मैं अन्य शोहदा और नबियों के साथ एक बार फिर आराफ की ऊंचाई पर खड़ा था. इस उंचाई से हष्र का मैदान बिल्कुल साफ नज़र आ रहा था. नज़र की हद तर फैले हुए मैदान में लोगों को दो समूहों में जमा कर दिया गया था. मैदान के दाहिने हाथ पर नज़र की हद तक लोगों की सफें दर सफें (लाइन पर लाइन) बनी हुई थी. यह जन्नत वाले थे. उनके चेहरे रोशन, आंखों में चमक और होंटों पर मुस्कान थी. उनके दिल खुशी से नाच रहे थे और उनकी रूहें (आत्माएं) शुक्र गुज़ारी के अहसास में डूबी हुई थी. यह दाहिने हाथ वाले थे. दाहिने हाथ वाले की खुशकिस्मती का क्या कहना!
मैदान के बाईं ओर लोग एक हुज्जूम के रूप में घुटनों के बल बैठे थे. उनके हाथ पीछे करके बांधे गए थे और जहन्नम का नज़ारा उनके सामने था. यह जहन्नमी थे जिनके लिए हमेशा के घाटे का फैसला सुनाया जा चुका था. वह अपने अंजाम की आहट को महसूस कर रहे थे. उनके चेहरे उतरे हुए, आँखें बुझी हुई सर गर्द गुबार से भरे हुए और गर्दन झुकी हुई थी. उनकी रंगत स्याह पड़ चुकी थी, शरीर पर गर्द ग़ुबार अटा हुआ था. यह बाएं हाथ वाले थे. बाएं हाथ वालों की बदनसीबी का क्या कहा.
सामने अर्श इलाही था. उसके जलाल व जमाल (महिमा) का क्या कहना! अर्श के आसपास पंक्तियों में फरिश्ते खड़े हुए थे. उनके बीच में अर्श से मिले हुए आठ बहुत ख़ास (अत्यंत असाधारण) फरिश्ते खड़े हुए थे. यह अर्श को उठाने वाले फरिश्ते थे. फरिश्तों की ज़ुबानों पर खुदा की तारीफ़ और बड़ाई (स्तुति) के शब्द जारी थे. जबकि अर्श के पीछे कुछ ऊंचाई पर जन्नत और जहन्नम दोनों का नज़ारा साफ दिख रहा था. दाहिने ओर जन्नत थी जिससे उठने वाली खुशबुओं ने हष्र के दाहिने हिस्से को महका रखा था और वहां के नगमों ने दिलों के तारों को छेड़ दिया था. जन्नत की बस्ती के खुबसूरत मंज़र, हरे हरे बाग़, बागीचे, महल, नदियाँ, नौकर साफ़ तौर से नजर आरहे थे . इस जन्नत का मंज़र (दृश्य) हर आदमी की आंखों को ललचा रहा था. जन्नती अपनी खुश नसीबी पर रश्क करते, जन्नत की आरज़ू मन में लिए एक दूसरे के साथ खुशियाँ बाँट रहे थे.
दूसरी तरफ जहन्नम का सबसे भयानक नज़ारा अर्श के बाएँ तरफ दिखता था. आग के शोले साँप के फन की तरह बार बार लपक रहे थे. जहन्नम में दिए जाने वाले तरह तरह के आज़बों का नज़ारा दिलों को दहला रहा था. बदबू, सड़न, आग, ज़हरीले कीड़े, वहशी जानवर, कड़वे कसीले फल, काँटेदार झाड़, पीप और लहू का खाना, खोलता हुआ पानी, उबलते हुए तेल की तलछत, उन जैसे अनगिनत अज़ाब और सबसे बढ़कर बहुत खौफनाक फरिश्ते जो हाथों में कोड़े, ज़नजीरें, तौक़ और हतोड़े जैसे हथ्यार लेकर जहन्नम वालों का स्वागत करने के लिए मौजूद थे.
