हम हवा के नरम और तेज झोनकों की तरह आगे बढ़ रहे थे. इस चलने में कोई परेशानी न थी बल्कि मज़ा आ रहा था. न जाने हमने कितना फासला तय किया था, तभी सालेह कहने लगा:
''अर्श इलाही के साये में मामून इलाक़ा शुरू होने वाला है. वो देखो! आगे फरिश्तों की एक भीड़ नजर आ रही है. उनके पीछे एक ऊँचा दरवाजा है. यही अंदर जाने का दरवाज़ा है.''
मैंने सालेह के कहने पर सामने गौर से देखा तो वाकेई फ़रिश्ते और उनके पीछे एक दरवाजा नज़र आया. लेकिन यह अजीब दरवाजा था जो किसी दीवार के बिना ही खड़ा था. या शायद दीवार न दिखने वाली थी क्योंकि दरवाजे के पीछे की ओर कुछ नज़र नहीं आ रहा था. जैसे एक नज़र न आने वाला पर्दा था जो दरवाजे के पीछे के हर नज़ारे को ढक रहा था.
खैर, उसकी बात सुनते ही मेरे कदम तेज हो गए और दूरी तेजी से घुटने लगी. दरवाज़ा अभी दूर ही था, लेकिन फरिश्ते साफ नज़र आने लगे थे. यह बहुत कठोर ऊंचे और तड़ंगे फरिश्ते थे जिनके हाथ में आग के कोड़े देख कर मैं घबरा गया. मैंने सालेह का हाथ मजबूती से पकड़ कर उसे रोकते हुए कहा:
'तुम शायद गलत दिशा में जा रहे हो,यह तो अज़ाब के फरिश्ते लगते हैं.'
'' चलते रहो.'' उसने रुके बिना जवाब दिया.
मजबूर था मुझे भी उसके पीछे जाना पड़ा. लेकिन मैंने ये किया कि उससे दो कदम पीछे चलने लगा ताकि अगर पलट कर भागने की नौबत आए तो उससे आगे ही रहूँ. सालेह को मेरे अहसासों का अंदाज़ा हो चुका था. उसने बात को साफ़ करना ही सही समझा:
'' यह बेशक अज़ाब ही के फरिश्ते हैं.''
मैंने उसकी बात बीच ही में से उचक कर कहा: 'और यहां इसलिए खड़े हैं कि आगे बढ़ने से पहले मेरी पिटाई करके मेरे गुनाह झाड़ें.?'
वह मेरी बात सुन कर जोर जोर से हंसने लगा और बोला:
''यार देखो अगर पिटाई होनी ही है तो तुम्हे भगने से कोई फायदा नहीं होगा. कोई इंसान इन फरिश्तो की रफ़्तार और ताकत का मुकाबला नहीं कर सकता. वैसे तुम्हारी जानकारी के लिए बतादूँ कि यह तुम्हारे लिए यहाँ नहीं खड़े हैं. बल्कि इसलिए खड़े हैं ईश्वर का कोई अपराधी अगर इस तरफ आने की कोशिश करे, तो उसे इतना मारें कि वह दोबारा इस ओर आने की हिम्मत न करे.''
हमारे करीब पहुंचने से पहले ही उन्होंने दो भागों में बट कर हमारे लिए रास्ता बना दिया. और उस पर एक इनायत ये भी की के कोड़ों को अपने पीछे छिपा लिया. मेरा ख्याल था कि शायद अब ये हमें देखकर मुस्कुराएँगे और ख़ुशी का इज़हार करेंगे, लेकिन मैं कोशिश के बावजूद भी उनके चेहरे पर कोई मुस्कान न ढूँढ सका. सालेह कहने लगा:
''इनके यहाँ होने का एक मकसद तुम्हें अल्लाह की नेमत का एहसास दिलाना है कि किस तरह के फरिश्तों से तुम्हें बचा लिया गया.''
आप से आप मेरी जुबान से खुदा की बड़ाई और शुक्र अदा होने लगा.
उनके बीच से गुजर कर हम दरवाजे के पास पहुंचे तो वह खुद ब खुद खुल गया. उसके खुलते ही मेरी नज़रों के सामने एक सुहाने मौसन की जगह आ गई. यहां से वो जगह शुरू हो रही थी जहां अर्श इलाही की रहमतें साया कर रही थीं. रूह तक उतर जाने वाली ठंडी हवाएं और सुकून देने वाली खुशबू मुझे छूने लगी थीं.
