गुरुवार, 12 जुलाई 2012

भाग ३.० हष्र का मैदान


हम दोनों एक बार फिर तेजी से चल रहे थे. अर्श की हदों से निकलते ही एक बहुत गर्म और वहशत से भरपूर माहौल से वास्ता पड़ा. लगता था कि सूरज नौ करोड़ मील से सवा मील पर आकर दहकने लगा है. हवा बिल्कुल बंद थी . लोग पसीने में डूबे हुए थे. पानी का नाम व निशान नहीं था. मुझ पर कौसर के जाम का असर था वरना इस माहौल में तो एक लम्हा बिताना नामुमकिन था. मगर मैं देख रहा था कि अनगिनत लोग इसी माहौल में बदहाल घूम रहे थे . चेहरों पर वहशत, आंखों में भय, बाल धूल से भरे, शरीर पसीने से नहाता हुआ, वुजूद (अस्तित्व) मिट्टी से अटा हुआ, पैर में छाले और उन छालों से रिसता हुआ खून और पानी. इतनी बड़ी तादाद में इतने ज्यादा परेशान लोगों का ये मन्ज़र मैंने जीवन में पहली बार देखा था. हर तरफ अराजकता छाई हुई थी. हर किसी को अपनी पड़ी हुई थी. मेरी नज़रें किसी ऐसे व्यक्ति को खोज रही थीं जिसे मैं जानता हूँ. पहला इंसान जो मुझे नज़र आया जिसे मैं जानता था वो थे मेरे उस्ताद (गुरु) फरहान अहमद. उन्होंने दूर से मुझे देखा और तेजी के साथ मेरी आँखों से ओझल होने की कोशिश करने लगे. मैंने सालेह से कहा:
'' उन्हें रोको! यह मेरे शिक्षक हैं. मैं उनसे बात करना चाहता हूँ.''
मगर उसने मुझे उनकी ओर बढ़ने से रोक दिया और गुस्सा और नफरत भरे लहजे में बोला
'' देखो अब्दुल्ला! अपने उस्ताद के अपमान को और ज्यादा मत बढाओ. इस समय यहां अगर किसी का हाल खराब हो रहा है तो समझ लो के उसके साथ इन्साफ हो चुका है. वह खुदाई कसौटी पर खोटा सिक्का निकला, इसलिए इस हाल में है.''
मैं तड़प कर बोला:
'मगर हमने तो खुदा परस्ती और परलोक की सोच और अच्छे अखलाक की सारी बातें उन्हीं से सीखी थी.'
'' सीखी होंगी'', सालेह ने बेपरवाई से जवाब दिया.
''मगर उनका इल्म (ज्ञान) उन का व्यक्तित्व नहीं बन सका. देखो! खुदा के सामने किसी इंसान का फैसला उसके इल्म (ज्ञान) के आधार पर नहीं होता. उसका का अमल (कर्म), सीरत और किरदार ही बुनियादी चीज़ें है. इल्म (ज्ञान) केवल इसलिए होता है कि इंसान सही आधार पर अपने आप को सँवार सके. इल्म ज़ाहिर तक रहे तो साँप है और अन्दर उतर जाए तो दोस्त बनजाता है.
यही तुम्हारे उस्ताद के साथ हुआ है. वह एक अच्छे लेखक थे. बातें भी अच्छी करते थे. लेकिन उनकी सीरत और किरदार उनकी बातों के अनुसार न थी. वास्तव में तुम्हारे उस्ताद साँप पाल रहे थे. आज इल्म के इन सांपों ने उन्हें डस लिया है. आज यहां जब तुम लोगों को देखोगे तो उन्हें उनके ज़ाहिर और उनकी बातों के अनुसार नहीं पाओगे, बल्कि उनके व्यक्तित्व ठीक वैसे ही दिखेंगे जैसा कि वों अन्दर से थे. याद रखो! ख़ुदा लोगों को उनके ज़ाहिर और उनकी बातों पर नहीं परखता. वो अमल और किरदार को देखता है. खासकर अहले इल्म (ज्ञानी) की पकड़ आज के दिन बहुत सख्त होगी. जो बातें दूसरे लोगों के लिए फाएदे मंद बन जाएगी आज आलिम (ज्ञानी) के लिए फाएदा न दे सकेंगी.''
