सोमवार, 23 जुलाई 2012

भाग १४.१ जन्नत की बादशाही में दाखिला

अंधेरे में मेरा सफ़र जारी था. बाहर दूर तक गहरा अँधेरा छाया हुआ था. मगर इस अंधेरे में कोई भय ... कोई डर नहीं था. अंधेरे की इस परत पर एक सन्नाटे की परत जमी हुई थी. मगर इस सन्नाटे में भी कोई वहशत कोई खौफ नहीं था. अंधेरे की तरह सन्नाटा भी अपने भीतर एक अजीब तरह का सुकून और सुरूर लिए हुए था. ऐसा लगता था कि खामोसी में बिना आवाज़ के ही नगमे बिखरे हुए हैं जो कानों के बजाय दिल के दरवाजों से वुजूद पर हौले हौले दस्तक दे रहे हैं. बगैर साज़ के कुछ सुर हैं फिजा में बिखरे हुए जो सीधे मेरे दिल की दुनिया में दाखिल होकर झूम रहे हैं.
रहा अँधेरा तो मुझे इसका मकसद एक नज़र आता था. वह यह कि यह अँधेरा उस रौशनी को खूब साफ़ करके दिखलादे जो बहुत दूर फिजा में उंचाई पर एक दिए की तरह रौशन थी. यह रौशनी आसमान के किसी तारे की न थी कि उस समय धरती की तरह आसमान भी अंधेरे की चादर ओढ़े हुए था. यह रौशनी एक ऊँचे पहाड़ की चोटी से उठ रही थी. अंधेरे में रौशनी काफी खुबसूरत और आकर्षक लग रही थी इतनी कि उससे नजर हटाने का दिल ही नहीं चाहता था. फिर मैंने सोचा इस अंधेरे में देखने को और रखा ही क्या है. मेरे दिल में इच्छा जागी कि क्या ही अच्छा होता कि मैं देख सकता कि इस रौशनी में नीचे का मंज़र कैसा दिख रहा है. मैंने 'सुब्हानअल्लाह' कहा जिसके साथ ही अँधेरा छट गया और नीचे का मंज़र साफ दिखने लगा.
नीचे नज़र की हद तक एक बहुत बड़ा हरा भरा मैदान फैला हुआ था जिसके ठीक बीच में संग मरमर का सफेद पहाड़ दिख रहा था. यह किसी पहाड़ी श्रंखला का हिस्सा नहीं बल्कि अकेला एक ही संग मरमर का ऊँचा टीला था जो इस ज़मीन के सीने में अकेले किसी स्तम्भ की तरह गड़ा था. इस पहाड़ की चोटी ऊँची होते होते एक बारीक नोक की तरह बारीक होकर खत्म हो रही थी. लेकिन यह पहाड़ का अंत नहीं थी बल्कि यह नोक उस विशाल और आलीशान महल की बुन्याद  का काम कर रही थी जो ठीक उसके सिरे पर बना हुआ था. मुझे यह मंज़र हकीकत से ज्यादा किसी चित्रकार के कल्पना का शाहकार लग रहा था. क्योंकि ऐसे मैदान फिर उसमे ऐसे पहाड़, पहाड़ की इतनी बारीक चोटी और चोटी के सहारे खड़े ऐसे महल हकीकत में नहीं हुआ करते.
लेकिन वह पिछली दुनिया की बातें थीं. अब तो परीक्षण और भौतिक नियमों की वह पहली दुनिया खत्म हो चुकी थी. एक नई दुनिया वुजूद में आ चुकी थी जिसमे मेरी बादशाही थी और मैं था. मैंने सोचा कि मानव इतिहास हजारों लाखों साल का सफर तय करके एक ईश्वर के दौर में दाखिल (प्रवेश) हो चूका है ... जब ज़मीन का इन्तिज़ाम (व्यवस्था) खुदा के फरिश्तों ने संभाल कर हर नामुमकिन को मुमकिन कर दिया है. और एक ऐसी दुनिया बना दी है जिसका अँधेरा हर डर और ख़ामोशी हर अंदेशे से पाक (मुक्त) है. जिसका अंधेरा रौशनियों का हिस्सा और ख़ामोशी सुकून का सामान हुआ करती है.