हम दरवाज़े से अन्दर दाखिल हुए तो देखा कि दूर तक फरिश्ते कतार लगाए खड़े थे. उनके चेहरे बेहद आकर्षक और इससे कहीं अधिक ख़ूबसूरत मुस्कान उनके चेहरे पर थी. यह हाथ बांधे अदब के अंदाज़ में खड़े थे. हम जैसे ही उनके बीच से गुज़रे, दुआ और सलाम और स्वागत है के शब्दों से हमारा स्वागत शुरू हो गया. उनके व्यवहार और शब्दों की तासीर मेरी रूह की गहराई में उतर रही थी और उनके वुजूद (अस्तित्व) से उठने वाली खुशबुएँ मेरे अहसास को ओर ज़यादा खुशनुमा बना रही थी.
यहां दाखिल होते ही मुझे यह लगा कि मेरे अंदर कोई असामान्य बदलाव आया है. लेकिन उस समय मेरा सारा ध्यान फरिश्तों और यहां के आकर्षक माहौल की तरफ था इसलिए मैं ज्यादा ध्यान नहीं दे सका कि मेरे साथ क्या हुआ है. मैंने इस हालत को बस यहाँ के माहौल का असर समझा. चलते चलते मुझे कुछ ख्याल आया तो मैंने सालेह के कान में हलके से कहा:
'यार यह तो ठीक है कि लोग मुझे कोई बख्शा हुआ इंसान मान कर मेरा स्वागत कर रहे हैं, लेकिन यहाँ मेरा निजी जानकार तो कोई नहीं है. क्या यहाँ तुम्हारा कोई परिचित है?'
मेरी बात सुनकर सालेह हँसते हुए बोला:
''अब्दुल्ला! आज हर इन्सान अपने माथे से पहचाना जाएगा कि वह कौन है. तुम्हें पता नहीं लेकिन तुम्हारा पूरा परिचय तुम्हारी माथे पर लिखा है. तुम देखते जाओ आगे क्या होता है.''
कतार के आखिर पर खड़ा एक फ़रिश्ता, जो अपने ढंग से इन सब का सरदार लग रहा था, मेरे पास आया और मेरा नाम लेकर उसने मुझे सलाम किया. मैंने सलाम का जवाब दिया. फिर वह बहुत नरमी और प्रेम से बोला:
''हमेशा बाक़ी रहने वाली कामयाबी मुबारक हो!''
मैंने जवाब में धन्यवाद किया था कि वो बोला:
''क्या आप आईना देखना पसंद करेंगे?''
मेरी समझ में नहीं आया कि उसने यह बात मजाक में कही थी या गंभीरता से. क्योंकि तब आईना देखने की कोई सही वजह मुझे समझ में नहीं आ रही थी. लेकिन उसने मेरे जवाब का इंतजार नहीं किया. एक फरिश्ते को इशारा किया और अगले ही पल मेरे सामने एक इन्सान के कद के बराबर बड़ा आईना था. मैंने इस आईने को देखा और मुझे विश्वास हो गया कि उसने मेरे साथ मजाक किया था. क्योंकि यह आईना नहीं बल्कि एक बहुत सुंदर और जीवन से भरपूर पेंटिंग थी जिसमें एक सुंदर युवा बल्कि शहजादा शाही लिबास पहने खड़ा था. यह तस्वीर किसी भी तरह से तस्वीर नहीं लग रही थी बल्कि यूं लग रहा था कि जैसे आईने के सामने कोई आदमी जीवित खड़ा हुआ है.
मैंने उस फरिश्ते की ओर देखा और मुस्कुरा कर कहा:
'आप अच्छा मजाक करते हैं, लेकिन पेंटिंग उससे भी अच्छी कर लेते हैं. चित्रकार तो आप ही लगते हैं, लेकिन इसमें मॉडल कौन है?'
फरिश्ते ने बहुत गंभीरता से मेरी बात का जवाब दिया:
''चित्रकार तो सारी सूरतें बनाने वाला इज्ज़त वाला सारे जहानों का मालिक है. लेकिन मॉडल आप हैं.''
इसके बाद उसने सालेह को इशारा किया. वो मेरे पास आया और मेरा सिर घुमाकर फिर पेंटिंग की ओर कर दिया. इस बार पेंटिंग में युवा के साथ सालेह भी दिख रहा था. मैं हैरत से कभी सालेह को देखता और कभी उस आईने में खड़े दूसरे व्यक्ति को जिसके बारे में दोनों की समान राय यह थी कि यह मैं ही था.
