गुरुवार, 12 जुलाई 2012

भाग ४.१ नाएमा


वापसी पर मैंने सालेह से कहा:
' यहां के जीवन में तो परिवारों में बड़ी टूट फूट हो जाएगी. किसी की पत्नी रह गई और किसी का पति रह गया.
'' हां यह सब तो होगा. आगे बढ़ने का मौका तो वह दुनिया थी जो गुज़र गई. यहां जो पीछे रह गया सो रह गया. लेकिन यहां कोई अकेला नहीं रहेगा. रह जाने वालों के इंतजार में नहीं रुकेगा. नए रिश्ते नाते बन जाएँगे. नए जोड़े बन जाएंगे. नई शादियां हो जाएंगी.''
'मगर यहां वैसे परिवार तो नहीं होंगे जैसे दुनिया में होते थे.'
'' तुम ठीक समझे हो. इंसान की कुछ कमजोरियों की बुन्याद पर दुनिया में परिवार बनाए गए थे,  बच्चों की परवरिश और बूढों की देखभाल इसका असल मकसद था. परिवार की मजबूती को बनाए रखने के लिए मर्दों को परिवार का मुखिया बनाया गया. इसी परिवार को जोड़े रखने के लिए औरतों को कई मामलों में मर्दों से कमज़ोर बनाया गया था, जबकि मर्दों को जरूरी तौर पर औरतों का मोहताज कर दिया गया था. वह मर्दों के लिए नेमत भी थीं और जरूरत भी. उसके बिना दुनिया का कामकाज चल नहीं सकता था. लेकिन अब यहाँ हालत अलग होंगे. औरतें मर्दों के लिए नेमत तो रहेंगी, लेकिन खुद उनकी मोहताज नहीं होंगी. इसीलिए उनकी कद्र ओ कीमत बहुत बढ़ जाएगी और उनका नख़रा भी.''
' इसका मतलब यह है कि इस दुनिया में औरत होना ज्यादा फाएदे की बात है. औरत जब चाहेगी मर्द का ध्यान हासिल कर लेगी, लेकिन मर्दों का औरतों पर कोई ज़ोर नहीं होगा हालांकि वह उनके जरूरत मंद होंगे.'
''हां यह बात ठीक है.''
' तो हम मर्द तो फिर नुकसान में रहे.'
'' हां नुकसान में तो तुम लोग रहोगे.''
' यह तो बड़ी समस्या है. इस समस्या का कोई हल है?'
'' जन्नत की नई दुनिया में हर चीज का हल होता है. हूरें इसी समस्या का हल है.''
'मगर उनसे तो औरतों को जलन महसूस होगी.'
'' नहीं ऐसा नहीं होगा. हूरें अपने स्टेटस और खूबसूरती में कभी जन्नती औरतों के बराबर नहीं आ सकतीं. इसलिए वह जन्नती औरतों के लिए कभी ईर्ष्या और जलन का कारण नहीं बनेंगी. जन्नत की औरतें अपने आमल (कर्मों) की वजह से हूरों से कहीं ज्यादा खुबसूरत और बहुत बड़े स्टेटस की मालिक होंगी. उन्हें इसकी परवाह नहीं होगी कि उनके पति की और रुचियां क्या हैं. वैसे भी जन्नत इंसानों की नहीं ईश्वर की दुनिया है. तुम जानते हो कि इंसान और ईश्वर की दुनिया में क्या अंतर हो सकता है?''
मैं चुपचाप सवालिया निगाहों से उसे देखता रहा. उसने अपने सवाल का खुद ही जवाब दिया:
'' इंसानों की दुनिया में विरोधी से नफरत की जाती हैं. मगर ख़ुदा की दुनिया में विरोधी भी महबूब होता है.''
' यह तो लाजवाब है, लेकिन इस समस्या का फैसला जन्नती औरतें ही कर सकती हैं.'
