हम हष्र के मैदान की ओर जा रहे थे कि रास्ते में एक जगह नहूर और शाहिस्ता दिखे. उन्हें देख कर मुझे शरारत सूझी और मैंने सालेह से कहा:
' आओ जरा चलते चलते उन्हें तंग करते जाएं.'
उन दोनों का रुख़ झील की तरफ़ था इसलिए वो हमें पास आते हुए देख नहीं सके. मैं शाहिस्ता की ओर से उसके पास पहुंचा और जोर से कहा:
'ए लड़की! चलो हमारे साथ. हम तुम्हें एक गैर मर्द के साथ घूमने फिरने के आरोप में गिरफ्तार करते हैं.'
शाहिस्ता मेरी ऊँची आवाज़ और सख्त लहजे से एकदम घबरा कर पलटी. लेकिन नहूर पर मेरी बात का कोई असर नहीं हुआ. उन्होंने इत्मीनान के साथ मुझे देखा और कहा:
'' फिर तो मुझे भी गिरफ्तार कर लीजिये. मैं भी इस जुर्म में शामिल हूँ.'' यह कहते हुए उन्होंने दोनों हाथ आगे फैला दिए. फिर हंसते हुए कहा:
''मगर समस्या यह है कि यहां न जेल है और न सज़ा देने की जगह.''
' जेल तो यहां नहीं है, लेकिन सजा जरूर मिल सकती है. वह यह कि शाहिस्ता ही के साथ आप की शादी करा दी जाए. सारा जीवन एक ही औरत के साथ रहना वह भी जन्नत में बड़ी सज़ा है.'
इस पर नहूर ने एक जोरदार कहकहा लगाया. शाहिस्ता जो मेरे शुरुआती हमले के बाद संभल चुकी थी, हँसते हुए बोली:
'' वैसे तो आप लोग तौहीद (एक ही ईश्वर) रखने के बड़े कायल हैं, लेकिन इस मामले में आप लोगों की सोच इतनी शरीक करने वाली क्यों हो जाती है?''
नहूर ने अपने चेहरे पर नकली गंभीरता लाते हुए कहा:
'' आप जानते हैं अब्दुल्लाह! शिर्क करने वालों का अंजाम जहन्नम है. इसलिए आगे से आप शाहिस्ता के सामने ऐसी शरीक करने वाली बात मत करयेगा वरना आपकी खैर नहीं.''
सालेह ने बातचीत में हस्तक्षेप करते हुए कहा:
'' शाहिस्ता! आप इत्मीनान रखें. यह व्यवहारिक रूप एक ही के कायल हैं. इनकी एक ही बेगम हैं.''
इस पर नहूर मुस्कुराते हुए बोले:
'' यह इनका कारनामा नहीं, इनके जमाने में मजबूरी थी. खैर छोड़ें इसे. ये बताइये कि आपकी बेगम साहिबा हैं कहां?''
मैं अभी भी गंभीर होने के लिए तैयार नहीं था. मैंने उनकी ओर शरारत भरे अंदाज में देखते हुए कहा:
' हमें कुछ दूसरों बुजुर्गों की तरह बीवियों के साथ घूमने की फुर्सत नहीं है.'
'' लेकिन दूसरों की फुर्सत को नज़र लगाने की फुर्सत ज़रूर है.'' नहूर ने उसी लैब व लहजे में जवाब दिया.
'हम खुश होने वाले लोग हैं, नज़र लगाने वाले कभी नहीं.'
''मगर आपने मुझे तो नज़र लगा दी है.'' फिर व्याख्या करते हुए बोले:
''मेरे पैग़म्बर यर्मियाह नबी को गवाही देने के लिए बुला लिया गया है. क्योंकि मैं उनका करीबी साथी था, इसलिए मेरा वहां मौजूद होना ज़रूरी है.''
यह आखरी बात कहते हुए उनके चेहरे पर गंभीरता आ गई थी.
'' आप जा रहे हैं?'' शाहिस्ता ने पूछा.
'' हाँ. तुम अपने घर वालों के पास चली जाओ. कुछ देर तक इन मामलों में व्यस्त रहूंगा. अब्दुल्लाह ने मुझे नज़र जो लगा दी है.''
यह कहकर वह फरिश्तों के साथ रवाना हो गए जो उन्हें लेने आए थे.