जहन्नम वालों की बदहाली पहले ही कुछ कम न थी कि अब जहन्नम को उन्होंने अपनी आंखों से देख लिया था. इस मंज़र (दृश्य) ने उनकी हिम्मत को आखरी दर्जे में तोड़ डाला था. वह वहशत पड़ी नज़रों से यह मंज़र देख रहे थे. उनमे से हर आदमी की सबसे बड़ी ख्वाहिश (इच्छा) थी कि किसी तरह उनकी मौत का फैसला सुना दिया जाए. मगर अफसोस कि जहन्नम में हर अज़ाब था सिवाय मौत के. क्योंकि जहन्नम वालों के लिए मौत सबसे बड़ी राहत थी लेकिन जहन्नम अज़ाब की जगह (स्थान) थी, राहत की नहीं.
जन्नत वालों और जहन्नम वालों के बीच में एक पारदर्शी पर्दा था. जिससे दोनों एक दूसरे को देख सकते और बातचीत कर सकते थे, लेकिन उस परदे के पार नहीं जा सकते थे. जन्नत वाले जहन्नम वालों से पूछते कि हमने तो अपने रब (प्रभु) के वादों को सच पाया जो उस ने हमसे किये थे. क्या तुमने भी जहन्नम के सारे वादे और विवरण सच पाए जो ईश्वर ने तुम से किए थे. जहन्नम वालों के पास जवाब में स्वीकार कर गर्दन झुका देने और हां कहने के अलावा कोई और चारा ही नहीं था .
वह भूख और प्यास से बिलख रहे थे. इसलिए सामने जन्नत वालों के सामने मेवे, और तरह तरह के पकवान खाते और पीते देखते तो कहते कि पानी और दूसरी चीज़े जो खुदा ने तुम्हें दी हैं, कुछ हमें भी खाने के लिए दे दो. जवाब मिलता कि खुदा ने जहन्नम वालों पर यह सब चीज़े हराम रखी हैं.
हम ऊपर खड़े यह सब देख और सुन रहे थे. हालांकि हमारे फैसले का ऐलान एक रस्मी सी बात थी, लेकिन न जाने क्यों मेरा दिल डर रहा था. मैं अल्लाह तआला से उसकी रहमत और माफ़ी का सवाल कर रहा था. मैं दुआ कर रहा था कि परवरदिगार हमें जहन्नम वालों का साथी न बना बल्कि जन्नत में दाखिल फ़रमा. यही दुआ दूसरे लोग भी कर रहे थे.
यह मेरी हालत थी. जबकि कुछ दूसरे साथी इस मौके पर आगे बढ़े और पुकार कर जन्नत वालों को बधाई देने लगे. वह कह रहे थे कि आप पर खुदा की रहमत (दया) और सलामती (सुरक्षा) हो. इस मौके पर नबी आगे बढ़े और अपनी क़ौम के काफ़िर सरदारों को पहचान कर कहने लगे. कहाँ है आज तुम्हारी सरदारी, तुम्हारी फौज और तुम्हारा घमंड? फिर वह जन्नत वालों की तरफ़ इशारा करके कहते कि क्या यह वही गरीब लोग हैं जिन्हें तुम नीच समझते थे और सोचा करते थे कि उन्हें खुदा की रहमत से कोई भाग ना दुन्याँ में मिला है और न कभी मिलेगा. देख लो आज वह किस ऊँचे मक़ाम (उच्च स्थान) पर हैं.
इसी बीच में ऐलान हुआ कि हमारे नबियों और शोहदा को उनका आमाल नामा उन्हें दे दिया जाए. मेरी उम्मीद से उलट इस मौके पर हिसाब किताब या पेशी नहीं हुई. सिर्फ यह हुआ कि हर आदमी को आगे सामने की ओर बुलाया जाता जहां से हर जन्नती और जहन्नमी उसे देख सकता था. वह आदमी अपने साथ मौजूद फरिश्तों के साथ चलता हुआ आगे आता. फरिश्ते बहुत इज्ज़त के साथ उसे अर्श के सामने ले जाते. जहां ज़िन्दगी में उसके कारनामों और आखिरत (परलोक) में उनकी सफलता की घोषणा की जाती.