मेरी चाहने पर एक बार फिर अँधेरा छा चूका था. अंधेरे से मुझे ख्याल आया कि कुछ जहन्नम वालों का हाल भी देखूँ. मैंने 'सुब्हान अल्लाह' कहा और उसके साथ ही मेरे बाईं ओर नीचे की ओर एक स्क्रीन सी दिखाई गई. उस पर जो सीन चला वह बहुत ही दहशत नाक था. यह जहन्नम के बीच के हिस्से का मंज़र (दृश्य) था. भयानक और बड़े बड़े फरिश्ते भड़कती हुई आग से कुछ बहुत बुरी शकल वाले इंसानों को घसीट घसीट कर बाहर निकाल रहे थे. उनके गलों में तौक़ थे और हाथ पैरों में भारी और नुकीली जंजीरें बंधी हुई थीं. उनके चेहरे का मांस आग में झुलस गया था. उनके शरीर पर तारकोल का बना हुआ कपड़ा था, जिससे सुलगती आग उनके मांस को जला रही थी. वह तकलीफ के मारे चीख रहे थे . रो रो कर अल्लाह से फरियाद कर रहे थे कि उन्हें एक बार दुनिया की ज़िन्दगी में जाने का मौका दिया जाए फिर कभी वे अत्याचार, कुफ़्र और नाइंसाफी के पास भी नहीं फटकेंगे. मगर वहां चीख़ना, रोना और दांत पीसना सब बेकार था.
फिर जहन्नम वालों ने चिल्ला चिल्ला कर पानी मांगना शुरू किया तो फरिश्ते उनको घसीटते हुए पानी के कुछ चश्मों तक ले गए. यहां उबलते पानी से भाप उठ रही थी. लेकिन यह जहन्नमी इतने प्यासे थे कि उसी पानी को पीने पर मजबूर थे. वह खोलते हुए पानी को पीते और चीख़ते जा रहे थे. वह पानी से मुंह हटाते लेकिन कुछ ही देर में इतनी ज्यादा प्यास लगती कि फिर जानवरों की तरह उसी पानी को पीने पर खुद को मजबूर पाते. इस के नतीजे में उनके चेहरे की खाल उतर गई और उनके होंठ नीचे तक लटक गए थे.
यह मंज़र देख कर मैंने खुदा की पनाह (शरण) मांगी और उसका शुक्र अदा किया कि उसने मुझे इस भयानक अंजाम से बचा लिया. फिर मैं इस मंज़र से नज़र हटा कर उस रौशनी को देखने लगा जो पहाड़ की चोटी पर बने मेरे महल से उठ रही थी. मेरी सवारी धीरे धीरे इस महल की ओर बढ़ रही थी. मेरे दिल में इच्छा जागी कि महल पहुंचने से पहले ही यहां बैठे बैठे उसे देख लूँ. मैंने फिर सुब्हान अल्लाह कहा. अचानक मेरा कमरा सिनेमा घर में बदल गया. लेकिन इस सिनेमा की स्क्रीन सामने ही न थी बल्कि दाहिने बाएँ नीचे और ऊपर की ओर भी थी, महल का मंज़र किसी थ्री डी फिल्म की तरह चलने लगा. मुझे लगा कि मैं खुद महल के भीतर मौजूद हूँ और सब कुछ देख और सुन सकता हूँ.
आज यहां जश्न का माहोल था. ऊँचे पहाड़ की चोटी पर मेरा यह शानदार महल नूर का घर बना हुआ था. बिना बल्ब के फूटती हुई रोशनियाँ और बिना किसी शमा के चमकते हुए झूमर इस शानदार महल को अंधेरे के सागर में रौशनी का एक जज़ीरा (द्वीप) बनाए हुए थे. यह रौशनी हर दिशा और हर रुख से फूट रही थी. यह रौशनी से ज्यादा रंग और नूर की वह बरसात लगती थी जो आँखों के रस्ते अहसासात (भावनाओं) की दुनिया को हर पल एक नई लज्ज़त हा अहसास करा रही थी. रौशनी कभी आँखों को इतनी अच्छी भी लग सकती है यह कभी किसी ने नहीं देखा होगा. समय समय पर यहां नगमों का तरन्नुम छिड़ता और दिलों के तारों को छेड़ता हुआ वातावरण में बिखर जाता. संगीत इतना मदहोश करने वाला भी हो सकता है, किसी ने कभी इसका गुमान न किया होगा. वातावरण में धीमी धीमी खुशबू भी महक कर फिजा को और मदहोश बनाए हुए थी. खुशबू इतनी राहत देने वाली भी हो सकती है, किसी इंसान ने कभी इसकी कल्पना नहीं की होगी.
