फरिश्ते आसमान से उतरते जाते और दाएरा दाएरा करके हाथ बांध कर खड़े होते जाते. हर पल उनकी संख्या बढ़ती जा रही थी. इस दौरान लोगों की चीख और पुकार भी थम चुकी थी. हर इन्सान फटी आँखों से टकटकी बांधे उसी दिशा में देखे जा रहा था. अब फ़िज़ा में बस कुछ फुसफुसाहट ही बाकी रह गई थी. इसकी वजह यह थी कि हर व्यक्ति अपने बराबर वाले से पूछ रहा था कि क्या हो रहा है?
मुझे कुछ कुछ अंदाज़ा था कि यह क्या हो रहा है, लेकिन फिर भी मैंने सालेह से वजाहत (स्पष्टीकरण) चाही. उसने जैसा की मेरा अंदाजा था जवाब दिया:
'' हिसाब किताब शुरू हो रहा है. ईश्वर का दरबार सजाया जा रहा है. यह पहला चरण है. फ़रिश्ते लगातार उतर रहे हैं और काफी देर तक उतरते रहेंगे. इसके बाद सबसे आखिर में अर्श को उठाने वाले उतरेंगे. तुम तो उनसे मिल चुके हो. उस वक़्त वे चार थे. अब चार और उनमें शामिल हो जाएंगे. कुल आठ फ़रिश्ते अर्श इलाही के साथ नाज़िल होंगे.''
'अर्श इलाही.?' सालेह ने स्पष्ट करते हुए कहा:
'' तुम तो समझ सकते हो, अल्लाह अर्श पर बैठते नहीं हैं. वह इस तरह के सभी इंसानी सोचों से पाक ( मुक्त) हैं. यह अर्श हकीकत में खुदा की तरफ रुख करने की जगह है. जैसे दुनिया में बैतुल्लाह (काबा) हुआ करता था क़िबला (दिशा) के तौर पर. अल्लाह के घर का मतलब यह नहीं था कि अल्लाह वहाँ रहते थे. लेकिन आदमी उसकी तरफ रुख करता था तो इसके लिए वो जगह एक रुख बन जाता था. उसी तरह आज अर्श इलाही के द्वारा लोग अल्लाह के साथ बात चीत करेंगे.''
मैंने पूछा:
' तो क्या लोग अल्लाह की बात सुनेगें?'
सालेह ने कहा:
'' हाँ, वैसे ही जैसे हज़रत मूसा (एक नबी) ने तूर पहाड़ की घाटी में एक पेड़ में से खुदा की आवाज़ आते हुए सुनी थी. और हां अब्दुल्लाह एक बहुत खास बात भी सुन लो.''
मेरा पूरा ध्यान तो उसकी तरफ था ही लेकिन अब मैं जैसे समर्पित हो कर उसे देखने लगा.
'' अर्श उठाने वाले फरिश्तों के उतरने के साथ ही अर्श खुदा के नूर की तजल्ली (परछाई, भनक) से जगमगा उठेगा. जिसके साथ पूरी ज़मीन पर इस नूर का असर फैल जाएगा. इसका मतलब यह होगा कि जमीन अपने रब के नूर से रौशन हो जाएगी और मामले अब सीधे अल्लाह की निगरानी में अंजाम पाना शुरू हो जाएँगे. यह मतलब है क़ुरआन की इस बात का के ज़मीन को खुदा अपनी मुट्ठी में ले लेगा. उस वक़्त पहला हुक्म यह दिया जाएगा कि सब अल्लाह के सामने सजदे में गिर जाएँ. अब्दुल्लाह! उस समय बहुत हैरत अंगेज़ मंज़र (दृश्य) सामने आएगा. तुम देखोगे कि सारे फ़रिश्ते सजदे में होंगे. अर्श के दाहिने हाथ की ओर अर्श इलाही के साये में सारे नबी, शहीद और नेक लोग, सब सजदे में होंगे.''