'' जन्नत पाक (पवित्र) लोगों के रहने की जगह है. उनकी पाकीज़गी (पवित्रता) खुदा की महरबानी (कृपा) से बुरे जज़्बात (नकारात्मक भावना) को उनके पास फटकने नहीं देगी.'' सालेह ने मेरी बात का सीधा जवाब देने के बजाय एक उसूली बात बतादी और फिर उसको और खोलते हुए कहा:
'' दरअसल तुम अभी तक इंसानी दुनिया के असर से नहीं निकले हो. पिछली दुनिया आज़माइश की दुनिया थी. इसलिए वहाँ सकारात्मक भावनाओं के साथ नकारात्मक भावनाएँ भी रख दी गई थीं. यह नकारात्मक भावनाएँ हर इंसान के अंदर से उठती थी. हर ईश्वर को मानने वाले मर्द और औरत की यह जिम्मेदारी थी कि वह हर तरह के अच्छे और बुरे हालत और माहौल में रहने के बावजूद अपने अंदर पैदा होने वाले नकारात्मक भावनाओं पर काबू पाए. यह बिल्कुल ऐसा ही है जैसे पसीना, बदबू, पेशाब और मल वगैराह इंसानी शरीर से निकलने वाली गंदगियाँ थीं. लेकिन हुक्म था कि हर गंदगी से अपने वुजूद (अस्तित्व) को पाक रखो तो तुम लोग पानी से नहाते व तहारत करते थे. इसी तरह नकारात्मक भावना भी अंदर से पैदा होने वाली गंदगियाँ थीं. गुस्सा, नफरत, झूठ, जलन , घमंड, बैर, ज़ुल्म (अत्याचार) और उन जैसी सभी गंदगियों के बारे में हुक्म था कि सब्र के पानी से उन्हें धो डालो. ईश्वर को मानने वाले मर्द और औरत ज़िन्दगी भर यह तकलीफ उठाते रहे. लेकिन आज के दिन उन्हें हर ऐसी मेहनत से आज़ाद कर दिया जाएगा.''
' यानी?'
'' मतलब यह कि न उनके शरीर से गंदगियाँ निकलेंगी और न उनके मन में नकारात्मक भावना और विचार ही पैदा होंगे. जन्नत खुबसूरत लोगों के रहने की एक खूबसूरत जगह है जहां कोई बदसूरत ख्याल भी बाकी नहीं रहेगा.''
' लेकिन मेरे हिसाब से इस बहस में रोचक बात यह सामने आई कि हूरें जन्नत की औरतों से कमतर हैं और बस गुजारे लायक हैं. तभी उनसे और औरतों को जलन नहीं होगी.'
फिर मैंने हँसते हुए अपनी बात को बढ़ाया:
' मुसलमान बिना वजह हूरों के हुस्न की तारीफ़ सुन कर उनके दीवाने बने और बेवजह लोगों के ताने सुनते रहे.'
मेरे मजाक के जवाब में सालेह ने गंभीरता से कहा:
'' यह दोनों तुम्हारी गलत फहमियां हैं. बात यह है कि जन्नत में तुम मर्द, महिलाओं के लिए कोई कीमती चीज़ नहीं रहोगे जिस की वजह से वह किसी से नफरत करें. रही हूरें तो उनकी इतनी बेईज्जती मत करो कि उनके लिए 'काम चलाऊ' और 'गुजारे के लायक' जैसे शब्द बोलो. वह जन्नती औरतों जैसी तो नहीं, मगर फिर भी ऐसी नहीं है कि तुम उन्हें कम समझो.
'अच्छा तो कैसी हैं वह?'
''मैं बताता हूँ वह कैसी है. वह हूरें इंसानी जमाल का आखरी नमूना और जिस्मानी खूबसूरती का आखरी शाहकार हैं. उनका बेमिसाल हुस्न और बाकमाल रूप; गुलाबी पाउडर के सिंगार, गजरों के तार, मोतियों के हार और जेवरों की झनकार का मोहताज नहीं होता. उनके वुजूद (अस्तित्व) की बनावट के लिए काएनात अपना हर हुस्न वार देती है. फूल अपने रंग, हवा अपना अहसास, नदी अपना बहाव, ज़मीन अपना ठहराव, तारे अपनी चमक, कलयाँ अपनी महक, चाँद अपनी रोशनी, सूरज अपनी किरणे, आसमान अपना संतुलन, चौटयाँ अपनी ऊंचाई और वादयाँ अपने उतार चढ़ाओ जब जमा करते हैं तो एक हूर वुजूद (अस्तित्व) में आती है.
