मंगलवार, 24 जुलाई 2012

भाग १५.० जब ज़िन्दगी शुरू होगी


जन्नत में धीरे धीरे मेरे जानने वाले लोग भी आते जा रहे थे. अलग अलग मजलिसों में उनसे मुलाकात हो रही थीं. उन में दुन्याँ में मेरे समझाने पर ऊँची इमानी और अख्लाकी (नैतिक) ज़िन्दगी गुज़ारने वाले लोग भी थे और ख़ुदा के दीन (धर्म) में मेरा साथ देने वाले मेरे साथी भी. इनमें से हर आदमी से मिलकर यूँ लगता था कि ज़िन्दगी में खुशी और मुहब्बत का एक दरवाज़ा और खुल गया है. लेकिन वो अभी तक नहीं आई थी जिसका मुझे इंतजार था. हालांकि इस इंतजार में कोई परेशानी नहीं थी बल्कि मजा ही था. फिर एक दिन, हालांकि इस नई दुनिया में रात और दिन नहीं रहे थे, सालेह मेरे पास आकर कहने लगा:
'' सरदार अब्दुल्लाह तुम्हारे लिए एक बुरी खबरी है.''
मुझे हैरत हुई कि जन्नत में मुझे यह क्या बुरी खबर सुनाऐगा. लेकिन इसका लहजा ऐसा था कि मैं पूछने पर मजबूर हो गया:
' क्यों भाई! यहाँ क्या खबर बुरी खबर हो सकती है?'
'' सरदार अब्दुल्लाह बुरी खबर यह है कि तुम्हारे ऐश के दिन ख़त्म हो गए. तुमने नाएमा के पीछे आज़ादी के बहुत दिन देख लिए. अब तुम्हारी निगरानी के लिए नाएमा खुद आ रही है.''
' क्या सच?' मैंने जल्दी से ख़ुशी के मारे सालेह को गले लगाते हुए कहा.
'' और क्या मैं झूठ बोलूंगा?''
फिर मेरे सर को सहलाते हुए बोला:
'' मुझे छोड़ दो. मैंने नाएमा के आने की खुश खबरी दी है. मगर मैं खुद नाएमा नहीं हूँ.''
' तुम हो भी नहीं सकते.' मैंने उसे छोड़ते हुए कहा.
' लेकिन यह बताओ कि इतनी अच्छी खबर तुम मुझे धमकी के अंदाज में क्यों सुना रहे हो. वैसे तुम्हें नाएमा से अगर यही उम्मीदें हैं तो मुझे विश्वास है कि तुम्हें बहुत निराशा होगी. खैर छोड़ो इन बातों को. मैं नाएमा के आने पर उसे एक बहतरीन तोहफा देना चाहता हूं.'
'' क्या तोहफा देना चाहते हो?''
' एक बहतरीन घर.'
'' भाई तुम्हारे पास तुम्हारा घर है और उसके पास उसका घर है. अब इस नई दुनिया में खानदानी निज़ाम (व्यवस्था) तो है नहीं कि घर देना तुम्हारी जिम्मेदारी हो, न उसे तुम्हारे बच्चों को घर बैठकर पालना है. फिर नया घर क्यों बनाते हो?''
' मुझे पता है कि हर जन्नती का अपना घर और अपनी सल्तनत होगी, लेकिन मेरी इच्छा है कि अपनी पसंद से नाएमा के लिए घर बनाऊँ जो मेरी सल्तनत में हो. और फिर उस घर को नाएमा को गिफ्ट करूँ.'
'' जानते नहीं खुदा ने ज्यादा बढ़ने वालों को शैतान का भाई कहा है?'' वो इस समय मुझे तंग करने के मूड में था.
' जन्नत में शैतान नहीं आ सकता, लेकिन उसके कुछ चेले जरूर हैं जो मियाँ बीवी में प्यार पैदा करने के बजाय दूरी पैदा करते हैं.' मैंने बनावटी गुस्से के साथ उसे घूरते हुए कहा.
'' ठीक है ठीक है.'' वह हाथ जोड़ते हुए बोला
'' मुझे बताओ क्या करना चाहते हो?'''
उसके बाद मैंने उसे सारी स्कीम समझाई. मेरी बात ख़त्म हुई तो वह बोला:
'' चलो महल देखने चलो.''
मैंने हैरान होकर पूछा:
' क्या मतलब?, क्या महल बन गया?'