'मगर उन्होंने बड़ी कुर्बानियां दी थीं.' मैंने हार न मानते हुए कहा.
'' हां लेकिन उनका बदला उन्हें दुनिया में मिल चूका है.'' सालेह ने जवाब दिया.
'' इल्म की ग़लतियाँ माफ हो सकती है, लेकिन किरदार की कमजोरी आज के दिन इसी हाल में पहुंचाएगी जिस हाल में तुम्हारे उस्ताद  हैं. खैर अभी तो यह दिन शुरू हुआ है, देखो आखिर तक इनका क्या होता है.''
मैं सदमे की हालत में देर तक गुमसम खड़ा रहा. मैं एक यतीम इंसान था जिसका कोई रिश्ता नाता न था. मेरे लिए जो कुछ थे मेरे उस्ताद ही थे. उन्होंने मेरी देख भाल की, मुझे इल्म सिखाया, मेरी शादी करवाई, और जीवन में लक्ष्य दिया. जो आदमी मेरे लिए पिता से ज्यादा कीमती था, उसे इस हाल में देख कर मुझे एक शाक (Shock) लगा था. इस हाल की वजह से मैं अपने आस पास के माहौल से बे खबर हो गया था.
मेरे सामने अनगिनत लोग भागते, दौड़ते, गिरते पड़ते चले जा रहे थे. वातावरण में आग की लपटों के दहकने की आवाज़ के साथ लोगों के चीख़ने चिल्लाने और रोने पीटने की आवाजें गूंज रही थीं. लोग एक दूसरे को बुरा भला कह रहे थे, गालियां दे रहे थे, लड़ झगड़रहे थे, आरोप प्रत्यारोप कर रहे थे, आपस में गुत्थम गुत्था थे.
कोई सर पकड़ के बैठा था. कोई मुँह पर धूल डाल रहा था. कोई चेहरा छिपा रहा था. कोई शर्मिंदगी उठा था. कोई पत्थरों से सिर टकरा रहा था. कोई अपना सीना पीट रहा था. कोई खुद को कोस रहा था. कोई अपने माँ बाप, पत्नी बच्चों, दोस्तों और नेताओं को अपनी तबाही का जिम्मेदार ठहराकर उन पर बरस रहा था. इन सब का मुद्दा एक ही था. क़यामत का दिन आ गया और उनके पास उस दिन की तैयारी नहीं थी. अब यह किसी को आरोप दें या खुद को बुरा भला कहें, मातम करें या सब्र का दामन थामें, अब कुछ नहीं बदल सकता. अब तो इंतजार था तो बस जहानों के मालिक के ज़हूर का. जिसके बाद हिसाब किताब शुरू होना था और पूरे इन्साफ के साथ हर व्यक्ति के भाग्य का फैसला किया जाना था.
मगर मैं इस सबसे बेखबर न जाने कितनी देर तक इसी तरह गुमसम खड़ा रहा. अचानक मेरे बिलकुल करीब एक आदमी चिल्लाया:
'' हाय ... इससे तो मौत अच्छी थी. इससे तो कब्र का गढ़ा अच्छा था.''
यह चीख नुमा आवाज़ मुझे वापस अपने माहौल में ले आई. पल भर में मेरे मन में शुरू से आखिर तक सब कुछ ताजा हो गया.
...............
मैंने गर्दन घुमा कर सालेह की ओर देखा. उसका चहरा हर प्रकार के प्रभाव से खाली था और वह लगातार मुझे देखे जा रहा था. मेरा ध्यान अपनी ओर आकर्षित पाकर वह बोला:
'' अब्दुल्ला! तुम हष्र के मैदान का हाल जानने के शौक में अपनी जगह छोड़ कर यहां आए हो तो ऐसे कई मंज़र (दृश्य) अब तुम्हें और देखने होंगे. मैं तुम्हें और ज्यादा सदमे से बचाने के लिए अभी से यह बता रहा हूँ कि तुम्हारी पत्नी, तीन बेटियों और दो बेटों में से तुम्हारी एक बेटी लैला और बेटा जमशैद इसी क्षेत्र में खार व परेशान मौजूद हैं.''
