गुरुवार, 12 जुलाई 2012

भाग ३.१ हष्र का मैदान


सालेह ने फिर इशारा किया और मंजर (दृश्य) ख़त्म हो गया. लेकिन साथ ही हुमा की हर उम्मीद को खत्म कर गया. सालेह ने इसी सपाट और गुस्से से भरे लहजे में सख्ती से कहा:
..'' तुमने देखा! तुम्हारी ज़ुबान से निकला हुआ एक एक शब्द रिकॉर्ड किया गया है. तो जाओ हुमा बीबी अपने पीर साहब को ढूँडो जो तुम्हें बख्शवा सकते हैं और जिनके सामने खुदा भी......''
सालेह ने वाक्य तो अधूरा छोड़ दिया, लेकिन हुमा के शब्द दोहराते समय उस के लहजे में जो गुस्सा आ गया था, उससे मैं खुद दहल कर रह गया. हुमा भी बुरी तरह डर गई. इससे पहले कि सालेह कुछ और कहता वह रोती चीखती हुई वहां से भाग गई.
इस मंज़र (दृश्य) में जमशैद को देखकर मेरी हालत फिर डांवा डोल हो गई थी. जाहिर है कि हुमा की तरह वह भी सख्तियों भरे मैदान में परेशान हाल घूम रहा होगा. मैं सोच रहा था कि जमशैद उसी हाल में मेरे सामने आ गया तो मैं क्या करूँगा. मैं इसी सोच में था कि सालेह ने मेरी कमर थपथपा कर कहा:
'' आओ चलते हैं.''
न जाने इस थपकी में क्या बात थी कि मैंने महसूस किया कि मेरे ऊपर तारी होने वाली परेशानी की हालत बहुत हल्की हो गई है. मैं उसके साथ चलने लगा. आसपास फिर वही परेशान और वहशत में पड़े लोगों की हलचल थी. हम कुछ दूर आगे चले थे कि सामने से चौधरी मुख़्तार साहब आते दिखाई दिए. उन्होंने शायद मुझे देख लिया था और मेरी ओर आ रहे थे. चौधरी साहब मेरे बेटे जमशैद के ससुर के व्यापार में भागीदार थे. इस वजह से मेरी उनसे औपचारिक जानपहचान थी. मेरे पास आते ही उन्होंने मुझसे गले मिलने की कोशिश की जिसे सालेह ने हाथ आगे बढ़ा कर यह कहते हुए नाकाम बना दिया:
'' दूर रह कर बात करो.''
उसका बोलने का अंदाज़ इतना बुरा था कि मुझे भी इससे अजनबीयत महसूस होने लगी. अपने अपमान के बावजूद चौधरी साहब के जोश में कमी नहीं आई. वह कहने लगे:
'' मुझे यकीन था अब्दुल्ला साहब! आप मुझे ढूंढते हुए जरूर आएंगे. आपको याद है अब्दुल्ला साहब! मैंने एक मस्जिद निर्माण कराइ थी जिसमें आप भी नमाज़ पढ़ा करते थे. इसके अलावा भी मैं ग़रीबों और मोहताजों की मदद किया करता था.'''
' मुझे याद है चौधरी साहब.' मैंने धीरे से उन्हें जवाब दिया.
'' बस तो अब आप मेरी सिफारिश कर दीजिए. बहुत देर से परेशान घूम रहा हूँ. यहाँ तो जिसे देखो अपनी ही पड़ी है. न कोई कुछ बताता है न सीधे मुंह बात करता है.''
यह आखिरी बात कहते हुए उन्होंने भी एक नज़र सालेह की ओर देखा. मैंने भी गर्दन घुमाकर सालेह की ओर देखा. उसने पल भर के लिए मुझे देखा और चौधरी साहब के चेहरे पर नज़रें गाड़ते हुए बोला:
'' आपने मस्जिद ज़रूर बनवाई थी, लेकिन खुदा के लिए नहीं बल्कि अपनी नेक नामी के लिए. जब पैसे अल्लाह को दिए जाते हैं तो गर्दन झुकी होती है, हाथ बंधे होते हैं, अंदाज़ झुका हुआ होता है और दिल में आजज़ी और डर होता है. लेकिन आपके मामले में ऐसा नहीं था. आप अपना नाम चाहते थे. सो दुनिया में नाम हो गया. अब तो आपको हिसाब देना होगा कि यह पैसा कमाया कैसे था.
