हष्र के मैदान में माहौल बहुत सख्त और दुखदाई था. एक ओर माहौल और हालात (परिस्थितियों) की सख्ती थी तो दूसरी तरफ लोगों को यह आशंका खाए जा रही थी कि आगे क्या होगा. निराशा और परेशानी के अलावा लोगों में भारी गुस्सा था. यह गुस्सा अपने आप पर भी था और अपने लीडरों और गुमराह करने वाले अपने बड़ों पर भी था. इसलिए जो गुमराह करने वाला साधू संत पीर अपने अनुयाईयों के हाथ आजाता वह लोग उसकी पिटाई शुरू कर देते थे. यह जैसे अज़ाब से पहले एक तरह का अज़ाब था.
ऐसे तमाशे इस वक़्त इस मैदान में जगह जगह हो रहे थे.लोग अपने गुमराह करने वाले नेताओं को अपने गुरुओं को अपने आलिमों को अपने पीरों को और दरवेशों को भी बेदर्दी से पीट रहे थे और अपना गुस्सा निकाल रहे थे. मगर अब क्या फायदा था! लेकिन इस तरह परेशान और बादहाल लोगों को एक तरह का तमाशा देखने को जरूर मिल रहा था.
हम इस तरह के तमाशे देखते हुए आगे बढ़ते रहे. रास्ते में मैंने सालेह से कहा:
'मैं तो यह सोच कर परेशान हूँ कि दुनिया में कुछ देर गर्मी से हमारी हालत बहुत ख़राब हो जाती थी. यहां तो इतना लंबा समय हो चुका है लेकिन लोगों को इस मुसीबत से छुटकारा नहीं मिल रहा. तुम्हारे साथ होने के वजह से मुझे तो यहाँ गर्मी और तकलीफ बिल्कुल महसूस नहीं हो रही, लेकिन जो लोग यहाँ हैं, उनके साथ तो वाकई बहुत बुरा मामला हो रहा है.'
'' अपने शब्दों को सही कर लो. बुरा नहीं हो रहा इन्साफ हो रहा है. हां मामला बेशक सख्त है और इसी वजह से बाकि जीवो ने इख़्तियार (अधिकार) और इक्तिदार (सत्ता) के इस अमानत के बार को उठाने और सज़ा जज़ा के कड़े इम्तिहान में खड़े होने से मना कर दिया था.''
'मेरी समझ में नहीं आता कि आम लोगों के साथ इतनी मुश्किल है तो जिन लोगों ने सारे इंसानों की तरफ से हुक़ूमत और अधिकार का बार उठाया उनके साथ क्या हुआ होगा.'
इस बात से मेरा इशारा जालिम बादशाहों नेताओं और जनता का माल हड़प कर जाने वाले अधिकारियों की तरफ था.
'' देखना चाहते हो कि उनके साथ क्या हो रहा है?''
मैंने हाँ में गर्दन हिलाई. सालेह एक ओर बढ़ते हुए बोला:
'' अभी तक हम सिर्फ ऐसे इलाकों में घूम रहे थे, जहां वे लोग थे जिनका हिसाब किताब होना है. जिस तरह अभी पीछे वो खास नेक लोगों का मामला था कि अर्श के नीचे खुदा की नेमतों में खड़े हैं और उनका हिसाब किताब नहीं होना सिर्फ औपचारिक तौर पर उनकी कामयाबी का ऐलान होना है, इसी तरह कुछ बदबखत (बहुत बुरे) लोग हैं जिनके बुरे कामों के आधार पर उनकी जहन्नम का फैसला पहले ही हो चुका है. हम उन्हीं की ओर चल रहे हैं.''
हम जैसे आगे बढ़ रहे थे गर्मी और बहुत तेजी से बढ़ती जा रही थी. मुझे इसका अंदाजा इस बढ़ते हुए पसीने से हुआ जो लोगों के शरीर से बह रहा था. लोगों के शरीर से पसीना बूंदों की सूरत में नहीं बल्कि धार के रूप में बह रहा था, मगर ज़मीन इतनी गरम थी कि पसीना ज़मीन पर गिरते ही गायब हो जाता था. प्यास के मारे लोगों की जुबान बाहर निकल आई थी और किसी थके और प्यासे ऊँट की तरह हाँफ रहे थे, लेकिन पानी का यहां क्या सवाल?