सालेह की यह बात सुनकर मेरे पैरों के नीचे से ज़मीन निकल गई. मुझे चक्कर सा आया और मैं सिर पकड़ कर बैठ गया. सालेह भी मेरे साथ ही जमीन पर चुप चाप बैठ गया.
मेरी आँखों से लगातार आँसू बह रहे थे. मगर यहाँ किसी को किसी की कोई परवाह नहीं थी. कोई क्यों बैठा है? क्यों खड़ा है? क्यों लेटा है? कोई क्यों रो रहा है? क्यों चीख रहा है? क्यों मातम कर रहा है? यह किसी का सवाल नहीं था. आज सबको अपनी ही पड़ी थी. ऐसे में कोई रुक कर मुझसे मेरा ग़म क्यों पूछता? लोग हमारे पास से भी बेपरवाह हो कर चले जा रहे थे. कुछ देर बाद मैंने सालेह से पूछा:
'अब क्या होगा?'
''जाहिर है हिसाब किताब होगा. फिर उसके बाद ही कोई अंतिम बात सामने आएगी.''
उसका जवाब दो टूक था. फिर वह अपनी बात की व्याख्या करते हुए बोला:
''जिन लोगों ने आज के दिन की हाजरी को अपने लिए एक ज़रूरी मसला बना लिया था और उसी के लिए जिये, चाहे वह ईमान और अख़लाक़ की ज़रूरतों को पूरी करने वाले नेक लोग हों या ख़ुदा के दीन की मदद को अपनी ज़िन्दगी बनाने वाले इमानदार, सब के सब इस तरह उठाए गए हैं कि उनकी निजात (मुक्ति) का फैसला हो चुका है. इन लोगों ने जीवन में केवल नेकयाँ कमाई थी. खुदा और मखलूक (प्राणी) के हक़ (अधिकार) पूरे किए थे. इसलिए उनकी मौत ही उनका परवाना-ए-निजात बनकर सामने आई थी और हष्र के दिन उन्हें शुरू से ही पनाह नसीब हो गई.
'मगर गुनाह तो सब करते हैं. तो क्या इन लोगों ने कोई गुनाह नहीं किया था?' मैंने पूछा.
''हां गुनाह उन्होंने भी किए थे, मगर उनके छोटे छोटे गुनाह उनकी नेकियों ने समाप्त कर दिए और अगर कभी किसी बड़े गुनाह से दामन दागदार हुआ तो उन्होंने फ़ौरन तौबा के आंसुओं से दागों को धो दिया था. ऐसे सभी साफ पवित्र लोग इस समय अर्श के साये के नीचे हैं. इन लोगों का औपचारिक हिसाब किताब होगा जिसके बाद उनकी कामयाबी का ऐलान कर दिया जाएगा.
इसके विपरीत जिन लोगों के खाते में कोई बड़ा गुनाह हुआ जो ईमान को ही बेफाएदा कर दे जैसे कुफ़्र (इश्वर का इनकार), शिर्क (एक इश्वर के साथ औरों को भी पूजना), मनाफकत (दोगला पन), हत्या, व्यभिचार, बलात्कार, यतीमों का माल खाना, खुदा की बनाई हुई हदों को पार करना और इसी प्रकार अन्य अपराध आदि, तो इन्साफ की तराजू में ऐसे लोगों के पापों का पलड़ा भारी होगा और उन्हें नरक की सज़ा सुनादी जाएगी.'' सालेह ने कानून की खोल कर व्याख्या की.