इस बड़े महल की सीड़यों पर गुलामान (नौकरों) की चहल पहल बिखरे मोतियों का सा मंजर लग रही थी. उनके चेहरों पर रौशनी, खुबसूरत कपड़े और अंदाज़ में मुस्तैदी थी. इन की मंजिल महल के एक कोने पर बना विशाल बाग था. यह बाग क्या था हरयाली, फूलों और पेड़ों का एक गुलदस्ता था जिसने अपनी खूबसूरती से बागीचे बनाने वालों की हर कारीगरी को मात दे दी थी. हज़ारहा रंग इस बाग में बिखरे हुए थे. एक हरे रंग ने ही इतने अलग अलग रूप लिए थे कि उन्हें गिना नहीं जा सकता था. बड़े बड़े घने पेड़ और उन पर लगे अनगिनत तरह (प्रकार) के फल, हर पेड़ पर अलग रंग के पत्ते, हजारों तरह के पौधे जिन पर लगे रंग बिरंगे फूल और कलयां. फिर यह सब कुछ ऐसे ही नहीं था बल्कि असल खूबसूरती डिजाइन की थी जिस डिजाइन के साथ पेड़ों, पौधों और फूलों को लगाया गया था. यह बाग किसी शायर की दिल को छू लेने वाली ग़ज़ल की तरह था जिसमें अलग अलग शब्दों को एक ख़ास लड़ी में पिरो कर खुबसूरत ग़ज़ल बनाई जाती है. इस हसीन और खुबसूरत बाग में बने खुबसूरत रास्ते और क़यामत ढा रहे थे जो याकूत और नीलम जैसे कीमती पत्थरों से बनाए गए थे. इस पर चार चाँद वह झरने, नदियां और नहरें लगा रही थीं जो बाग के बीच में बहरही थीं. देखने में खुबसूरत लगने के साथ साथ उन की आवाज़ भी कुछ कम खुबसूरत नहीं थी. इन नहरों में से किसी में सफेद दूध, किसी में झाग उड़ाता पानी, किसी में लाल शरबत किसी में बहते शहद की मोजें और ना जाने कितनी तरह की पीने की चीज़ों थीं. हर नहर से एक अलग तरह की खुशबू उठ रही थी जो करीब जाने वाले को अपने जादू में जकड़ लेती. नहरों के साथ और पेड़ों के नीचे जगह जगह बैठने वालों के लिए हीरे जवाहरात से जड़े हुए तख्त, शाही सीटें, कालीन और आरामदेह तकिये रखे हुए थे.
यह खुबसूरत बाग चारों ओर से खुला हुआ था. जब कभी हवा का कोई झोंक उठता एक नई खुशबू को अपने साथ लाता था. बाग से दूर तक का नज़ारा बिल्कुल साफ दिख रहा था. बाहर जो अंधेरा था यहां उसका कोई असर महसूस नहीं होता था. दूर तक विशाल शहर की सी ऊँची इमारतें और उनमें जगमगाती रोशनियाँ थीं जो रात में चमकते हुए कंडील लग रहे थे. आसमान पर छोटे छोटे तारे जगमगा रहे थे जिनकी दूधया रौशनी ने आसमान को और हसीन बना दिया था. एक दिशा में एक जगमगाती हुई रौशनी थी जो धीरे धीरे महल की ओर बढ़ रही थी. मुझे मालूम हो गया कि यह दरअसल मेरी ही सवारी थी जिसे खुदा की कुदरत से अंदर बैठा हुआ होने के बावजूद मैं बाहर से महल की ओर बढ़ता हुआ देख रहा था.
