मंगलवार, 10 जुलाई 2012

भाग २.१ अर्श के साए में


मुझे ऊँचे स्थानों पर चढ़ने का हमेशा से शौक रहा है. लेकिन शायद यह मेरे जीवन की सबसे अजीब ऊंचाई थी. ये देखने में बहुत ऊँची और आसमान तक थी. मगर हम ज़मीन को इस तरह देख रहे थे जैसे कुछ मंजिल ही ऊपर खड़े हों. नीचे से जो जगह एक चोटी की तरह लग रही थी वह एक सीधी सतेह थी. इस के बाद इस ज़मीन पर थोड़ी थोड़ी दूर पर किलों के जैसी ऊँची ऊँची और भव्य छतें बनी हुई थीं. लेकिन उनके आसपास कोई दीवार न थी और न उनमें दरवाजे ही मौजूद थे. इसलिए बाहर से भीतर देखा जा सकता था. यहां हर तरफ शाही अंदाज के नज़ारे थे. आलीशान गद्दियों पर ताज पहने हुए बहुत बावकार (प्रतिष्ठित) हस्तियां बैठी हुई थीं. उनके आसपास उसी शान के लोग शाहाना सीटों पर बिराजमान थे. मैंने सालेह से इन ऊँचे निर्माण के बारे में पूछा तो उसने कहा:
''यह अलग अलग नबियों की आरजी (अस्थायी) आराम करने की जगह हैं. इसी के आधार पर इस पहाड़ को आराफ़ कहा जाता है. तुम तो जानते हो कि आराफ़ का मतलब बुलंदियों का मजमुआ (ऊँचाइयों का संग्रह) है.''
मैंने हाँ में सिर हिलाया. वह बातचीत का सिलसिला जारी रखते हुए बोला:
''सिंहासन पर बैठे हुए हज़रात अम्बिया हज़रात हैं. और उनके आसपास बैठे लोग उनकी उम्मत के शुहेदा (गवाही दिने वाले) और सिद्दिकीन (सच कर दिखाने वाले) लोग हैं. सिद्दिकीन वह लोग हैं जिन्होंने नबियों के जीवन में उनका साथ दिया और शुहेदा वह लोग हैं जिन्होंने नबियों के बाद उनकी दावत व पैगाम को आगे पहुंचाया. यह सब वे लोग थे जो दुनिया में ख़ुदा के लिए जिये और उसी के लिए मरे. उसी के सिले में इन लोगों को आज ये सम्मान और इज्ज़त मिली हैं जिसे तुम अपनी आँखों से देख रहे हो.''
'क्या यह मुमकिन है कि नबियों से मेरी मुलाकात हो सके?' मैंने पूछा.
''सब से मिलने का समय तो नहीं है लेकिन कुछ से जरूर मिल सकते हैं.''
उसने जवाब दिया और फिर एक एक करके खुदा के जलीलुल क़द्र (बड़े बड़े) पैग़म्बरों से मेरी मुलाक़ात करानी शुरू की. वह पैगम्बर जिन के लिए मेरे दिल में अज़मत ही अज़मत थी, आज मैं उनसे मिल रहा था. आदम, नूह, हूद, सालेह, इस्हाक़, याकूब, यूसुफ, शोएब, मूसा, हारून, यूनुस, दाऊद, सुलैमान, ज़करिया, याह्या, ईसा और सबसे बढ़कर अबू अल अम्बिया सय्यदना इब्राहीम अलैहिमुस्सलाम. सबने गले लगाकर और मेरा माथा चूम कर मेरा स्वागत किया और मुझे बधाई दी.
इन जलीलुल क़द्र हस्तियों से बात करने के बाद हम आगे रवाना हो गए, मगर मुझे बातचीत के दौरान यह महसूस हुआ था कि सब लोग एक प्रकार की परेशानी और फ़िक्र में हैं. रास्ते में सालेह से मैंने इसकी वजह पूछी तो वो बोला:
''तुम्हें नहीं मालूम इस समय हष्र के मैदान में क्या क़यामत बरपा है. इस समय हर नबी परेशान है कि मानवता का क्या होगा. अल्लाह के अज़ाब की तीव्रता इतनी अधिक है कि नबियों में से कोई भी नहीं चाहता कि उसकी उम्मत खुदा के अज़ाब का सामना करे. वह चाहते हैं कि अल्लाह लोगों को माफ़ कर दें. लेकिन फिलहाल इसकी कोई संभावना नहीं. ऐसी कोई ना दुआ की जा सकती है और न इसकी इजाज़त है. लोग सैकड़ों साल से बदहवास और परेशान हैं और फ़िलहाल हिसाब किताब शुरू होने की भी कोई उम्मीद नहीं है.''
