रविवार, 15 जुलाई 2012

भाग ८.० होज़े कौसर पर


हज़रत ईसा की गवाही का मंजर देखने के बाद हम दोनों ने होज़ कि तरफ बढ़ना शुरू कर दिया. मैंने रास्ते में सालेह से पूछा:
' हज़रत ईसा ने जो सिफारिशी शब्द कहे थे यानी अगर तू उन्हें बख्श दे तो तू हर चीज़ पर ताकत रखने वाला और हर चीज़ कि हकीकत को जानने वाला है, क्या इन शब्दों का कोई असर नहीं हुआ?'
'' तुमने जवाब में अल्लाह तआला की बात नहीं सुनी थी कि आज सच्चों को उनकी सच्चाई ही फाएदा पहुंचाएगी.''
' हां सुनी, मगर उससे तो यह लगता है कि उनकी सिफारिश क़ुबूल नहीं हुई.'
'' नहीं ऐसा नहीं हुआ. अल्लाह ने अपना कानून स्पष्ट कर दिया है. कानून है कि पैगंबर की लाई हुई शिक्षा को सच मान कर क़ुबूल करना और अपने अमल (कर्म) ऐसे ही बना कर उस कि पुष्टि करना सफलता और मुक्ति की बुनियादी शर्त है. खुदा कि बात का मतलब यह था कि जिस किसी ने यह बुनियादी शर्त पूरी कर दी, उसके साथ अल्लाह अब दरगुज़र (माफ़ करदेना) का मामला करेंगे. यानी जो गलतियां ऐसे लोगों से होती रहीं और उन्होंने उन का सुधार और तौबा नहीं भी की, उन पर अल्लाह अपनी रहमत से पकड़ नहीं कर रहे.
हर नबी अपनी उम्मत की इसी तरह दबे शब्दों में सिफारिश कर रहा है और करेगा. मगर इसके नतीजे में फ़िलहाल सिर्फ इतनी ही छूट मिल रही है. इस समय गलतियाँ माफ हो रही हैं, अपराध नहीं. और ऐसी गलतियाँ जिन्हें मामूली समझ कर तौबा नहीं की गई थी बहरहाल इसी तरह की शर्मिंदगी उसका कारण बनी हैं जो तुम्हारी बेटी लैला को उठानी पड़ी थी. बाकी जिन लोगों ने हर समय ईमान और नेक अमल और तौबा और सुधार करने के काम में लगे रहे वह तो पहले ही से सुकून में हैं, और जिन लोगों ने लगातार नाफ़रमानी और बड़े गुनाहों की राह अपनाई वो इस समय बदतरीन सख्ती का शिकार हैं.''
यह बातचीत करते हुए हम एक ऐसी जगह आ गए जहां फरिश्ते लोगों को आगे बढ़ने से रोक रहे थे. सालेह मेरा हाथ थामे उनके पास चला गया. उसे देखते ही फरिश्तों ने रास्ता छोड़ दिया. हम ज़रा दूर चले तो एक झील सी नज़र आने लगी. उसे देखते ही सालेह बोला:
'' यही होज़े कौसर है.''
मैंने कहा:
'मगर यहां रसूल अल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम तो नहीं हैं.'
''वह आगे की ओर हैं. हम दूसरी ओर से दाखिल हुए हैं. मैं तुम्हें इसे पूरी तरह दिखाना चाह रहा था इसलिए यहां से लाया हूं.''
सालेह की बात पर मैंने गौर से देखाना शुरू किया तो पता चला कि आम मायने में यह कोई होज़ नहीं है. मैंने आश्चर्य के साथ सालेह से कहा:
' यार यह तो झील बल्कि शायद समुद्र जितना बड़ा है जिसका दूसरा किनारा मुझे नज़र ही नहीं आता.'
'' हां यह ऐसा ही है. तुम देख नहीं रहे कितने सारे लोग इसके किनारे खड़े पानी पी रहे हैं. अगर कोई छोटा मोटा होज़ हो तो फ़ौरन ही खाली हो जाएगा.''
उसने ठीक कहा था. यहां हर जगह बहुत सरे लोग मौजूद थे.
वैसे पिछली दुनिया में भी रसूल अल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के फरमान से मुझे अंदाज़ा था कि यह आम सा होज़ नहीं होगा बल्कि कोई सागर है. बल्कि पैगम्बर के इरशादात से मुझे ख्याल होता था कि यह वही जगह है जहां पिछली दुनिया में अरब व अफ्रीका को अलग करने वाला दरया (Red Sea) बहता था. मैंने अपने इस अनुमान को सालेह से बताया तो वह बोला:
'' बड़ी हद तक यह अनुमान ठीक है. ज़मीन फैलकर हालांकि बहुत बड़ी हो चुकी है, लेकिन यह लगभग वही जगह है.''