'लेकिन इंसान तो इन दो हदों के बीच भी होते हैं. उनका क्या होगा?' मैंने सवाल किया तो सालेह ने जवाब दिया:
''हां इन दो हदों के बीच वह लोग हैं जिनके पास ईमान और कुछ न कुछ अच्छे काम का खज़ाना भी है, मगर वह दुनिया में पाप करते रहे और तौबा भी नहीं की. ऐसे लोगों को अपने पापों के बदले हष्र के दिन की सख्ती झेलनी होगी, उसके बाद मुक्ति की कोई संभावना पैदा हो सकती है. आज जो लोग मैदान हष्र में फंसे हुए हैं वह या तो मुजरिम हैं जिन्हें आखिरकार नरक में फेंका जाएगा या फिर ईमानदार है जिनका दामन थोड़े बहुत गुनाहों से दागदार है. सो जिसके गुनाह जितने अधिक और जितने बड़े होंगे आज के दिन उसे उतनी ही सख्ती झेलनी होगी. कम गुनाह करने वालों को हिसाब किताब के शुरू में ही निजात मिल जाएगी. लेकिन जैसा कि मैंने कहा कि दुनिया के जीवन के सैकड़ों साल तो गुज़र चुके हैं. उन लोगों को हिसाब के शुरू में निजात भी मिली तो यह हष्र की सख्ती दुन्याँ की साठ साल की ज़िन्दगी में किये हुए गुनाहों के बदले के लिए काफी है. जबकि जिनके गुनाह ज्यादा हैं उन्हें तो न जाने अब कितने हजार या लाख साल तक इस सख्ती और इस डर को झेलना होगा.''
सालेह की बात सुनकर मैंने दिल में सोचा कि दुनिया में गुनाह कितने मामूली लगा करते थे, लेकिन आज यह किस मुसीबत में ढल गए हैं. काश लोग अपने गुनाहों को छोटा ना समझते और फ़ौरन तौबा करने को ज़रूरी बना लेते. वह लोगों की बुराई करने, चुगल खोरी करने, कमजोरों पर ज़ुल्म करने, दिखावा और प्रदर्शन करने, झूंटे आरोप लगाने आदि को मामूली चीज़ ना समझते. खुदा और बन्दों के अधिकार को पामाल करने को छोटा न समझते, खुदा की नाफ़रमानी (अवज्ञा) से बचते और रसूल की बात मानते तो आज यह दिन न देखना पड़ता जहां एक गुनाह का थोड़ा सा मज़ा (आनन्द) आज सैकड़ों साल की रुसवाई और अज़ाब में बदल चुका है.
फिर मैंने उससे पूछा:
'क्या इस समय किसी को पता है कि उसकी निजात (मुक्ति) होगी या नहीं, और अगर होगी तो कैसे होगी?'
सालेह ने जवाब दिया:
''यही तो सब से बड़ी मुसीबत है. कि यहाँ किसी को यह नहीं पता कि उसका भविष्य क्या है. निजात की उम्मीद है या नहीं? यह कोई नहीं जानता सिवाय एक ईश्वर के. इसलिए रसूल अल्लाह (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) और अन्य नबी लगातार दुआ कर रहे थे कि हिसाब किताब शुरू हो जाए. इसके परिणामस्वरूप इमानदार लोगों को यह फायदा होगा कि वह मुजरिमों से अलग होकर हिसाब किताब के बाद निजात (मुक्ति) पाजाएँगे. तुम जानते हो आज के दिन अपनी मर्जी से न किसी के लिए कोई अपनी जुबान से एक बोल निकाल सकता है और न इसकी कोई गुंजाइश है. और खुशी की बात यह है कि रसूल अल्लाह की यह दुआ क़ुबूल हो चुकी है. यह बात खलीफा-ए-रसूल अबू बक्र सिद्दीक़ ने तुम्हें खुद बताई थी.
'मगर अभी तक हिसाब किताब तो शुरू होता नजर नहीं आता.' मैंने आश्चर्य से पूछा तो सालेह बोला:
''दुआ क़ुबूल हुई है, लेकिन इस पर अमल खुदा अपनी हिकम और मसलहत (रणनीती और सब के हितों) के तहत ही करेंगे. हो सकता है कि अभी तक पूरी दुनिया से लोग यहां पहुंचे ही नहीं.''
'क्या मतलब लोग इतने वर्षों में यहां तक ​​नहीं आए?'