'सैकड़ों साल ? क्या मतलब! हमें तो अंदर आए हुए मुश्किल से एक दो घंटे बीते होंगे.' मैंने चौंक कर आश्चर्य से कहा.
''यह तुम समझ रहे हो. आज का दिन सफल लोगों के लिए घंटों का है और बाहर मौजूद लोगों के लिए बहुत सख्ती और मुसीबत का एक बेहद लम्बा दिन है. बाहर सदयाँ गुज़र गई हैं. मगर तुम अभी यह नहीं समझोगे.'' उसने स्पष्ट करते हुए जवाब दिया.
मैं इस बात को हजम नहीं कर सका, लेकिन जाहिर है मैं जिस दुनिया में था वहाँ सब कुछ संभव था. और न जाने और कितनी ताज्जुब भरी बातें मेरे सामने आने वाली थीं.
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सहाबा हज़रात और मुहाजिरीन और अन्सार (मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्ल्लम के साथी) हलका (गोल क्षेत्र) बनाए अदब और सम्मान से बैठे थे. उम्मते मुहम्मद्या के पहले और आख़री लोगों की एक बड़ी संख्या मौजूद थी. शमा-ए-रिसालत के इन परवानों के बीच रिसालतमआब (मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्ल्लम) सिर झुकाए तशरीफ़ फ़रमा थे. लगता था सब कुछ बिल्कुल ठीक थी, मगर मैं महसूस कर सकता था कि यहां भी इसी तरह की बेचैनी फैली हुई थी जिसे मैं पहले देख आया था.
''रसूल अल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम इस समय बारगाह इलाही में दुआ (प्रार्थना) कर रहे हैं. हमें बैठकर इंतजार करना चाहिए.'' सालेह पिछली सीटों की तरफ बढ़ते हुए बोला.
हम पिछली सीटों पर बैठ गए. यहां से यह अनुमान करना मुश्किल था कि आगे क्या हो रहा है. मैंने हलके से सालेह से पूछा:
'यह हिसाब किताब कब शुरू होगा?'
''मुझे क्या मालूम. किसी को भी पता नहीं है.'' उसने जवाब दिया.
उसकी बात सुनकर मैं चुप हो गया और सीट के पीछे सिर टिकाकर आँखें बंद करके बैठ गया. न जाने कितना समय बीता था कि सालेह की आवाज़ मेरे कान में आई:
''अब्दुल्लाह उठो! देखो तुम से कौन मिलने आया है.उसकी आवाज़ पर मैं चौंक कर खड़ा हो गया. सामने देखा तो एक बहुत प्रतिष्ठित हस्ती मेरे सामने खड़ी थी. उनके चेहरे पर मुस्कान और आंखों से प्यार के आसार झलक रहे थे. इससे पहले कि सालेह और कुछ कहता, उन्होंने नरम लहजे में अपना परिचय देते हुए कहा:'' मरहबा अब्दुल्ला! मेरा नाम अबू बक्र है. रसूल अल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की तरफ से मैं तुम्हारा स्वागत करता हूँ.यह कहते हुए उन्होंने अपने दोनों हाथ फैला दिए. मैं उत्साहित अंदाज में उनसे गले मिला. हाल चाल पूछने के बाद वे मुझे लोगों से ज़रा दूर ले कर एक सीट पर जा बैठे. मैंने बैठते ही उनसे पूछा:
'मैं रसूल अल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम से कब मिल सकता हूँ?.'
