दरबार शुरू होने वाला था. जन्नत के आम लोग, खास लोग, सारे नबी, शहीद, सहाबा, शोहदा दरबारी सब अपनी अपनी जगह पर आकर बैठ रहे थे. दरबार से पहले खुदा की तरफ से एक खास दावत का आयोजन था. यह दावत अभी तक होने वाली सबसे बड़ी दावत थी जिसमें हज़रत आदम से लेकर क़यामत तक के सभी जन्नती एक साथ जमा थे. पांच बड़े नबियों को अल्लाह की ओर से दावत की मेजबानी की जिम्मेदारी दी गई थी. नूह, इब्राहीम, मूसा, ईसा और मोहम्मद अलैहिम सलाम इस दावत के मेजबान (host) थे.
यह दावत एक बहुत ऊँचे पहाड़ के दामन में आयोजित हुई थी. यह बहुत विशाल मैदान था जो एक बाग के रूप में फैला हुआ था. यहाँ से दूर दूर तक फैला हुआ हरा भरा क्षेत्र आँखों को ठंडक दे रहा था. इस मैदान के बीच में नदियाँ बह रही थीं. इस दावत का पूरा इन्तिज़ाम अरब की परंपरा और शान व शौकत के अनुसार किया गया. इसी लिए सीटें शाही सिंहासन के रूप में थीं जिन पर हीरे और मोती जुड़े हुए थे. ज़मीन पर दूर दूर तक नर्म कालीन और गालीचे बिछे हुए थे. गुलामान (सेवकों) की एक बड़ी संख्या हाथों में तरह तरह के शरबत के जग लिए फिर रहे थे. जन्नती को जिस प्रकार का शर्बत चाहिए होता वह नज़र उठाते और गुलामान पल भर में हाज़िर होकर उनकी इच्छा के अनुसार जाम भर देते. यह शरबत क्या था एक पारदर्शी ड्रिंक था जिसमें बहुत स्वाद था. इसके अलावा बहुत से लज़ीज़ खाने, सोने और चांदी के बर्तनों में लगातार पेश किए जा रहे थे. पेड़ों की डालयाँ फलों से लदी थी और जब फल का जी चाहता वह डाली झुक जाती और लोग फल को तोड़ लेते.
अच्छे अच्छे कपड़े पहने खुबसूरत लड़के और लड़कियां हर तरफ नजर आए. उनके चेहरे रोशन, आंखें चमकदार और होंठो पर मुस्कुराहटें थीं. यह मंज़र देखकर मुझे दुनिया की महफ़िलें याद आ गईं जहां औरतें मेकअप का ताम झाम किये, खुदा की बनाई हुई हदों को तोड़ती अपने जिस्म की नुमाइश करती महफ़िलों में शामिल हुआ करती थीं. मर्द अपनी निगाहों को झुकाने के बजाय इस नुमाइश से मज़ा लिया करते थे. अपने जिस्म का प्रदर्शन ना करने वाली औरतों और अपनी निगाहों को नीचा रखने वाले मर्दों को कितनी मुश्किलों का सामना करना पड़ता था.
लेकिन अब सारी मुश्किलें ख़त्म; मैंने दिल में सोचा. यह महफ़िल खुबसूरत औरतों से भरी हुई थी जिनके कपड़े भी और गहने अपनी खूबसूरती में बे मिसाल और हर नज़र को अपनी और खींच लेने के लिए काफी थे. लेकिन अल्लाह ने इंसानों के मन इस तरह पाक (पवित्र) कर दिए थे कि निगाहों में बेशर्मी और दिलों में बेईमानी की कल्पना भी कोई नहीं कर रहा था. हर मर्द और हर औरत खुबसूरत पर पाकी (पवित्रता) के अहसास में जिन्दा था. अब न अपनी खूबसूरती को छुपाने का कोई हुक्म था न निगाहों को नीचा रखने की ज़रूरत थी. कितनी थोड़ी थी वह महनत और कितना ज्यादा है यह बदला.
मेरे साथ मेरे घर वाले और दुन्याँ में रहे मेरे दोस्त और करीबी रिश्तेदार बैठे थे. मेरे बच्चे मेरी फिर शादी करवाकर बहुत खुश थे. उसी मौके (अवसर) पर जमशैद व अमूराह की रजामंदी से उनकी भी शादी कर दी गई और वह भी हमारे परिवार का हिस्सा बन चुकी थी. ज़िन्दगी ख़ुशियों की राह पर तेज़ी से दौड़ रही थी. मेरे दिल में बस एक बेनाम सा एहसास था. वह यह कि मेरे सारे प्यार करने वाले लोग मेरे साथ आ चुके थे, सिवाय मेरे उस्ताद (गुरु) फरहान अहमद साहब के. एक मामूली सी उम्मीद थी कि शायद मैं दरबार में उनसे मिल सकूं.
दावत खाने के बाद लोग दरबार में अपनी निर्धारित सीटों पर आकर बैठना शुरू हो गए. अर्श इलाही के बिल्कुल करीब ख़ास लोग बैठे हुए थे. जिस में अम्बिया हज़रात, नबियों के सहाबा और शहीद और सालेहीन की एक बड़ी संख्या शामिल थी. जबकि बाक़ी जन्नत वाले उन के पीछे बैठे हुए थे. इस बैठक की सबसे खास बात यह थी कि आज पहली बार लोगों को खुदा के दीदार (दर्शन) की नेमत से फैज़याब (लाभान्वित) होना था जो जन्नत वालों का सबसे बड़ा सम्मान था. नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने खबर दी थी कि जिस तरह दुनिया में चौध्वी के चांद का दीदार किया जाता है, उसी तरह जन्नत में दीदार इलाही होगा. इसलिए लोगों में बहुत उत्साह था. इसके अलावा आज ही के दिन लोगों का सम्मान और उनके पद औपचारिक रूप उन्हें दिए जाने थे. इसलिए हर आदमी दरबार के शुरु होने की राह देख रहा था.
