रविवार, 22 जुलाई 2012

भाग १३.१ आखरी अंजाम की तरफ रवानगी


ज्यादा देर न गुजरी थी कि एक एक करके आराफ पर खड़े सारे लोग निपट गए. अब फैसला सुनाने के लिए कुछ भी नहीं रहा था. लेकिन शायद अब भी कुछ बाकी था. सब अपनी जगह खड़े थे कि हष्र के मैदान में एक जानवर को लाया गया . यह जानवर बहुत मोटा ताज़ा था जिसके गले में रस्सी पड़ी हुई थी और फरिश्ते उसे खींचते हुए अर्श के सामने ले जा रहे थे. सालेह ने मेरे कान में कहा:
'' यह मौत है जिसके खातमे (अंत) के लिए उसे लाया गया है.''
अर्श से ऐलान हुआ कि आज मौत को मौत दी जा रही है. अब किसी जन्नती को मौत आएगी ना किसी जहन्नमी को.
इसके साथ ही फरिश्तों ने उस जानवर को लेटाया और उसे जिबह (कुर्बान, बलि) कर दिया. मौत के जिबह हो जाने पर जन्नत वालों ने जोरदार तालियां बजाकर इसका स्वागत किया. जबकि जहन्नम वालों में मातम शुरू हो गया. उनके दिल में उम्मीद की कोई शमा अगर रोशन थी तो वह भी मौत की मौत के साथ अपनी मौत आप मर गई.
अर्श से आवाज़ आई कि जहन्नम वालों को समूह दर समूह उनके अंजाम तक पहुंचाया जाए. फरिश्ते तेजी के साथ हरकत में आ गए. हष्र के बाएं किनारे पर एक जबरदस्त हलचल मच गई. चीख और पुकार और आहों के बीच फरिश्ते पकड़ पकड़ कर मुजरिमों और ना फर्मानों का एक जत्था बनाते और उन्हें जहन्नम की ओर हांक देते. हर गिरोह जहन्नम के दरवाज़े पर पहुंचता जहां जहन्नम के दारोगा 'मालिक' उन का स्वागत करते और उनके आमाल (कर्मों) के अनुसार जहन्नम के सात दरवाजों में से किसी एक दरवाज़े को खोल कर उन्हें इसमें धकेल देते.
इस दौरान समय समय पर अर्श की ओर से जहन्नम को संबोधित करके पूछा जाता:
'' तू भरगई?''
वह ग़ज़बनाक आवाज़ में अर्ज़ करती:
'' परवरदिगार! क्या और लोग भी हैं? उन्हें भी भेज दें.''
यह सुनकर हष्र में एक आह और उठती. रह जाने वाले मुजरिमों पर फरिश्ते फिर झपट पड़ते और उनकी आखरी मंजिल तक पहुँचा देते. यूं थोड़ी ही देर में सारे मुजरिम अपने अंजाम तक जा पहुँचे.
इसके बाद अर्श से सदा बुलंद हुई:
'' जन्नत वालों को उनकी मंजिल तक पहुंचा दिया जाए.''
जब आदेश हुआ तो मैंने देखा कि कुछ लोग अभी तक बाएँ दिशा में मौजूद थे. मैंने सालेह से पूछा:
' यह कौन लोग हैं. उन्हें जहन्नम में क्यों नहीं भेजा जा रहा?'
उसने जवाब दिया:
'' यह मुनाफिकीन (जो होते कुछ हैं और दिखाते कुछ हैं) हैं. यह जहन्नम के सबसे निचले दर्जे में होंगे. यह दुनिया में खुदा को धोखा देते थे. आज उन्हें न सिर्फ बड़ा से बड़ा अज़ाब मिलेगा बल्कि उनकी धोखाधड़ी के बदले में उनका अंजाम एक धोखे से शुरू होगा.''
' धोखा. क्या मतलब?'
उसने कहा:
'' ये लोग देखने से यह समझे कि उन्हें जहन्नम में नहीं फेंका गया और जन्नतियों को जन्नत में जाने का हुक्म हो गया है तो शायद उन्हें भी दिखावे के ईमान के आधार पर छोड़ा जा रहा है. लेकिन यह उनकी गलतफहमी है जो जल्द ही दूर हो जाएगी.