'मगर यह तो मैं नहीं हूँ !'' मैंने ज़ोर से कहा.
जवाब में सालेह ने एक मिसरा पढ़ दिया:
''ऐ जान-ए-जहां ये कोई तुम सा है कि तुम हो''
'लेकिन यह कैसे मुमकिन है? मैं तो एक बूढ़ा इन्सान था और जवानी में भी कम से कम ऐसा नहीं था!'
इस बार मेरी बात का जवाब दुसरे फरिश्ते ने दिया:
''आप नामुमकिन की दुन्याँ से मुमकिन की दुन्याँ में आ गए हैं. आप इंसानों की दुन्याँ से खुदा की दुन्याँ में आ गए हैं. आज हर इन्सान वैसा नहीं दिखाई देगा जैसा वह दुन्याँ में दूसरे इंसानों को नज़र आता था. बल्कि आज हर इन्सान वैसा दिखेगा जैसा वह अपने मालिक (ईश्वर) को नज़र आता था. और मालिक की नज़र में इन्सान की सूरत गिरी उनके हड्डी, मांस और खाल से नहीं बल्कि उनके ईमान और अखलाक (नैतिकता) और आमाल (कार्यों) के हिसाब से होती थी. आप उसे दुन्याँ में जैसे लगते थे, वैसा ही आज उसने आपको बना दिया है. वैसे यह आरजी इंतजाम (अस्थायी व्यवस्था) है. आपकी असल शख्सियत (व्यक्तिव) उस समय सामने आएगी, जब जन्नत में आपके दर्जों (वर्गों) का फैसला अंतिम रूप में होगा. फिलहाल तो आप आगे जाइये. कई अन्य लोग आपका इंतज़ार कर रहे हैं.''
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हम आगे की ओर बढ़ने लगे. मुझे अंदाजा हो चुका था कि अंदर दाखिल होते ही मुझे जिस बदलाव का एहसास हुआ था वो क्या था . मेरी चाल में बहुत विश्वास था. शायद यह आईने का असर था कि अब मुझे विश्वास आने लगा था कि रब ने मुझे इज्ज़त वालों में करके मेरे नसीब को हमेशा की लिए जगा दिया है. मेरे जीवन के रात और दिन और उन में आने वाली समस्याएं अब मेरे लिए ख्वाब और ख्याल हो चुके थे. पिछली दुनिया की गरीबी, सब्र (धैर्य) और महनतें कभी इस तरह भी रंग लाएँगी, मुझे इसका बिल्कुल अंदाजा नहीं था. क़ुरआन और हदीसों में अगली दुनिया का बहुत कुछ परिचय पढ़ा था, मगर आँख जो कुछ देख सकती है, कान सुनते हैं और मन महसूस करता है वह शब्दों से बहुत ही कम समझ में आता है. आज जब यह सब सच्चाइयाँ सामने हैं तो यकीन नहीं होता कि ..... मुझे यह अंदाज़ा तो ज़िन्दगी ही में हो चुका था कि परलोक की बाजी में जीत जाऊँगा. लेकिन इस जीत का मतलब इतना शानदार होगा, इसका मुझे बिल्कुल भी अंदाज़ा नहीं था.
''तुम्हें अब भी पूरा अंदाजा नहीं है.''
सालेह पता नहीं कैसे मेरे ख्याल पढ़ रहा था. उसके बोलने ने मुझे चोंका दिया. उसने अपनी बात जारी रखी:
''असल ज़िंदगी तो अभी शुरू ही नहीं हुई. अभी तो तुम हष्र के शुरूआती मरहले में हो. असल ज़िंदगी तो हकीकत में जन्नत में शुरू होगी. तब खुदा का इनाम देखना. तब खुदा को दाद देना. फिलहाल तो आगे देखो, हम कहां खड़े हैं.''