लोग अपनी अपनी सीटों पर बिराजमान हो चुके थे. हर जुबान व दिल पर अपने रब की तारीफ़ बड़ाई की तसबीह थी. लोग बार बार यह कह रहे थे कि यह सब अल्लाह का एहसान है कि उसने हमें सीधी सच्ची राह दिखाई वरना हम कभी जन्नत में नहीं पहुंच सकते थे.
दरबार की शुरुआत पर फरिश्तों ने अल्लाह की तसबीह और तमजीद की. इसके बाद दाऊद अलैहिस्सलाम तशरीफ़ लाये और अपनी मीठी आवाज़ में एक खुदा की तारीफ का गीत इस तरह गाया कि समां बंध गया. इसके बाद अर्श को उठाने वाले फरिश्तों ने ऐलान किया कि आलम के परवरदिगार अपने बन्दों से बातचीत करेंगे. कुछ ही देर में अल्लाह ने बहुत प्यार और नरमी के साथ बन्दों से बातचीत फ़रमाना शुरू की.
इस बातचीत में अल्लाह ने अपने बंदों की तारीफ़ फ़रमाई जो अपनी मेहनत, संघर्ष और धैर्य से इस जगह तक पहुंचे थे. बन्दों से पूछा गया कि क्या वह इस सिले से राज़ी हैं जो उनकी मेहनत के बदले उन्हें मिला है. सब ने एक जुबान होकर जवाब दिया कि हमने अपनी उम्मीदों से बढ़कर बदला पाया है और वो सब कुछ पाया है जो किसी प्राणी को नहीं मिला. हम क्यों तुझ से राजी न हों. पर इरशाद हुआ अब मैं तुम्हें वह दे रहा हूँ जो हर चीज़ से बढ़कर है. मैं तुम्हें अपनी रज़ामंदी से नवाजता हूँ. इसके साथ ही फिज़ा में अल्लाह की बड़ाई के नारे गूंजने लगे.
फिर रुतबे और सम्मान का सिलसिला शुरू हुआ. यह एक लंबी प्रक्रिया है. लेकिन यहां अनगिनत नेअमतें लगातार मिल रही थीं जिनकी वजह से लोग इत्मीनान के साथ बैठे हुए थे. दुसरे लोगों की तरह मेरे घर वाले भी मेरे साथ ही अगली सीटों पर बैठे थे. मैं यह सब कुछ देख रहा था और मन में सोच रहा था कि दुनिया की कितनी कम परेशानी उठाकर आज कितना बड़ा इनाम इंसानों को मिल रहा है. लेकिन फिर मुझे ख्याल आया कि इंसानों की ज्यादा बड़ी संख्या तो परीक्षा में असफल ही गई . फिर मुझे अपने उस्ताद फरहान साहब का ख्याल आया. वह आज भी मुझे नहीं मिल सके थे हालांकि मेरा ख्याल था कि आज के दिन तो कहीं न कहीं मिल ही जाएंगे. मैंने सोचा कि सालेह से पूछूँ. पर वह यहाँ मेरे साथ नहीं था. लेकिन उसी समय वह मेरे पास आ खड़ा हुआ.
उसे देख कर मैंने कहा:
' मुझे लगता था कि मैं दरबार में अपने उस्ताद (गुरु) को देख सकता हूँ. लेकिन वह मुझे नहीं मिल सके. तुम्हे मेरे उस्ताद का कुछ पता चला?'
'' नहीं जन्नत की इस बस्ती में अभी तक वे मुझे कहीं नहीं मिल सके. मुझे लगता है कि अब तुम भी उनके बारे में सोचना छोड़ दो. लगता है उनके बारे में ख़ुदा अपना फैसला कर चुका है. दुनिया की कोई ताकत अब इस फैसले को नहीं बदल सकती. खुदा का इन्साफ बहरहाल लागू होकर रहता है.''
' और उसकी रहमत?'
'' तुम अच्छी तरह जानते हो कि खुदा का रहम और इन्साफ हर चीज़ उसूल (सिद्धांत) पर आधारित है. किसी की इच्छा से यहाँ कुछ भी नहीं बदल सकता.''
'मगर जन्नत की यह दुनिया तो मुमकिन की दुनिया है. यहाँ सब कुछ मुमकिन है.'
सालेह झल्ला कर बोला
'' यार तुम क्यों बहस कर रहे हो. फैसला हो गया है. वैसे तुम खुद ईश्वर से बात क्यों नहीं करते. तुम्हारी बात तो बहुत सुनी जाती है. मैं तो तुम्हें अर्श तक ले जाने आया हूँ. चलो और समय का पहिया उल्टा घुमाने की दुआ करो.''
खबर नहीं कि सालेह ने गुस्से में आकर मुझ से यह कहा था या सचमुच मुझे सुझाव दिया था. लेकिन इस बात पर अमल करने की मूर्खता करने के लिए मैं तैयार नहीं था. लेकिन उसकी यह बात ठीक थी कि मुझे बुलाया जा रहा है. कुछ ही देर में मेरा नाम पुकारा गया. मैं जो अभी तक इत्मीनान से बैठा था लरज़ते दिल के साथ खड़ा हो गया. मैं धीरे धीरे क़दमों से चलता हुआ उस हस्ती के सामने पेश हो गया जिसके अहसानों के बोझ तले मेरा रोआं रोआं दबा हुआ था. करीब पहुँच कर मैं सजदे में गिर गया.
कुछ देर बाद आवाज़ आई:
'' उठो!''
मैं धीरे धीरे उठा और झुकी नज़र के साथ हाथ बांधकर खड़ा हो गया.
अल्लाह ने बहुत नरमी के साथ पूछा:
'' अब्दुल्लाह! आज के दिन मेरे लिए क्या लाए हो?''