इसी पल मेरे कानों में अलहम्दु लिल्लाहि रब्बिल आलमीन (सारी खूबयाँ और तारीफ़ उस के लिए हैं जो सारे जहानों का रब है) के पढ़ने की बहुत आकर्षक आवाज़ आना शुरू हो गई. यह अर्श को उठाने वाले और दूसरे फरिश्ते थे जिन्होंने अपनी खूबसूरत आवाज में शुक्र का कलमा पढ़ना शुरू किया था. सालेह ने मुझे बताया:
'' यह हष्र के दिन के ख़त्म होने का ऐलान है.''
इसके साथ ही हष्र के मैदान में अंधेरा फैलना शुरू हो गया. सिवाय अर्श के और कहीं रोशनी बाकी नहीं रही. मैं कुछ भी देखने के लायक नहीं रह गया था. मैंने घबरा कर सालेह से पूछा:
' यह क्या हो रहा है?'
'' अंधेरा'' उसने संक्षिप्त में उत्तर दिया.
' भाई यह तो मुझे भी पता है. मगर ऐसा क्यों हो रहा है?'
'' यह इसलिए हो रहा है कि अंधेरे को पार करके जन्नत तक सिर्फ वही लोग पहुंचेगे जिनके पास अपने ईमान और आमाल (कर्म) की रोशनी होगी.
यह कहकर उसने मेरे हाथ में मेरा आमाल नामा थमा दिया. इसमें एक अजीब सी रोशनी थी जिसकी वजह से मेरी आँखें फिर से रोशन हो गईं और मैं अंधेरे में भी साफ़ साफ़ से देखने के काबिल होगया.
'' हर आदमी को उसका आमाल नामा दिया गया है और यही आमाल नामा अब हष्र के मैदान की काली रात में रोशनी बन चुका है. अब सिवाय मुनाफिकों के हर आदमी के पास रोशनी है.'' सालेह ने मेरी जानकारी को बढ़ाते हुए बताया.
' अब क्या होगा?' मैंने पूछा.
'' अब यहां से हम लोग नीचे जाएंगे. सभी उम्मातें अपने नबी के नेतृत्व में जन्नत की ओर रवाना होंगी.''
' जन्नत का रास्ता किस तरफ़ है?' मैंने पूछा.
'' अर्श के बिल्कुल करीब है. अर्श के पीछे दाहिने हाथ की ओर जहां आसमान पर जन्नत का नज़ारा दिख रहा था वहीं से जन्नत का रास्ता है. लेकिन यह रास्ता जहन्नम की खाई के ऊपर से जाता है जहां हर तरफ अंधेरा ही अंधेरा है. जिसके पास जितनी ज्यादा रोशनी है वह उतनी ही आसानी और तेजी से जहन्नम के ऊपर से गुजर जाएगा.''
' इसका मतलब है कि एक इम्तिहान अभी और बाकी है.'
'' नहीं यह इम्तिहान नहीं. दुनिया की ज़िन्दगी की तस्वीर है. जो दुनियां में जितना ज्यादा खुदा का वफादार और बात मानने वाला रहा और ज़िन्दगी के पुल पर सच्चाई और एक ईश्वर के लिए खुदा की ओर बढ़ता रहा वह इतनी ही आसानी और तेजी से जन्नत की ओर बढ़ेगा. लेकिन हल्के या तेज़ सारे दाहिने हाथ वाले यहां से गुजर जाएंगे. सिवाय मुनाफिकों के जो ईमान और आमाल की रोशनी के बिना खाई को पार करने की कोशिश करेंगे और जहन्नम के सबसे निचले गड्ढे में जा गिरेंगे जहां उन्हें बहुत बुरा अज़ाब दिया जाएगा.''
'मेरे घर वाले मेरे साथ होंगे?' मैंने पूछा.
'' आज यह आखरी सफ़र सबको अकेले ही तय करना है.'' सालेह ने दो टूक जवाब दिया.
' फिर वह समूह समूह होकर जन्नत में जाने वाली बात का क्या हुआ?' मैंने सवाल उठाया.
'' समूह दर समूह का मतलब यह है कि हर उम्मत अपने नबी के नेतृत्व में जन्नत के दरवाज़े तक पहुंचेगी. लेकिन जन्नत में दाखिला एक एक करके अपने निजी आमाल के आधार पर होगा.'' फिर उसने कुछ देर टहर कर पूछा:
'' क्या तुम अभी भी कोई तमाशा देखने में रुचि रखते हो?''