'' तुम क्या समझते हो तुम दुनिया में खड़े हो कि पहले जमीन ख़रीदोगे, फिर नक्शा पास कराओगे, फिर कोई ठेकेदार ढूँडोगे और फिर कई महीनों में महल तैयार होगा. सरदार अब्दुल्लाह! यह तुम्हारी सल्तनत है. खुदा की शक्ति तुम्हारे साथ है. तुमने कहा और सब हो गया. यही यहाँ का कानून है.
...............
हम दूर तक फ़ले हुए सागर के ऊपर सफ़र कर रहे थे. सालेह और मैं समुद्री जहाज जैसी किसी चीज में सवार थे. सवारी का यह तरीका सालेह के कहने पर ही अपनाया गया था. उसका कहना था जन्नत में जितना सुखद मंजिल पर पहुँचना है इतना ही मज़ेदार वहां तक ​​पहुंचने का रास्ता है. उसकी बात ठीक थी. मुझे दुनिया की ज़िन्दगी में समुद्री सफ़र कभी पसंद नहीं आया था. लेकिन इस सफ़र की बात ही कुछ और थी. यह जहाज़ एक तैरता हुआ महल जैसा था जिसके ऊपर हम दोनों खड़े थे. धीमी हवा और खुशगवार (सुखद) मौसम में आगे बढ़ते हुए हम अपनी मंजिल के करीब पहुंच रहे थे.
हमारी मंज़िल वह पहाड़ी द्वीप था जिसे एक महल के रूप में नाएमा के लिए तैयार किया गया था. यह महल बिल्कुल वैसा ही था जैसा मैं सालेह को बता रहा था. बीच समुद्र में एक बहुत बड़ा द्वीप, जहां हरे हरे पहाड़, दरया, नदियां, समुद्र के साथ चलने वाले पहाड़ी रास्ते, घास के बड़े बड़े मैदान और इन सबके बीच एक घर. जिसका फर्श पारदर्शी हीरे का बना हुआ. ऐसा फर्श जो हीरे की तरह चमकदार और शीशे की तरह पारदर्शी हो, इतना पारदर्शी कि उसके नीचे बने होज़ों में बहता पानी और उनमें तैरती रंग बिरंगी मछलियों साफ़ नज़र आएं. जिसकी दीवारें पारदर्शी चांदी की बनी हों जो बाहर का हर मंज़र दिखाई दे और जिसकी ऊँची और बड़ी छत सोने की हो और छत पर मोती, जवाहरात और कीमती पत्थर जड़े हों. यह महल कई मंजिल ऊँचा हो. इतना ऊँचा कि आसपास के पहाड़ों से भी ऊँचा हो जाए. जिसकी हर मंजिल से कुदरत और उसकी खूबसूरती का एक नया मंज़र दिखाई दे.
यहाँ आकर जो कुछ मैंने अपने सामने देखा मेरे बताने और अंदाज़े से कहीं ज्यादा खुबसूरत था. इसकी वजह शायद यह थी कि मेरे शब्द उन नेमतों का बयान (वर्णन) करने के लिए बहुत कम थे जो मुझे हासिल थीं. मैंने तो एक सामान्य नक्शा या ख्याल बताया था, लेकिन उस नक़्शे में डिज़ाइन, रंग और रूप रौशनी और दूसरी आराम की चीज़ें मेरे बयान और कल्पनाओं दोनों से ही कहीं ज्यादा थी. सालेह ने मेरी बात को उसूल में समझा और उसके बाद महल बनवा दिया जो खुबसूरत बिल्डिंग का एक शाहकार था जो उम्मीद से भी ज्यादा दिल को मोह लेने वाला था. यह महल इतना बड़ा था कि उसे पूरा देखने के लिए बहुत समय चाहिए था. मैंने सालेह से कहा:
'' मेरा इत्मिनान (संतोष) हो गया. ऐसा है कि अभी तो चलते हैं. नाएमा आएगी तो उसके साथ.....'
मेरा वाक्य यहीं तक पहुंचा था कि खनक सी एक आवाज़ आई:
''मगर मैं तो यहाँ आ चुकी हूँ.''
मैंने पीछे मुड़कर देखा तो बस देखता ही रह गया. यह नाएमा थी और नाएमा नहीं भी थी. हष्र के दिन मैंने नाएमा को जवान और सुंदर देखा था. मगर यहाँ मेरे सामने जो लड़की खड़ी थी उसकी खूबसूरती बताने के लिए हुस्न, सौंदर्य, युवा, शबाब, रूप, आकर्षण,सुन्दरता जैसे शब्द कोई हैसियत नहीं रखते थे. मैं अभी इसी हालत में था कि सालेह की आवाज़ आई:
'' आप से मिलिये. आप सरदार अब्दुल्लाह! हैं. यह नाएमा हैं. और मुझे पता है कि आप को एक दूसरे से मिलकर बहुत खुशी हुई है.''