मैं तो यहां लेने आया था, कुछ देने के लिए नहीं. इसलिए यह सवाल मेरी उम्मीद के बिलकुल उलट था. लेकिन जो मेरे पास था वह मैंने कह दिया:
' मालिक जो अच्छा काम मैंने किया वह हकीकत में तेरी ही तौफीक (करने,मदद) से था. उसे तो मैं पेश नहीं कर सकता. रहा मेरा वुजूद तो मेरे पास तेरी आला (उच्च) हस्ती के सामने पेश करने के लिए .... बहुत सारी नदामत (लज्जा) और इल्तिज़ा के सिवा कुछ नहीं.'
जवाब मिला:
'' अच्छा किया कि नदामत और इल्तिज़ा ले आए. यह चीजें मेरे पास नहीं होती. उन्हें मैं तुम्हारे नाम से अपने पास रख लूँगा. अब बोलो क्या मांगते हो?''
मैंने अर्ज़ किया:
' आपकी दी हुई हर चीज़ और आप की रज़ा मन्दी दोनों मिल गए हैं. मेरा ज़र्फ़ इतना छोटा है कि उसके बाद मांगने के लिए कुछ नहीं बचता. लेकिन जो भी भलाई और भीख आप अता (प्रदान) करेंगे मैं उसका का मोहताज (ज़रुरत मन्द) हूँ.'
करीब मोजूद अर्श के उठाने वाले फरिश्ते को इशारा हुआ. उसने मेरे इनाम और रुतबे बयान करना शुरू कर दिए. यह तो मुझे पता था कि मैं इस नई दुनिया का हुक्मरान (राजा) और हाई क्लास का हिस्सा हूँ, मगर जो दिया गया वह मेरी हैसियत, अपेक्षाओं और मेरी औक़ात से बहुत ज्यादा था. फरिश्ता बोले जा रहा था और मैं शर्म से सिर झुकाकर यह सोच रहा था कि आलमों के परवरदिगार की करीम हस्ती मुझ जैसे गुनाह गार (पापी) के साथ ऐसी है तो नेक लोगों के साथ कैसी होगी?
फरिश्ता चुप हुआ तो मुझे संबोधित करके कहा:
'' अब्दुल्लाह! गुनाह गार तो सब हैं. पर वापस लौट आने वालों और तौबा करने वालों को मैं गुनाह गार नहीं लिखता. और तुमने तो मुझसे और मेरी मुलाक़ात से बंदों को परिचित कराने के लिए अपनी ज़िन्दगी लगा दी थी. तुम्हें तो मैंने वफादार लिखा है.''
पल भर की ख़ामोशी के बाद कहा गया:
'' मुझे पता है जो कुछ अभी तुम सालेह से कह रहे थे. मैं वह भी जानता हूँ जो तुम हष्र में अपने आमाल नामे के पेश होने के वक़्त सोच रहे थे. तुम यही सोच रहे थे ना कि काश एक मौका और मिल जाए. काश किसी तरह गुज़रा हुआ समय फिर लौट आए. ताकि मैं एक एक इंसान को झिंझोड़ कर इस दिन के बारे में चेता सकूं.
अब्दुल्लाह! मैं तुम्हारी तड़प को अच्छी तरह जानता हूँ और मुझ से जुड़ी तुम्हारी उम्मीदों को भी. यह तुमने ठीक समझा कि बेशक मुझे किसी की ज़रुरत नहीं और यह भी कि मैं जमाल व कमाल और जलाल (महिमा) वाला हूं. मैं यह भी जानता हूँ कि तुम्हारी कुल सम्पत्ति यही है कि तुम्हारी पहुँच मेरे क़दमों तक है. मेरे लिए तुम्हारी भी अहमियत (महत्व) है और तुम्हारी इस बात की भी, लेकिन...''
फिर एक ख़ामोशी छाई और मैं लरज़ते दिल के साथ सोच रहा था कि मेरे रब (प्रभु) से न ज़ुबान से निकलने वाले शब्द छुपे रहते हैं और न दिल में आने वाले ख्याल ही उसके इल्म (ज्ञान) से बाहर रह सकते हैं. बे इख़्तियार मेरी ज़ुबान से निकला:
'मेरे रब आप पाक (पवित्र) हैं.'
'' मुझे मालूम था कि तुम अपनी दिली तमन्ना दर्शाने के लिए बयान का यही तरीका अपनाओगे. देखो! लोगों को फिर दुनिया में भेजना मेरी योजना का हिस्सा नहीं. उस दुनिया में न तुम जा सकते हो और न दूसरे इंसान. मगर समय मेरा गुलाम है. मैं चाहूं तो उसका पहिया उल्टा घुमा सकता हूँ.''
फिर एक फरिश्ते को इशारा हुआ. वह हाथों में चांदी के पन्नों का पुलिंदा लेकर मेरे पास आया. मैंने देखा तो पहले पेज पर सोने के तारों से लिखा था:
'' जब ज़िन्दगी शुरू होगी''
आवाज़ आई:
'' अब्दुल्ला! यह तुम्हारी दास्तान है. इस नई दुनिया में जो तुम्हारे साथ हुआ, उसका कुछ हिस्सा इसमें महफूज़ (सुरक्षित) कर दिया गया है. तुम्हारी खातिर अब तुम्हारी इस कहानी को समय की खिड़की से दोबारा पिछली दुनिया में भेजा जा रहा है. इस बात का इन्तिज़ाम किया जाए कि यह दास्तान इंसानों तक पहुंचा दी जाए. मैं अपने बन्दों और बंदियों के दिलों में डाल दूंगा. कि वह तुम्हारी इस कहानी को अपने हर चाहने वाले तक पहुँचा दें ..... हर इंसान तक जिसे वह आखिरत (परलोक) की रुसवाई से बचाकर जन्नत की मंजिल तक पहुंचाना चाहते होंगे. अजब नहीं कि कोई खुश किस्मत इस पैगाम (संदेश) को पढ़ कर अपने अमल (कर्म) सुधार ले. अजब नहीं कि किसी की ज़िन्दगी बदल जाए. अजब नहीं कि किसी का भविष्य बदल जाए. मैं लोगों को तुम्हारी दुआ (अनुरोध) पर एक मौका और देना चाहता हूँ. आखरी घाटे से पहले, आखरी बर्बादी से पहले, आखरी तबाही से पहले इस क़यामत से पहले.''