बाग के एक हिस्से में मैंने सालेह को बैठे हुए देखा और मन में कहा कि तुम मुझसे पहले ही यहां पहुंच चुके हो. वह जिस जगह बैठा हुआ था वह शायद बाग का सबसे सुंदर हिस्सा था. उसके आसपास का फर्श पारदर्शी शीशे की तरह था. फर्श इतना पारदर्शी था कि दूर तक नीचे का मंज़र साफ दिख रहा था. फर्श के नीचे एक ढलती हुई हसीन शाम का मंज़र था जिसमें हरी भरी घास और रंगीन फूलों से ढके मैदान और उनके बीच में बहते दरया बहुत खुबसूरत लग रहे थे.
यहाँ से नज़र नीचे दौड़ा पर हसीन शाम नज़र आती तो आसपास एक महकती और चमकती हुई रात थी. नीचे अगर दरया बह रहे थे तो ऊपर पेड़ों की फलों से लदी डालयाँ थीं जो इशारा पाकर नीचे आने और मनपसंद मेवों की भेंट पेश करने के लिए बेकरार थी. कुछ सेवक एक कोने पर तरह तरह के पकवान पका रहे थे. उससे उठने वाली महक खाने के स्वादिष्ट होने का ऐलान कर रही थी. साथ ही शीशे से अधिक पारदर्शी पर चांदी के बने हुए बर्तन खूबसूरती से रखे हुए थे ... इस इंतजार में कि कब महफिल गर्म हो और हम अपने मालिक को खुश करें.
यह मंज़र देखने से मुझे एहसास हो रहा था कि यह सब कुछ मेरे लिए अजनबी नहीं है. मुझे याद आया कि में ब्रज़ख की ज़िन्दगी में मैं इसको देख चुका था. इसी बीच में मुझे महसूस हुआ कि सवारी की गति धीमी हो रही है. मैंने इशारा किया और स्क्रीन गायब हो गई. मेरी सवारी मंजिल पर पहुंच रही थी. ऊंचाई से जगमगाता हुआ महल इतना खुबसूरत लग रहा था कि मेरा दिल चाहा कि मैं यहाँ ठहर कर यह मंज़र देखता रहूं. इस मंज़र को देखने के लिए मैंने महल के आसपास तीन चक्कर लगाए. फिर मुझे खयाल आया कि सालेह नीचे मेरा इंतज़ार कर रहा है. इसलिए मैंने उतरने का फैसला किया. मेरी सवारी या शीश महल उसी जगह धीरे से उतर गया जहां सालेह मौजूद था.
मैं बाहर निकला तो सालेह ने हंस कर मेरा स्वागत किया और बोला:
''मैं यह समझ रहा था कि तुम उसे अर्श समझ कर उसका तवाफ़ कर रहे हो. अच्छा हुआ तुम ने सात चक्कर नहीं लगाए.''
उसके दिलचस्प टिप्पणी करने पर मैं भी उसकी हँसी में शामिल होकर उसके गले लग गया. फिर वह मुझसे अलग होते हुए बोला:
'' तुम पहले अपने महल का निरीक्षण करोगे या खाने पीने का इरादा है?''
'मैं तो इस घर की खूबसूरती से हैरान होकर रह गया. मैं सोच भी नहीं सकता कि किसी चीज़ को इतनी खूबसूरती में भी बनाया जा सकता है.'
'' अब्दुल्लाह! यह तो सिर्फ शुरुआत है. अब से लेकर दरबार वाले दिन तक जो कुछ भी तुम देखोगे कुरआन उस सब को शुरूआती महमान नवाजी का सामान कहता है. जो इसके बाद मिलेगा वह तो न किसी कान सुना है न किसी आँख ने देखा है और न किसी दिमाग पर कभी उसका ख्याल ही गुज़रा है.''
' तुम ठीक कहते हो. ये बातें कुरान और हदीस में बयान हुई थीं, लेकिन जन्नत उस से अलग है जो नक्शा कुरआन में बयान हुआ है. मेरा मतलब है कि उस बयान से कहीं ज्यादा खूबसूरत जगह है.'
'' इसकी वजह यह है कि जन्नत का कुरान में ज़िक्र कुरान नाजिल (उतरने) होने के समय के अरब वासियों के दिमाग के हिसाब से हुआ है. यानी जिन चीजों को उस वक़्त अरब वाले ज्यादा से ज्यादा बड़ी नेमत और ऐश की चीज़ें समझ सकते थे, उसी का बयान (वर्णन) किया गया. वह आदमी मूर्ख होगा जो जन्नत को सिर्फ उन्ही चीज़ों तक समझेगा.''