उनके चेहरों पर परेशानी से कहीं ज्यादा डर के साये थे. यह डर किस चीज़ का था यह भी थोड़ी ही देर में मालूम हो गया. अचानक लोगों के बीच एक अजीब हलचल मच गई. लोग इधर उधर भागने लगे. भीड़ छटी तो देखा कि एक आदमी के पीछे दो फ़रिश्ते दौड़ रहे हैं. यह वैसे ही फ़रिश्ते थे जैसे अर्श के साये की तरफ़ जाते हुए हमें दिखाई दिए थे. एक के हाथ में आग का कोड़ा था और दूसरे के हाथ में ऐसा कोड़ा था जिसमें कीलें निकली हुई थीं.
वह आदमी उनसे बचने के लिए जी तोड़ कोशिश कर रहा था, लेकिन यह फ़रिश्ते उसका पीछा नहीं छोड़ रहे थे. साफ नजर आ रहा था कि फरिश्ते जानबूझ कर उसे थका रहे हैं. वह उसके पास पहुंचकर उसे एक कोड़ा मारते और कहते जाते थे कि ऐ बादशाह (शासक) उठ और अपने राज्य में चल. कोड़ा पड़ते ही वह व्यक्ति चीख़ता चिल्लाता गिरता पड़ता भागने लगता. फिर वह फरिश्ते उसके पीछे दौड़ने लगते.
मुझे उनका परिचय पाने के लिए ज्यादा इंतजार नहीं करना पड़ा. सालेह ने खुद ही बताया:
'' यह तुम्हारे जमाने के देशो के बड़े अधिकारी हैं.''
कुछ ही देर में अधिकारी आग कीलों वाले कोड़े खाकर ज़मीन पर गिर चुके थे. जिसके बाद फरिश्तों ने उन्हें एक लंबी जंजीर में बाँधना शुरू किया जिसकी कड़ियां आग में दहकाकर लाल की गई थी. बड़े बड़े नेता और मंत्री और गुमराह करने वाले धर्म गुरु बेबसी से तड़प रहे थे और रहम की भीक मांग रहे थे, लेकिन फरिश्तों को क्या पता था कि रहम और दया क्या है. वह बेदर्दी से उन्हें बांधते रहे. जब उनका पूरा शरीर जंजीरों से जकड़ गया तो इतने में कुछ और फ़रिश्ते आ गए. पहले फरिश्ते उनसे बोले:
'' हमने सबसे बड़ों को पकड़ लिया है. तुम जाओ और इनके सारे चेले चांटों और साथियों को पकड़ लाओ जिन्होंने इनकी मदद की और इनके अत्याचार, भ्रष्टाचार और लोगों को झूंटी बाते बताने में शामिल थे.''
इसलिए लोगों में बड़े पैमाने पर वहीँ हलचल, भाग दौड़ और मारपीट शुरू हो गई. थोड़ी ही देर में एक पर्भावी लोगों का गिरोह जिसमें मंत्रियों, अमीर, सलाहकार, जागीरदार, पूंजीपति और हर तरह के ज़ालिम जमा थे, गिरफ्तार हो गया. इसके बाद फरिश्तों ने सब को सर के बालों से पकड़ कर मुँह के बल घसीटना शुरू कर दिया. वह हमारे पास से गुज़रे तो उनकी खालों के जलने की बदबू हर तरफ वातावरण में बिखरी हुई महसूस हुई. इस बदबू का एहसास होते ही सालेह ने मेरी कमर पर हाथ रखा तो मेरी जान में जान आई. वे उनको हमारे सामने से खींचते हुए और बाईं ओर ले गए. मैं उनके घसीटे जाने से जमीन पर बन जाने वाली लकीरों और उन पर पड़े खून के धब्बों को देखता रहा, जो उनके शरीर से रिस रहा था.
...............
यह खोफनाक मंज़र देखकर मेरे मुंह से आह निकली. मैंने दिल में सोचा:
कहाँ गई उनकी सत्ता? कहाँ गए वो शानदार ऐश के दिन? कहाँ गए वो आलीशान महल, महंगे कपड़े, विदेशी दौरे, शानदार वाहन, इज्ज़त और शान व शौकत? आह! इन लोगों ने कितने छोटे और कितने कम समय के मज़ों के लिए कैसा बुरा अंजाम चुन लिया.
सालेह बोला:
'' यह सब ज़ालिम, भ्रष्ट और अय्याश लोग थे जिनकी बर्बादी का फैसला दुनिया ही में हो चुका था. लेकिन ये उनकी असल सज़ा नहीं. असल सज़ा तो जहन्नम में मिलेगी. जिस तरफ फरिश्ते उन्हें ले जा रहे हैं वहां से जहन्नम बिल्कुल करीब है. उसी जगह से उन्हें हिसाब किताब के लिए ले जाया जाएगा जहां उनकी हमेशा की ज़िल्लत और अज़ाब का फैसला सुनाया जाएगा. फिर उन्हें दोबारह बाईं ओर लाया जाएगा. जहां से गिरोह दर गिरोह उन्हें जहन्नम (नरक) में डाल दिया जाएगा.''