मैं बे इख़्तियार 'अल्लाहुअकबर कहता हुआ सजदे में गिर गया.
...............
अल्लाहुअकबर अल्लाहुअकबर. मौअज़्ज़न (अज़ान पढने वाला) ने अभी यह शब्द पढ़े ही थे कि अब्दुल्लाह एक झटके के साथ 'अल्लाहुअकबर कहता हुआ जाग गया. वह खाली खाली नज़रों से आसपास देख रहा था. कुछ देर तक वह नहीं समझ सका कि वह कहाँ है. वह तो अल्लाह के सामने खड़ा था. उसने गोर किया. वह अभी भी अल्लाह के सामने मौजूद था. ठीक बैतुल्लाहहराम में काबे के सामने. फज्र (सुबह) का समय था और मस्जिदुलहराम में लोगों की चहल पहल जारी थी.
' तो क्या मैंने सपना देखा था?' अब्दुल्ला ने खुद से सवाल किया.
'मगर वह तो बिल्कुल सच था. वह हष्र का दिन, वह जन्नत की महफ़िल और खुदा के सामने मेरी पेशी... अगर वह सच था तो फिर यह क्या है? और अगर यह सच है तो फिर वह हकीकत से ज्यादा यकीनी चीज़ क्या थी. वह सपना था या सपना है.'
वह लगातार बड़बड़ाए जा रहा था:
'' ऐसा न हो कि अचानक एक दिन आंख खुले और मुझे मालूम हो कि जो कुछ दुनिया में देखा था सपना तो दरअसल वह था और सच आखिरत की ज़िन्दगी था.
आसमान से नूर उतर रहा था. सफेद जगमगाती हुई रोशनियों से हरम (क़ाबा) की फिज़ा दूध्या हो रही थी. आसमान अभी काला ही था, लेकिन इस जगह दिन की रौशनी से ज्यादा चहल पहल थी. यह हरम मक्का था. ईमान वालों का काबा. दिल वालों का केंद्र और मुहब्बत वालों का क़िबला. ख़ुदा के बन्दे और बंदिआं ... हर जाति, हर समुदाय के लोग यहां जमा थे. ईश्वर की स्तुति, बड़ाई और तारीफ करते हुए.
आज हरम पाक में अब्दुल्लाह की आखरी रात थी. लेकिन यह आखरी रात अब्दुल्लाह के जीवन की सबसे कीमती रात बन चुकी थी. अब्दुल्लाह कुछ देर पहले हैरानी की जिस स्थिति में था, अब उससे बाहर आ चुका था. उसने हरम को देखा और फिर आसपास नज़र डाली. हरम से बाहर हर तरफ ऊँची ऊँची इमारतों का मंज़र था. यह देख कर उस पर एक दूसरी कैफियत छा गई. उसकी आंखों से आंसू बहने लगे. उसका दिल मालिक ज़ुलजलाल के लिए खुद एक विनती बन गया:
' मालिक! क़यामत का समय सर पर आ खड़ा हुआ है. नंगे पैर बकरियां चराने वाले (अरब वाले) ऊँची ऊँची इमारतें बना रहे हैं. तेरे महबूब रसूल की भविष्यवाणी पूरी हो चुकी है. अब मुझे तेरे बन्दों तक तेरा पैगाम (संदेश) पहुंचाना है. क़यामत से पहले उन्हें क़यामत के हादसे से खबरदार करना है. मुझे लोगों को झिंझोड़ना है. आज दुनिया की मुहब्बत आखिरत की फ़िक्र पर ग़ालिब आ चुकी है. तेरी मुलाकात से बेपरवाही आम है. शासक क्रूर और जनता जाहिल. अमीर माल में मस्त हैं और ग़रीब अपने हाल में मस्त. व्यापारी मुनाफा खोर और झूठे हैं. नेता बेईमान हैं. कर्मचारी कामचोर हैं. मर्दों का जीने का मकसद सिर्फ रुपया कमाना बन चुका है और औरतों का मकसद सिर्फ फैशन मेकप और जिस्म दिखाना.'
अब्दुल्लाह की आंखों से आंसू जारी थे. उसके दिल से लगातार दुआएं और मिन्नतें निकल रही थी. वह दुआ जिसका क़ुबूल होना शायद मुक़द्दर बन चुका था.
'' मौला! आज लोग तुझ से ग़ाफ़िल और बे परवाह होकर अत्याचार और दुनिया परस्ती में ज़िन्दगी गुजार रहे हैं. धर्म के नाम पर खड़े लोग सांप्रदायिकता के अधीन या राजनीति में उलझे हुए हैं. कोई नहीं जो तेरी मुलाकात से सावधान कर रहा हो. तू मुझे इस सेवा के लिए क़ुबूल फरमाले. तू मुझे अपने पास से ऐसी सलाहियत (क्षमता) अता कर कि मैं तेरी मुलाक़ात और आने वाली दुनिया का नक्शा तेरे बन्दों के सामने खींच कर रख दूं. जो कुछ तू ने कुरान में बयान किया तेरे महबूब नबी ने जिस घटना की खबर दी है, उस दिन की एक जीवित तस्वीर तेरे बन्दों तक पहुँचा दूँ. इंसानियत को पता नहीं कि उसके पास मोहलत ख़त्म हो चुकी है. मुझे क़ुबूल कर कि मैं इस बात से तेरे बन्दों को खबरदार कर सकूं. मेरे रब! सारी इंसानियत को सीधी राह की हिदायत दे. और अगर तूने सब कुछ खत्म करने का फैसला कर लिया है तो फिर मेरे लिए आसानी कर दे कि जितने लोग हो सकें, मैं उन्हें जन्नत की राह दिखा सकूँ. उन्हें तुझ तक पहुँचा सकूँ.... इससे पहले कि सूर फूंक दिया जाए .... इससे पहले कि अमल की मोहलत खतम होजाए..''