और हां ... अच्छे कामों पर तो कभी कभी ही पैसे खर्च करते थे. यह क्यों नहीं बताते कि देश की एक मशहूर अभिनेत्री का साथ पाने के लिए आपने करोड़ों रुपये खर्च कर दिए थे. आपके खाते में ज़िना (व्यभिचार)का गुनाह (पाप) है. एक बार नहीं बल्कि बार बार का गुनाह. अलग अलग महिलाओं के साथ ज़िना (व्यभिचार) का गुनाह. देश की मशहूर अभिनेत्रियों और फैशन मॉडल के साथ आपके संबंध थे. खर्च को छोड़ो आप की तो आमदनी में भी हराम की मिलावट थी. आप मिलावट करते थे. आम ज़रुरत की चीज़ को कीमत बढ़ाने के लिए जमा करते थे. लोगों से हद से ज्यादा मुनाफा लेकर चीजें बेचते थे. बिजली चोरी, धोखाधड़ी, कर्मचारियों के अधिकार में डंडी मारना, यह आपके कारोबार के बुनियादी उसूल थे. अपने कारोबार की ऊंचाईयों पर पहुंचकर आपने मीडिया समूह बना लिया था जिसके एक टीवी चैनल पर आप लोगों को खुश करने वाले धार्मिक कार्यक्रम दिखाते और अन्य पर कला और इंटरटेनमेंट के नाम पर समाज में बेशर्मी और बुरा व्यवहार आम कर रहे थे. आप जानते थे कि दुनिया में सफलता का राज़ लोगों को खुश करना है. काश आप जान लेते कि दुनिया और आखिरत में सफलता का राज़ लोगों को नहीं ईश्वर को खुश करना है.''
सालेह लगातार बोल रहा था और शब्दों के उसकी जुबान से तीर बनकर निकल रहे थे. उनका सामना करना चौधरी साहब के लिए मुमकिन न था, मगर उनके लिए कोई भागने की राह भी न थी. वह गर्दन झुकाए सुनते रहे. सालेह के लब और लहजे की सख्ती ने चौधरी साहब के चेहरे पर अँधेरी फेलादी थी. लेकिन उसने इस पर बस नहीं किया और कहने लगा:
'' ज़रा पीछे देखिये चौधरी साहब आपके पीछे आपकी प्रेमिका भी खड़ी है.''
चौधरी साहब घब्रा कर वापस पलटे. मैंने भी नजर उठाकर चौधरी साहब के पीछे देखा. सामने एक बहुत बुरी शक्ल व सूरत की बूढ़ी औरत खड़ी थी जिसके शरीर से गंध उठ रही थी. सालेह ने मेरी पीछे हाथ रखा जिसके बाद मुझे यह असहनीय बदबू आना बन्द हो गई, लेकिन चौधरी साहब के लिए यह गंध अभी तक बाकी थी. वह बद शकल बुढ़िया चौधरी चौधरी कहते हुए आगे बढ़ी. इस बुढ़िया के करीब आने के डर से भयभीत होकर चौधरी साहब पीछे हटने लगे और फिर बेतहाशा भागने लगे. वह औरत या बुरी बला जो कुछ थी उनके पीछे हाथ फैलाकर दौड़ने लगी.
' यह औरत कौन थी?' उनके दूर जाने के बाद मैंने सालेह पूछा.
'' यह चौधरी साहब की रखैल और तुम्हारे जमाने की मशहूर अभिनेत्री और मॉडल चम्पा थी.'' सालेह ने बदशकल औरत का परिचय कराया तो मैंने हैरत से कहा:
' चम्पा? मगर वह तो बहुत खूबसूरत थी और लोग उसके हुस्न की मिसाल दिया करते थे.'