जब कोई आदमी पेश होता, उसके ज़माने के सारे हालात, जिन लोगों को उन्होंने दीन (धर्म) पहुँचाया उनकी प्रतिक्रिया और सब कुछ विस्तार से बताया जाता. बाकि लोग यह सब सुनते और दाद देते. आखिर में जब उसकी सफलता और दर्जे का ऐलान होता तो मुबारक बाद की गूंज उठती. जन्नत वाले तालियां बजाते और कुछ सीटियाँ और चीखें मार कर अपनी खुशी का इजहार करते.
जब मेरा नाम पुकारा गया तो साथ खड़े हुए सारे लोगों ने बधाई दी. मैं सालेह और इम्साइल के साथ किनारे पर पहुँचा जहाँ से मैदान में खड़े सभी लोग मुझे देख सकते थे. इम्साइल ने मेरा आमाल नामा उठा रखा था. जबकि सालेह मेरे आगे आगे चल रहा था. वहां पहुंच कर मैं सर झुका कर खड़ा हो गया. आवाज आई:
'' अब्दुल्लाह सर झुकाने का समय बीत गया. अब सर उठाओ. लोग तुम्हें देखना चाहते हैं.''
मैंने सर उठाया इस तरह कि मेरी आंखों में शुक्र गुज़री (आभार) के आंसू और मेरे होंठों पर जीत की मुस्कान थी. सालेह और इम्साइल ने बारगाह इलाही से इशारा पाकर मेरी ज़िन्दगी का विवरण बयान करना शुरू किया. मैंने मैदान की ओर नज़र दौड़ाई तो देखा कि मेरे परिवार वाले, दोस्त, मेरा साथ देने वाले खुदा के बन्दे, मेरी दावत क़ुबूल करने वाले ईमान ला चुके लोग, एक ईश्वर और आखिरत (परलोक) की बातें सुन कर गुनाहों से तौबा करने वाले मर्द और औरतें सब मुझे देख कर हाथ हिला रहे थे. मैं भी जवाब में हाथ हिलाने लगा, मगर मेरी नज़र नाएमा को खोज रही थी. वह अपने बच्चों के बीच खड़ी थी. उसकी आंखों में आंसू थे और वे भी हंस रही थी. उसे जब लगा कि मैं उसे देख रहा हूँ तो उसने शरमाकर नज़र झुका दी. लैला उसके बराबर में खड़ी थी. वह सबसे ज्यादा जोश में थी और अपनी कुर्सी पर चढ़ी तालियां बजा रही थी. जबकि आरफा, आलया, अनवर और जमशैद अपनी सीटों पर खड़े उत्साहित अंदाज में हाथ हिला रहे थे.
मैंने कुछ देखने के लिए नज़रें मैदान की बाईं ओर फेराई. यहाँ एक दूसरा ही मंज़र (दृश्य) था. शर्मिंदगी, अपमान, पछतावे, अंदेशे, निराशा, परेशानी, यातना, मुसीबत, मलामत, लज्जा और हसरत की खत्म न होने वाली काली रात थी जो जहन्नम वालों पर छाई हुई थी. अगर ज़मीन आसमान में बोलने की शक्ति होती तो वह जहन्नम वालों के हाल पर नोहा पढ़ते. मेरा दिल चाहा कि मैं किसी तरह समय का पहिया उल्टा घुमाकर पुरानी दुनिया में लौट जाऊँ और यह मंज़र दुनिया वालों को दिखा सकूँ. मैं चीख चीख कर उन्हें बताऊँ कि मेहनत करने वालो! एक दूसरे से मुकाबला करने वालो! माल और सामान की रेस लगाने वालो! मुकाबला करना है तो उस दिन की कामयाबी के लिए करो. रेस लगानी है तो जन्नत पाने के लिए लगाओ. योजना बनानी है तो जहन्नम से बचने की योजना बना. प्लाट, दुकान, मकान, बंगले, स्टैटस, कैरियर, गाड़ी, जेवर और कपड़े के दिखावे में एक दूसरे को पीछे छोड़ने वालो! दुनिया के मिलने पर हंसने और उसकी नुक्सान पर रोने वालो! हंसना है तो जन्नत की उम्मीद पर हंसो और रोना है तो जहन्नम के अंदेशे पर रो. मरना है तो उस दिन के लिए मरो और जीना है तो उस दिन के लिए जिओ.... जब ज़िन्दगी शुरू होगी. कभी न खत्म होने के लिए .
मेरी आंखों से बहने वाली आंसुओं की लड़ी और तेज हो गई. इस बार यह आँसू खुशी के नहीं थे. इस एहसास के थे कि शायद मैं थोड़ी सी मेहनत और करता तो ज्यादा लोगों तक मेरी बात पहुंच जाती और कितने ही लोग जहन्नम में जाने से बच जाते. मेरे दिल में तड़प कर एहसास हुआ. काश एक मौका और मिल जाए. काश कोई गुज़रा हुआ समय फिर लौट आए. ताकि मैं एक एक आदमी को झिंझोड़ कर उस दिन के बारे में खबर दार कर सकूं. मेरे दिल की गहराइयों से तड़प कर एक आह निकली. मैंने बड़ी बेबसी से नज़र उठाकर अर्श की ओर देखा. वहाँ हमेशा की तरह रुख-ए-अनवर पर जलाल (महिमा) का पर्दा था. मेरी नज़र उन कदमों पर आकर ठहरगई, जहां से मैं कभी नामुराद नहीं लौटा था. इस हकीर और गरीब बन्दे की सारी पहुंच इन क़दमों तक ही थी. सरे जहां से बेनियाज़ (जिसे कुछ ज़रुरत ना हो) शहंशाह के लिए इस बात का कोई महत्व हो तब भी, और उसका कोई महत्व ना हो तब भी, यही मेरी कुल संपत्ति थी. यही मेरी कुल पहुंच थी.
दिल को कुछ करार हुआ तो मेरी नज़र फिर जहन्नम वालों की तरफ फिर गई. इनमें से बहुत से लोग ऐसे थे जिन्हें मैं जानता था. उनकी संख्या बहुत अधिक थी. यह आपस में घुस कर गुलामों कि तरह बैठे हुए थे. यह लोग नज़र नहीं मिला रहे थे बल्कि बहुत सौं ने तो पीठ फेर ली थी. इसलिए मैं अपने जानने वाले ज्यादा लोगों को वहां नहीं देख सका. लेकिन उनको देख कर उस नेमत का अहसास हुआ कि किस तरह अल्लाह ने मुझे अपने रहम और कर्म से इस बुरे अंजाम से बचा लिया. मुझे महसूस हुआ कि जन्नत की अनगिनत नेमतों में से दो सबसे बड़ी नेअमतें शायद यह है कि इंसान को जहन्नम से बचा लिया जाएगा और दूसरा उसे बड़े सम्मान के साथ जन्नत में ले जाया जाएगा.
.............................................................................................................जारी है....
मैदान के बाईं ओर लोग एक हुज्जूम के रूप में घुटनों के बल बैठे थे. उनके हाथ पीछे करके बांधे गए थे और जहन्नम का नज़ारा उनके सामने था. यह जहन्नमी थे जिनके लिए हमेशा के घाटे का फैसला सुनाया जा चुका था. वह अपने अंजाम की आहट को महसूस कर रहे थे. उनके चेहरे उतरे हुए, आँखें बुझी हुई सर गर्द गुबार से भरे हुए और गर्दन झुकी हुई थी. उनकी रंगत स्याह पड़ चुकी थी, शरीर पर गर्द ग़ुबार अटा हुआ था. यह बाएं हाथ वाले थे. बाएं हाथ वालों की बदनसीबी का क्या कहा.
सामने अर्श इलाही था. उसके जलाल व जमाल (महिमा) का क्या कहना! अर्श के आसपास पंक्तियों में फरिश्ते खड़े हुए थे. उनके बीच में अर्श से मिले हुए आठ बहुत ख़ास (अत्यंत असाधारण) फरिश्ते खड़े हुए थे. यह अर्श को उठाने वाले फरिश्ते थे. फरिश्तों की ज़ुबानों पर खुदा की तारीफ़ और बड़ाई (स्तुति) के शब्द जारी थे. जबकि अर्श के पीछे कुछ ऊंचाई पर जन्नत और जहन्नम दोनों का नज़ारा साफ दिख रहा था. दाहिने ओर जन्नत थी जिससे उठने वाली खुशबुओं ने हष्र के दाहिने हिस्से को महका रखा था और वहां के नगमों ने दिलों के तारों को छेड़ दिया था. जन्नत की बस्ती के खुबसूरत मंज़र, हरे हरे बाग़, बागीचे, महल, नदियाँ, नौकर साफ़ तौर से नजर आरहे थे . इस जन्नत का मंज़र (दृश्य) हर आदमी की आंखों को ललचा रहा था. जन्नती अपनी खुश नसीबी पर रश्क करते, जन्नत की आरज़ू मन में लिए एक दूसरे के साथ खुशियाँ बाँट रहे थे.
दूसरी तरफ जहन्नम का सबसे भयानक नज़ारा अर्श के बाएँ तरफ दिखता था. आग के शोले साँप के फन की तरह बार बार लपक रहे थे. जहन्नम में दिए जाने वाले तरह तरह के आज़बों का नज़ारा दिलों को दहला रहा था. बदबू, सड़न, आग, ज़हरीले कीड़े, वहशी जानवर, कड़वे कसीले फल, काँटेदार झाड़, पीप और लहू का खाना, खोलता हुआ पानी, उबलते हुए तेल की तलछत, उन जैसे अनगिनत अज़ाब और सबसे बढ़कर बहुत खौफनाक फरिश्ते जो हाथों में कोड़े, ज़नजीरें, तौक़ और हतोड़े जैसे हथ्यार लेकर जहन्नम वालों का स्वागत करने के लिए मौजूद थे.
जहन्नम वालों की बदहाली पहले ही कुछ कम न थी कि अब जहन्नम को उन्होंने अपनी आंखों से देख लिया था. इस मंज़र (दृश्य) ने उनकी हिम्मत को आखरी दर्जे में तोड़ डाला था. वह वहशत पड़ी नज़रों से यह मंज़र देख रहे थे. उनमे से हर आदमी की सबसे बड़ी ख्वाहिश (इच्छा) थी कि किसी तरह उनकी मौत का फैसला सुना दिया जाए. मगर अफसोस कि जहन्नम में हर अज़ाब था सिवाय मौत के. क्योंकि जहन्नम वालों के लिए मौत सबसे बड़ी राहत थी लेकिन जहन्नम अज़ाब की जगह (स्थान) थी, राहत की नहीं.
जन्नत वालों और जहन्नम वालों के बीच में एक पारदर्शी पर्दा था. जिससे दोनों एक दूसरे को देख सकते और बातचीत कर सकते थे, लेकिन उस परदे के पार नहीं जा सकते थे. जन्नत वाले जहन्नम वालों से पूछते कि हमने तो अपने रब (प्रभु) के वादों को सच पाया जो उस ने हमसे किये थे. क्या तुमने भी जहन्नम के सारे वादे और विवरण सच पाए जो ईश्वर ने तुम से किए थे. जहन्नम वालों के पास जवाब में स्वीकार कर गर्दन झुका देने और हां कहने के अलावा कोई और चारा ही नहीं था .
वह भूख और प्यास से बिलख रहे थे. इसलिए सामने जन्नत वालों के सामने मेवे, और तरह तरह के पकवान खाते और पीते देखते तो कहते कि पानी और दूसरी चीज़े जो खुदा ने तुम्हें दी हैं, कुछ हमें भी खाने के लिए दे दो. जवाब मिलता कि खुदा ने जहन्नम वालों पर यह सब चीज़े हराम रखी हैं.
हम ऊपर खड़े यह सब देख और सुन रहे थे. हालांकि हमारे फैसले का ऐलान एक रस्मी सी बात थी, लेकिन न जाने क्यों मेरा दिल डर रहा था. मैं अल्लाह तआला से उसकी रहमत और माफ़ी का सवाल कर रहा था. मैं दुआ कर रहा था कि परवरदिगार हमें जहन्नम वालों का साथी न बना बल्कि जन्नत में दाखिल फ़रमा. यही दुआ दूसरे लोग भी कर रहे थे.
यह मेरी हालत थी. जबकि कुछ दूसरे साथी इस मौके पर आगे बढ़े और पुकार कर जन्नत वालों को बधाई देने लगे. वह कह रहे थे कि आप पर खुदा की रहमत (दया) और सलामती (सुरक्षा) हो. इस मौके पर नबी आगे बढ़े और अपनी क़ौम के काफ़िर सरदारों को पहचान कर कहने लगे. कहाँ है आज तुम्हारी सरदारी, तुम्हारी फौज और तुम्हारा घमंड? फिर वह जन्नत वालों की तरफ़ इशारा करके कहते कि क्या यह वही गरीब लोग हैं जिन्हें तुम नीच समझते थे और सोचा करते थे कि उन्हें खुदा की रहमत से कोई भाग ना दुन्याँ में मिला है और न कभी मिलेगा. देख लो आज वह किस ऊँचे मक़ाम (उच्च स्थान) पर हैं.
इसी बीच में ऐलान हुआ कि हमारे नबियों और शोहदा को उनका आमाल नामा उन्हें दे दिया जाए. मेरी उम्मीद से उलट इस मौके पर हिसाब किताब या पेशी नहीं हुई. सिर्फ यह हुआ कि हर आदमी को आगे सामने की ओर बुलाया जाता जहां से हर जन्नती और जहन्नमी उसे देख सकता था. वह आदमी अपने साथ मौजूद फरिश्तों के साथ चलता हुआ आगे आता. फरिश्ते बहुत इज्ज़त के साथ उसे अर्श के सामने ले जाते. जहां ज़िन्दगी में उसके कारनामों और आखिरत (परलोक) में उनकी सफलता की घोषणा की जाती.
जब कोई आदमी पेश होता, उसके ज़माने के सारे हालात, जिन लोगों को उन्होंने दीन (धर्म) पहुँचाया उनकी प्रतिक्रिया और सब कुछ विस्तार से बताया जाता. बाकि लोग यह सब सुनते और दाद देते. आखिर में जब उसकी सफलता और दर्जे का ऐलान होता तो मुबारक बाद की गूंज उठती. जन्नत वाले तालियां बजाते और कुछ सीटियाँ और चीखें मार कर अपनी खुशी का इजहार करते.
जब मेरा नाम पुकारा गया तो साथ खड़े हुए सारे लोगों ने बधाई दी. मैं सालेह और इम्साइल के साथ किनारे पर पहुँचा जहाँ से मैदान में खड़े सभी लोग मुझे देख सकते थे. इम्साइल ने मेरा आमाल नामा उठा रखा था. जबकि सालेह मेरे आगे आगे चल रहा था. वहां पहुंच कर मैं सर झुका कर खड़ा हो गया. आवाज आई:
'' अब्दुल्लाह सर झुकाने का समय बीत गया. अब सर उठाओ. लोग तुम्हें देखना चाहते हैं.''
मैंने सर उठाया इस तरह कि मेरी आंखों में शुक्र गुज़री (आभार) के आंसू और मेरे होंठों पर जीत की मुस्कान थी. सालेह और इम्साइल ने बारगाह इलाही से इशारा पाकर मेरी ज़िन्दगी का विवरण बयान करना शुरू किया. मैंने मैदान की ओर नज़र दौड़ाई तो देखा कि मेरे परिवार वाले, दोस्त, मेरा साथ देने वाले खुदा के बन्दे, मेरी दावत क़ुबूल करने वाले ईमान ला चुके लोग, एक ईश्वर और आखिरत (परलोक) की बातें सुन कर गुनाहों से तौबा करने वाले मर्द और औरतें सब मुझे देख कर हाथ हिला रहे थे. मैं भी जवाब में हाथ हिलाने लगा, मगर मेरी नज़र नाएमा को खोज रही थी. वह अपने बच्चों के बीच खड़ी थी. उसकी आंखों में आंसू थे और वे भी हंस रही थी. उसे जब लगा कि मैं उसे देख रहा हूँ तो उसने शरमाकर नज़र झुका दी. लैला उसके बराबर में खड़ी थी. वह सबसे ज्यादा जोश में थी और अपनी कुर्सी पर चढ़ी तालियां बजा रही थी. जबकि आरफा, आलया, अनवर और जमशैद अपनी सीटों पर खड़े उत्साहित अंदाज में हाथ हिला रहे थे.
मैंने कुछ देखने के लिए नज़रें मैदान की बाईं ओर फेराई. यहाँ एक दूसरा ही मंज़र (दृश्य) था. शर्मिंदगी, अपमान, पछतावे, अंदेशे, निराशा, परेशानी, यातना, मुसीबत, मलामत, लज्जा और हसरत की खत्म न होने वाली काली रात थी जो जहन्नम वालों पर छाई हुई थी. अगर ज़मीन आसमान में बोलने की शक्ति होती तो वह जहन्नम वालों के हाल पर नोहा पढ़ते. मेरा दिल चाहा कि मैं किसी तरह समय का पहिया उल्टा घुमाकर पुरानी दुनिया में लौट जाऊँ और यह मंज़र दुनिया वालों को दिखा सकूँ. मैं चीख चीख कर उन्हें बताऊँ कि मेहनत करने वालो! एक दूसरे से मुकाबला करने वालो! माल और सामान की रेस लगाने वालो! मुकाबला करना है तो उस दिन की कामयाबी के लिए करो. रेस लगानी है तो जन्नत पाने के लिए लगाओ. योजना बनानी है तो जहन्नम से बचने की योजना बना. प्लाट, दुकान, मकान, बंगले, स्टैटस, कैरियर, गाड़ी, जेवर और कपड़े के दिखावे में एक दूसरे को पीछे छोड़ने वालो! दुनिया के मिलने पर हंसने और उसकी नुक्सान पर रोने वालो! हंसना है तो जन्नत की उम्मीद पर हंसो और रोना है तो जहन्नम के अंदेशे पर रो. मरना है तो उस दिन के लिए मरो और जीना है तो उस दिन के लिए जिओ.... जब ज़िन्दगी शुरू होगी. कभी न खत्म होने के लिए .
मेरी आंखों से बहने वाली आंसुओं की लड़ी और तेज हो गई. इस बार यह आँसू खुशी के नहीं थे. इस एहसास के थे कि शायद मैं थोड़ी सी मेहनत और करता तो ज्यादा लोगों तक मेरी बात पहुंच जाती और कितने ही लोग जहन्नम में जाने से बच जाते. मेरे दिल में तड़प कर एहसास हुआ. काश एक मौका और मिल जाए. काश कोई गुज़रा हुआ समय फिर लौट आए. ताकि मैं एक एक आदमी को झिंझोड़ कर उस दिन के बारे में खबर दार कर सकूं. मेरे दिल की गहराइयों से तड़प कर एक आह निकली. मैंने बड़ी बेबसी से नज़र उठाकर अर्श की ओर देखा. वहाँ हमेशा की तरह रुख-ए-अनवर पर जलाल (महिमा) का पर्दा था. मेरी नज़र उन कदमों पर आकर ठहरगई, जहां से मैं कभी नामुराद नहीं लौटा था. इस हकीर और गरीब बन्दे की सारी पहुंच इन क़दमों तक ही थी. सरे जहां से बेनियाज़ (जिसे कुछ ज़रुरत ना हो) शहंशाह के लिए इस बात का कोई महत्व हो तब भी, और उसका कोई महत्व ना हो तब भी, यही मेरी कुल संपत्ति थी. यही मेरी कुल पहुंच थी.
दिल को कुछ करार हुआ तो मेरी नज़र फिर जहन्नम वालों की तरफ फिर गई. इनमें से बहुत से लोग ऐसे थे जिन्हें मैं जानता था. उनकी संख्या बहुत अधिक थी. यह आपस में घुस कर गुलामों कि तरह बैठे हुए थे. यह लोग नज़र नहीं मिला रहे थे बल्कि बहुत सौं ने तो पीठ फेर ली थी. इसलिए मैं अपने जानने वाले ज्यादा लोगों को वहां नहीं देख सका. लेकिन उनको देख कर उस नेमत का अहसास हुआ कि किस तरह अल्लाह ने मुझे अपने रहम और कर्म से इस बुरे अंजाम से बचा लिया. मुझे महसूस हुआ कि जन्नत की अनगिनत नेमतों में से दो सबसे बड़ी नेअमतें शायद यह है कि इंसान को जहन्नम से बचा लिया जाएगा और दूसरा उसे बड़े सम्मान के साथ जन्नत में ले जाया जाएगा.
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