........................................................................................................जारी है....
यह दावत एक बहुत ऊँचे पहाड़ के दामन में आयोजित हुई थी. यह बहुत विशाल मैदान था जो एक बाग के रूप में फैला हुआ था. यहाँ से दूर दूर तक फैला हुआ हरा भरा क्षेत्र आँखों को ठंडक दे रहा था. इस मैदान के बीच में नदियाँ बह रही थीं. इस दावत का पूरा इन्तिज़ाम अरब की परंपरा और शान व शौकत के अनुसार किया गया. इसी लिए सीटें शाही सिंहासन के रूप में थीं जिन पर हीरे और मोती जुड़े हुए थे. ज़मीन पर दूर दूर तक नर्म कालीन और गालीचे बिछे हुए थे. गुलामान (सेवकों) की एक बड़ी संख्या हाथों में तरह तरह के शरबत के जग लिए फिर रहे थे. जन्नती को जिस प्रकार का शर्बत चाहिए होता वह नज़र उठाते और गुलामान पल भर में हाज़िर होकर उनकी इच्छा के अनुसार जाम भर देते. यह शरबत क्या था एक पारदर्शी ड्रिंक था जिसमें बहुत स्वाद था. इसके अलावा बहुत से लज़ीज़ खाने, सोने और चांदी के बर्तनों में लगातार पेश किए जा रहे थे. पेड़ों की डालयाँ फलों से लदी थी और जब फल का जी चाहता वह डाली झुक जाती और लोग फल को तोड़ लेते.
अच्छे अच्छे कपड़े पहने खुबसूरत लड़के और लड़कियां हर तरफ नजर आए. उनके चेहरे रोशन, आंखें चमकदार और होंठो पर मुस्कुराहटें थीं. यह मंज़र देखकर मुझे दुनिया की महफ़िलें याद आ गईं जहां औरतें मेकअप का ताम झाम किये, खुदा की बनाई हुई हदों को तोड़ती अपने जिस्म की नुमाइश करती महफ़िलों में शामिल हुआ करती थीं. मर्द अपनी निगाहों को झुकाने के बजाय इस नुमाइश से मज़ा लिया करते थे. अपने जिस्म का प्रदर्शन ना करने वाली औरतों और अपनी निगाहों को नीचा रखने वाले मर्दों को कितनी मुश्किलों का सामना करना पड़ता था.
लेकिन अब सारी मुश्किलें ख़त्म; मैंने दिल में सोचा. यह महफ़िल खुबसूरत औरतों से भरी हुई थी जिनके कपड़े भी और गहने अपनी खूबसूरती में बे मिसाल और हर नज़र को अपनी और खींच लेने के लिए काफी थे. लेकिन अल्लाह ने इंसानों के मन इस तरह पाक (पवित्र) कर दिए थे कि निगाहों में बेशर्मी और दिलों में बेईमानी की कल्पना भी कोई नहीं कर रहा था. हर मर्द और हर औरत खुबसूरत पर पाकी (पवित्रता) के अहसास में जिन्दा था. अब न अपनी खूबसूरती को छुपाने का कोई हुक्म था न निगाहों को नीचा रखने की ज़रूरत थी. कितनी थोड़ी थी वह महनत और कितना ज्यादा है यह बदला.
मेरे साथ मेरे घर वाले और दुन्याँ में रहे मेरे दोस्त और करीबी रिश्तेदार बैठे थे. मेरे बच्चे मेरी फिर शादी करवाकर बहुत खुश थे. उसी मौके (अवसर) पर जमशैद व अमूराह की रजामंदी से उनकी भी शादी कर दी गई और वह भी हमारे परिवार का हिस्सा बन चुकी थी. ज़िन्दगी ख़ुशियों की राह पर तेज़ी से दौड़ रही थी. मेरे दिल में बस एक बेनाम सा एहसास था. वह यह कि मेरे सारे प्यार करने वाले लोग मेरे साथ आ चुके थे, सिवाय मेरे उस्ताद (गुरु) फरहान अहमद साहब के. एक मामूली सी उम्मीद थी कि शायद मैं दरबार में उनसे मिल सकूं.
दावत खाने के बाद लोग दरबार में अपनी निर्धारित सीटों पर आकर बैठना शुरू हो गए. अर्श इलाही के बिल्कुल करीब ख़ास लोग बैठे हुए थे. जिस में अम्बिया हज़रात, नबियों के सहाबा और शहीद और सालेहीन की एक बड़ी संख्या शामिल थी. जबकि बाक़ी जन्नत वाले उन के पीछे बैठे हुए थे. इस बैठक की सबसे खास बात यह थी कि आज पहली बार लोगों को खुदा के दीदार (दर्शन) की नेमत से फैज़याब (लाभान्वित) होना था जो जन्नत वालों का सबसे बड़ा सम्मान था. नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने खबर दी थी कि जिस तरह दुनिया में चौध्वी के चांद का दीदार किया जाता है, उसी तरह जन्नत में दीदार इलाही होगा. इसलिए लोगों में बहुत उत्साह था. इसके अलावा आज ही के दिन लोगों का सम्मान और उनके पद औपचारिक रूप उन्हें दिए जाने थे. इसलिए हर आदमी दरबार के शुरु होने की राह देख रहा था.
लोग अपनी अपनी सीटों पर बिराजमान हो चुके थे. हर जुबान व दिल पर अपने रब की तारीफ़ बड़ाई की तसबीह थी. लोग बार बार यह कह रहे थे कि यह सब अल्लाह का एहसान है कि उसने हमें सीधी सच्ची राह दिखाई वरना हम कभी जन्नत में नहीं पहुंच सकते थे.