'' हां मिसाल देने के अलावा उसे अपना आइडियल भी बनाते थे. अब देख लो लोगों के आइडियल के रूप को कैसी हो चुकी है. यह औरत अपने भड़कीले और अर्ध नग्न कपड़ों से समाज में अश्लीलता फैलती थी. अब ख़ुदा का फैसला है कि यह जिन दिलों पर राज करती थी, नरक में उन्हीं लोगों पर उसे अज़ाब बनाकर थोप दिया जाए.'' सालेह ने हंसते हुए जवाब दिया.
मैं दिल में सोचने लगा कि मेरे ज़माने में अश्लीलता शायद मानव इतिहास में सबसे ज्यादा बढ़ चुकी थी. टी.वी. ने घर घर इस तरह की अभिनेत्रियों के जलवे बिखेर दिए थे. इस दौर के सभी समुदायों ने अश्लीलता और नग्नता फैलाने वाली ऐसी महिलाओं को इज्ज़त के बुलंद मुकाम पर बिठा दिया था. फिल्म कम्पंयों और टीवी चैनलों के मालिकों के पास यह महिलाएं माल कमाने का सबसे सस्ता और आसान रास्ता थीं जिनके अश्लील सीन, दिलबर अदाओं और कम कपड़ों को बेच कर ये लोग अपनी दौलत बढाया करते थे. युवा उनके दीवाने थे और अपनी होने वाली पत्नियों में उनकी शक्लें और नखरे खोजते थे. लड़कियां उन्हीं के अंदाज और ड्रैस की नक़ल करके खुद को संवारा करती थीं. उन्हीं की वजह से शरीफ पर आम शक्ल व सूरत वाली कितनी ही लड़कियां समाज में बेकीमत हो गई थीं. उनमें से कितनी थीं जो अपने आंगन में बहारों की राह तकते तकते सफेद बालों तक जा पहुँचीं और कितनी थीं जो समाज की नाकदरी के दाग को शराफत की चादर में छिपाए दुनिया से विदा हो जाती थीं.
मेरे चेहरे पर दुख के आसार साफ़ थे. यह आसार सालेह ने पढ़ लिए थे. वह मेरा हाथ थामे चुप चाप एक तरफ बढ़ने लगा. कुछ देर बाद एक जगह ठहर कर बोला:
'' खुदा ने तुम्हारे दुखों को दूर करने का एक इन्तिज़ाम किया है, लेकिन बेहतर होगा कि उसे देखने से पहले गुजरी हुई दुनिया का यह मंज़र (दृश्य) भी देख लो.''
उसकी जुबान से शब्द निकले ही थे कि मेरे सामने एक मंज़र फिल्म स्क्रीन की तरह चलने लगा. मुझे लगा कि मैं इस मंज़र का एक हिस्सा हूँ और बताए बिना हर सच्चाई समझ रहा हूँ.
...............
सुबह की रोशनी खिड़की पर पड़े पर्दों में से पार होते हुए कमरे में दाखिल होने लगी थी. कॉलेज जाने का समय हो रहा था, मगर शाहिस्ता की हिम्मत नहीं हो रही थी कि सर्दी में बिस्तर से निकले और कॉलेज जाने की तैयारी करे. वह आमतौर पर फज्र (सुबह) की नमाज़ पढ़कर कुछ देर पढ़ा करती थी और फिर कॉलेज की तैयारी, पर आज वह नमाज़ पढ़ कर फिर बिस्तर में लेट गई थी. कल रात से ही उसकी तबियत कुछ ख़राब थी.
'' नहीं! मुझे कॉलेज जाना होगा. वरना स्टुडेंटस का बहुत नुकसान होगा ... और फिर अम्मी अब्बू के लिए नाश्ता भी तो बनाना है.''
उसने दिल में सोचा और हिम्मत करके बिस्तर से उठ गई. धीरे से चलते हुए बराबर वाले कमरे की तरफ गई जो उसके माता पिता का था. उसने धीरे से दरवाजा खोल कर देखा. दोनों गहरी नींद में सो रहे थे. उसके चेहरे पर एक संतोषजनक मुस्कान आ गई.