' सारे नबी तो अपनी उम्मतों पर गवाही दे चुके. यह यर्मियाह नबी की गवाही किस चीज़ की हो रही है?' मैंने सालेह की ओर देखते हुए पूछा.
'' जिन मुजरिमों ने उनके साथ ज़ुल्म किया था, उन्हें भी उनके अंजाम तक पहुंचना है. यह गवाही इस संबंध में है.''
सालेह ने जवाब दिया. फिर हम दोनों भी हष्र की ओर रवाना हो गए.
...............
अर्श के सामने यर्मियाह के ज़माने के सभी यहूदी जमा थे. उनका समय यहूदी इतिहास का एक महत्वपूर्ण दौर था. यहूद या बनी इस्राइल हज़रत इब्राहीम के छोटे बेटे हज़रत इसहाक़ और उनके बेटे याकूब की सन्तान में से थे. हज़रत याकूब जिन का उपनाम इस्राइल था उनके बारह बेटे थे. उन्हीं की संतान को बनी इस्राइल कहा गया. इन बारह बेटों में सबसे मशहूर हज़रत यूसुफ थे. हज़रत याकूब और उनके बारह बेटे फ़िलिस्तीन में बसे थे. मगर हज़रत यूसुफ के जमाने में यह सब मिस्र चले गए. कई सदियों तक मिस्र में रहे उनकी संख्या लाखों तक पहुंच गई.
हज़रत मूसा की पैदाइश के समय फ़िरऔन ने यहूद्यों को गुलाम बना रखा था. खुदा ने हज़रत मूसा के द्वारा लोगों को फ़िरऔन के ज़ुल्मों सितम से आज़ादी दी और लोगों को एक उम्मत बनाया. किताब और शरीयत (खुदाई क़ानून) उन पर नाज़िल हुई. लेकिन सदियों की गुलामी ने उनमें कायरता, शिर्क और अन्य नैतिक गड़बड़ियां पैदा कर दी थीं. इसलिए उन लोगों ने अल्लाह के हुक्म के बावजूद फ़िलिस्तीन को वहां मौजूद शिर्क करने वालों से जिहाद करके जीतने से इनकार कर दिया. बाद में हज़रत मूसा के उत्तराधिकारी यूशा बिन नून (अ) के ज़माने में फ़िलिस्तीन पर जीत हुई और यह लोग वहाँ आबाद हो गए.
इसके बाद हज़रत दाऊद और हज़रत सुलैमान (अ) के ज़माने में अल्लाह तआला ने उनको एक जबर्दस्त हुकूमत दी जिसकी शोहरत दुनिया भर में थी. मगर उसके बाद में नैतिक पतन आया और हर तरह की नैतिक त्रुटियाँ और शिर्क उन में फैल गया. उन्हें पैगम्बरों ने बहुत समझाया लेकिन यह बाज नहीं आए. नतीजतन उन पर हार थोप दी गई. आसपास के राज्यों ने उन पर हमले पर हमले करके उनके साम्राज्य को बहुत कमजोर कर दिया.
जब हज़रत यर्मियाह आए यहूदी उस दौर की महान महाशक्ति इराक और उसके राजा बख्त नस्र की तलवार के नीचे थे. इस दौर में बनी इसराइल का नैतिक पतन अपनी अंतिम सीमाओं को छू रहा था. उन में शिर्क आम था. व्यभिचार मामूली बात थी. अपने ही धर्म के लोग के साथ अन्याय का मामला करते. ब्याज ख़ोरी और गुलामी की लानतें आम थीं. एक तरफ नैतिक पस्ती का यह आलम था और दूसरी तरफ राजनीतिक उमंगें अपने चरम पर थी. हर तरफ बख्त नस्र के खिलाफ नफरत का तूफान उठाया जा रहा था. उनके धार्मिक और राजनीतिक नेताओं का सारा ध्यान इस बात की ओर था कि राजनीतिक हार से छुटकारा मिल जाए. कौम में सुधार, नैतिक निर्माण, ईमान की ताक़त जैसी चीजें कहीं बहस में भी न थीं. धर्म के नाम पर हत्यारों का जोर था. ईमान और नैतिकता और नेकी की कोई कीमत न थी.