मेरे हां कहने से पहले ही वह मुझे लेकर तेजी से आगे बढ़ गया. यहां तक ​​कि हम एक ऐसी जगह आ गए जहाँ लोगों के पास बेहद तेज रोशनी थी. उनकी रोशनी उनके आगे आगे और दाएँ दिशा में उनके साथ चल रही थी. वह ऊँची आवाज में कह रहे थे ऐ हमारे रब! हमारी रौशनी को पूरा रख और हमें माफ कर. तू हर चीज़ पर क़ादिर (सक्षम) है. मैं सालेह से कुछ पूछे बिना ही उन लोगों को पहचान गया. यह सहाबा हज़रात (नबी के साथी) थे. सबसे आगे रसूल अल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम थे जिनका वुजूद सरापा नूर बना हुआ था. मैं उन लोगों की नक़ल में उन्ही के शब्द दोहराने लगा. यह वो कुरान की दुआ थी जो मैं ज़िन्दगी भर पढ़ता रहा था. लेकिन इस दुआ को पढ़ने का असल समय अब ​​आया था. हम इसी तरह चल रहे थे कि सालेह ने कहा:
'' अब तमाशा देखो.''
उसके साथ मैंने देखा कि कुछ लोग दौड़ते, गिरते पड़ते सहाबा हज़रात के पास आए. मगर उनके पास कोई रोशनी नहीं थी. उन्होंने आते ही दुहाई देना शुरू कर दिया कि हमें भी अपनी रोशनी से थोड़ा सा हिस्सा दे दो. सहाबा में से कुछ ने अपने पीछे हष्र के मैदान के सीधे हाथ की तरफ़ इशारा करते हुए जवाब दिया कि हम तो यह रोशनी वहाँ से लेकर आए हैं तुम भी वापस लोटो और वहां से रोशनी ले लो. यह सुनकर सारे मुनाफिक जल्दी से उस दिशा में भागे . लेकिन जैसे ही उन्होंने दाहिने ओर जाने की कोशिश की उन्हें पता चला कि यहां तो एक दीवार है. इस दीवार में कुछ जंगहों पर दरवाज़े बने हुए थे जिन पर फ़रिश्ते तैनात थे. इन लोगों ने उन दरवाजों से अंदर जाने की कोशिश की लेकिन फरिश्तों ने उन्हें मार मार कर वहां से भगा दिया. उनके पास रोशनी हांसिल करने का कोई रास्ता नहीं रहा. इसलिए वो लौटकर सहाबा हज़रात के पास वापस आ गए और उनसे कहने लगे कि देखिये हम भी मुसलमान हैं और दुनिया में आपके साथ ही थे. आपको तो पता है. हमारी रोशनी के लिए कुछ करें. जवाब मिला: बेशक तुम हमारे साथ थे लेकिन तुमने अपने आपको धोके में डाला, तुम इस दिन के बारे में शक (संदेह) में रहे और तुम्हारा असली मकसद दुनिया की ज़िन्दगी ही था. तुमने शैतान की बात मानी और उसने तुम्हें धोखे में डाले रखा. सो न आज तुम कुछ दे दिलाकर छूट सकते हो और न कोई काफ़िर.
यह सुनकर मुनाफिकों को विश्वास हो गया कि उनका अंजाम भी काफिरों (इंकार करने वालों) से अलग नहीं है. वापस जाने में उन्हें नुकसान लगा. इसलिए उन्होंने अंधेरे में रास्ता पार करने की कोशिश की. लेकिन रौशनी के बिना कोशिश का नतीजा जहन्नम की खाई थी. इस तरह एक एक करके सारे मुनाफिक चीख़ते चिल्लाते हुए जहन्नम में जा गिरे जहां नीचे अज़ाब के फरिश्ते उनका इंतजार कर रहे थे. हम सारा मंज़र (दृश्य) देखते हुए और ऊँची आवाज़ से यह दुआ पढ़ते हुए अर्श की ओर बढ़ते रहे:
'ए हमारे रब (प्रभु) हमारे नूर को बुझने न दे और मुनाफिकों के अंजाम से हमें बचाते हुए हमारी बख्शिश फ़रमा. बेशक तू हर चीज़ पर क़ादिर (ताकत रखने वाला) है.
....................................................................................................जारी है....

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