''तुम्हारा क्या ख्याल है कि आज लोग विमान, रेलों, बसों और मोटरों में बैठ कर यहां तक ​​आयेंगे? आज सब पैदल दौड़ते आ रहे हैं. इस्राफील के सूर ने लोगों को इस दिशा में आने के लिए मजबूर कर दिया था. आज समंदर पाट दिए गए हैं और पहाड़ ढाह दिए गए हैं. इसलिए लोग सीधा यहां आ रहे हैं, लेकिन जाहिर है पैदल आते हुए समय तो लगेगा. लेकिन नेक लोगों के साथ फरिश्ते थे जो उन्हें तुरंत यहाँ ले आए. बहरहाल जब तक हिसाब किताब शुरू नहीं होता, हम यहाँ मौजूद लोगों के हाल देख लेते हैं. वैसे शायद तुम इसी मकसद के लिए यहां आए थे.''
सालेह ने ये शब्द कहे और मेरे जवाब का इंतज़ार किए बिना मेरा हाथ थामे आगे बढ़ने लगा. इस समय गर्मी से चेहरे तप रहे थे. हर तरफ गर्द व ग़ुबार उड़ रहा था. लोग समूह के रूप में भी और अकेले भी इधर से उधर परेशान घूम रहे थे. मेरी खोजी नज़रें अपने किसी परिचित को खोज रही थीं, मगर कहीं कोई जानी पहचानी सूरत नज़र नहीं आ रही थी. अचानक कहीं से एक लड़की आई और इससे पहले कि मैं उसकी शक्ल देख पाता मेरे कदमों पर गिरकर बेबसी से रोने लगी. मैंने परेशां नज़रों से सालेह की ओर देखा.
उसने सपाट लहजे में लड़की से कहा:
''खड़ी हो जाओ!''
उसके अंदाज़ में न जाने क्या था कि मेरी रीढ़ की हड्डी में सनसुनाहट होने लगी. लड़की भी सहम कर खड़ी हो गई. मैंने उसका चेहरा देखा. यह चेहरा डर, अनदेशे और गम के साए से काला पड़ चूका था. चेहरे और बालों पर मिट्टी पड़ी हुई थी. प्यास के मारे होंठों पर पपड़ियाँ जमी हुई थीं और डरी हुई आंखों में भय और आतंक का रंग छाया हुआ था.
रहम और प्यार की एक लहर मेरे वजूद के अंदर उतर गई. मैंने इस चेहरे को जब पहली बार देखा था तो भी ख़ुशी से चश्मे बद्दूर कहा था. गोरा रंग, बारीक नाक नक्शा, किताब सा चेहरा, गुलाबी होंठ, नीली आंखें और गहरे काले बाल. ख़ुदा ने इस चेहरे को प्राकृतिक सौंदर्य से इस तरह सजाया  था कि सजने सवारने की उसे ज़रुरत न थी. लेकिन आज यह चेहरा बिल्कुल बदल चुका था. अतीत की ख़ूबसूरती को वर्तमान के हालत ने हष्र के दुखों में कहीं दफन कर दिया था. हसरत, डर, वहशत, दुःख (यातना) और शर्म से भरा हुआ यह अस्तित्व किसी और का नहीं मेरे चहेते बेटे जमशैद की पत्नी और मेरी बड़ी बहू हुमा का था जो हसरत और डर की  एक जिन्दा तस्वीर बनकर मेरे सामने खड़ी थी.
''अब्बू जी मुझे बचा लीजये. मैं बहुत तकलीफ में हूँ. यहां का माहौल मुझे मार डालेगा. मैंने सारी ज़िंदगी कोई तकलीफ नहीं देखी, लेकिन अब लगता है कि मेरे जीवन में कोई आसानी नहीं आएगी. खुदा के लिए मुझ पर दया करें. आप खुदा को प्यारे बन्दे हैं. मुझे बचा लीजये''
यह कहते हुए हुमा हिचकियां लेकर रोने लगी.
'जमशैद कहां है?' मैंने डूबी हुई आवाज़ में पूछा.