' इसका मतलब है कि हष्र का मैदान अरब की धरती पर लगाया गया है?'
'' हां तुम्हारे अनुमान ठीक हैं.''
मैं चुपचाप सोचने लगा कि कैसा समय था वो जब दुनिया आबाद थी. लोग उस समय दुनिया के हंगामों में गुम थे. काश उन्हें अंदाज़ा हो जाता कि असल दुनिया तो मौत के बाद शुरू होने वाली है. खुदा ने नबियों को भेज भेज कर पिछली दुनिया में तरह तरह से लोगों को समझाया, लेकिन लोग मान कर ही नहीं दिए. फिर खुदा ने नबियों में से कुछ को रिसालत के पद पर नियुक्त कर दिया. यह रसूल न केवल लोगों को सही रास्ते की ओर बुलाते थे बल्कि इससे एक कदम आगे बढ़ कर लोगों को चेतावनी भी देते थे कि अगर उनकी बात नहीं मानी गई तो खुदा क़यामत से पहले ही इस कौम पर अपना अज़ाब भेज देगा जिससे सिर्फ मानने वाले बचाए जाएंगे. इसी लिए नूह की कौम,आद की, समूद की, लूत की कौम, शुएब की कौम, फ़िरऔन की आल और खुद मक्का के कुरैश के साथ यही हुआ.
इन कौमों के रसूलों ने उन्हें अल्लाह के अज़ाब से डराया, लेकिन जब वह नहीं माने तो क़यामत से पहले ही दुनिया में उन्हें अज़ाब दिया गया. नूह की कौम और फ़िरऔन की आल को पानी में डुबो कर, आद को तुन्द आंधी, समूद की कौम और शुएब की कौम को एक कड़क से, लूत की कौम को पत्थर वाली हवा से, और मक्का के कुरैश को मुसलमानों की तलवारों से ख़त्म किया गया और ईमान वालों को बचाकर ज़मीन की हुकूमत (सत्ता) उन्हें दे दी गई. खासकर मक्का के इन्कारियों और पैगम्बर का मामला तो इतिहास की रोशनी में हुआ और कुरान में इसका रिकॉर्ड सुरक्षित कर दिया गया. और किसे मालूम नहीं था कि सहाबा इकराम (आखरी नबी के साथियों) को किस तरह कुछ वर्षों में ही दुनिया का हुक्मरान (शासक) बना दिया गया. यूँ सजा व जज़ा का एक दुन्यावी नमूना इस तरह किया गया कि कोई भी इसका इन्कार करने की ताकत नहीं रखता. फिर भी लोगों ने इस दिन की तैयारी नहीं की.
सबसे बढ़कर इस मिडल ईस्ट के इलाके में जहां आज हष्र का मैदान है, चार हजार साल तक इब्राहीम की औलाद के रूप में एक कौम के साथ लगातार सजा व जज़ा का मामला किया गया. इब्राहीम की औलाद की दो शाखाओं यानी बनी इस्माइल और बनी इसराइल के साथ खुदा का कानून यह रहा कि वह फरमाबरदारी (आज्ञाकारी) करते थे तो खुदा की रहमत उन्हें दुनिया ही में मिलनी शुरू हो जाती और नाफ़रमानी (अवज्ञा) करते तो दुनिया में राष्ट्रीय रूप में सजा पाते थे. बनी इसराइल को अपने इतिहास में अपने जुर्मों के नतीजे में दो बार बड़ी तबाही का सामना सजा के रूप में करना पड़ा. एक बार इराक के बादशाह बख्त नस्र के हाथों और दूसरी बार रोमन जर्नल टाईटस के हाथों पर तबाही नाज़िल की गई. इसी तरह मुस्लिम उम्मत को उनके जुर्म के आधार पर दो बार बड़े पैमाने पर सजा दी गई. एक बार तातारियों के हाथों और दूसरी बार यूरोपीय कौमों के हाथों उन्हें तबाही और गुलामी के अपमान का सामना करना पड़ा.