उनका हुस्न खूबसूरती के हर पैमाने को आखरी दर्जे में पूरा करता है. उनका कद लंबा और रंग हल्का गुलाबी गोरा है. पूरे शरीर की त्वचा बेदाग और साफ़ है. आँखें बड़ी बड़ी और गहरी काली हैं, लेकिन हर लिबास (ड्रैस) के हिसाब से उस के रंग में ढल सकती हैं. उनकी भवें कमान और पलकें बड़ी बड़ी हैं. उनकी नज़र आमतौर पर झुकी रहती है, मगर जब उठती है तो तीर की तरह दिल तक जा पहुँचती हैं. उनका चेहरा किताब, माथा विशाल, गाल गुलाबी, बोलने का अंदाज़ मीठा और होंठ गुलाब की तरह नाज़ुक और दांत मोतियों की तरह चमकदार हैं. उनके बाल रेशम की तरह मुलायम और चमकदार और उनके सफेद रंग के उलट गहरे काले पिंडलियों तक लंबे हैं. उनकी आवाज़ सुरीली गाने की तरह कान में रस घोलती हैं, बातों से मोती झड़ते और मुस्कान से रुत हसीन हो जाती है. उनके वुजूद (अस्तित्व) में हया का इत्र और साँसों में खुशबुओं की महक है. उनके लहजे में नरमी, चलने के अंदाज में दिलबरी और बोलने के तरीके में शान और प्रतिष्ठा है. उनके शरीर पर मखमली कपड़े और चमकते गहने बादलों से छिपते खुलते पूरे बड़े चाँद का मन्ज़र (दृश्य) पेश करते हैं.''
' तुमने हूरों को देखा है?'
'' नहीं! उन्हें किसी ने नहीं देखा. सिर्फ उन के हालात सुने हैं. वही तुम्हें सुना रहा हूँ.''
यह कहते हुए उसने अपनी बात जारी राखी.
मैंने कहा: 'तुम्हारी बातें हकीकत नहीं, कहानियां और सपना लग रही हैं. लेकिन अगर सपना है तो बहुत खुबसूरत सपना है.'
'' यह सपना अभी ख़त्म नहीं हुआ. सुनो! एक हूर का वुजूद (अस्तित्व) बल खाती नदी की तरह ढलता है जो आसमान की काली घटाओं से बर्फ जैसे सफ़ेद बादलों से अपना सफ़र शुरू करती, चोटियों पर डेरा डालती, झरनों और बूंदों की सूरत में निकलती, ढलानों में उतरती, मैदानों में ठहरती, बुलंदियों को छूती, उतार की ओर बढ़ती, टीलों को बहाती हुई वादीं तक पहुंचती है और आख़िरकार नेकी, रहम दिली और तक़वा (जुनाहों से बचना) के इस समंदर पर अपना वुजूद निछावर कर देती है जो जीवन सब्र (धैर्य) और तक़वा के साथ बिताया. यह इसलिए होता है कि यह नदी अपने पूरे सफर में किसी नापाकी या किसी प्रदूषण का शिकार नहीं होती. हर गैर निगाह से अपने आप को बचाती और स्पर्श से दूर रखती है. यह हज़ारों मील का सफ़र पाकदामनी के साथ तय करती है इसलिए पाकदामन से कम किसी को क़ुबूल नहीं करती. और आखिरकार समंदर की मौज का सा उनका वुजूद (अस्तित्व) अपने समुद्र में हमेशा के लिए समाँ जाता है.''
' मुझे समझ नहीं आता कि तारीफ हूरों की करूँ या तुम्हारे बयान करने की.'
'' तारीफ़ तो बस ईश्वर की होनी चाहिए.''
' इसमें तो कोई शक नहीं कि इबादत (पूजा) और तारीफ तो खुदा ही की होनी चाहिए. लेकिन यह बताओ कि क्या यह हूरें इंसान होंगी?'
''हां यह भी इंसान हैं. इसी तरह जन्नतियों के वह नौकर जिन्हें गुलमान कहा जाता है, वह भी इंसान ही हैं. यह वह लड़के हैं जो हमेशा लड़के ही रहेंगे.''