शाहिस्ता ने अपनी सारी जिंदगी अपने परिवार के नाम कर दी थी. उसके पिता उसके बचपन में ही अपाहिज हो गए थे. वह तीन बहनों में सबसे बड़ी थी. मां ने सिलाई करके मुश्किल से उन्हें पढ़ाया था. शिक्षा पूरी करके उसने पहले स्कूल और फिर एक प्राइवेट कॉलेज में पढ़ाना शुरू कर दिया. वह उसके सपने देखने के दिन थे. वह बहुत सुन्दर नहीं थी, लेकिन नौजवानी खुद एक हुस्न है. लेकिन उसके जीवन में नौजवानी का मतलब बस एक जिम्मेदारी था जिसमें सपनों और ख्वाहिशों की कोई गुंजाइश नहीं थी. घर का खर्च, पिता का इलाज, मकान का किराया और छोटी बहनों की शिक्षा. दोनों छोटी बहनें खूबसूरत थीं. बड़ी हुई तो आने वाले हर रिश्ते का रुख उन्हीं की ओर था. शाहिस्ता रास्ते की दीवार नहीं बनी और खुशी खुशी बहनों को उनके घर आबाद कर दिया. यह फ़र्ज़ पूरा करते करते उसकी जवानी ढलती चली गई. और अब वह अपने बूढ़े माता पिता का बोझ उठाने के लिए अकेली रह गई थी.
इन हालात में उसका सहारा ईश्वर था. उसे खुदा से बहुत घहरा प्यार था. इतनी मुहब्बत कि जीवन में किसी कमी ने इसके अंदर मायूसी नहीं आने दी. नमाज़ रोज़े की पाबंद तो वह बचपन से थी, लेकिन ईश्वर प्रेम की यह मिठास उसे रूहानी (आध्यात्मिक) गुरू अब्दुल्ला साहब की किताबें पढ़कर मिली थी. और अब उसके जीवन का मिशन था कि वह ईश्वर की उपासना और प्यार की यह मिठास अपने युवा छात्रों में भी विकसित करे. वह एक बेहतरीन शिक्षक थी उसके छात्र उस की बहुत इज्जत करते थे. इसलिए वह उसकी बातें हमेशा ध्यान से सुनते और शाहिस्ता शौक से उन्हें पढ़ाती थी.
मगर आज न जाने क्यों उसका दिल बहुत उदास था. शायद खराब तबयत का असर था कि डिप्रेशन की सी हालत में थी. नाश्ते से निपट कर वह आईने के सामने खड़ी कॉलेज जाने के लिए तैयार हो रही थी. उसने अपने चेहरे को ध्यान से देखा. ढलती जवानी के सारे आसार अब साफ़ थे. एक आह के साथ मुस्कुराई और खुद को संबोधित करके धीरे से बड़बड़ाई:
'' शाहिस्ता! तुम हार गई. तुम्हारे हिस्से में तनहाईयों के सिवा कुछ नहीं आया?''
यह कहते हुए उसने आंखें बंद कर ली. शायद यह हार को स्वीकार करना था. मगर उसी पल गुरु अब्दुल्ला की बात उसके कानों में गूंजने लगी:
'' जो परमेश्वर से सौदा करता है वह कभी नुकसान नहीं उठाता.''
एक मुस्कान के साथ उसने आंखें खोलीं और ठहरे हुए लहजे में बोली:
'' देखते हैं ... देख लेंगे ... अब समय ही कितना बचा है.
...............
मंज़र (दृश्य) ख़त्म हो गया. मैंने सालेह की ओर देख कर कहा:
'मैं तो उस लड़की को नहीं जानता.'
'' अब जान लोगे. वैसे तुम जो कुछ लिखते थे, वह बहुत दूर तक जाता था.''