' तुमने मुझे बताया क्यों नहीं कि नाएमा पहले से यहां होगी.' मैंने कुछ नाराज़ होकर सालेह की तरफ देखते हुए कहा.
नाएमा सालेह की सफाई पेश करते हुए बोली:
'' उन्हें मैंने मना किया था. आपको सरप्राइज़ देना चाहती थी.''
'' यह भी आपको सरप्राइज़ देना चाहते थे. देखा आपने, आपके लिए कितना ख़ास घर बनवाया है उन्होंने.''
'' हाँ मैंने देख लिया. मुझे तो अपनी आंखों पर यकीन ही नहीं आता.''
'और मुझे अपनी आँखों पर यकीन नहीं आ रहा.' मैं नाएमा को देखते हुए कहा. फिर सालेह को संबोधित करते हुए कहा:
' आपकी पत्नी तो है नहीं. आप विदा होने का क्या लेंगे?'
उसने हंसते हुए जवाब दिया:
''मैं दुनिया में हमेशा तुम्हारे साथ रहा था. अभी भी चाहता हूं कि हमेशा तुम्हारे साथ रहूँ.''
'मगर भाई, तब आप नज़र नहीं आया करते थे.'
वह शरारती अंदाज में बोला:
'' यह अब भी मुमकिन है कि मैं गायब रहकर यहां मौजूद रहूं.''
यह कहते ही वह हमारी नज़रों से गायब हो गया और फिर उसकी आवाज़ आई:
'' ऐसे ठीक है?''
'' नहीं भई नहीं. ऐसे नहीं चलेगा.'' नाएमा एकदम बोली.
सालेह फिर सामने आ गया. नाएमा ने उसे देख कर राहत (संतोष) की सांस ली और बोली:
'' आप वादा करें कि जब भी आएंगे इंसानों की तरह सामने आएंगे और जाएंगे तो इंसानों की तरह ही जाएंगे.''
'' अच्छा भई अच्छा! '' उसने सर हिलाकर जवाब दिया, लेकिन उसकी आंखों में अभी भी शरारत चमक रही थी. वह बड़ी मासूमियत से बोला:
'' मुश्किल यह है कि इंसान तो मैं हूं नहीं. फिर इंसानों वाले नियम मुझ पर कैसे लागू हो सकते हैं?''
' सोच लो! मेरी पहुँच तुम्हारे सरदार तक है. मेरी एक शिकायत पर वह तुम्हें वाकई इंसान बना सकते हैं.' मैंने मुस्कुरा कर कहा तो वह लहजे में उदासी लाते हुए बोला:
'' यार धमकी क्यों देते हो. मैं वादा करता हूँ कि मैं आऊँगा और जाऊँगा तो इजाज़त (अनुमति) ले लिया करूंगा. और अगर तुम कहो तो मैं अभी चला जाता हूँ.''
यह कहकर वह पीठ फेर कर मुड़ा, दो चार कदम चला, फिर घूमकर नाएमा से बोला:
'' हालांकि मेरे जाने से कोई फर्क नहीं पड़ता. क्योंकि तुम दोनों के बच्चे यहां आ चुके हैं और उनका फैसला है कि हम अपनी माँ की शादी खुद करेंगे. उसके बाद ही तुम अब्दुल्लाह के घर आ सकती हो.''
'' सालेह ने सही कहा.'' लैला अंदर आते हुए जोर से बोली. और तीर की तरह भाग कर मेरे पास आ गई. उसके पीछे ही अनवर, जमशैद, आलया  और आरफा भी थे. उन को देखकर मेरी खुशी कई गुना बढ़ गई. मैंने सबको अपने गले लगाकर प्यार किया. मिलना मिलाना ख़त्म हुआ तो नाएमा ने कुछ गुस्से के साथ कहा:
'' यह क्या बचपने वाली बात तुम लोग कर रहे हो कि हमारी दुबारा शादी होगी?''
आलया ने कहा:
'' अम्मी पिछली दुनिया में हम में से कोई भी आप की शादी में मौजूद नहीं था. इसलिए हम सब भाई बहनों की एक ही राय है कि हम आप लोगों की शादी बड़ी धूमधाम से करेंगे. हम आप को खुद दुल्हन बनाकर विदा करेंगे और तब तक आपका अब्बू से पर्दा रहेगा.''