ऐसे में हज़रत यर्मियाह उठे और उन्होंने पूरी ताकत के साथ ईमान और अच्छे अख़लाक़ (नेतिकता) की सदा बुलंद की. उन्होंने धार्मिक गुरुओं और नेताओं की उनके रवय्ये पर आलोचना की. उनकी अख्लाकी (नैतिक) कमज़ोरियों, शिर्क और दुसरे गुनाहों पर उन्हें चेतावनी दी. साथ ही आपने अपनी कौम को सख्ती से यह चेता दिया कि वह बख्त नस्र के खिलाफ विद्रोह का ख्याल अपने मन से निकाल दें. उन्हें समझाया कि जज़्बात में आकर उन्होंने अगर यह कदम उठाया तो बख्त नस्र कहर इलाही बन कर उनके ऊपर नाज़िल हो जाएगा. मगर उनकी जनता बाज़ न आई. उन्होंने उन्हें कुएं में उल्टा लटका दिया और फिर जेल में डाल दिया. इसके साथ ही उन्होंने बख्त नस्र के खिलाफ विद्रोह कर दिया. जिसके नतीजे में बख्त नस्र ने हमला किया. छह लाख यहूदियों को उसने मार डाला और छह लाख को गुलाम बनाकर अपने साथ ले गया. येरुशलम की ईंट से ईंट बजादी गई. पूरा शहर धूल और खून में बदल गया. कुरआन ने इस घटना का वर्णन किया और बताया कि हमलावर लोग दरअसल कहर इलाही थे क्योंकि इस्राइलियों ने ज़मीन पर फसाद मचा रखा था.
मैं इसी सोच में था कि सालेह ने शायद मेरे ख्याल पढ़ कर कहा:
''ठीक यही काम तुम्हारे ज़माने में तुम्हारी कौम कर रही थी. वह इल्म (ज्ञान), शिक्षा, ईमान, अख़लाक़ (नैतिकता) में पस्ती का शिकार थी, लेकिन उसके तथाकथित नेता उसे यही समझाते रहे कि सारी परेशानी समय की सुपर पावर और उसकी चालों (षड्यंत्रों) की वजह से है. ईमान और अख्लाकी सुधार के बजाय ताक़त और सत्ता ही को उनकी मंजिल बनाने में लगे रहे. मिलावट, भ्रष्टाचार, नाजाइज़ मुनाफा ख़ोरी, दोगला पन और शिर्क लोगों की मूल समस्या थी. नबुव्वत खत्म हो जाने के बाद उनकी जिम्मेदारी थी कि वह दुनिया भर में इस्लाम का पैगाम (संदेश) पहुंचाते, लेकिन उन लोगों ने कौम में सुधार और गैर मुसलमानों को इस्लाम का पैगाम पहुंचाने के बजाय गैर मुस्लिमों से नफरत को तरीका बना लिया. उनके खिलाफ जंग और जदल का मोर्चा खोल दिया. ठीक उसी तरह जैसे यहूदीयों ने अपना सुधार करने के बजाय बख्त नस्र के खिलाफ मोर्चा खोला था. इसलिए बनी इस्राइल की तरह उन्होंने भी इस तरीके का बुरा नतीजा भुगत लिया.''
इसी बीच में ऐलान हुआ:
'' यर्मियाह को पेश किया जाए.''
थोड़ी देर में यर्मियाह कुछ फरिश्तों के साथ तशरीफ़ लाए. वह अर्श के सामने खड़े हो गए. लेकिन उन्होंने कुछ कहा नहीं.
सालेह ने कहा:
'' अल्लाह अपने नबी का मुक़दमा खुद पेश करेंगे.''
सालेह ने ये शब्द कहे ही थे कि आसमान पर एक फिल्म सी चलने लगी. और सभी निगाहें इन मंज़रों (दृश्यों) को देखने के लिए ऊपर की ओर उठ गईं.
...............
यह एक महान तबाही का मंजर था. हर तरफ आग भड़क रही थी. आग की लपटों का नाच चल रहा था. जलते हुए घर और संपत्ति से उठने वाले काले धुंए आसमान को छू रहे थे. वातावरण में आहें, चीखें और सिसकियाँ बुलंद हो रही थीं. ज़मीन मासूमों और मुजरिमों के खून से रंगीन थी. इंसानों को बुरी तरह मारा जा रहा था. घरों को लूटा जा रहा था. औरतों की गली कूचों में इज्ज़त लूटी जा रही थी. येरुशलम की गलियों में हर तरफ इराक के राजा बख्त नस्र के सैनिक दनदनाते हुए फिर रहे थे. उनके सामने एक ही मक़सद था. यहूद्यों के पाक (पवित्र) शहर और उसके वासियों को तबाह करके रख दें.