' तुम सही कहते हो, कुरान नाजिल होने के ज़माने के अरब वासी तो शायद बहुत सी चीज़ों का अंदाज़ा भी नहीं कर सकते थे जो मेरे जमाने यानी सूचना युग में आविष्कार हो चुकी थी. कुरआन ने अरबों की सोच के हिसाब से ही जन्नत के ऐश का नक्शा खींचा था. लेकिन भाई जिस सवारी पर मैं सवार होकर आया हूं, उसने तो मेरी कल्पना को भी हिला दिया.'
'' इस तरह की बहुत सी चीजें तुम अब और देखोगे. खैर अभी क्या इरादा है?''
मैं उसकी बात सुनी अनसुनी करते हुए आसपास फैले हुए हसीन माहौल में खोगया. मैं एक एक चीज़ और एक मंज़र को अपनी आंखों में समेट लेना चाहता था. सालेह ने मेरे मूड को देखा तो शरारत भरी मुस्कान के साथ कहने लगा:
'' तुम शायद हूरों को ढूंढ रहे हो. वह तुम्हारा स्वागत करने बाहर आईं थी, अब सब अपने महलों में लौट गई हैं. लेकिन तुम चाहो तो''
मैंने उसे वाक्य पूरा करने का मौका दिए बिना पूरी संजीदगी से जवाब दिया:
'मेरे समय में इंसानयत के दो बड़े पेशवा हुआ करते थे. एक कार्ल मार्क्स जो पेट को ही ज़िन्दगी की असल बताते थे और दूसरे फ़्रायड जो.... ''
मैंने वाक्य अधूरा छोड़ कर पल भर के लिए रुका जिस पर सालेह ने जोरदार ठहाका लगाया. मैंने खाने की खुशबू को सूंघते हुए कहा:
'मैं फिलहाल कार्ल मार्क्स की बात मानने का इरादा रखता हूं.'
.................
दुनिया में तमाम इंसानों की ज़िन्दगी समय की गुलामी में बीता करती थी. समय का पहिया पल, दिनों और महीनों और साल का सफ़र तय करता हुआ आगे बढ़ा करता था. पहरों और मोसमों के बदलने से समय के गुजरने का एहसास हुआ करता था. मगर मैं अब जिस दुनिया में था, वहां समय गुलाम था और इंसान आक़ा. पल, दिन और सप्ताह, महीने और साल,और सदियाँ इनके दिन खत्म हो चुके थे. समय बीतने का ज़माना पिछली दुन्याँ की तरह गुज़र चुका था. समय और काल के अवशेषों से अब जो कुछ बाकी था वह सिर्फ मौसम थे. और वह भी सारे हमारे काबू में थे. जन्नत के इंसानी राज्य में कहीं हमेशा सुबह की रौशनी छाई रहती, कहीं दोपहर के सन्नाटे, कहीं शाम की फैलती डूबती लाली, कहीं आधी रात की स्याह ख़ामोशी और कहीं पूरे बड़े चाँद की चांदनी, कहीं तारों भरी रातें, कहीं बहारों की घनी छाओं. हांलाकि जन्नत का मौसम बहुत अच्छा रहता था, लेकिन लोगों की मर्ज़ी के हिसाब से सर्दियां थीं तो कहीं गर्मी और कहीं बरखा की रुत थी, यानि जो भी दिल चाहे हर तरह का मौसम इंसान के लिए मौजूद था.
मैं एक बहुत बड़ी सल्तनत का अकेला राजा बन चुका था. मेरा प्यारा दोस्त सालेह इस नए संसार में मेरा साथी था. उसी ने मुझे बताया कि यह इतनी बड़ी सल्तनत बहुत बड़ी और फैली हुई काएनात का एक हिस्सा थी. इस नई व्यवस्था में बटवारा कुछ इस तरह था कि सभी जन्नत वालों की रहने की जगह इसी धरती पर थी जहां हजारों लाखों साल तक इंसान की आज़माइश होती रही. जन्नत वालों में दो कक्षाएं थीं. एक आम लोग दुसरे ख़ास लोग. आम लोग या कम दर्जे (स्तर) के आमाल वाले वो लोग थे जिन्हें इनाम में एक या एक से ज्यादा सितारे दे दिए गए थे. यह बताने की शायद जरूरत नहीं कि यह सितारे अब वेसे नहीं रहे थे जिनको हम दुनिया में जानते थे बल्कि बदलकर खुबसूरत जन्नतों और वादियों में बदल चुके थे.