अनवर ने हस्तक्षेप करते हुए कहा:
'' पर्दे वाली बात तो बड़ी सख्त है. बस इतनी शर्त लगादो कि अकेले में नहीं मिलेंगे.''
' इस महरबानी का बहुत बहुत शुक्रिया. यह बताओ कि शादी कब होगी.' मैंने बेबसी से पूछा.
'' जब तैयारियां हो जाएंगी.'' आरफा ने बड़ी गंभीरता से कहा.
' और क्या तैयारियां होंगी.' मैंने पूछा.
''मैं बताती हूँ.'' लैला बोली.
'' जगह तो यही ठीक है. बस कपड़े, गहने आदि का इन्तिज़ाम करना है.''
'और मुझे भी ज़रा अपने अच्छे कपड़े बनवाने हैं ... अब्बू जैसे. मुझे तो अब्बू के कपड़े देखने के बाद अपने कपड़े अच्छे नहीं लग रहे.'' जमशैद ने भी मांगों में अपना हिस्सा डाला.
' अच्छा यह सब तैयारियां हो गईं तो शादी हो जाएगी?' मैंने पूछा.
'' क्यों नहीं.'' सब ने मिल कर कहा.
' चलो फिर अभी चलो. मैं तुम्हें जन्नत के सबसे बड़े शॉपिंग के इलाक़े में ले चलता हूँ. वैसे तो तुम लोग वहां घुस भी नहीं सकते, लेकिन मेरी तरफ से जो दिल चाहे आज शॉपिंग करलो.'
इस पर सारे बच्चों ने खुशी का नारा लगाया. फिर हम शॉपिंग के लिए रवाना हो गए.
.................
यह एक और अलिफ़ लैला की सी जगह थी. मैं इससे पहले सालेह के साथ यहां कई बार आ चुका था. लेकिन हर बार यहां हमेशा नई चीजें मौजूद हुआ करती थीं. इस जगह के लिए शॉपिंग सेंटर या बाजार जैसी शब्दावली बिल्कुल ठीक नहीं थीं. यह सैकड़ों मील फैला हुआ एक इलाका था जो रंग और नूर के सैलाब से रौशन था. यहां रात का समय ही रहा करता था. खाने पीने, पहनने और बरतने की यहां इतनी चीज़ें थीं कि उनकी संख्या गिनना तो दूर की बात है, उनकी विभिन्न प्रकार और वेराईटी ही करोड़ों में थी. हर जगह यहाँ फरिश्ते तैनात थे. लोग डिसप्ले से कुछ पसंद कर लेते और फिर फरिश्तों को नोट करा देते. जिसके बाद यह चीजें लोगों के घरों में पहुंचा दी जातीं. फरिश्ते हर आदमी का रिकॉर्ड चेक करके उसके बारे में सब कुछ जान लेते. इस बाजार के दो हिस्से थे एक हिस्से में आम जन्नती खरीदारी कर सकते थे. दूसरा हिस्सा ख़ास लोगों के लिए विशेष था. आम लोग यहां जा तो सकते थे, मगर यहाँ खरीदारी की इजाज़त सिर्फ ऊँचे दर्जे के जन्नतियों को थी.
यह सब पहली बार यहां आए थे. पहले मैं उन्हें आम लोगों के हिस्से में ले गया. ये लोग उसे देख कर खुशी से पागल हो गए. उसके बाद उन्होंने जो दिल चाहा खरीदना शुरू कर दिया. लेकिन नाएमा सारा समय मेरे साथ ही रही. उनकी खरीदारी ख़त्म हो गई तो मैंने कहा कि मैं तुम्हें खाना खिलाने ले जाता हूँ. खाने के लिए मैं उन्हें ऊपर ले गया. यहां छत से दूर दूर तक सुंदर रोशनियाँ दिखाई दे रही थीं. जबकि ऊपर तारों भरा आसमान था. दुन्याँ से उलट जहां शहर की रोशनियाँ तारों की चमक को फीका कर देती थीं यहाँ ज़मीन और आसमान पर एक जैसी जगमगाहट थी.
तारों की दूधया रोशनी और ठंडी हवा में खाने की सुगंध ने वातावरण को बेहद प्रभावी बना रखा था. बाजार की तरह यहां भी धीमी सी आवाज़ में नगमे चल रहे थे. खाने की इतनी वेराईटी थी कि किसी को समझ में नहीं आता था कि क्या खाएं. जो चीज़ लेते वह इतनी लज़ीज़ (स्वादिष्ट) होती कि छोड़ने का दिल ही नहीं चाहता था. मगर शुक्र खुदा का कि यहां पेट भरने का कोई मसला ही नहीं था जिस की वजह से जब तक दिल चाहता रहा हम लोग बैठकर खाते रहे.