'' रसूल अल्लाह इस समय बारगाह इलाही में शुक्र और प्रार्थना में व्यस्त हैं. तुम उनसे बाद में मिल सकते हो. इस समय बताने की महत्वपूर्ण बात यह है कि अल्लाह की बारगाह में हुज़ूर की यह प्रार्थना स्वीकार हो गई है कि लोगों का हिसाब किताब शुरू हो. इस कुबूलियत की घड़ी में तुम ने भी दुआ की थी. तुम फिर हष्र के मैदान में जाकर वहां का अहवाले देखना चाहते थे? तो तुम्हें भी इसकी अनुमति मिल गई है. हिसाब किताब कुछ देर बाद शुरू होगा. तब तक तुम लोगों के हाल देख सकते हो. यह संदेश दे कर ही रसूल अल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने मुझे तुम्हारे पास भेजा था.''
यह सुनकर मेरे चेहरे पर खुशी के आसार ज़ाहिर हुए. जिन्हें देख कर रसूल के खलीफा के चेहरे पर भी मुस्कान आ गई. एक अंतराल के बाद वे फिर बोले:
''बाहर बहुत सख्त माहौल है. सालेह हालांकि तुम्हारे साथ होगा, मगर फिर भी तुम यह पीते जाओ. यह शरबत तुम्हें बाहर के मौसम से सुरक्षित कर देगा.''
यह कहकर उन्होंने पास रखा सुन्हेरे रंग का जगमगाता  हुआ एक गिलास मेरी ओर बढ़ाया. मैंने दोनों हाथ आगे बढ़ाकर यह गिलास उनके हाथों से लिया और अपने होठों से लगा लिया.
गिलास होठों से लगाते ही एक अजीब घटना हुई. मैं हालांकि बिल्कुल प्यासा नहीं था और न किसी तकलीफ़ और बेचैनी में था, लेकिन जो संतोष मुझे मिला वह शायद सदियों के किसी प्यासे को पानी का पहला घूंट पीने पर भी नहीं मिलता होगा. इस शरबत का एक घूंट हलक से उतारते ही स्वाद, सुकून, आसोदगी, मिठास और ठंडक के शब्द अपने ऐसे मतलब के साथ मुझ पर स्पष्ट हुए जो अनुभव मुझे तो क्या, किसी इन्सान को कभी नहीं हुआ होगा. इस शरबत का एक एक कतरा मेरी जुबान से गले, गले से सीने और सीने से पेट तक उतरता रहा और मेरी रग रग को सुकून पहुंचाता गया. मेरा दिल तो चाहा कि एक ही घूंट में पूरा गिलास पी जाऊं, मगर जिस हस्ती के सामने बैठा था, उसके अदब और इज्ज़त की वजह से न पी सका. मैंने हल्के से सवाल किया:
'यह क्या चीज़ है?'
''यह नया जीवन और नई दुनिया का पहला परिचय है. यह जाम-ए- कौसर है. इसे पीने के बाद हष्र में गर्मी और प्यास तुम्हें नहीं सताएगी.''
यह शब्द सुनते ही मुझे समझ में आ गया कि मुझ पर शरबत का असाधारण असर क्यों हुआ था? यह जन्नत की नहर कौसर का पानी था और बेशक वह सभी गुण रखता था जिनका ज़िक्र मैं हमेशा सुनता रहा था. उस पल मुझे यह भी अंदाज़ा हुआ कि जन्नत की नेअमतें क्या होंगी. पिछली दुनिया में खाने पीने का आनन्द दो चीजों में छुपा था. एक यह कि इंसान को बहुत तेज़ भूख और प्यास लगी हो और दूसरे उसे खाने पीने के लिए बहुत लज़ीज़ (स्वादिष्ट) चीज़  मिल जाए. लेकिन जन्नत की हर चीज़ अपने आप में बहुत स्वाद के साथ साथ इंसान को बिना भूख और प्यास के वह स्वाद और सुकून भी देगी, जो एक बहुत भूखे और प्यासे इंसान को मिल सकती है. अब मुझे मालूम हो गया कि जन्नत में न भूख होगी और न प्यास, लेकिन इसके बावजूद इंसान जितना चाहेगा शौक से खाएगा. और उसकी कोई खाने की चीज़ ऐसी न होगी जो उसे बुरी लगे या पेट भारी करदे.
..............................................................................................................................जारी है...

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