मैंने पूछा:
' और यहाँ हष्र के मैदान में मौजूद लोग?'
'' महत्वपूर्ण और हैरत अंगेज़ बात यह है. यहां मौजूद कोई ईश्वर का इंकार करने वाला, मुनाफिक (ज़ुबान पर कुछ और दिल में कुछ और रखने वाला), खुदा का नाफरमान और कोई मुजरिम सजदे में नहीं जा सकेगा. यह लोग लाख कोशिश करेंगे कि सजदे में गिर जाएँ, लेकिन उनकी कमर और गर्दन तख्ता हो जाएगी. जमीन उन्हें अपनी ओर आने से रोक देगी.''
' और बाकी लोग?' मैंने पूछा.
सालेह बोला:
''वह लोग जिनके आमल (कर्म) मिले जुले और गुनाह कम होंगे वह सजदे में चले जाएंगे. और इसी वजह से इन सब को तुरंत हिसाब किताब के लिए बुला लिया जाएगा. बाकी जिसका ईमान यकीन जितना मज़बूत और अमल जितने अच्छे होंगे वह इतना ही झुक सकेगा. कोई रुकु में होगा, कोई आधा झुका होगा. कोई बस गर्दन ही झुका सकेगा. जो जितना कम झुके, वह उतना ही शर्मिंदा होगा.''
मैं बात समझते हुए सर हिला कर बोला:
' अच्छा इसका मतलब यह है कि लोगों को अपने पिछले कर्मों का एक हद तक अनुमान हो जाएगा.'
सालेह ने कहा:
'' नहीं, तुम्हें ये बातें मैं बता रहा हूँ, उन्हें यह अंदाज़ा नहीं होगा. लेकिन सजदा न करने पर अपमान का अहसास और करने पर एक तरह का सुकून हो जाएगा. लेकिन लोग यह अच्छी तरह जान लेंगे कि खुदा कौन है? जिस हस्ती को भुला कर ज़िन्दगी गुज़री थी वह कौन है? आज लोगों को मालूम हो जाएगा कि राजाओं का राजा कौन है? शहंशाहों का शहंशाह कौन है? कौन सच्चा ईश्वर है? कौन है जिसकी ताक़त दुन्याँ पर छाई हुई है? कौन है जिसके हाथ में कुल भलाई और सभी खैर है? कौन है जिसके इशारे से तकदीर बनती और बिगड़ सकती है? कौन है जो हर किसी से हर अमल के बारे में पूछ सकता है मगर उससे उसके किसी निर्णय के बारे में कुछ नहीं पूछा जा सकता? कौन है जो हर तारीफ़, हर शुक्र, हर रुकु, हर सजदे, हर नज्र व नियाज़, हर इज्ज़त, हर मुहब्बत, हर तसबीह और हर हर बड़ाई का हकदार है? बुलंनद मर्तबा और शान वाला. अल्लाहुअकबर. अल्लाहुअकबर. अल्लाहुअकबर.''
यह शब्द कहते हुए सालेह के शरीर पर एक लर्जाह सा तारी हो गया और आखरी बार अल्लाहुअकबर कहते हुए वह सजदे में गिर गया. उसी पल मुझे महसूस हुआ कि ज़मीन पर एक खास तरह की रोशनी फैल चुकी है. माहौल एक खास नूर से जगमगा उठा है . इसके साथ ही कानों में फरिश्तों की तसबीह और तकबीर करने की आवाजें आने लगीं.
मुझे अंदाज़ा हो गया कि अर्श इलाही की तजलियात से माहौल मुनव्वर हो चुका है. लेकिन इस अरसे में मैं नज़र झुका कर खड़ा रहा था. डर के मारे मैंने अर्श की तरफ देखने की कोशिश ही नहीं की थी.
ज्यादा देर ना गुजरी थी कि मेरे कानों ने जिब्राइल अमीन की जानी पहचानी मगर रोअब से भरपूर आवाज़ आई:
'' (आज के दिन बादशाहत किसकी है?).''