वापसी पर मैं जानबूझ कर इन लोगों को बाजार के उस इलाके से ले गया जहाँ सिर्फ ऊँचे दर्जे के जन्नती खरीदारी कर सकते थे. उसे देख कर उन लोगों की आंखें फट गईं. जमशैद ने कहा:
'' यह भी शॉपिंग सेंटर का हिस्सा है?''
'हां यह भी शॉपिंग का इलाका है.' मैंने जवाब दिया.
मेरी बात पूरी तरह सुने बिना ही सब लोग शॉपिंग के लिए बिखर गए. मेरे साथ केवल नाएमा ही रह गई.
' क्यों, तुम कुछ नहीं ख़रीदोगी? पहले भी तुमने कुछ नहीं लिया और अब भी यहीं खड़ी हो.'
मेरी बात सुनकर नाएमा धीरे से मुस्कराकर बोली:
''मेरे लिए सबसे कीमती चीज़ आपका साथ है. यह अनमोल चीज आपके साथ के सिवा कहीं नहीं मिलेगी.'' यह कहते हुए नाएमा का रौशन चेहरा और रौशन हो गया.
हम दोनों एक जगह ठहर कर ख्वाब और ख्याल से ज्यादा हसीन इस जगह और इस के माहोल को एन्जोए करने लगे. दूर तक फैला हुआ यह बाजार अपने भीतर हर तरह की दुकानें लिए हुए था. कपडे, फैशन, जूते, आराम के सामान, उपहार और न जाने कितनी ही दूसरी चीजों की दुकानें यहां थीं. हर दुकान इतनी बड़ी थी कि कई घंटों में भी नहीं देखी जा सकती थी. दुनिया का बड़े से बड़ा शॉपिंग सेंटर भी इसकी एक दुकान के सामने कुछ नहीं था. लेकिन यहां की असल कशिश (आकर्षण) यह दुकानें नहीं बल्कि मदहोश करदेने वाला माहौल था जो हर तरफ छाया हुआ था. मन को अपनी ओर खींचती चीजों से भरी दुकानें, उनमें जगमग जगमग करती रोशनियाँ, खुशबूदार फिज़ा (वातावरण), सुंदर फ़वारे और खुबसूरत लोगों की चहल पहल, सब मिलकर एक बहुत प्रभावशाली माहौल बना रहे थे. यहां का माहौल आने वालों की देखने, सुनने, सूंघने और दूसरी हर तरह की शक्ति पर जिससे उसका दिमाग किसी चीज़ को महसूस करता है इस तरह हमला कर रहा था कि उसे मदहोश कर देता था. दूसरों के लिए जगह चीज़े खरीदने की जगह थी जबकि मेरे लिए यह जगह खूबसूरती के कमाल देखने की थी. मगर फिलहाल नाएमा के साथ ने यहां के हर रंग को मेरी नज़र में फीका कर दिया था. लेकिन हमारी तन्हाई में मिलने के पल बहुत कम रहे क्योंकि थोड़ी ही देर में लैला लौट आई और कहने लगी:
'' अब्बू वह जो हीरों का ताज है मुझ पर कैसा लगेगा?''
' बहुत प्यारा लगेगा.'
''मगर अब्बू यह लोग कह रहे हैं कि आप इसे खरीद नहीं सकते.''
' अच्छा!' मैंने इतना ही कहा था कि बाकी लोग भी मुंह लटकाए लौट आए. अनवर ने कहा:
'' अब्बू चलें यहाँ ज्यादा अच्छी चीजें नहीं हैं.''
'' दूसरे शब्दों में अंगूर खट्टे हैं.'' नाएमा हंसते हुए बोली.
' नहीं यह अंगूर इतने खट्टे भी नहीं हैं. चलो मेरे साथ चलो.'
मैं इन सबको लेकर उस जगह गया जहाँ फरिश्ता मौजूद था. मैंने उससे कहा:
' मेरा नाम अब्दुल्लाह है. यह मेरे बीवी बच्चे हैं. इन्हें जो चाहिए आप दे दें.'
फरिश्ते ने मुस्कुराते हुए कहा:
'' सरदार अब्दुल्लाह! मैं माफ़ी चाहता हूँ आपको खुद आने की तकलीफ उठानी पड़ी. उन्हें जो चाहिए वे ले सकते हैं.''
इन सब का चेहरा खुशी से दमक उठा और यह लोग एक बार फिर खरीदारी मिशन पर निकल खड़े हुए.
...........................................................................................................जारी है....

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