दरबार की शुरुआत पर फरिश्तों ने अल्लाह की तसबीह और तमजीद की. इसके बाद दाऊद अलैहिस्सलाम तशरीफ़ लाये और अपनी मीठी आवाज़ में एक खुदा की तारीफ का गीत इस तरह गाया कि समां बंध गया. इसके बाद अर्श को उठाने वाले फरिश्तों ने ऐलान किया कि आलम के परवरदिगार अपने बन्दों से बातचीत करेंगे. कुछ ही देर में अल्लाह ने बहुत प्यार और नरमी के साथ बन्दों से बातचीत फ़रमाना शुरू की.
इस बातचीत में अल्लाह ने अपने बंदों की तारीफ़ फ़रमाई जो अपनी मेहनत, संघर्ष और धैर्य से इस जगह तक पहुंचे थे. बन्दों से पूछा गया कि क्या वह इस सिले से राज़ी हैं जो उनकी मेहनत के बदले उन्हें मिला है. सब ने एक जुबान होकर जवाब दिया कि हमने अपनी उम्मीदों से बढ़कर बदला पाया है और वो सब कुछ पाया है जो किसी प्राणी को नहीं मिला. हम क्यों तुझ से राजी न हों. पर इरशाद हुआ अब मैं तुम्हें वह दे रहा हूँ जो हर चीज़ से बढ़कर है. मैं तुम्हें अपनी रज़ामंदी से नवाजता हूँ. इसके साथ ही फिज़ा में अल्लाह की बड़ाई के नारे गूंजने लगे.
फिर रुतबे और सम्मान का सिलसिला शुरू हुआ. यह एक लंबी प्रक्रिया है. लेकिन यहां अनगिनत नेअमतें लगातार मिल रही थीं जिनकी वजह से लोग इत्मीनान के साथ बैठे हुए थे. दुसरे लोगों की तरह मेरे घर वाले भी मेरे साथ ही अगली सीटों पर बैठे थे. मैं यह सब कुछ देख रहा था और मन में सोच रहा था कि दुनिया की कितनी कम परेशानी उठाकर आज कितना बड़ा इनाम इंसानों को मिल रहा है. लेकिन फिर मुझे ख्याल आया कि इंसानों की ज्यादा बड़ी संख्या तो परीक्षा में असफल ही गई . फिर मुझे अपने उस्ताद फरहान साहब का ख्याल आया. वह आज भी मुझे नहीं मिल सके थे हालांकि मेरा ख्याल था कि आज के दिन तो कहीं न कहीं मिल ही जाएंगे. मैंने सोचा कि सालेह से पूछूँ. पर वह यहाँ मेरे साथ नहीं था. लेकिन उसी समय वह मेरे पास आ खड़ा हुआ.
उसे देख कर मैंने कहा:
' मुझे लगता था कि मैं दरबार में अपने उस्ताद (गुरु) को देख सकता हूँ. लेकिन वह मुझे नहीं मिल सके. तुम्हे मेरे उस्ताद का कुछ पता चला?'
'' नहीं जन्नत की इस बस्ती में अभी तक वे मुझे कहीं नहीं मिल सके. मुझे लगता है कि अब तुम भी उनके बारे में सोचना छोड़ दो. लगता है उनके बारे में ख़ुदा अपना फैसला कर चुका है. दुनिया की कोई ताकत अब इस फैसले को नहीं बदल सकती. खुदा का इन्साफ बहरहाल लागू होकर रहता है.''
' और उसकी रहमत?'
'' तुम अच्छी तरह जानते हो कि खुदा का रहम और इन्साफ हर चीज़ उसूल (सिद्धांत) पर आधारित है. किसी की इच्छा से यहाँ कुछ भी नहीं बदल सकता.''
'मगर जन्नत की यह दुनिया तो मुमकिन की दुनिया है. यहाँ सब कुछ मुमकिन है.'
सालेह झल्ला कर बोला
'' यार तुम क्यों बहस कर रहे हो. फैसला हो गया है. वैसे तुम खुद ईश्वर से बात क्यों नहीं करते. तुम्हारी बात तो बहुत सुनी जाती है. मैं तो तुम्हें अर्श तक ले जाने आया हूँ. चलो और समय का पहिया उल्टा घुमाने की दुआ करो.''
खबर नहीं कि सालेह ने गुस्से में आकर मुझ से यह कहा था या सचमुच मुझे सुझाव दिया था. लेकिन इस बात पर अमल करने की मूर्खता करने के लिए मैं तैयार नहीं था. लेकिन उसकी यह बात ठीक थी कि मुझे बुलाया जा रहा है. कुछ ही देर में मेरा नाम पुकारा गया. मैं जो अभी तक इत्मीनान से बैठा था लरज़ते दिल के साथ खड़ा हो गया. मैं धीरे धीरे क़दमों से चलता हुआ उस हस्ती के सामने पेश हो गया जिसके अहसानों के बोझ तले मेरा रोआं रोआं दबा हुआ था. करीब पहुँच कर मैं सजदे में गिर गया.
कुछ देर बाद आवाज़ आई:
'' उठो!''
मैं धीरे धीरे उठा और झुकी नज़र के साथ हाथ बांधकर खड़ा हो गया.
अल्लाह ने बहुत नरमी के साथ पूछा:
'' अब्दुल्लाह! आज के दिन मेरे लिए क्या लाए हो?''
मैं तो यहां लेने आया था, कुछ देने के लिए नहीं. इसलिए यह सवाल मेरी उम्मीद के बिलकुल उलट था. लेकिन जो मेरे पास था वह मैंने कह दिया:
' मालिक जो अच्छा काम मैंने किया वह हकीकत में तेरी ही तौफीक (करने,मदद) से था. उसे तो मैं पेश नहीं कर सकता. रहा मेरा वुजूद तो मेरे पास तेरी आला (उच्च) हस्ती के सामने पेश करने के लिए .... बहुत सारी नदामत (लज्जा) और इल्तिज़ा के सिवा कुछ नहीं.'