' यह लड़के क्यों रहेंगे, नौकर और सेवक तो वह बेहतर होता है जो ज्यादा उम्र का हो और ज्यादा समझ रखता हो?' मैंने दिमाग में आने वाली आपत्ति जड़ दी.
'' नहीं ऐसा नहीं है. यह कम उम्र होने के बावजूद बला के समझदार और अच्छी आदत के होंगे. जन्नत वालों की महफ़िलों में जब किसी जन्नती का ड्रिंक खत्म होगा तो उसकी नज़र देखेंगे और बिना कुछ कहे सुने उसके गिलास में जरूरी ड्रिंक इतनी ही मात्रा में डालेंगे जितनी उसे जरूरत होगी. इसलिए उनकी समझ बूझ और अच्छे स्वभाव की तो कोई हद नहीं होगी लेकिन उन्हें लड़कों के रूप में इसलिए रखा जाएगा कि जिस्मानी तौर पर हर पल मुस्तैद रहें और पल भर में हर हुक्म बजालाएँ . उनका लिबास (ड्रैस), रूप और हुलया उन्हें ऐसा बना देगा जैसे महफ़िल में कीमती मोती बिखरे हुए हैं. उनके कभी ना बढ़ने वाली कम उम्र के लड़के बनाए जाने की दूसरी वजह यह है कि कभी उन को वैवाहिक संबंध की जरूरत न हो. जबकि हूरें पुरे शबाब की उम्र को पहुंची हुई लड़कियां होंगी और जन्नतियों की पत्नियाँ होंगी.''
' क्या हूरे और गुलमान को जन्नतियों के लिए खास तौर से बनाया जाएगा?'
'' यह एक लम्बी कहानी है.''
' हमारे पास समय की कौन सी कमी है. यह लंबी कहानी भी सुनाते जाओ.'
'' सुनो! आज का दिन इंसानों का पहला हष्र का दिन नहीं है.''
' क्या मतलब! क्या क़यामत पहले भी आ चुकी है?'
'' क़यामत तो पहले नहीं आई लेकिन सारे इंसान एक बार पहले भी पैदा किए जा चुके हैं.''
' यह कब हुआ था?'
'' यह तो तुम अल्लाह से जन्नत में जाकर खुद पूछना. मुझे तो इतना मालूम है कि यह हुआ था. दरअसल जिस आज़माइश में इंसान को डाला गया था, यह पहला हष्र इस कहानी का दूसरा भाग है. पहला भाग ये था कि अल्लाह ने सभी जीवों के सामने यह मौका रखा था कि वह जन्नत में खुदा के पास हमेशा के लिए रहने का सौभाग्य प्राप्त करें. लेकिन इसके लिए उन्हें दुनिया में कुछ वक़्त ऐसे बिताना होगा कि खुदा उनके सामने नहीं होगा. सिर्फ उस के हुक्म उनके सामने आएंगे और उन्हें बिन देखे खुदा की इबादत (पूजा) और इताअत (आज्ञा पालन) का रास्ता अपनाना होगा. ज़मीन की हुकूमत कुछ समय के लिए अमानत के तौर पर उनको दे दी जाएगी और ज़मीन पर अपनी हुकूमत के दौरान उन को ये साबित करना होगा कि वह ताकत होने के बावजूद बिन देखे ख़ुद ईश्वर की बात और हुक्म मानने के लिए तैयार है. जिसने इस ताकत और अमानत का सही इस्तेमाल किया उसका बदला जन्नत में परमेश्वर के पास हमेशा रहने का मौका होगा, और गलत इस्तेमाल करने पर जहन्नम की सज़ा मिलेगी''
' तो फिर क्या हुआ?'
'' फिर यह हुआ कि सब जीव डर ​​के पीछे हट गए. क्योंकि जन्नत जितनी खुबसूरत है, जहन्नम उतनी ही भयानक जगह है. हष्र की सख्ती को तो अभी तुमने अपनी आँखों से देखा है. उसके बाद कौन बुद्धि मान होता जो इस इम्तिहान में कूदने की कोशिश करता.''
' और शायद हम जज्बाती इंसान इस इम्तिहान में कूद पड़े.' मैंने बीच में कहा.