सालेह ने जवाब दिया और साथ ही मेरा हाथ थामे एक ओर आगे बढ़ने लगा. थोड़ी देर बाद हम एक ऐसी जगह पहुंचे जहां वैसे ही भयानक फरिश्ते दिखाई दिए जैसे अर्श की ओर आम लोगों को बढ़ने से रोकने के लिए खड़े थे. मगर सालेह को देख कर उन्होंने हमारा रास्ता छोड़ दिया. ज़रा दूर चल कर हमारे सामने एक दरवाज़ा आ गया. सालेह ने दरवाजा खोला और मेरा हाथ थामे अंदर चला गया. यह दरवाजा एक दूसरी दुनिया का दरवाजा था. क्योंकि इसके दूसरी ओर हष्र के परेशान माहोल से उलट माहोल फैला हुआ था. मैं फ़ौरन बोला:
' सालेह! हम वापस नबियों के कैम्प की ओर तो नहीं आ गए?'
उसने मुस्कुरा कर कहा:
'' हाँ ... तुम्हारा दुःख तो यहीं आकर दूर हो सकता है.''
हम चलते हुए एक शानदार कैम्प के पास पहुंचे. उनके दरवाज़े पर एक बहुत शानदार और रोशन चेहरे के एक साहब खड़े थे. यह मेरे लिए बिल्कुल अजनबी थे. करीब पहुंचकर सालेह ने उनसे मेरा परिचय कराया:
'' यह अब्दुल्ला हैं. मुहम्मद रसूल अल्लाह की उम्मत के आखरी दौर के उम्मती. और आप नहूर हैं, यर्मियाह नबी के बहुत करीबी साथी. नहूर आप इन्ही से मिलना चाह रहे थे ना?''
यह एक महान पैगम्बर के सहाबी (साथी) का मुझसे परिचय था और यह भी की मैं यहाँ क्यूँ हूँ.
मैंने नहूर से मुसाफाह करने के लिए हाथ बढ़ाया, लेकिन नहूर ने उत्साहित अंदाज में मुझे अपने गले से लगा लिया. मैंने उसी हालत में कहा:
' यर्मियाह नबी से मुलाकात का सौभाग्य तो मुझे अभी तक नहीं हुआ लेकिन आपसे मिलना भी किसी सम्मान से कम नहीं है. यर्मियाह नबी के हालात और ज़िन्दगी में मेरे लिए हमेशा बड़ी रहनुमाई (मार्गदर्शन) वाली रही. मुझे उनसे मिलने का बहुत शोंक है.'
यह कहते हुए मेरे मन में बनी इसराइल (यहूदी) के इस महान पैगंबर की ज़िन्दगी घूम रही थी. छटी सदी ईसा पूर्व में बनी इसराइल (यहूदी) बहुत बुरी आदतों और रस्मों के शिकार थे और इसी आधार पर अपने ज़माने की महाशक्ति इराक के शासक बख्त नस्र के हाथों राजनीतिक हार के खुदाई अज़ाब से ग्रस्त हो चुके थे. मगर उनके नेताओं ने कौम में सुधर करने के बजाय उनके हां राजनीतिक रुतबे की सोच आम कर दी. यर्मियाह नबी ने इस्राइलियों (यहूद्यों) को उनकी अख्लाकी (नैतिक) और इमानी गुमराहियों पर चेताया और उन्हें समझाया कि समय की महाशक्ति से टकराने के बजाय अपना सुधार करें. मगर उनकी उम्मत ने सुधार करने के बजाय उन्हें कुएं में उल्टा लटका दिया और बख्त नस्र के ख़िलाफ़ बग़ावत कर दी. इसके बाद बख्त नस्र अज़ाब इलाही बन कर उतरा और उसने येरुशलम (बैतुल मुक़द्दस) की ईंट से ईंट बजादी. छः लाख यहूदी क़त्ल हुए छह लाख को वह गुलाम बनाकर अपने साथ ले गया था.
मैं उसी सोच में था कि नहूर ने मेरी बात का जवाब देते हुए कहा:
'' इन्शाअल्लाह उनसे भी जल्द मुलाकात हो जाएगी. लेकिन फ़िलहाल तो आप को किसी से मिलवाना चाहता हूँ.'' यह कहते हुए वह मुझसे अलग हुए कैम्प की ओर रुख करके किसी को आवाज़ दी:
'' ज़रा बाहर आना! देखो तो तुम से कौन मिलने आया है?''