हिसाब किताब की बात से मुझे भी समय का ख्याल आया तो सालेह से पूछा:
' सालेह! रसूल अल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की दुआ को क़ुबूल हुए लम्बा समय गुज़र गया है. लेकिन अब तक यह हिसाब किताब क्यों नहीं शुरू हुआ?'
'' यह तुम समझते हो कि लम्बा समय हो गया है. मैदान-ए-हष्र में समय बहुत धीरे धीरे बीत रहा है. जिसकी वजह से यह लम्बा समय लगता है. मगर अर्श तले बहुत ही कम समय बीता है. तुम जानना चाहते हो कि जितना वक़्त भी लग रहा है वह क्यों लग रहा है?''
' तुम्ही ने बताया कि जिन लोगों को माफ किया जाना है इस सख्ती को उनकी माफी की वजह बना दिया जाएगा.'
''हां यह एक वजह है. मगर दूसरी वजह लोगों को यह एहसास दिलाना है कि यहां सारा अधिकार खुदा के हाथ में है. बात यह है अब्दुल्ला! इंसानों ने अपने करीम और मेहरबान खुदा की कद्र नहीं की. आज वह खुदा लोगों को यह एहसास दिला रहा है कि इंसान कितने ज्यादा उसके मोहताज और उसके सामने लाचार हैं.
उसकी ताकत और अजमत (महिमा) का पहला इज़हार क़यामत का दिन था जब इंसानों की दुनिया बर्बाद हो गई और उनका सब कुछ तबाह हो गया था. इंसान की सारी ताकत उस क़यामत के होलनाक हादसे (दुर्घटना) से नहीं बचा सकी. दूसरा मौका आज हष्र का दिन है जब सबको मालूम हो चुका है कि खुदा के सामने किसी की कोई औकात नहीं है. तीसरा मौका अब आ रहा है यानी हिसाब किताब जब ईश्वर खुद आसमानों और ज़मीन का कंट्रोल अपने हाथ में ले लेंगे.''
' तो क्या अभी तक ऐसा नहीं हुआ?'
'' नहीं अभी तक ऐसा नहीं हुआ. अभी तक काएनात (ब्रह्मांड) देखने में लगता है की फरिश्ते चला रहे हैं और खुदा सिर्फ उन्हें हुक्म (आदेश) दे रहे हैं. थोड़ी ही देर में सारे मामलों को ईश्वर खुद संभाल लेंगे. ताकि जिन, इन्सान और फरिश्तों सहित हर मखलूक (प्राणी) जान ले कि सारा अधिकार और हुकूमत सिर्फ खुदा ही के हाथ में है. सारे आकाश गंगाओं में बिखरा हुआ ब्रह्मांड जो बे हिसाब फ़ासलों पर फैला हुआ था, उस को समेटा जा रहा है. तुम्हें तो पता है कि अब तक ब्रह्मांड पल पल फैल रहा था. अब खुदा के हुक्म (आदेश) पर दूरी सिमट रही हैं और अनगिनत आकाश गंगाएं सितारे और ग्रह जो पूरे आसमान में फैले हुए हैं, फिर करीब आ रहे हैं.''
' ऐसा क्यों है?' मैंने हैरत (आश्चर्य) से पूछा.
'' यह इसलिए है कि खुदा इन सब को जन्नत वालों में बतौर इनाम (पुरस्कार) बाँट देंगे. फिर उन जगोंह पर अल्लाह के इनाम याफता (पुरस्कार विजेता) बन्दों की हुकुमत कायम (सत्ता स्थापित) होगी. ब्रह्मांड को वापस समेटने का काम ही वह चीज़ है जिसे कुरान करीम ने आकाश को परमेश्वर के दाहिने हाथ पर लपेट लेने से ताबीर किया है.''
फिर सालेह ने आसमान की ओर नज़र की. और मैंने भी उसको देखते हुए ऊपर देखा.
सूरज दहक रहा था. मैंने पहली बार यह बात नोट की कि चाँद भी सूरज के पास मौजूद था, लेकिन वह बे नूर हो चुका था और बहुत धीरे धीरे सूरज की ओर बढ़ रहा था. यह देख कर सालेह ने कहा:
'' आज आसमान और ज़मीन बदल कर कुछ के कुछ हो चुके हैं. ज़मीन फूल कर बहुत बड़ी हो चुकी है और यूं इसके क्षेत्रफल में कई गुना बढ़ोत्तरी हो चुकी है.''