'' हाँ यही हुआ था. लेकिन खुदाई अमानत उठाने का यह इरादा इंसानी रूहों ने मिलकर सामूहिक तौर पर किया था. इसलिए खुदा के इन्साफ की मांग थी कि हर इंसान से अलग अलग भी यह पता किया जाए कि वह किस हद तक इस इम्तिहान में उतरने के लिए तैयार है.
अब्दुल्ला! यह इसलिए हुआ कि तुम्हारा रब किसी पर राई के दाने के बराबर भी ज़ुल्म नहीं करता. सो उसने सब इंसानों को पैदा किया. सबके सामने अपना पूरा प्लान रखा. जाहिर है ज़्यादातर इंसान पहले ही इस मकसद (उद्देश्य) के लिए तैयार थे. इसीलिए पूरे समझ बूझ के साथ इस इम्तिहान में कूदने के लिए तैयार हो गए. लेकिन जिन लोगों ने यह जोखिम लेने से मना कर दिया, उन सब के बारे में यह फैसला हुआ कि इंसानों के घरों में जो बच्चे पैदा होंगे और बालिग होने से पहले मर जाएंगे , उन में इनकी रूह को भेजा जाएगा तो उन लोगों को यही भूमिका सौंप दी गई. और यही बच्चे बच्चियां जन्नत की बस्ती में हूर और गुलामान बना दिए जाएँगे.''
' और बाकी लोग कड़े इम्तिहान में उतरने के लिए तैयार हो गए?'
'' इसमें भी रहम करने वाले खुदा ने बहुत रहम किया था. तुम जानते हो कि दुनिया में सब का इम्तिहान एक जैसा नहीं होता. यह इम्तिहान भी उस दिन हर इंसान ने अपनी मर्ज़ी से चुन लिया था. जो बहुत साहसी लोग थे उन्होंने नबियों का समय चुन लिया. इन लोगों का इम्तिहान यह था कि चरों तरफ फैली गुमराही के दौर में नबियों की दस्दीक (पुष्टि) करके उनका साथ दें. उनकी कामयाबी के लिए असल शर्त यह थी कि वह पूरी तरह किये जारहे विरोध में भी ईमान पर जमे रहे इस राह में हर मुश्किल को सहन करें और नबियों के पैगाम (संदेश) को आगे पहुँचाएँ. इसलिए उनका इनाम भी बड़ा रखा गया, लेकिन उन्हें नबियों की सीधे रहनुमाई (मार्गदर्शन) मिलने के आधार पर इनकार करने की सूरत में अज़ाब भी उतना ही भयानक होता . इन्हीं लोगों में एक तरफ हज़रत अबू बक्र (मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के एक साथी) जैसे लोग थे और दूसरी ओर अबू लहब (मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम का एक दुश्मन) जैसे सच्चाई के दुश्मन भी.
आज़माइश की दूसरी केटेगरी वह थी जिसमें लोगों ने मुसलमानों और नबियों के बाद उनकी उम्मत में शामिल होने का इम्तिहान चुना. इन लोगों की परीक्षा ये थी कि बाद के दिनों में पैदा होने वाली गुमराहियों, फिरका वारीयत (सांप्रदायिकता), बिदत (दीन में नई बातों को मिलाना) और बेपरवाही से बच कर शरीयत (खुदाई क़ानून) की ज़रूरतों को हर हाल में निभाते रहें और समाज से कटने के बजाय लोगों में नेकी को फैलाएँ और बुराई से रोकें. यह जुम्मेदारियां उन पर इसलिए लगाई गईं थी कि उनके पास नबियों की शिक्षा थीं और वह जन्म से मुसलमान थे जिन्हें इस्लाम क़ुबूल करने के लिए किसी बड़ी परेशानी से नहीं गुजरना पड़ा. इसका मतलब यह था कि आम इंसानों की तुलना में उनकी रहनुमाई (मार्गदर्शन) ज्यादा की गई, उन्हें ज्यादा फल कमाने के मौके दिए गए, लेकिन बेपरवाही करने की सूरत में उनका हिसाब किताब इतना ही सख्त होना तय पाया.''
' मेरा और अन्य मुसलमानों का संबंध इसी गिरोह से था ना?'