''वो यहीं थे. वो भी आप को ढूंढ रहे हैं. लेकिन यह इतनी बड़ी जगह है और इतने सारे लोग हैं कि किसी को ढूँढ पाना नामुम्किन है. उनका हाल भी बहुत बुरा है. वह मुझसे बहुत नाराज़ थे. उन्होंने मिलते ही मुझे थप्पड़ मार कर कहा कि तुम्हारी वजह से मैं बर्बाद हो गया. अब्बू मैं बहुत बुरी हूँ. मैं खुद भी बर्बाद हो गई और अपने परिवार को भी बर्बाद कर दिया. प्लीज़ मुझे माफ़ कर दें और मुझे बचालें. खुदा का अज़ाब (प्रकोप) बहुत भयानक है. मैं उसे बर्दाश्त नहीं कर सकती.''
हुमा फरियाद कर रही थी और उसकी आंखों से आंसुओं की धारा बह रही थी. मेरे दिल में दबी प्यार की भावना जोश मारने लगी. वह बहरहाल मेरी बहू थी. लेकिन इससे पहले कि मैं कुछ कहता, सालेह उसी सपाट लहजे में बोला:
''यह तुम्हें दुन्याँ में सोचना चाहिए था हुमा बीबी. आज तुम्हारी अक्ल ठिकाने आ गई है. मगर याद है दुन्याँ में तुम क्या थीं? तुम्हें शायद याद न आए ... मैं याद दिलाता हूँ.''
यह कहते हुए सालेह ने इशारा किया और अचानक एक मंज़र (दृश्य) सामने नज़र आने लगा. यह जमशैद और हुमा का कमरा था. मुझे लगा कि मेरे आसपास का माहौल गायब हो चुका है और मैं इसी कमरे में इन दोनों के साथ मौजूद हूँ और सीधे सब कुछ देख और सुन रहा हूँ.
...............
''जमशैद अब इस देश में मैं नहीं रह सकती. अब हमें किसी वेस्टर्न कंट्री में शिफ्ट हो जाना चाहिए.''
ड्रेसिंग टेबल के सामने बैठी हुई हुमा ने अपने कटे हुए बालों को ब्रश करते हुए कहा. जमशैद बैड पर लेटा टीवी देख रहा था. उसने कोई जवाब नहीं दिया.
''तुमने सुना जमशैद मैंने क्या कहा?''
'यस मैंने सुन लिया. लेकिन मेरा पूरा परिवार यहाँ है. में उन्हें छोड़ कर कैसे जाऊँ?'
''बिल्कुल वैसे ही जैसे तुम उनका घर छोड़ कर मेरे साथ अलग हो चुके हो.''
'यहां की बात और है. में सप्ताह में एक बार जाकर उससे मिल तो लेता हूँ. दूसरा यह कि फौरेन ट्रिप तो हम हर साल कर ही लेते हैं. फिर हमें बाहर शिफ्ट होने की क्या जरूरत.'
''नहीं अब बच्चे बड़े हो रहे हैं. मैं चाहती हूँ कि उनकी परवरिश बाहर ही हो.''
'लेकिन मैं यह चाहता हूँ कि मेरे बच्चे मेरे माँ बाप की सोहबत(साथ) का लाभ उठाएं. मैं तो अपने माँ बाप की नेकी का कोई हिस्सा नहीं पा सका, लेकिन कम से कम मेरी औलाद तो नेक हो.'
'' उन्हीं की सोहबत से तो मैं अपने बच्चों को बचाना चाहती हूँ. मेरे एक बच्चे को भी अगर अपने दधिहाल की हवा लग गई तो उसकी ज़िन्दगी खराब हो जाएगी.''
इसके साथ ही फोन की घंटी बजी. जमशैद ने फोन उठाया. दूसरी ओर से कुछ कहा गया. जमशैद ने अच्छा कहकर रिसीवर नीचे रख दिया और हुमा को संबोधित करके कहा:
' तुम्हारे पापा हमें नीचे बुला रहे हैं.' फिर हुमा की बात का जवाब देते हुए बोला:
' तुम आखिर मेरे माँ बाप के बारे में इतनी निगेटिव क्यों हो? उन्होंने मेरी खुशी के लिए तुम्हें बहू के रूप में स्वीकार किया. हालांकि तुम्हारे शैली और अंदाज़ उन्हें बिल्कुल पसंद नहीं थे. तुम मुझे लेकर अलग हो गई तब भी उन्होंने बुरा नहीं माना.'