ख़ास लोगों में पहले शोहदा और नबियों के साथी थे. उनको अरबों खरबों सितारों की आकाशगंगा (गैलेक्सी) की बादशाही दी गई थी. मैं ऐसी ही एक आकाशगंगा का राजा था. उनके ऊपर नबियों की क्लास थी जो अनगिनत आकाशगंगाओं के शासक थे.
फिलहाल यह एक राज़ था कि किसे कौन सी जगह की बादशाही मिलनी है, वहाँ क्या करना होगा. सालेह ने मुझे बताया कि यह सब कुछ अल्लाह दरबार के दिन बयान करेंगे. इसी दिन हर इंसान को उसके साम्राज्य औपचारिक रूप से दे दिए जाएंगे. फिलहाल तो लोग केवल पृथ्वी पर रहते थे और कहना सालेह का के उनको जो नेअमतें यहां मिल रही थीं वे शुरुआती महमान नवाज़ी की चीजें थीं. असल नेअमतें जो किसी आँख ने देखी, न किसी कान ने सुनी न किसी दिमाग में उनका ख्याल गुज़रा वह दरबार वाले दिन के बाद ही मिलना शुरू होंगी. लेकिन तब तक लोगों को प्रोटोकॉल उन की हैसियत के अनुसार ही दिया जा रहा था.
इस प्रोटोकॉल का इज़हार उन समारोहों, मजलिसों और दावतों में होता जो जन्नत वाले आपस में एक दूसरे को दे रहे थे. हालांकि अभी तक सारे जन्नती जन्नत में नहीं आए थे, मगर यहाँ भरपूर जीवन शुरू हो चुका था. पीछे हष्र में सिर्फ इतना हो रहा था कि एक के बाद एक करके नेक लोग जन्नत में दाखिल हो रहे थे, मगर यहाँ समय चूंकि रुका हुआ था इसलिए सिर्फ दो लोगों के दाखिल (प्रवेश) होने के बीच भी अनगिनत साल गुज़र जाते थे. मेरा तो अंदाज़ा यही था और जिसका सालेह ने भी समर्थन किया था कि दरबार उसी समय लगेगा जब सारे जन्नती जन्नत  में आ जाएँगे. यही जन्नत की शरुआती ज़िन्दगी थी. इसी दौरान में मजलिसे और समारोह हो रहे थे. ज्यादा तर नबी हज़रात ही थे जो अपनी और दुसरे नबियों की उम्मतों के शुरू में आने वाले नेक लोगों के सम्मान में दावतें कर रहे थे.
इन्हीं मजलिसों में मेरी कई लोगों से मुलाकात हुई. मैं हालांकि दुनिया में बहुत कम कम लोगों से मिला करता था, लेकिन जन्नत में आने के बाद मैंने महसूस किया कि मैं आदत के खिलाफ बहुत सोशल किसम का हो चुका हूं. इसलिए मेरे नए नए दोस्त बनने लगे. लोगों के हालात और उनकी पिछली ज़िन्दगी के तजुर्बे मिलने लगे. मेरे लिए ये बात अजीब तो नहीं थी मगर फिर भी मुझे थोडा आश्चर्य हुआ कि शुरूआती सफल लोगों में अधिकतर गरीब और परेशान हाल लोग थे. यह वो लोग थे जिन्होंने दुनिया में बहुत परेशानी और दुख झेले, लेकिन हमेशा सब्र (धैर्य) और शुक्र से काम लिया. मैंने यह बात खास तौर पर नोट की कि ऊँचे दर्जे के इन शुरूआती जन्नतयों की एक बात समान थी. यह सब सब्र करने वाले थे जिन्होंने बुरे से बुरे हालात में भी अल्लाह पर भरोसा किया और इत्मिनान और खुदा पर भरोसे का दामन कभी नहीं छोड़ा.
...........................................................................................................जारी है....

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