''हां तुम ठीक समझे. तीसरा गिरोह उन लोगों का था जिन्होंने अपना इम्तिहान बहुत सादा रखा. ये सारे लोग नबियों की सीधी रहनुमाई (मार्गदर्शन) के बिना पैदा किए गए और उनका इम्तिहान  फितरत में मौजूद एक इश्वर के होने की निशानी और निर्देश थी. यानी एकेश्वरवाद और अख्लाक़ (नैतिकता) का इम्तिहान. उन्हें आम मुसलमानों की तरह शरीयत के इम्तिहान में नहीं डाला गया न नबियों का साथ देने के कड़े इम्तिहान में. जाहिर है कि उनका हिसाब किताब सबसे हल्का होगा, उनके ज्यादा अज़ाब की आशंका भी कम है और फल पाने के मौके भी उसी हिसाब से कम हैं.''
' और नबियों का मामला क्या था?'
'' उन्होंने सबसे सख्त इम्तिहान चुना. इसलिए उनकी रहनुमाई (मार्गदर्शन) सीधे ईश्वर की तरफ से की गई और इसीलिए उनकी पकड़ का स्तर भी सबसे कठोर था. तुम्हें तो पता है कि हज़रत यूनुस (एक नबी) के साथ क्या हुआ था. उन्होंने कोई गुनाह नहीं किया था. अपनी अक्ल  से एक फैंसला लिया था. लेकिन देखो उन्हें किस तरह खुदा ने मछली के पेट में बंद कर दिया था.''
फिर उसने लंबी बातचीत का खुलासा करते हुए कहा:
'' असल कानून (मूल सिद्धांत) जो हर तरह के गिरोहों में काम कर रहा है वह एक ही है. ज्यादा रहनुमाई, ज्यादा सख्त हिसाब किताब और बड़ी सज़ा बड़ा इनाम. कम रहनुमाई (मार्गदर्शन), हल्का हिसाब किताब कम सज़ा कम इनाम. मगर कौन सा इन्सान किस गिरोह से होगा इस का फैसला इंसानों ने खुद किया है, खुदा ने नहीं.''
' इसका मतलब यह हुआ कि दुनिया में मेरी रहनुमाई ज्यादा की गई थी तो यह हकीकत में मेरी अपनी मांग की वजह से की गई थी?.'
'' हाँ बिल्कुल ऐसा ही है. इसी लिए तुम आज इतना ऊंचा दर्जा पाने में कामयाब हो गए. अगर तुम इस रहनुमाई की कद्र न करते तो तुम्हें उतना ही सख्त अज़ाब दिया जाता.''
' यार मैंने कितना बड़ा रिस्क ले लिया था.'
'' यही तुम्हारी दुनिया का नियम था. No Risk No Gain''
मुझे इस पल एहसास हुआ कि मैंने क्या पा लिया है और किस खतरे से निकल गया. मैं आप से आप ही सजदे में गिर गया. देर तक मैं अपने रब का शुक्र अदा करता रहा जिसने मुझे इस महान परीक्षा में सफल कर दिया था. इतने में सालेह ने मेरी पीठ थपकते हुए मुझसे कहा:
'' अब्दुल्ला! उठो.''
मैं उठकर खड़ा हुआ और सालेह को दोनों हाथों से पकड़ कर बोला:
'' सालेह अब में कभी नहीं मरूंगा. मेरी ज़िन्दगी में कभी कोई बीमारी, बुढ़ापा, डर, गम, उदासी और मायूसी नहीं आएगी. मेरा दिल चाह रहा है कि मैं उछ्लूं, कूदुं, नाचूं, जोर जोर से हंसू और दुनिया को चीख चीख कर बताऊँ कि लोगो मैं कामयाब हो गया. लोगो मैं कामयाब हो गया. आज मेरी बादशाहत शुरू होती है. आज से मेरी ज़िन्दगी शुरू होती है.'
सालेह चुप चाप मुस्कुराते हुए मुझे देखता रहा. मेरे चुप होने पर वह बोला:
'' ज़िन्दगी तो शुरू होगी. अभी तो हमें वापस हष्र में लौटना है. कई तरह के हालात देखने हैं. ख़ुदा ने तुम्हें बड़ा खास मौका दिया है. आओ हष्र के मैदान में चलते हैं.'' 
.........................................................................................................जारी है....

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