इस अराजकता और हंगामे में कुछ सिपाही एक कमांडर के साथ घोड़ों पर सवार तेजी से एक दिशा में बढ़े जा रहे थे. शहर के कोने में बने जेल खाने के पास पहुंचकर वे रुके और अपने घोड़ों से उतर कर खड़े हो गए. उनका कमांडर आगे बढ़ा और जेल खाने में कैदियों की ओर देखते हुए पुकारा:
'' तुम में से यर्मियाह कौन है?''
उसकी बात का कोई जवाब नहीं आया, लेकिन सभी कैदियों की नज़रें एक पिंजरे की ओर उठ गईं जहां एक कैदी को पिंजरे में बहुत बेरहमी से रस्सियों से जकड़ कर रखा गया था. कमांडर को अपने सवाल का जवाब मिल गया था. उसने सिपाहियों की ओर देखा. वह तेजी से आगे बढ़े. पिंजरे को खोला और यर्मियाह को रस्सियों की कैद से रिहाई दिलाई. वह इतने निढाल थे कि ज़मीन पर गिर पड़े. कमांडर उन की ओर बढ़ा और उनके सामने जाकर खड़ा हो गया और नरमी से पुकार कर कहा:
'' यर्मियाह! तुम ठीक तो हो.''
कैदी ने धीरे से आंखें खोलीं. मगर ज्यादा कमजोरी से उनकी आँखें फिर बंद हो गईं. कमांडर ने उनकी ओर देखते हुए गर्व के साथ कहा:
'' यर्मियाह तुम्हारी भविष्यवाणी पूरी हो गई. हमारे राजा बख्त नस्र शाह इराक ने येरुशलम की ईंट से ईंट बजादी. आधी आबादी मौत के घाट उतारी जा चुकी है और आधी आबादी को हम गुलाम बनाकर अपने साथ ले जा रहे हैं. मगर तुम्हारे लिए राजा का विशेष आदेश है कि तुम्हें कोई नुकसान न पहुंचे. तुम एक सच्चे आदमी हो. तुमने अपनी क़ौम को बहुत समझाया, लेकिन वह बाज नहीं आए और उन्होंने उनकी सजा भुगत ली.''
यह कहकर वह पीछे मुड़ा और सिपाहियों को आदेश दिया:
''यर्मियाह को छोड़ कर बाकी सब कैदियों को क़त्ल कर दो. इसके बाद इस शहर के आदमियों के लहू से अपनी प्यास बुझाओ और इन की औरतों से अपने खून की गर्मी को ठंडा करो. जो चीज़ हाथ आए उसे लूट लो और जो बाकी बचे उसे आग लगा दो.''
कैदियों को क़त्ल कर दिया गया और सिपाही लूटमार के लिए दूसरी दिशाओं में निकल गए. यर्मियाह अपने शरीर की पूरी ताक़त समेट कर उठे और पिंजरे की दीवार का सहारा लेकर बैठ गए. उनकी आंखों के सामने उनका शहर जल रहा था. उनके शरीर का जोड़ जोड़ दुःख रहा था, लेकिन उससे कहीं ज्यादा दर्द उन्हें अपनी क़ौम की बर्बादी का था.
फिर स्क्रीन पर उनकी ज़िन्दगी और उनके दौर के कई मंज़र एक एक करके सामने आने लगे. वह कौम के नेता और जनता को समझा रहे थे. लेकिन उनकी बात कोई नहीं सुन रहा था. उनकी कौम इराक के राजा और जबर्दस्त शासक बख्त नस्र के अधीन थी. वार्षिक कर (टैक्स) बख्त नस्र को भेजना ही उनके अपने देश में ज़िन्दा रहने की वजह थी. इस गुलामी की वजह वो अख्लाकी पस्ती (नैतिक पतन) थी जो कौम की रग रग में समां गयी थी. तौहीद (एक ईश्वर) को मानने वालों में शिर्क आम था. बलात्कार और किमार बाज़ी सामान्य थी. बददयानती और अपने लोगों पर गुल्म का चलन था. झूठी कसमें खाकर माल बेचना और पड़ोसियों पर ज़ुल्म करना उनका नियम था. वे भारी ब्याज पर क़र्ज़ देते. जो कर्जदार कर्ज अदा न कर पाता उसके परिवार को गुलाम बना लेते. आलिम (ज्ञानी) लोग लोगों में सुधार करने के बजाय उन्हें राष्ट्रीय गर्व से ग्रस्त किए हुए थे. ईमान, अख्लाक और शरीयत के बजाय जानवरों की क़ुरबानी ही को असल धर्म समझ लिया गया था. उनके नेता क्रूर और रिश्वत खोर थे. इन्साफ के बजाय ऐश परस्ती का चलन था. लेकिन पूरी कौम इस बात पर जमा थी कि हमें बख्त नस्र की गुलामी से निकल कर विद्रोह कर देना चाहिए. सच्चाई यह थी कि उन पर खुदा का अज़ाब था, मगर उन्हें यह बताने के बजाय राष्ट्रीय गर्व और सुलैमान और दाऊद की महानता पाने के सपने दिखाए जा रहे थे. उन्हें सुपर पावर बन्ने की दुहाई दी जा रही थी हालांकि वह ईमान व अख्लाक से दूरी का शिकार थे.