जवाब मिला:
'' अच्छा किया कि नदामत और इल्तिज़ा ले आए. यह चीजें मेरे पास नहीं होती. उन्हें मैं तुम्हारे नाम से अपने पास रख लूँगा. अब बोलो क्या मांगते हो?''
मैंने अर्ज़ किया:
' आपकी दी हुई हर चीज़ और आप की रज़ा मन्दी दोनों मिल गए हैं. मेरा ज़र्फ़ इतना छोटा है कि उसके बाद मांगने के लिए कुछ नहीं बचता. लेकिन जो भी भलाई और भीख आप अता (प्रदान) करेंगे मैं उसका का मोहताज (ज़रुरत मन्द) हूँ.'
करीब मोजूद अर्श के उठाने वाले फरिश्ते को इशारा हुआ. उसने मेरे इनाम और रुतबे बयान करना शुरू कर दिए. यह तो मुझे पता था कि मैं इस नई दुनिया का हुक्मरान (राजा) और हाई क्लास का हिस्सा हूँ, मगर जो दिया गया वह मेरी हैसियत, अपेक्षाओं और मेरी औक़ात से बहुत ज्यादा था. फरिश्ता बोले जा रहा था और मैं शर्म से सिर झुकाकर यह सोच रहा था कि आलमों के परवरदिगार की करीम हस्ती मुझ जैसे गुनाह गार (पापी) के साथ ऐसी है तो नेक लोगों के साथ कैसी होगी?
फरिश्ता चुप हुआ तो मुझे संबोधित करके कहा:
'' अब्दुल्लाह! गुनाह गार तो सब हैं. पर वापस लौट आने वालों और तौबा करने वालों को मैं गुनाह गार नहीं लिखता. और तुमने तो मुझसे और मेरी मुलाक़ात से बंदों को परिचित कराने के लिए अपनी ज़िन्दगी लगा दी थी. तुम्हें तो मैंने वफादार लिखा है.''
पल भर की ख़ामोशी के बाद कहा गया:
'' मुझे पता है जो कुछ अभी तुम सालेह से कह रहे थे. मैं वह भी जानता हूँ जो तुम हष्र में अपने आमाल नामे के पेश होने के वक़्त सोच रहे थे. तुम यही सोच रहे थे ना कि काश एक मौका और मिल जाए. काश किसी तरह गुज़रा हुआ समय फिर लौट आए. ताकि मैं एक एक इंसान को झिंझोड़ कर इस दिन के बारे में चेता सकूं.
अब्दुल्लाह! मैं तुम्हारी तड़प को अच्छी तरह जानता हूँ और मुझ से जुड़ी तुम्हारी उम्मीदों को भी. यह तुमने ठीक समझा कि बेशक मुझे किसी की ज़रुरत नहीं और यह भी कि मैं जमाल व कमाल और जलाल (महिमा) वाला हूं. मैं यह भी जानता हूँ कि तुम्हारी कुल सम्पत्ति यही है कि तुम्हारी पहुँच मेरे क़दमों तक है. मेरे लिए तुम्हारी भी अहमियत (महत्व) है और तुम्हारी इस बात की भी, लेकिन...''
फिर एक ख़ामोशी छाई और मैं लरज़ते दिल के साथ सोच रहा था कि मेरे रब (प्रभु) से न ज़ुबान से निकलने वाले शब्द छुपे रहते हैं और न दिल में आने वाले ख्याल ही उसके इल्म (ज्ञान) से बाहर रह सकते हैं. बे इख़्तियार मेरी ज़ुबान से निकला:
'मेरे रब आप पाक (पवित्र) हैं.'
'' मुझे मालूम था कि तुम अपनी दिली तमन्ना दर्शाने के लिए बयान का यही तरीका अपनाओगे. देखो! लोगों को फिर दुनिया में भेजना मेरी योजना का हिस्सा नहीं. उस दुनिया में न तुम जा सकते हो और न दूसरे इंसान. मगर समय मेरा गुलाम है. मैं चाहूं तो उसका पहिया उल्टा घुमा सकता हूँ.''
फिर एक फरिश्ते को इशारा हुआ. वह हाथों में चांदी के पन्नों का पुलिंदा लेकर मेरे पास आया. मैंने देखा तो पहले पेज पर सोने के तारों से लिखा था:
'' जब ज़िन्दगी शुरू होगी''
आवाज़ आई:
'' अब्दुल्ला! यह तुम्हारी दास्तान है. इस नई दुनिया में जो तुम्हारे साथ हुआ, उसका कुछ हिस्सा इसमें महफूज़ (सुरक्षित) कर दिया गया है. तुम्हारी खातिर अब तुम्हारी इस कहानी को समय की खिड़की से दोबारा पिछली दुनिया में भेजा जा रहा है. इस बात का इन्तिज़ाम किया जाए कि यह दास्तान इंसानों तक पहुंचा दी जाए. मैं अपने बन्दों और बंदियों के दिलों में डाल दूंगा. कि वह तुम्हारी इस कहानी को अपने हर चाहने वाले तक पहुँचा दें ..... हर इंसान तक जिसे वह आखिरत (परलोक) की रुसवाई से बचाकर जन्नत की मंजिल तक पहुंचाना चाहते होंगे. अजब नहीं कि कोई खुश किस्मत इस पैगाम (संदेश) को पढ़ कर अपने अमल (कर्म) सुधार ले. अजब नहीं कि किसी की ज़िन्दगी बदल जाए. अजब नहीं कि किसी का भविष्य बदल जाए. मैं लोगों को तुम्हारी दुआ (अनुरोध) पर एक मौका और देना चाहता हूँ. आखरी घाटे से पहले, आखरी बर्बादी से पहले, आखरी तबाही से पहले इस क़यामत से पहले.''