'' बस बस रहने दो.'' हुमा तनक कर बोली.
'' उन्हें मेरे स्टाइल और तौर तरीके नापसंद थे. लेकिन तुम मेरे प्यार में दीवाने हो रहे थे. इसलिए उन्होंने मजबूरन तुम्हें मुझसे शादी की अनुमति दी. तुम उनसे अलग होकर यहां अधिक अच्छी ज़िन्दगी गुजार रहे हो. पापा के व्यापार में शामिल हो. करोड़ों में खेलते हो. जमशैद मुझसे शादी करके तुम सरासर फाएदे में रहे हो. तुमने कोई नुकसान नहीं उठाया.''
'पता नहीं क्यों तुम्हारी बातें सुनकर कभी कभी अब्बु की याद आती है कि फाएदे और नुक्सान का फैसला आखिरत के दिन होगा.'
'' यार यह बेकार की धार्मिक बातें बंद करो. मुझे इनसे चिढ़ आती है. कोई क़यामत आदि नहीं आनी है. लाखों साल से दुनिया का सिस्टम ऐसे ही चल रहा है..
If you are smart, powerful and wealthy you are the winner. All the others are loosers and idiots. And you know this judgment day is nothing but a rabbish.''
वैसे तुम्हारी जानकारी के लिए बतादूँ, मेरे पापा ने अपने पीर साहब से यह गारंटी ले रखी है कि क़यामत में वो उन्हें बख्शवा देंगे. उन्हें बहुत पैसा देते हैं मेरे पापा.''
' हां हम जिस तरह गैर कानूनी मुनाफा ख़ोरी, कानून का उल्लंघन और कई हराम तरीकों से पैसा कमाते हैं, उसे कहीं तो पाक करना होगा. मुझे सब मालूम है. तुम्हारे पापा और चौधरी मुख़्तार साहब कई व्यापार में भागीदार हैं और दो नंबर के हथकंडों से पैसा कमाते हैं.'
'' अच्छा ... इतना ही हलाल हराम मानते हैं तो छोड़ दो पापा का व्यापार.''
' व्यापार तो छोड़ दूं, मगर तुम्हें कैसे छोडूं. मुझे पता है कि इसके बाद नौकरी करने से न तुम्हारे खर्च पूरे होंगे और न मैं तुम्हारा लिविंग स्टैंडर्ड मैनटेन कर सकूँगा. तुम्हारे प्यार ने मुझे कहीं का न छोड़ा. वरना जिस परिवार से मैं हूँ वहाँ हलाल और हराम ही सब कुछ है.'
'' इसीलिए इतना मध्यम वर्गीय जीवन गुजार रहे हैं वे. अच्छा हुआ तुम मेरे साथ आ गए वरना अपने भाइयों की तरह मोटरसाइकिल पर घूमते या 800 सीसी गाड़ी चलाते किसी फ्लैट में सड़ी हुई ज़िन्दगी गुजार कर मर जाते.''
' ज़िन्दगी अच्छी गुजारें या बुरी, मरना तो हमें है ही. पता नहीं आखिरत (परलोक) में हमारे साथ क्या होगा?'
'' बेफ्रिक रहो कुछ नहीं होगा. वहां भी हम ठाट से रहेंगे. मेरे पापा के पीर साहब के सामने तो तुम्हारे अल्लाह मियां भी कुछ नहीं बोल सकते.''
' कुफ़्र तो मत बको... और अल्लाह मेरा कहाँ है. जब मैं अल्लाह का नहीं रहा तो वह मेरा कैसे रहेगा.'
यह बात कहते हुए जमशैद का लहजा भररा गया और उसकी आँखों में नमी आ गई. मगर हुमा उसके बहते हुए आंसुओं को नहीं देख सकी. उसका सारा ध्यान आईने की ओर था. वह अपना मेकअप पूरा कर चुकी थी, इसलिए ड्रेसिंग टेबल के सामने से उठते हुए बोली:
'' अच्छा छोड़ो यह बेकार की बातें! नीचे चलो, पापा इंतज़ार कर रहे होंगे.''
.....................................................................................................जारी है...

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