' मुझे याद है कि पृथ्वी का व्यास पच्चीस हजार किलोमीटर था.'
मगर अब यह कई गुना बढ़ चुका है. साथ ही यह ज़मीन अब उससे कहीं ज्यादा हसीन और खुबसूरत है जितनी पहले थी. इस्राफील ने दो बार सूर फूंक था. पहली बार सब कुछ तबाह हो गया था जबकि दूसरे सूर पर इंसानों को ज़िन्दा कर दिया गया. इन दोनों के बीच में खुदा के हुक्म से जमीन बड़ी हुई और फरिश्तों ने उस पर जन्नत वालों के लिए बहतरीन घर, महल, बाग़ और उनके आराम और मनोरंजन के लिए बेहतरीन चीजें और तुम्हारे लिए जो तुम सोच भी नहीं सकते इस हद तक खुबसूरत एक नई दुनिया बना दी है. हर जन्नती को उस का घर इसी जमीन में दिया जाएगा और रहने रहने के लिए बड़े बड़े क्षेत्रफल दिए जाएंगे. पृथ्वी के बीच में दहकते हुए विस्फोटक अंगारों और खोलते पानी के चश्मों के बीच में जहन्नमयों (नरक वासियों) का ठिकाना होगा.''
मैंने उसकी बात को बढ़ाते हुए कहा:
' तुमने जो कुछ कहा कुरान करीम में लिखी बातों से मुझे यह पहले ही अंदाज़ा था. कुरान करीम के बयानों से यह मालूम होता था कि ज़मीन के वारिस खुदा के नेक बंदे होंगे और ज़मीन की सतेह बदल दी जाएगी जहां जन्नत वालों का ठिकाना होगा. जमीन के बीच जहन्नम वाले होंगे. जबकि आकाश के तारे और कह्कशाएँ इनाम के रूप में और हुकूमत करने के लिए जन्नत वालों में बांटे जाएँगे. वैसे उनमे में क्या होगा?'
'' इस की तफसील (विवरण) तो दरबार वाले दिन पता लगेगी. दरबार वाली बात याद है ना?''
'हां तुमने बताया था कि हिसाब किताब के बाद जन्नत वालों की अल्लाह तआला के साथ जो बैठक होगी उसका नाम दरबार है. उस बैठक में सभी जन्नत वालों को उनके रुतबे और स्थान औपचारिक रूप में बांटे जाएंगे. यह लोगों की उनके रब के साथ मुलाक़ात भी होगी और खास लोगों के सम्मान का मौका भी होगा.'
'' हां उस दिन पुरस्कार भी दिया जाएगा और काम भी बताया जाएगा.''
इतनी देर में बे नूर चाँद सूरज में समां गया. यह देखकर सालेह बोला:
'' आसमान पर मौजूद ईश्वर की निशानियाँ बदल रही हैं. चाँद का सूरज में समां जाना इसी का एक संकेत है. इसका मतलब यह है कि सारे आसमान समेट लिए गए हैं. अब किसी भी पल खुदा का ज़हूर होगा और वह अदालत शुरू हो जाएगी जिसका इंतजार था. तब तुम्हें और सारी दुनिया को मालूम हो जाएगा कि अल्लाह जल जलालहु किस महान हस्ती का नाम है.'' अभी सालेह की बात पूरी भी नहीं हुई थी कि एक जोरदार धमाका हुआ. सब लोग घबरा कर रह गए. आवाज़ क्यूंकि आसमान की ओर से आई थी इसलिए हर निगाह ऊपर की ओर उठ गई.
मैं और सालेह भी लोगों के साथ ऊपर देखने लगे. एक हैरत अंगेज़ मंज़र (आश्चर्यजनक दृश्य) सामने था. आसमान में दरार पद चुकी थी और थोड़ी ही देर में वह बादलों की तरह फट कर टुकड़े हो गया. इन दरारों को देखकर ऐसा लगा कि आसमान में दरवाजे ही दरवाज़े बन गए हैं. हर दरार से फरिश्तों की सेना दर सेना ज़मीन की ओर उतरने लगी. उनकी संख्या इतनी ज्यादा थी कि किसी तरह से भी उन की गिनती और अनुमान लगाना मुश्किल था. फरिश्तों के विभिन्न समूह थे और हर समूह की ड्रैस और आने का अंदाज़ अलग था . वह फरिश्ते हष्र के मैदान के बीच में एक जगह पर उतरने लगे और उन्होंने बीच में एक बड़ी और ऊँची जगह को अपने घेरे में ले लिया.
........................................................................................................जारी है....
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