मैं बे इख़्तियार 'अल्लाहुअकबर कहता हुआ सजदे में गिर गया.
...............
अल्लाहुअकबर अल्लाहुअकबर. मौअज़्ज़न (अज़ान पढने वाला) ने अभी यह शब्द पढ़े ही थे कि अब्दुल्लाह एक झटके के साथ 'अल्लाहुअकबर कहता हुआ जाग गया. वह खाली खाली नज़रों से आसपास देख रहा था. कुछ देर तक वह नहीं समझ सका कि वह कहाँ है. वह तो अल्लाह के सामने खड़ा था. उसने गोर किया. वह अभी भी अल्लाह के सामने मौजूद था. ठीक बैतुल्लाहहराम में काबे के सामने. फज्र (सुबह) का समय था और मस्जिदुलहराम में लोगों की चहल पहल जारी थी.
' तो क्या मैंने सपना देखा था?' अब्दुल्ला ने खुद से सवाल किया.
'मगर वह तो बिल्कुल सच था. वह हष्र का दिन, वह जन्नत की महफ़िल और खुदा के सामने मेरी पेशी... अगर वह सच था तो फिर यह क्या है? और अगर यह सच है तो फिर वह हकीकत से ज्यादा यकीनी चीज़ क्या थी. वह सपना था या सपना है.'
वह लगातार बड़बड़ाए जा रहा था:
'' ऐसा न हो कि अचानक एक दिन आंख खुले और मुझे मालूम हो कि जो कुछ दुनिया में देखा था सपना तो दरअसल वह था और सच आखिरत की ज़िन्दगी था.
आसमान से नूर उतर रहा था. सफेद जगमगाती हुई रोशनियों से हरम (क़ाबा) की फिज़ा दूध्या हो रही थी. आसमान अभी काला ही था, लेकिन इस जगह दिन की रौशनी से ज्यादा चहल पहल थी. यह हरम मक्का था. ईमान वालों का काबा. दिल वालों का केंद्र और मुहब्बत वालों का क़िबला. ख़ुदा के बन्दे और बंदिआं ... हर जाति, हर समुदाय के लोग यहां जमा थे. ईश्वर की स्तुति, बड़ाई और तारीफ करते हुए.
आज हरम पाक में अब्दुल्लाह की आखरी रात थी. लेकिन यह आखरी रात अब्दुल्लाह के जीवन की सबसे कीमती रात बन चुकी थी. अब्दुल्लाह कुछ देर पहले हैरानी की जिस स्थिति में था, अब उससे बाहर आ चुका था. उसने हरम को देखा और फिर आसपास नज़र डाली. हरम से बाहर हर तरफ ऊँची ऊँची इमारतों का मंज़र था. यह देख कर उस पर एक दूसरी कैफियत छा गई. उसकी आंखों से आंसू बहने लगे. उसका दिल मालिक ज़ुलजलाल के लिए खुद एक विनती बन गया:
' मालिक! क़यामत का समय सर पर आ खड़ा हुआ है. नंगे पैर बकरियां चराने वाले (अरब वाले) ऊँची ऊँची इमारतें बना रहे हैं. तेरे महबूब रसूल की भविष्यवाणी पूरी हो चुकी है. अब मुझे तेरे बन्दों तक तेरा पैगाम (संदेश) पहुंचाना है. क़यामत से पहले उन्हें क़यामत के हादसे से खबरदार करना है. मुझे लोगों को झिंझोड़ना है. आज दुनिया की मुहब्बत आखिरत की फ़िक्र पर ग़ालिब आ चुकी है. तेरी मुलाकात से बेपरवाही आम है. शासक क्रूर और जनता जाहिल. अमीर माल में मस्त हैं और ग़रीब अपने हाल में मस्त. व्यापारी मुनाफा खोर और झूठे हैं. नेता बेईमान हैं. कर्मचारी कामचोर हैं. मर्दों का जीने का मकसद सिर्फ रुपया कमाना बन चुका है और औरतों का मकसद सिर्फ फैशन मेकप और जिस्म दिखाना.'
अब्दुल्लाह की आंखों से आंसू जारी थे. उसके दिल से लगातार दुआएं और मिन्नतें निकल रही थी. वह दुआ जिसका क़ुबूल होना शायद मुक़द्दर बन चुका था.
'' मौला! आज लोग तुझ से ग़ाफ़िल और बे परवाह होकर अत्याचार और दुनिया परस्ती में ज़िन्दगी गुजार रहे हैं. धर्म के नाम पर खड़े लोग सांप्रदायिकता के अधीन या राजनीति में उलझे हुए हैं. कोई नहीं जो तेरी मुलाकात से सावधान कर रहा हो. तू मुझे इस सेवा के लिए क़ुबूल फरमाले. तू मुझे अपने पास से ऐसी सलाहियत (क्षमता) अता कर कि मैं तेरी मुलाक़ात और आने वाली दुनिया का नक्शा तेरे बन्दों के सामने खींच कर रख दूं. जो कुछ तू ने कुरान में बयान किया तेरे महबूब नबी ने जिस घटना की खबर दी है, उस दिन की एक जीवित तस्वीर तेरे बन्दों तक पहुँचा दूँ. इंसानियत को पता नहीं कि उसके पास मोहलत ख़त्म हो चुकी है. मुझे क़ुबूल कर कि मैं इस बात से तेरे बन्दों को खबरदार कर सकूं. मेरे रब! सारी इंसानियत को सीधी राह की हिदायत दे. और अगर तूने सब कुछ खत्म करने का फैसला कर लिया है तो फिर मेरे लिए आसानी कर दे कि जितने लोग हो सकें, मैं उन्हें जन्नत की राह दिखा सकूँ. उन्हें तुझ तक पहुँचा सकूँ.... इससे पहले कि सूर फूंक दिया जाए .... इससे पहले कि अमल की मोहलत खतम होजाए..''
........................................................................................................जारी है....
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