नहूर की आवाज़ के साथ ही एक लड़की खेमे से निकल कर उनके बराबर आखड़ी हुई. यह लड़की अपने हुल्ये से राजकुमारी और शक्ल व सूरत में परिस्तान की कोई परी लग रही थी. उस लड़की ने गर्दन झुका कर मुझे सलाम किया और मुझे संबोधित करके कहा:
'' आप मुझे नहीं जानते. पर मेरे लिए आप मेरे उस्ताद(गुरु) हैं और इस रिश्ते से मैं आपकी रूहानी (आध्यात्मिक) औलाद हूँ. मेरा नाम शाहिस्ता है. गुमराही के अंधेरों में खुदा के सच्चे धर्म की रोशनी मैंने आप से पाई थी. ख़ुदा से मेरा परिचय आपने कराया था. परमेश्वर के साथ इंसान का असल रिश्ता क्या होना चाहिए, यह मैंने आप ही से सीखा था. आज देखो! खुदा ने मुझ पर एहसान किया और अब मैं एक महान नबी के सहाबी (साथी) की पत्नी बनने जा रही हूँ.''
थोड़ी देर पहले सालेह ने इसी लड़की को मुझे दिखाया था. लेकिन अब उसकी हालत में जो परिवर्तन आ चुका था उसे देख कर मैं दंग रह गया. लेकिन उसे इस तरह देख कर मुझे जितनी खुशी हुई, उसको शब्दों में बयान नहीं कर सकता. मैंने शाहिस्ता से कहा:
मेरी ओर से आप दोनों दिल्ली बधाई क़ुबूल करें. उम्मीद है कि आप मुझे अपनी शादी में भी याद रखेंगे है.
'' क्यों नहीं. आपको तो बुलाने का मकसद ही नहूर को यह बताना था कि मेरे मैके वाले कोई मामूली लोग नहीं हैं.'' उसने हंसते हुए जवाब दिया.
' फिर तो आपने गलत इंसान को बुला लिया है.'
मैंने तुरंत जवाब दिया. फिर अपना रुख नहूर की ओर करते हुए कहा:
' लेकिन शाहिस्ता की बात सही है. उनके मैके के लोग मामूली नहीं. और हो भी कैसे सकते हैं. शाहिस्ता उम्मत-ए-मुहम्मदया में से हैं. नबी अरबी से नाम जुड़ने के बाद उनका मैका मामूली नहीं रहा.'
इस मौके पर सालेह बीच में आया और कहा:
'' आप लोगों की इज्ज़त और पद की बहस का फैसला बाद में होता रहेगा. फिलहाल मुझे अब्दुल्ला को वापस लेकर जाना है. इसलिए हमें इजाज़त दें.''
नहूर और शाहिस्ता से इजाज़त लेकर हम दोनों वहां से विदा हो गए. वापसी पर सालेह मुझसे बोला:
'' हो गई ना तुम्हारे दुखों की दवा?''
मैंने खुदा की अपने बन्दों पर इनायत का जो नमूना अभी देखा था उसने मेरी बोलने की शक्ति तो जैसे छीनली थी. इसलिए मैं चुप रहा. सालेह ने अपनी बात जारी रखी:
'' यह लड़की अपने सब्र की वजह से इस ऊंचाई तक पहुंची है. ख़ुदा ने इस लड़की को सख्त हालात और मामूली शक्ल व सूरत के साथ आजमाया था. लेकिन उसने कमी होने के बावजूद सब्र, शुक्र और ईश्वर की सच्ची इबादत (पूजा) की राह ली थी. और आज तुमने देख लिया कि जो पिछली दुनिया में पाने से महरूम (वंचित) रह गए, उनका सब्र आज उन्हें किस इनाम का हकदार बना रहा है.'
में चलते चलते रुका. अपनी नज़रें उठाकर आसमान को देखा, आसमान वाले को अपनी मन की आखों से देखा और फिर अपनी गर्दन झुका ली.
 ..................................................................................................जारी है...

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