चुका.''
' वहाँ मेरे पीछे क्या हुआ था?'
'' सभी उम्मतों का जब सामान्य हिसाब किताब हो गया तो हष्र के मैदान में सिर्फ वे लोग रह गए जो ईश्वर के होने का यकीन तो रखते थे, लेकिन उनके गुनाहों (पापों) की बिना पर उन्हें रोक लिया गया था. आखिरकार हुज़ूर की दरख्वासत (अनुरोध) पर उनका भी हिसाब हो गया. अब आखिर में सारे नबी और शाहिद पेश होंगे.''
'' क्या शाहिद वे लोग हैं जो अल्लाह की राह में क़त्ल हुए?'' नामह ने सालेह से सवाल किया.
'' नहीं यह वो शाहिद नहीं. वह भी बड़े ऊँचे रुत्बों के मालिक बने हैं. लेकिन यह शाहिद हक़ की गवाही देने वाले लोग हैं. यानी उन्होंने इंसानों पर अल्लाह के दीन की गवाही के लिए अपनी ज़िन्दगी लगा दी थी. यही वह लोग हैं जिन्होंने नबियों के बाद उन की दावत को आगे पहुंचाया.
' क्या उनका भी हिसाब होगा?' मैंने पूछा क्योंकि मुझे हिसाब के ख्याल से ही घबराहट हो रही थी.
'' नहीं बस बारगाह इलाही में उनकी पेशी होगी और उनकी निजात (मुक्ति) का ऐलान होगा. लेकिन अल्लाह सारे आलमों के रब और हर चीज़ के मालिक हैं. वह जब चाहें जो चाहें हिसाब कर सकते हैं. कोई भी उन्हें रोक नहीं सकता.''
मेरे मुंह से निकला:
' रब्बिग फिर वरहम.' (ऐ मेरे रब मुझे बख्श दे और रहम कर).
''मैं खुदा के इख्तियार (अधिकार) का बयान कर रहा हूं. यह नहीं कह रहा कि खुदा यह करेंगे. दरअसल अब जन्नत और जहन्नम में दाखिले (प्रवेश) का समय आ रहा है. इसलिए अब जन्नती और जहन्नमी सब को हष्र के मैदान में जमा कर दिया जाएगा. उन सबके सामने नबियों और शहीदों की सफलता की घोषणा होगी. फिर गिरोह दर गिरोह  नेक और मुजरिम लोगों को जन्नत और जहन्नम में भेजा जाएगा. जिसके बाद खत्म न होने वाली ज़िन्दगी शुरू हो जाएगी.
.......................................................................................................जारी है....

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