फिर स्क्रीन पर वह मंज़र सामने आया जब यर्मियाह पर 'वही' (खुदा का पैगाम) आई कि अपनी कौम में सुधार करो. उन्हें सियासत से निकालकर हिदायत की तरफ लाओ. एक बार सच्ची खुदा परस्ती पैदा हो गई तो सियासत में भी तुमको कामयाबी मिलेगी. उन्हें हुक्म था कि वह शादी करके घर बसाने के बजाय कौम को आने वाली तबाही से खबरदार करें. मगर जब यर्मियाह यह पैगाम (संदेश) लेकर उठे तो हर तरफ से विरोध शुरू हो गया. परमेश्वर के इस नबी ने अपने ज़माने के आम लोग, ख़ास लोग, धार्मिक गुरु और नेता सब को पुकारा, लेकिन गिनती के कुछ लोगों को छोड़कर किसी ने उनकी बात नहीं सुनी. उनकी दावत बिल्कुल आसान थी. बख्त नस्र से टकराने के बजाय अपने ईमान और अख्लाक में सुधार करो.
स्क्रीन पर सबसे नाटकीय सीन वह था जब यर्मियाह राजा के दरबार में लकड़ी का जुआ (हल का वह हिस्सा जो जानवरों को खेत जोतने के लिए उनके गले पर डाला जाता है) पहनकर पहुंचे थे. यह उन लोगों को समझाने की आखरी कोशिश थी कि इस समय तुम पर लकड़ी का जुआ डला हुआ है उसे तोड़ने की कोशिश करोगे तो लोहे के जुए में जकड़ दिए जाओगे. मगर दरबारयों और आलिमों ने उन्हें बख्त नस्र का एजेंट करार दे दिया. बादशाह ने आगे बढ़कर लकड़ी का जुआ तलवार से काट डाला. इसके साथ ही तय हो गया. अब उनके गले में लोहे की बेड़ियाँ डाली जाएंगी.
अल्लाह के इस नबी को बख्त नस्र का एजेंट करार देकर सज़ा ते तौर पर पहले कुएं में उल्टा लटकाया गया और फिर एक पिंजरे में बांध दिया गया. बख्त नस्र के ख़िलाफ़ बग़ावत कर दी गई. जवाब में बख्त नस्र अज़ाब इलाही बनकर टूट पड़ा. फिर स्क्रीन पर वही पहला मंज़र आ गया जब अज़ाब की बारिश से येरुशलम नहा रहा था. यर्मियाह ने आँखें खोल कर आसपास पड़ी बे कफ़न लाशों और चारों ओर फैली तबाही पर एक नज़र डाली और ऊँची आवाज़ से कहा:
मैंने तुम लोगों को कितना समझाया. मगर तुमने सियासी सौदे बाजों और सम्परदाइक जाहिल धार्मिक जुरुओं की बातों को माना. तुम समाज के अच्छे बुरे और खुदा के हुक्मों से बेपरवाह होकर जीवन गुज़ारते रहे. आखिरकार उसकी सज़ा सामने आ गई.
फिर यर्मियाह ने आसमान की ओर नज़र उठाई और धीरे से बोले:
'' पूरे इन्साफ का दिन आएगा. ज़रूर आएगा. लेकिन कुछ इंतजार के बाद.''
............................................................................................................जारी है....
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें