खुदा के लोगों को पकड़ने में और फैसले करने में कुछ अजीब और कल्पना से बाहर की बातें सामने आ रही थीं. दुनिया में होने वालीं साजिशों, मशहूर लोगों की हत्या, घरेलू, दफ्तरी, राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर होने वाली घटनाओं के पीछे जिन जिन का हाथ था, और उन मुद्दों में शामिल लोग, गुप्त बैठकों की दास्तान, बंद कमरों की कानाफूसी, हर हर चीज़ आज के दिन खुल रही थी. इज्जतदार बेईज्ज़त हो रहे थे, शरीफ समझे जाने वाले लोग बदकार निकल रहे थे, मासूम समझे हुए गुनाहगार साबित हो रहे थे. लोग जीवन भर जिस ईश्वर को भूल कर जीते रहे, वह उनके हर पल का गवाह था. कोई शब्द नहीं था जो रिकॉर्ड न हो और कोई नियत और विचार ऐसा न था जो उसके इल्म (ज्ञान) में न आया हो. राई के दाने के बराबर भी किसी का कोई अच्छा बुरा काम न था जो किया गया हो और उस को एक किताब में नहीं लिखा गया. और आज के दिन यह सब कुछ सब लोगों के सामने इस तरह खोल दिया गया था कि हर इंसान जैसे बिल्कुल बेपर्दा खड़ा हुआ था.
मैं यह सब कुछ सोच रहा था और मन ही मन में डर रहा था कि मेरी गलतियाँ और भूल चूक आज सामने आ गई तो क्या होगा? कोई सज़ा न भी मिले, इंसान को सिर्फ बेपर्दा ही कर दिया जाए, यही आज के दिन की सबसे बड़ी सज़ा बन जाएगी. सालेह ने शायद मेरे ख्यालों को पढ़ लिया था. वह मेरी पीठ थपथपाते हुए बोला:
'' परवरदिगार आलम की करीम हस्ती आज नेक बन्दों को रुसवा नहीं करेगी. उसकी करम नवाजी अपने नेक बन्दों की इस तरह पर्दापोशी करेगी कि उनकी कोई खता, कोई गुनाह और भूल लोगों के सामने नहीं आएगी. तुम बेफ्रिक रहो. ख़ुदा से ज्यादा आला ज़र्फ़ हस्ती तुम किसी और की न देखोगे.''
' बेशक. मगर इस समय तो मैं खुदा की पकड़ देख रहा हूँ. इस तरह के जहन्नम की सजा सुनाने से पहले लोगों के चेहरे से शराफत और मासूमियत का नक़ाब नोच कर फेंका जाता है और फिर उनको अज़ाब की भेंट चढ़ा दिया जाता है.' मैंने डर के लहजे में जवाब दिया.
सालेह ने मुझे इत्मीनान दिलाते हुए कहा:
'' यह सिर्फ मुजरिमों के साथ हो रहा है. जिस्मानी तकलीफ से पहले उन्हें बेईज्ज़ती की मानसिक तकलीफ दी जाती है. नेक लोगों के साथ यह हरगिज़ नहीं होगा.''
हम बात कर ही रहे थे कि एक और आदमी को बारगाहे इलाही में पेश किया गया. उसने पेश होते ही बारगाहे इलाही में कहा:
'' परवरदिगार! मैं बहुत गरीब परिवार में पैदा हुआ था. बचपन बहुत गरीबी में बीता. जवानी में मुझसे कुछ गलतियां हो गईं थीं, लेकिन तू मुझे माफ़ करदे.''
फरिश्ते से पूछा गया:
'' क्या वाकई उसे मैंने गरीबी से आजमाया था?
फरिश्ते ने बड़े अदब से कहा:
'' मालिक! यह ठीक कहता है, लेकिन जिन्हें यह गलती कह रहा है वह इसके बहुत बड़े जुर्म हैं. यह जेब कतरा बन गया था. कुछ रुपए, नकदी और मोबाइल जैसी मामूली चीज़ें छीनने के लिए कई लोगों को मार डाला और कई लोगों को घायल किया था.''
'' अच्छा!'' अर्श के मालिक ने कहा.
इस 'अच्छा' में जो गजब था, उसमे इस आदमी का अंजाम साफ हो गया था. फिर कहर इलाही भड़क उठा:
''ऐ बदबख्त आदमी! मैंने तुझे गरीब तो पैदा किया था लेकिन अच्छी जिस्मानी सेहत और ताकत से यह मौका दिया था कि तू ज़िन्दगी में तरक्की की कोशिश करता. यह करता तो मैं तुझे माल देता. क्योंकि तुझे इतना ही मिलना था जो तेरे लिए मुक़द्दर था. पर तुने इस खाने को खून बहाकर और ज़ुल्म करके हांसिल किया. आज तेरा बदला यह है कि हर वो आदमी जिसे तूने क़त्ल किया और जिस पर ज़ुल्म किया, उनके गुनाहों का बोझ भी तुझे उठाना होगा. तेरे लिए हमेशा की जहन्नम का फैंसला है. तुझ पर लानत है. तेरे लिए ख़त्म न होने वाला दर्दनाक अज़ाब है.''
यह शब्द पूरे हुए ही थे कि फ़रिश्ते तीर की तरह उसकी ओर लपके और बहुत बेदर्दी से मारते पीटते और घसीटते हुए उसे जहन्नम की ओर ले गए.
...............
अगली बार जिसे हिसाब के लिए पेश किया गया उसे देख कर मेरी अपनी हालत खराब हो गई. यह कोई और नहीं मेरी बेटी लैला की सहेली आसमा थी. उसकी हालत पहले से भी ज्यादा बदतर थी. उसे बारगाहे इलाही में पेश किया गया.
पहला सवाल हुआ:
'' पांच वक्त की नमाज पढ़ी या नहीं?''
इसके जवाब में वह बिल्कुल चुप खड़ी रही. फिर कहा:
'' क्या तू मजबूर थी? क्या तू खुदा को नहीं मानती थी? क्या तू खुद को ईश्वर समझती थी? क्या तेरे पास हमारे लिए समय नहीं था? या हमारे सिवा कोई और था जिसने तुझे दुनिया भर की चीज़े दी थी?''
आसमा को अपनी सफाई में पेश करने के लिए शब्द नहीं मिल रहे थे.
उसकी जगह फरिश्ते ने कहा:
'' मालिक! यह कहती थी कि खुदा को हमारी नमाज़ की जरूरत नहीं है.''
'' खूब! इसने ठीक कहा था. लेकिन अब इसे यह मालूम हो गया होगा कि नमाज़ की ज़रूरत हमें नहीं खुद इसको थी. नमाज़ जन्नत की चाबी है. इसके बिना कोई जन्नत में कैसे जा सकता है.''
इसके बाद आसमा से अगले सवाल शुरू हुए. ज़िन्दगी किन कामों में गुज़री? जवानी कैसे गुज़री? माल कहां से कमाया कैसे खर्च किया? इल्म (ज्ञान) कितना हांसिल किया फिर उस पर कितना अमल किया? जकात, इंसानों की मदद, रोज़ा, हज. यह और इन जैसे और सवाल एक के बाद एक किए जाते रहे. मगर हर सवाल उसकी रुवाई और अपमान को बढ़ाता रहा.
आखिरकार आसमा चीखें मार कर रोने लगी. वह कहने लगी:
'' परवरदिगार! मैं आज के दिन से बेपरवाह रही. सारी ज़िन्दगी जानवरों की तरह बिताई. उम्र भर दौलत, फैशन, दोस्तों, रिश्तों और मज़ों में रही. तेरी अजमत (महिमा) और इस दिन की मुलाकात को भूली रही. मेरे रब मुझे माफ़ करदे. बस एक बार मुझे फिर दुनिया में भेज दे. फिर देख मैं सारी ज़िंदगी तेरी इबादत करूंगी. कभी नाफ़रमानी नहीं करूंगी. बस मुझे एक मौका और दे दे.'' यह कहकर वह ज़मीन पर गिर कर तड़पने लगी.
''मैं तुम्हें फिर दुनिया में भेज भी दूँ तब भी तुम वही करोगी. अगर तुम्हें और मौका दे भी दूँ तब भी तुम्हारे व्यवहार में बदलाव नहीं आएगा. मैंने अपना पैगाम (संदेश) तुम तक पहुंचा दिया था. मगर तुम्हारी आंखों पर पट्टी बंधी रही. तुम अंधी बनी रही. इसलिए आज तुम जहन्नम के अन्धेरे गड्ढे में फेंकी जाओगी. तुम्हारे लिए न कोई माफी है और न दूसरा मौका.''
फिर उसके के साथ भी वही कुछ हुआ जो इससे पहले लोगों के साथ हो चुका था.
...............
आसमा का अंजाम देखकर मेरी हालत खराब हो गई थी. मेरे मन में यह डर पूरी तरह जम गया था कि अगर इसी तरह मेरे बेटे जमशैद के साथ हुआ तो यह मंज़र (दृश्य) मैं देख नहीं सकूँगा. मैंने सालेह से कहा:
'मैं अब यहाँ और ठहरने की हिम्मत नहीं जुटा पारहा. मुझे यहां से ले चलो.'
सालेह मेरी हालत को समझ रहा था. वह बिना कोई सवाल किए मेरा हाथ पकड़े एक ओर रवाना हो गया. रास्ते में जगह जगह बहुत भयानक मंज़र थे. अनगिनत सदियों तक हष्र के मैदान की सख्तियों को झेल कर और कड़े माहोल के थपेड़ों ने लोगों की हालत को बद से बदहाल कर दिया था. दौलत मंद, ताकत वर, अकल्मन्द, हसीन, सत्ता के मालिक और हर तरह की क्षमता के लोग इस मैदान में हाँफते फिर रहे थे. उनके पास दुनिया में सब कुछ था. बस ईमान (खुदा के होने का यकीन) और नेक काम का भंडार नहीं था. यह सब कुछ पाए हुए लोग आज सबसे ज्यादा महरूम (वंचित) थे. यह खुश हाल लोग आज सबसे ज्यादा दुखी थे. हजारों साल से यह परेशान लोग मौत की दुआएं करते, रहम की उम्मीद बांधे, कोई सिफारिश ढूंढते हुए परेशान हाल घूम रहे थे. कहीं अज़ाब के फरिश्तों से मार खाते, कहीं भूख और प्यास से निढाल होते, कहीं धूप की शिद्दत (तेज़ी) से बेहाल होते, वे छुटकारा पाने के लिए कुछ भी करने को तैयार थे. अपनी ओलादों को अपने बीवी बच्चों को अपनी सारी दौलत को, सारी इंसानियत को भी बदले में दे कर आज के दिन की पकड़ से बचना चाहते थे. लेकिन यह मुमकिन नहीं था. वह समय तो गुज़र गया था जब कुछ रुपये खर्च करके, कुछ समय देकर जन्नत की नेमतों को हांसिल करना मुमकिन था. ये लोग सारी ज़िन्दगी, कैरियर, बच्चों और जाएदाद पर इन्वैस्ट करते रहे. काश ये लोग आज के दिन के लिए भी इन्वैस्ट कर लेते तो इस हाल को न पहुंचते.
मैदान में बार बार लोगों का नाम पुकारा जाता. जिसका नाम लिया जाता दो फरिश्ते तेजी से उसकी ओर झपटते और उसको लेकर खुदा के सामने पेश करते. लगता था कि फरिश्ते लगातार अपने शिकार पर नजर रखे हुए हैं और लाखों करोड़ों की इस भीड़ में बिना देर किये उस अपने बुलाए हुए आदमी को खोज लेते हैं. मेरी भी खोजी निगाहें मन ही मन जमशैद को खोज रही थीं. मगर वह मुझे कहीं नज़र नहीं आया. सालेह मेरी स्थिति को भांप कर बोला:
''मैं जान बूझ कर तुम्हें उसके पास नहीं ले जा रहा. उसकी पत्नी, बच्चे, सास, ससुर सबके लिए पहले ही जहन्नम का फैसला सुनाया जा चुका है और कुछ नहीं पता कि उसका क्या अंजाम होगा. बेहतर है कि तुम उससे न मिलो. यहाँ तक कि खुदा खुद कोई फैसला करें.''
उसकी बात सुनकर होना तो यह चाहिए था कि मेरी हालत बहुत उदास और दुखी हो. लेकिन न जाने क्यों मेरे दिल में एक एहसास पैदा हुआ. मैं सालेह से कहने लगा:
'मेरे रब का जो फैसला होगा वह मुझे मंज़ूर है. मैं अपने बेटे से जितना प्यार करता हूँ मेरा मालिक मेरा अनदाता इससे हजारों गुना ज्यादा अपने बन्दों से प्यार करता है. बल्कि सारे जीव अपने बच्चों को जितना चाहते हैं, मेरा प्रभु उससे बढ़ कर अपने बन्दों पे प्यार बरसाने वाला है. जमशैद की माफी की अगर एक प्रतिशत भी गुंजाइश है तो यकीनन उसे माफ कर दिया जाएगा. और अगर वह किसी भी तरह माफ़ करने लायक नहीं तो रब के ऐसे किसी मुजरिम से मुझे कोई सहानुभूति नहीं. चाहे वह मेरा अपना बेटा ही क्यों न हो.''
मेरी बात सुनकर सालेह मुस्कराया और बोला:
'' तुम भी बहुत अजीब हो. इतने अजीब हो कि बस...''
' नहीं अजीब मैं नहीं मेरा रब है. उसने मेरे दिल पर सुकून नाज़िल कर दिया है. अब मुझे किसी की कोई परवाह नहीं. वैसे हम जा कहाँ रहे हैं?'
'' यह हुई ना बात. अब तुम लौटे हो. अब तुम फिर एक बाप से अब्दुल्लाह बने हो. लेकिन मैं तुम्हें यह बता दूं कि अभी भी लोगों की निजात (मुक्ति) की उम्मीद है. खुदा हष्र के मैदान की इस सख्ती को कई लोगों के गुनाहों की माफ़ी का कारण बना कर उनके नेक कामों के आधार पर उन्हें माफ़ कर रहे हैं. तुम ने इत्तिफाक से सभी तरह के मुजरिमों का हिसाब किताब होते देख लिया, लेकिन कुछ लोगों को अभी भी माफ किया जा रहा है. इसलिए कि खुदा के इन्साफ में सच्ची नेकी कभी बेकार नहीं जाती.''
मैंने सालेह की बात के जवाब में कहा:
' बेशक मेरा रब बड़ा सराहने वाला है, मगर हम कहाँ जा रहे हैं?'
''हम असल में जहन्नम (नरक) की ओर जा रहे हैं. मैं तुम्हें अब जहन्नम वालों से मिलवाना चाह रहा हूँ.''
' तो क्या हम जहन्नम में जाएंगे?'
'' नहीं नहीं. यह बात नहीं. इस समय जहन्नम वालों को जहन्नम के पास पहुंचा दिया गया है. यह जो तुम मैदान देख रहे हो इसमें बाएँ हाथ की ओर एक रास्ता धीरे धीरे गहरा होकर खाई का रूप ले लेता है. जहन्नम के सातों दरवाजे इसी खाई से निकलते हैं. जैसा कि तुमने कुरान में पढ़ा है कि सात दरवाजों में सात अलग अलग प्रकार के अपराधी दाखिल (प्रवेश) किए जाएंगे.''
सालेह मुझे यह विवरण बता रहा था कि मैंने महसूस किया कि मैदान में नीचे की ओर एक रास्ता उतर रहा था. हम उस रास्ते पर नहीं गए बल्कि उसके साथ जो ऊँची ज़मीन थी उस पर चलते रहे. थोड़ी देर चलने के बाद यह नीचे वाला रास्ता खाई के रूप में बदल गया. हम ऊपर ही थे जहां से हमें नीचे का मंज़र (दृश्य) बिल्कुल साफ नजर आ रहा था. इस रास्ते पर जगह जगह फरिश्ते तैनात थे जो मुजरिमों को मारते घसीटते हुए ला रहे थे.
थोड़ा आगे जाकर इस छोटे रास्ते या खाई पर रश बढ़ने लगा. यहाँ खवे से खवा छिल रहा था. डरावने और बदशकल मर्द और औरत इस जगह ठसे पड़े थे. यह वो ज़ालिम, क्रूर और मुजरिम लोग थे जिनके फैंसले का ऐलान हो चूका था. जहन्नम में दाखिले (प्रवेश) से पहले उन्हें जानवरों की तरह एक जगह ठूंसा गया था.
समय समय पर जहन्नम के शोले भड़कते और उनकी लो आसमान तक उठती दिखाई देती थी. उनके असर से यहां का सारा आसमान लाल हो रहा था. जबकि उनके दहकने की आवाज़ उन मुजरिमों के दिलों को दहला रही थी. कभी कभी कोई चिंगारी जो किसी बड़े महल जितनी विशाल होती इस खाई में जा गिरती जिससे भारी हलचल मच जाती. लोग आग के गोले से बचने के लिए एक दूसरे को कुचलते और फलाँगते हुए भागते. ऐसा ज्यादातर तब होता जब कुछ बड़े मुजरिम इस गिरोह की तरफ लाए जाते तो आग का यह गोला उनका स्वागत करने आता. जिसकी वजह से उन लोगों की दर्द और तकलीफ और बढ़ जाती थी.
सालेह ने एक ओर इशारा करके मुझसे कहा:
'' वहां देखो.''
जैसे ही मैंने इस दिशा में देखा तो मुझे वहां की सारी आवाज़ें साफ सुनाई देने लगी. कुछ लीडर और उनके पैरोकार थे जो आपस में झगड़ रहे थे. पैरोकार अपने लीडरों से कह रहे थे कि हमने तुम्हारे कहने पर हक़ (सच्चाई) का विरोध किया था. तुम कहते थे कि हमारी बात मानो तुम्हें अगर कोई अज़ाब होगा तो हम बचालेंगे. क्या आज हमारे हिस्से का कुछ अज़ाब तुम उठा सकते हो या कम से कम इससे निकलने का कोई रास्ता ही बता दो? तुम तो बड़े बुद्धिमान और हर समस्या का हल निकाल लेने वाले लोग थे.
वह लीडर जवाब देते: अगर हमें कोई रास्ता मालूम होता तो पहले हम खुद न बचते. वैसे हमने तो तुमसे नहीं कहा था कि जो हम कहें वह ज़रूर मानो. हमने जबरदस्ती तो नहीं की थी. हमारे रास्ते पर चलने में तुम्हारे अपने हित थे. अब तो हम सब को मिलकर इस अज़ाब को भुगतना होगा. पर इस पर पैरोकार कहते ऐ खुदा हमारे इन गुरुओं ने हम को गुमराह किया. उन्हें दोगुना अज़ाब दे. पर वह लीडर गुस्से में आकर कहते कि हमें बद दुआ दे कर तुम्हारी अपनी हालत कौन सी अच्छी हो जानी है.
इस बात पर सालेह ने टिप्पणी की:
''इन सभी के लिए दोगुना अज़ाब होगा क्योंकि जो पैरोकार थे वो बाद वाले लोगों के गुरु बन गए और उन्होंने इसी तरह उनको गुमराह किया. देखो के उनके और ज्यादा पैरोकार आ रहे हैं.''
मैंने देखा तो वाकई भीड़ में धकम पेल शुरू हो गई क्योंकि कुछ और लोग उनकी ओर आए थे. वह लीडर बोले. इन कमबख्तों को भी यहीं आना था. पहले ही जगह इतनी कम है यह बदबू दार लोग और आ गए. नए आने वाले अपने इस बुरे स्वागत पर आपे से बाहर हो गए और एक नया झगड़ा शुरू हो गया. जो थोड़ी देर में मारपीट में बदल गया. जहन्नमी (नरक वाले) एक दूसरे को बुरा भला कहते, गालियां बकते आपस में गिरेबान पकड़ते. लातें घूँसे, धकम पेल और चीख और पुकार के इस माहौल में लोगों की जो हालत हो रही थी, जाहिर है मैं सिर्फ देख और सुन कर उसका अंदाजा नहीं लगा सकता था. लेकिन मुझे विश्वास था कि यह लोग अपनी दुनिया की ज़िन्दगी को याद करके ज़रूर रो रहे होंगे जिसमे उनके पास सारे मौके (अवसर) थे, लेकिन जन्नत की नेमत को छोड़कर उन्होंने अपने लिए जहन्नम की वहशत को पसंद कर लिया. कुछ दिन मज़ों, फ़ायदों, इच्छाओं और पक्षपात के लिए.
सालेह मुझसे कहने लगा:
'' अभी तो यह लोग जहन्नम में गए ही नहीं. वहां तो इससे कहीं बढ़कर अज़ाब होगा. उनके गले में गुलामी और अपमान की निशानी के रूप में तौक़ पड़ा होगा. पहनने के लिए गंधक और तारकोल के कपड़े मिलेंगे जो दूर से आग को पकड़ लेंगे. यह आग उनके चेहरे और शरीर को झुलसा देगी. वह यातना से तड़पते रहेंगे लेकिन कोई उनकी मदद को न आयेगा न उन पर तरस खाएगा. फिर उनकी झुलस गई त्वचा की जगह नई जिल्द पैदा होगी जिससे उन्हें बहुत खारिश होगी. यह अपने आप को खुजलाते खुजलाते लहू लुहान कर लेंगे, मगर खुजली कम नहीं होगी.
जब कभी उन्हें भूख लगेगी तो उन्हें खाने के लिए खारदार झाडियां और कडवे ज़हरीले थोहर के पेड़ के वह फल दिए जाएंगे जिन पर कांटे लगे होंगे. जबकि पीने के लिए गंदेले और बदबूदार पीप, खौलता पानी और खौलते तेल की तलछत होगी जो पेट में जाकर आग की तरह खौलेगा और प्यास का आलम यह है कि लोग उसे तौंस लगे ऊँट की तरह पीने पर मजबूर होंगे. वह पानी उनके पेट की अतड़यों को काटकर बाहर निकाल देगा.
जहन्नम में फरिश्ते उन्हें बड़े हथोड़ों से मारेंगे. जिससे उनका शरीर बुरी तरह घायल हो जाएगा. उनके घावों से लहू और पीप निकलेगी दूसरे मुजरिमों को पिलाई जाएगी. फिर उन्हें जंजीरों में बांधकर किसी तंग जगह पर डाल दिया जाएगा. वहां हर जगह से मौत आएगी लेकिन वह मरेंगे नहीं. उस समय उनके लिए सबसे बड़ी खुश खबरी मौत की खबर होगी मगर वहाँ उन्हें मौत नहीं आएगी. समय समय से सारे कष्ट वह हमेशा भुगदते रहेंगे.''
मैं यह सब सुनकर लरज़ा उठा. सालेह ने कहा:
'' जह्न्नमियों को जहन्नम में डालने से पहले यहाँ ऊपर लाया जाएगा और उन्हें जहन्नम के आसपास घुटनों के बल बिठा दिया जाएगा. इसलिए उनके लिए सबसे पहला अज़ाब यह होगा कि वह अपनी आँखों से सारे अज़ाब देख लेंगे. फिर समूह दर समूह जह्न्नमियों को जहन्नम की तंग और अँधेरी जगहों पर ले जाकर ठूंस दिया जाएगा और अज़ाब का वह सिलसिला शुरू होगा जो मैंने अभी बताया है.''
' तो क्या सारे मुजरिमों का यही अंजाम होगा?'
'' नहीं यह तो बड़े मुजरिमों के साथ होगा. दूसरों के साथ हल्का मामला होगा लेकिन यह हल्का अज़ाब भी बहरहाल बर्दाश्त से बहार का अज़ाब होगा.''
फिर उसने एक ओर इशारा किया. तो मैंने देखा कि वहाँ कुछ बहुत ज्यादा बदसूरत लोग हैं. सालेह एक एक करके मुझे बताने लगा कि उनमें से कौन किस रसूल का इनकार करने वाला और विरोधी था. मैंने खास तौर पर नमरूद और फ़िरऔन को देखा क्योंकि उनका ज़िक्र बहुत सुना था. उन्ही के साथ अबू जहल, अबू लहब और क़ुरैश के दुसरे सरदार भी मौजूद थे. इन सबकी हालत अविश्वसनीय हद तक बुरी हो चुकी थी. अपने समय के यह सरदार आज बदतरीन गुलामों से भी बुरी हालत में थे. उनका जुर्म यह था कि सच्चाई आखरी हद में उनके सामने आ चुकी थी लेकिन उन्होंने उसे क़ुबूल (स्वीकार) नहीं किया. ख़ुदा के मुकाबले में सरकशी की और और खुदा की मखलूक (प्राणी) पर ज़ुल्म व सितम का रास्ता अपनाया.
उस वक़्त सालेह ने मुझे एक अदभुद अनुभव कराया. उसके ध्यान दिलाने पर मैंने देखा कि इन सब के बीच में एक बहुत बड़ा देव नुमा आदमी खड़ा था. उसके शरीर से आग के शोले निकल रहे थे और पूरा शरीर जंजीरों से जकड़ा हुआ था. वह सबसे संबोधित होकर कह रहा था कि ''देखो खुदा ने तुम से जो वादा अपनी किताबों में किया था वह सच्चा था और जो वादे मैंने किए थे वे सब झूठे थे. आज मुझे बुरा भला न कहो. मैं तुम्हारे किसी काम का जुम्मेदार नहीं हूँ. मेरी कोई गलती नहीं है. मेरा तुम पर कोई अधिकार न था. तुमने जो किया अपनी मर्ज़ी से किया. अगर तुमने मेरी बात मानी तो इसमें मेरा क्या कुसूर (दोष). तुम लोग मुझे मत कोसो बल्कि खुद पर अफ़सोस करो. आज न मैं तुम्हारे लिए कुछ कर सकता हूँ और न तुम मेरे लिए कुछ कर सकते हो.''
मुझे उसकी बातों से अंदाज़ा हो गया कि यह बोलने वाला कौन हैं. मैंने अपने अनुमान की पुष्टि के लिए सालेह को देखा तो वह बोला:
'' तुम ठीक समझे. यह शैतान है. अल्लाह का सबसे बड़ा नाफरमान. आज सबसे बढ़कर अज़ाब भी उसी को होगा. लेकिन बाकी लोगों को भी उनके किए की सज़ा मिलेगी.''
मैं ऊपर खड़ा यह सारा मंज़र देख रहा था और मन ही मन में अपने महान रब का शुक्रिया कर रहा था जिसने मुझे शैतान के असर और धोखे से बचा लिया वरना ज़िन्दगी में कई बार इसने मुझे गुमराह करने की कोशिश की थी. लेकिन खुदा ने मुझे अपनी हिफाज़त में रखा. मेरी हमेशा यह आदत रही कि मैं शैतान से बचने के लिए खुदा की पनाह मांगता था. सो मेरे अल्लाह ने मेरी लाज रखी. लेकिन जिन्होंने अपनी इच्छाओं का पालन किया और शैतान को अपना दोस्त बनाया वह बुरे अंजाम से दो चार हो गए.
इसी बीच में सालेह मेरी तरफ मुड़ा और बोला:
'' अब्दुल्लाह चलो तुम्हें बुलाया जा रहा है.''
मैंने पूछा क्यों?
वह बोला जमशैद को हिसाब किताब के लिए पेश किया जाने वाला है. तुम्हें गवाही के लिए बुलाया जा रहा है.
'मेरी गवाही?'
'' हाँ तुम्हारी गवाही.''
'मेरी गवाही उसके पक्ष में होगा या उसके खिलाफ.?'
'' देखो अगर अल्लाह ने उसे माफ करने का इरादा किया है तो फिर वह तुमसे कोई ऐसी बात पूछेंगे जिसका जवाब उसके पक्ष में जाएगा. और अगर उसके गुनाहों के आधार पर उसे पकड़ने का फैसला किया है तो वह तुम से कोई ऐसी बात पूछेंगे जो उसके खिलाफ जाएगी. या हो सकता है कि कोई और मामला है. असल बात तो सिर्फ वही जानते हैं.''
मेरी हालत जो ठहर सी गई थी एक बार फिर ख़राब हो गई. मैं डरे हुए दिल और कांपते क़दमों के साथ सालेह के साथ रवाना हो गया.
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