उसकी बात से मुझे एहसास हुआ कि मैं अपने माहोल से बिल्कुल बेखबर होकर चल रहा था. मैंने नज़र उठाकर देखा. इस समय हम एक विशाल और हरे भरे मैदान में थे. आसमान पर सूरज चमक रहा था. इसमें रोशनी थी पर धूप न थी. आसमान पर कहीं बादल नहीं थे, लेकिन ज़मीन पर हर जगह जैसे छाँओं थी ज़मीन हरी थी. शायद इसी के असर से आसमान हल्के नीले के बजाय हल्का हरा हो रहा था. मैदान के बीच में एक गगनचुम्बी पहाड़ था. मुहावरतन नहीं, सचमुच गगनचुम्बी. क्योंकि उसकी चोटी जहां हम खड़े देख रहे थे, आसमान में जमी हुई लग रही थी. वातावरण में हर तरफ भीनी भीनी खुशबू महक रही थी. यह खुशबू हर एतबार से बिल्कुल नई थी मगर बहुत महसूस होने वाली थी. हमारे कान हमें उन नेमतों का एहसास दिला रहे थे जो कानों में रस घोलने वाले जैसे संगीत के साथ चारो तरफ बिखरे हुए थे. मुझे यह लग रहा था कि यह खुशबू और ये फिजाई आवाजें मेरी नाक और कान के रास्ते से नहीं बल्कि सीधे मेरे दिल तक पहुंच रही हैं . उसकी तासीर में महक और आराम और सुरूर इस खूबसूरत अनुपात में इकठ्ठा थे कि मुझे अपना अन्दर झूमता महसूस होने लग रहा था.
मैं एक जगह रुक कर खड़ा हो गया और आंखें बंद करके इस माहौल में खो गया. सालेह ने मेरी एकाग्रता देखकर कहा:
''इस पहाड़ का नाम आराफ है. आओ इसके आसपास चक्कर लगाते हैं. मैं साथ साथ तुम्हें यहां की सारी जानकारी से अवगत करता रहूंगा.''
मैं जवाब दिए बिना बेसुध की सी हालत में सालेह के साथ हो लिया. हमने दाईं ओर से अपना सफर शुरू किया. हम कुछ दूर ही चले थे कि पहाड़ के एक हिस्से पर 'आदम की उम्मत' लिखा हुआ नज़र आया. मैंने सालेह से पूछा:
'क्या यहां आदम अलैहिस्सलाम हैं?'
''नहीं. सारे नबी पहाड़ के ऊपर वाले हिस्से पर हैं. तुम देखोगे कि हर थोड़ी थोड़ी देर बाद इसी तरह किसी न किसी नबी और उसकी उम्मत का नाम लिखा नज़र आएगा. हर उम्मत के निजात याफ्ता (मुक्ति प्राप्त) लोग ... तुम्हारे जैसे बख्शे हुए लोग... यहाँ आकर जमा होंगे.'' उसने जवाब दिया.
'क्या मुझे उम्मत मुहम्मदी के शिविर में जाना होगा?' इस पर मैंने गंभीरता से पूछा.
सालेह ने ना में सिर हिलाया और बोला:
''इन जंगहों पर बख्शे हुए लोग खड़े होंगे और हिसाब के आखिर से यहीं से जन्नत में जाएगें. तुम्हें पहाड़ के ऊपर जाना होगा. वहां सारे नबी और उनकी उम्मतों के वो लोग इकठ्ठा हैं जिन्होंने नबियों की पैरवी में लोगों को हक की दावत दी. ये लोग यहीं से इंसानों के बारे में खुदा का फैसला देखते रहेंगे. उसी जगह से उन्हें इंसानों पर गवाही देने के लिए बुलाया जाएगा. हर नाकामयाब व्यक्ति नरक की ओर और हर सफल व्यक्ति पहाड़ के नीचे अपने अपने नबी के शिविर में आता जाएगा. फिर हर उम्मत यहीं से समूह बना कर जन्नत में जाएगी. यह वह स्थान है जहां से खुदा की अदालत में हो रहे सभी फैंसलों को सीधे देखा जा सकता है. स्वर्ग और नरक भी यहां से दिखाई देता है.''
हम ये बातें कर रहे थे और एक एक करके सभी नबियों की उम्मतों की जंगहों से गुजरते जा रहे थे. तब तक हर जगह बहुत कम लोग थे. मैंने सालेह से कहा:
'शायद अभी सभी लोग नहीं आए.'
उसने कहा:
'' नहीं यह बात नहीं. अन्य नबियों की उम्मत से बख्शे हुए लोग हैं ही बहुत कम. ज्यादा तर लोग बनी इसराइल (यहूदी) में से हैं और सबसे ज्यादा उम्मते मुहम्म्मादिया में से हैं. दोनों गिरोह अभी तक नहीं आए. लेकिन फ़िलहाल वहां भी ज्यादा लोग नहीं हैं. लेकिन थोड़ी देर में हो जाएगें. आओ अब ऊपर चलते हैं. इस पहाड़ का चक्कर तो बहुत लंबा हो जाएगा.''
.............................................................................................................जारी है......
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