इस सजा के साथ जब कभी वह तौबा करते तो उन पर हुकूमत और इनाम के दरवाजे खुल जाते. इसका एक उदाहरण वह था जब तातारियों के हाथों पूरी तरह बर्बाद होने के बाद मुसलमानों ने उन तक इस्लाम का पैगाम (संदेश) पहुंचाया तो थोड़े ही समय में बर्बाद हो चुके मुसलमान फिर से दुनिया की महाशक्ति बन गए. मगर अफसोस कि लोगों ने सजा और जज़ा के खुले मामले को देख कर भी क़यामत की सजा व जज़ा की हकीकत को गंभीरता से नहीं लिया. मेरे मुंह से एक ठंडी आह निकली और मैंने कहा:
'मेरे रब तू ने तो समझाने में कोई कसर नहीं छोड़ी, लेकिन इंसान बड़ा ही ढीट जीव था. इसीलिए उसे आज का यह कड़वा दिन देखना पड़ रहा है.'
सालेह ने मेरा वाक्य सुनकर पल भर के लिए मुझे देखा और बोला:
'' नहीं! हर इंसान ऐसा नहीं था. देख लो तुम्हारे आसपास होज़े कौसर पर कितने सारे लोग हैं.
मैंने हाँ में सिर हिलाया मगर कुछ बोला नहीं सका. वजह साफ जाहिर थी. सालेह यहां मौजूद लोगों को देख रहा था और मैं बाहर हष्र में मौजूद लोगों के ख्याल में था जिनमें मेरा अपना बेटा जमशैद भी शामिल था. मैं हष्र के मैदान में उसकी तलाश में लौटा था, मगर हज़रत ईसा की गवाही का मंजर देख कर मेरा हौसला जवाब दे चुका था. इसलिए फिलहाल उस का मामला मैंने खुदा पर छोड़ने का फैसला किया.
...............
हम आगे बढ़ रहे थे कि एक जगह पहुंचकर सालेह ने मुझसे कहा:
'' चलो अब कौसर के VVIP लाउंज में चलते हैं.''
मैंने उसकी बात पर कोई टिप्पणी नहीं की, लेकिन मुझे अंदाज़ा था कि सालेह क्या कह रहा है. लेकिन उसने अपनी बात को खुद ही पूरा किया:
'' आखिरत (परलोक) की कामयाबी हासिल करने वालों के दो दर्जे (वर्ग) हैं. एक वह जिन्होंने दीन (धर्म) को फ़र्ज़ और ज़रूरी समझ कर अपनाया. बन्दों और ईश्वर के हक़ (अधिकार) निभाए और ईश्वर के हर एक हुक्म (आदेश) को माना. यही लोग जन्नत की सफलता पाने वाले हैं. इनमें से कुछ लोग वह थे जिन्होंने फ़र्ज़ से भी बढ़कर कुर्बानी के तौर पर दीन को अपनाया, बुरे से बुरे हालात और मुश्किल मोकों पर सब्र किया और जमे रहे. नेकी और खैर के हर काम में बढ़त ली. हर हाल में सच को अपनाया और इसके लिए हर क़ीमत दी. ख़ुदा के दीन की मदद, उसकी नफिल इबादत, उसके बन्दों पर खर्च और सेवा को अपना जीवन बना लिया. यही वह लोग हैं जो आज आखिरत के दिन VIPs में शामिल किये जाएँगे. उनकी नेअमतें, उनके दर्जे, खुदा से उनकी करीबी और मक़ाम सब कुछ आम (सामान्य) जन्नतयों से कहीं ज्यादा है.
यह ऐसा ही है जैसे दुनिया में हर समाज में एक आम जनता की क्लास होती थी और एक ख़ास लोगों यानी elite हुआ करती थी. आज क़यामत के दिन यही हो रहा है. सफल जनता को मैदान की सख्ती से बचाकर होज़े कौसर के सुहाने मौसम में ठहराया गया है और जन्नत में भी उन्हें अच्छी जगह मिलेगी. जाहिर है कि यह बहुत बड़ी सफलता है. मगर इस से भी ऊँचा एक दर्जा (स्तर) ख़ुदा के करीबियों के लिए है. यह जन्नत का सबसे आला दर्जा है. इस की हकीकत तो जन्नत में दाखिल होने के बाद ही सामने आएगी, लेकिन होज़े कौसर के पास भी यह इन्तिज़ाम किया गया है कि ख़ास जन्नतयों के टहरने की जगह भी अलग बने गई है. हम वहीं जा रहे हैं.''