जवाब में सारे फ़रिश्ते पुकार उठे:
'' (अकेले ग़ालिब रहने वाले अल्लाह की)''.
जिब्राइल अमीन यह सवाल बार बार दोहराते और हर बार फ़रिश्ते जोर की आवाज़ से यही जवाब देते. इस प्रक्रिया ने हष्र के मैदान में ऐसा हश्र बरपा कर दिया कि दिल लरज़ने लगे. आखिरकार एक सदा बुलंद हुई:
'' रहमान खुदा के बन्दे कहाँ हैं? आलम के मालिक के गुलाम कहां हैं? अल्लाह ही को ईश्वर, अपना राजा और अपना रब मानने वाले कहाँ हैं? वह जहां भी हैं सारे आलम के रब के सामने सजदा में गिर जाएँ ''
यह सुनना था कि मैं कुछ देखने की कोशिश किए बिना ही सालेह के बराबर में सजदे (प्रणाम) में पड़ गया.
...............
हष्र के मैदान में एक दम चुप्पी छा गई. ऐसा सन्नाटा कि सूईं ज़मीन पर गिरे तो उसकी आवाज़ भी सुनाई दे जाए. मैंने इस सजदे की हालत में जितनी दिली ख़ुशी महसूस की, ज़िन्दगी में कभी महसूस नहीं की थी. दूसरों का तो नहीं मालूम कि सजदे में क्या कह रहे थे, लेकिन मैं इस सजदे में रो रो कर अल्लाह से दरगुज़र (गुनाहों के बारे में ना पूछने) और माफी की दुआ (अनुरोध) कर रहा था.
न जाने कितनी देर तक यह आलम तारी रहा. इसके बाद अचानक एक जोर की आवाज़ आई:
'' वो ईश्वर है जिसके सिवा कोई ईश्वर नहीं.''
मुझे पहले भी इसका अनुभव था कि अर्श को उठाने वाले फरिश्तों के इस ऐलान का मतलब सुनने वालों को यह बताना होता है कि अर्श का मालिक बात कर रहा है. आवाज़ आई:
''मैं अल्लाह हूँ. मेरे सिवा कोई ईश्वर नहीं.''
ये शब्द वही थे जो मैंने अर्श के पास सजदे में पहली बार सुने थे, लेकिन यह आवाज उस आवाज़ से बिल्कुल अलग थी. इस आवाज़ में जो हुक्म की सी सख़्ती थी वह अच्छे अच्छों का पत्ता पानी करने के लिए काफी थी. पल भर के लिए एक ख़ामोशी छाई जो चार तरफ फैले सन्नाटे से पुर थी. उसके बाद बादलों की कड़क से कहीं अधिक सख्त और गरजदार सी आवाज हुई:
''मैं हूँ बादशाह. कहां हैं सरकशी करने वाले? कहाँ हैं अपने आप को बड़ा समझने वाले? कहाँ हैं ज़मीन पर राज करने वाले?''
यह शब्द बिजली बन कर गरजे. लोगों ने इस बात का जवाब तो क्या देना था हर तरफ रोना पीटना मच गया. इस आवाज़ में जो सख्ती, रोब और हैबत (डर) थी उसकी वजह से मुझ पर भी सन्नाटा तारी हो गया. मुझे ज़िन्दगी का हर वह लम्हा याद आने लगा जब मैं खुद को ताकतवर, बड़ा और अपने घर में ही सही, खुद को प्रमुख समझता था. उस पल मेरी बहुत खुवाहिश हुई थी कि धरती फटे और मैं उसमें समा जाऊं. किसी तरह खुदा के कहर के सामने से हट जाऊं. बहुत बेबसी के आलम में मेरे मुंह से यह शब्द निकले:
' काश मेरी माँ ने मुझे पैदा ही न किया होता'.
इसके साथ ही मेरे दिल व दिमाग ने मेरा साथ छोड़ दिया और मैं बेहोश होकर ज़मीन पर गिर गया.
.....................................................................................................जारी है...
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