वह पल भर के लिए ठहरा और मेरी आँखों में ध्यान से देखते हुए कहने लगा:
'' क्यों कि हमारा अब्दुल्लाह आम जन्नतयों में से नहीं बल्कि एक सरदार और हर ऊँचे स्थान का हकदार है.''
मैंने उसकी बात सुनकर अपना सर झुका दिया.
...............
हम एक ऐसी जगह पहुंचे जहाँ की ख़ूबसूरती शायद शब्दों की पकड़ में नहीं आ सकती थी. झील का बर्फ की तरह सफेद और साफ़ पानी जमीन के फर्श पर चांदनी की तरह बिछा हुआ था. झील की सतह सुकून से भरपूर और बहुत बड़ी थी और देखने से निगाहों को अजब तरह की ठण्डक मिल रही थी. झील के किनारे ऐसे चमकदार मोती के बने हुए थे जो अन्दर से खाली थे. किनारे के पास बहुत मुलायम कालीन बिछे हुए थे जिन पर चलते हुए तलवों को अजीब राहत मिल रही थी. उन पर शाही और आरामदायक सीटें मौजूद थीं. शीशे से ज्यादा पारदर्शी मेजों पर सोने और चांदी के गिलास सितारों की तरह जगमगा रहे थे. झील से ऐसी महक उठ रही थी जिससे मेरा वुजूद मदहोश होकर रह गया.
मैंने एक सीट संभालते हुए सालेह से पूछा:
' यह इतनी अच्छी खुशबू कहाँ से आ रही है?'
'' होज़ की तह में जो मिट्टी है वह दुनिया की किसी भी खुशबू से ज्यादा खुशबूदार है. उसी का यह असर है.''
सालेह ने झील से एक गिलास भरा और मेरे सामने रखते हुए कहा:
'' मजे करो.''
मैंने एक घूंट लिया. दुनिया में मैंने इसकी सिर्फ मिसालें सुनी थीं, दूध, शहद आदि. मगर ये उन सबसे कहीं ज्यादा अच्छा था. हालांकि पहले भी मैं कौसर का जाम पी चुका था, लेकिन इस माहौल में पीने का मजा कुछ और था. बाहर हष्र में तेज़ चिलचिलाती धूंप थी मगर यहाँ ढलती हुई शाम का सा मंज़र (दृश्य) था. ठंडी और महकदार हवा चल रही थी. बिल्कुल सूरज डूबने से पहले का समां लगता था. सफेद आसमान पर हल्की सी लाली छाई हुई थी. आसमान के रंग झील के सफेद पानी पर अपने आप को यूँ फैलाए हुए थे कि जैसे कोई अपना रंग बिरंगा दुपट्टा हवा में लहरा रही हो. इसमें कोई शक नहीं कि यह एक बहुत आकर्षक और खुबसूरत मंज़र था.
मैंने अपने आसपास नज़र डाली. मुझे यह बिल्कुल किसी पिकनिक पॉइंट का मंज़र लग रहा था. लोग टोलियों में, अकेले अकेले और अपने परिवार के साथ इस झील या होज़ के किनारे खड़े और बैठे और आपस में खुश गप्पियां कर रहे थे. सब लोग बेहद खुश नजर आ रहे थे. उनके चेहरे पर फैला सुकून और इत्मीनान यह बताने के लिए काफी था कि उन लोगों ने बाज़ी मार ली है. यह मौत, दुख, बिमारी, गम और दुख के हर खतरे से दामन छुड़ाकर हमेशा रहने वाली और सच्ची खुशी के महासागर के किनारे आ खड़े हुए हैं.
खत्म न होने वाली कामयाबी, फीकी नहीं पड़ने वाली खुशी, कम न होने वाली लज्ज़तें, फ़ना ना होने वाली ज़िन्दगी और वापस न ली जाने वाली ऐश आज उनके क़दमों में थीं. कितनी कम मेहनत करके कितना ज्यादा सिला उन्होंने पा लिया था. इस सफलता का जश्न मनाते हुए उनके क़हक़हे की आवाज़ें दूर तक सुनी जा रही थीं. उनके चेहरों की मुस्कुराहटें हर तरफ बहार बनकर छा रही थीं.
उन्हें देख कर मुझे अपने पत्नी बच्चों का ख्याल आया.
सालेह ने मेरा ख्याल मेरे चेहरे पर पढ़ लिया. वह बोला:
'' आओ चलो लगे हाथों तुम्हें तुम्हारे घर वालों से भी मिलवा देते हैं. उन्हें भी यहीं बुलवा लिया गया है.''
................................................................................................................जारी है....

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